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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१११)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१११)

रथसे रथीको राक्षसको राक्षस द्वारा घोडेको घोडेसे पृथ्वीतलमें पीसने लगे ॥ २५ ॥ वानरोंसे वानरोंको घोररूपसे राक्षस ताडन करने लगे और राक्षसोंको राक्षसद्वारा पीसने लगे ॥ २६ ॥

आक्षिप्य च शिला जघ्नु राक्षसा वानर स्तथा ॥ तेषामाच्छिद्य शस्त्राणि जघ्नुस्तानपि वानराः ॥ २७ ॥ निर्जघ्नुः शैलशिखैर्विभिन्नाश्च परस्परम् ॥ सिंहनादं विनेदुश्च रणे वानरराक्षसाः ॥ २८ ॥

शिलाओंसे राक्षस वानरोंको मर्द्दन करने लगे और उनके शस्त्रोंको छेदन कर वानर उनको मारने लगे ॥ २७ ॥ परस्पर शैलशिखरोंको प्रहारकरके रणमें परस्पर ताडन कर रीछ वानर शब्द करने लगे ॥ २८ ॥

छिन्नचर्मतनुत्राणा राक्षसा वानरैः कृताः ॥ सुस्राव रुधिरं तेभ्यः स्रवतः पर्वतादिव ॥ २९ ॥ तस्मिंस्तदा संयति संप्रवृत्ते कोलाहले राक्षसराजधान्याम् ॥ संहृष्यमाणेषु च वानरेषु निपात्यमानेषु च राक्षसेषु ॥ ३० ॥

छिन्न चर्मतरकस राक्षसोंको वानरोंने कर दिये और पर्वतोंसे झरनेके समान उनके रुधिर निकलने लगा ॥ २९ ॥ तब उस संग्रामसे प्रवृत्त होनेमें राजधानीमें वडा कोलाहल हो गया, वानरोंके प्रसन्न होनेमें और राक्षसोंके मारनेमें ॥ ३० ॥

प्रभज्य मानेषु महाबलेषु महर्षयो भूतगणाश्च नेदु ॥ तेनापि सर्वे हरयः प्रहृष्टा विनेदुरास्फोटितसिंहनादैः ॥ ३१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तर काण्डे संकुलयुद्धं नामविंशतितमः सर्गः ॥ २० ॥

महासेनाके भग्न होनेमें महर्षि और भूतगण शब्द करने लगे, इससे सब वानर प्रसन्न हुए और भुजा फटकारते सिंहनाद करने लगे ॥ ३१ ॥

इत्यार्षे श्रीम. मा. आदि. अद्भु. भा. टी. संकुलयुद्धंनाम विंशतितमः सर्गः ॥ २० ॥

(११२) अद्भुतरामायण [ एकविंशति-

एकविंशति सर्ग

रावणका रामकी सेनाको विक्षेप करना

ततो रथं मारुततुल्यवेगमारुह्य शक्तिं निशितां प्रगृह्य ।। स
रावणो रामबलं प्रहृष्टो विवेश मीनो हि यथार्णवौघम् ।। १ ।।
सवानरान्हीनबलान्निरीक्ष्य प्राणेन दीप्तेन रराज राजा ।। एक-
क्षणेनैद्ररिपुर्महात्मा निहंतुमैच्छन्नरवानरांच ।। २ ।।

तब वडे क्षीण रथमें सवार होकर तीक्षण शक्तिको ग्रहण कर रावण रामकी सेनामें ऐसे प्रविष्ट हुआ जैसे मीन-सागरमें प्रवेश करती है ।। १ ।। तब वह वानरोंको हीनबल देखकर और राजा रावण प्राणोंके दीप्त होनेपर एकही क्षणमें उस वानरी सेनाके मारनेकी इच्छा करने लगा ।। २ ।।

मनसा चिंतयामास सहस्र कंधरः स्वराट् ।। एते क्षुद्राः समायाताः
प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च।। ३ ।। द्वीपांतरं महत्प्राप्य मम युद्धाभिकां-
क्षिणः ।। किं स्यान्म महतैः क्षुद्रैर्नरराक्षसवानरैः ।। ४ ।।

वह सहस्रमुखका रावण मनमें विचार करने लगा, यह क्षुद्र अपने प्राण और धन छोडकर यहां आये हैं ।। ३ ।। और द्वीपान्तरमें प्राप्त होकर मुझसे युद्धकी इच्छा करते हैं, इन क्षुद्र नर राक्षस वानरोंके मारनेसे मुझे क्या मिलेगा ।। ४ ।।

यस्माद्देशात्समायातास्तं देशं प्रापयाम्यहम् ।। क्षुल्लकेषु शराघातं
न प्रशंसंति पंडिताः ।। ५ ।। इति संचिंत्य धनुषावायव्यास्त्रं युयोज
ह ।। तेनास्त्रेण नरा ऋक्षा वानरा राक्षसा हि ते ।। ६ ।।

यह जिस देशसे आये हैं उसी देशमें प्राप्त किये देता हूँ क्षुद्रोंमें शराघात करनेकी पंडित जन प्रशंसा नहीं करते हैं ।। ५ ।। यह विचार कर धनुषपर वायव्य अस्त्र चढाया, उस अस्त्रसे राक्षस वानर जितने सेनाके लोग थे ।। ६ ।।

यस्माद्यस्मात्समायातास्तं तं देशं प्रयापिताः ।। गलहस्तिकया
विप्र चोरान्राजभटा इव ।। ७ ।। ते सर्वे स्वगृहं प्राप्ता अस्त्रवेगेन
विस्मिताः ।। क्व स्थिताः क्व समा*यातामन्यंत स्वप्न एव तैः ।।८।।


* समायाताः अमन्यंतेतिच्छेदः संधिरार्षः ।