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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७५)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७५)

चतुर्दश सर्ग

रामचन्द्र और महावीरजीका संवाद

सर्वलोकैकनिर्माता सर्वलोकैकरक्षिता ॥ सर्वलोकैकसंहर्ता सर्वा-
त्माहं सनातनः ॥ १ ॥ सर्वेषामेव वस्तूनामंतर्यामी पिता ह्यहम् ॥
मय्येवान्तःस्थितं सर्वं नाहं सर्वत्र संस्थितः ॥ २ ॥

सब लोकोंका निर्माण करनेवाला सब लोकका रक्षक, सर्वलोकका संहार-
कर्त्ता, सर्वात्मा, सनातन मैं हूँ ॥ १ ॥ सब वस्तुओंका अन्तर्यामी पिता हूँ
मेरे अन्तःकरणमें सब स्थित हैं मैं नहीं ॥ २ ॥

भवता चाद्भुते दृष्टं यत्स्वरूपं तु मामकम् ॥ ममैषा ह्युपमा वत्स
मायया दर्शिता मया ॥ ३ ॥ सर्वेषामेव भावानांमंतरा समवस्थितः ॥
प्रेरयामि जगत्सर्वं क्रियाशक्तिरियं मम ॥ ४ ॥

तुमने जो मेरा अद्भुतरूप देखा है हे वत्स ! मायाद्वारा मैंनेही यह रूप
निर्माण किया है ॥ ३ ॥ सब भावोंके अन्तरमें में ही स्थित हूँ, सब जगत्को
मैं प्रेरणा करता हूँ, यह मेरी क्रियाशक्ति है ॥ ४ ॥

ययेदं चेष्टते विश्वं मत्स्वभावानुवर्ति च ॥ सोऽहं काले जगत्कृत्स्नं
करोमि हनुमन् किल ॥ ५ ॥ संहराम्येकरूपेण द्विधावस्था ममैव
तु ॥ आदिमध्यांतनिर्मुक्तो मायातत्त्व प्रवर्तकः ॥ ६ ॥

यह जगत् मेरे द्वारा चेष्टा किया जाता है और मेरे स्वभावका अनुवर्तन
करनेवाला है, हे हनुमन् ! सो मैं समयपर सब जगत्को निर्माण करता हूँ ॥ ५ ॥
एक रूपसे कहता हूँ, यह दो प्रकारसे मेरीही अवस्था है, आदि मध्य अन्तरसे
रहित तत्त्वका प्रवृत्त करनेवाला मैं ही हूँ ॥ ६ ॥

क्षोभयामि च सर्गादौ प्रधानपुरुषावुभौ ॥ ताभ्यां संजायते सर्वं
संयुक्ताभ्यां परस्परम् ॥ ७ ॥ महदादिक्रमेणैव मम तेजो विजृंभि-
तम् ॥ यो हि सर्वजगत्साक्षी कालचक्रप्रवर्तकः ॥ ८ ॥

सृष्टिकी आदिमें मैं प्रधान और पुरुषको क्षुभित करता हूँ, उनके परस्पर
संयुक्त होनेसे यह जगत् होता है ॥ ७ ॥ महदादिके क्रमसे यह मेरा तेज फैल
रहा है, जो सब जगत्का साक्षी कालचक्रका प्रवृत्त करनेवाला है ॥ ८ ॥

(७६) अद्भुतरामायण [ चतुर्दश-

हिरण्यगर्भो मार्तंडः सोऽपि मद्देहसंभवः ॥ तस्मै दिव्यं स्वमैश्वर्यं
ज्ञानयोगं सनातनम् ॥ ९ ॥ दत्तवानात्मजावेदान् कल्पादौ चतुरः
किल ॥ स मन्नियोगतो ब्रह्मा सदा मद्भाव भावितः ॥ १० ॥
हिरण्यगर्भ मार्तण्ड है वह मेरे देहसे प्रगट है, उसको मैंने अपना दिव्य
ऐश्वर्यको सनातन ज्ञानयोग ॥ ९ ॥ और कल्पकी आदिमें चारों वेदोंको दिया
है, वह मन्नियोगसे भगवान् सदा सद्भावमें स्थित हुए ॥ १० ॥

दिव्यं तन्मामकैश्वर्यं सर्वदा वहति स्वयम् ॥ स सर्वलोकनिर्माता
मन्नियोगेन सर्ववित् ॥ ११ ॥ भूत्वा चतुर्मुखः सर्वं सृजत्येवात्मसं-
भवः ॥ योऽपि नारायणोऽनन्तो लोकानां प्रभवाव्ययः ॥ १२ ॥
उस मेरे दिव्य ऐश्वर्यको सदा धारण करते हैं, यह सबके निर्माता सबके
ज्ञाता मेरी आज्ञासे ॥ ११ ॥ चतुर्मुखी होकर सृष्टिको निर्माण करते हैं,
जो नारायण अनन्त लोकोंके प्रभु अविनाशी हैं ॥ १२ ॥

ममैव परमा मूर्तिः करोति परिपालनम् ॥ योऽन्तकः सर्वभूतानां
रुद्रः कालात्मकः प्रभुः ॥ १३ ॥ मदाज्ञयाऽसौ सततं संहरत्येव मे
तनुः ॥ हव्यं वहति देवानां कव्यं कव्याशिनामपि ॥ १४ ॥
वह मेरीही परमा मूर्ति होकर जगत्का पालन करते हैं, जो सब भूतोंका
अन्तक रुद्र कालात्मा प्रभु है ॥ १३ ॥ वह मेरा शरीर मेरी आज्ञासे ही यह
सब संहार करता है, देवताओंके निमित्त हव्य वहन करता हुआ ॥ १४ ॥

पाकं च कुरुते वह्निः सोऽपि मच्छक्तिचोदितः ॥ भुक्तमाहारजातं
यत्पचत्येतदहर्निशम् ॥ १५ ॥ वैश्वानरोऽग्निर्भगवानीश्वरस्य नियो-
गतः ॥ यो हि सर्वांभसां योनिर्वरुणो देवपुंगवः ॥ १६ ॥
अग्नि जो पाक करता है वह भी मेरी शक्तिसे प्रेरित हुआ करता है, जो
कुछ भोजन किया आहार है मेरे बलसे जठराग्नि उसे पचाती है ॥ १५ ॥
भगवान् वैश्वानर अग्नि मेरी आज्ञासे यह करता है, जो सम्पूर्ण जलोंकी योनि
वरुणदेवता है ॥ १६ ॥

स संजीवयते सर्वमीशस्यैव नियोगतः ॥ योऽन्तस्तिष्ठति भूतानां
बहिर्देवो निरंजनः ॥ १७ ॥ मदाज्ञयासौ भूतानां शरीराणि बिभर्ति
हि ॥ योऽपि संजीवनो नॄणां देवानाममृताकरः ॥ १८ ॥