शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
इस ग्रन्थ के बारे में
'शुक्रनीति' (शुक्रनीतिसार) राजनीति और शासन-व्यवस्था का संस्कृत ग्रन्थ है, जो असुरों के गुरु शुक्राचार्य के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें राजा के कर्तव्य, मन्त्रियों और अधिकारियों की नियुक्ति, राजकोष, कर-व्यवस्था, न्याय, दुर्ग, सेना और युद्ध-नीति के साथ-साथ लोक-व्यवहार, नगर-रचना और प्रतिमा-निर्माण जैसे विषय भी आते हैं। ग्रन्थ के समय पर विद्वानों में मतभेद है; इसमें आग्नेय अस्त्रों (नालिका) के वर्णन के कारण कई विद्वान इसके वर्तमान रूप को अपेक्षाकृत बाद का मानते हैं।
इस संस्करण में मूल श्लोकों के साथ 'विद्योतिनी' नाम की हिन्दी व्याख्या है। यह काशी संस्कृत ग्रन्थमाला (संख्या १८५) में चौखम्बा संस्कृत सीरीज़ ऑफ़िस, वाराणसी से विक्रम संवत् २०२५ में पहली बार प्रकाशित हुआ। व्याख्याकार का नाम आरम्भिक पृष्ठों में नहीं आया है। स्कैन वाराणसी के मुमुक्षु भवन वेद-वेदांग पुस्तकालय की प्रति से है।
ग्रन्थ अध्याय-क्रम से चलता है। उदाहरण के लिए दूसरे अध्याय में राज-सेवकों के वेतन और उनके पालन के नियम हैं, जैसे सेवक के वेतन का छठा या चौथा भाग उसके लिए सुरक्षित रखना। ५२६ पृष्ठों का यह ग्रन्थ प्राचीन भारतीय राजनीति-शास्त्र के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी है।
श्लोकानुक्रमणिका
| श्लोक/वाक्य | पृष्ठ | श्लोक/वाक्य | पृष्ठ | श्लोक/वाक्य | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वयत्नेन माध्यस्थ्यं | १६४ | साधन्करश्चैव प्राचीन | १०६ | सुकृतं यत्त्वया किञ्चित् | १०२ |
| सर्वलोकव्यवहार | २ | साधारणमिदं मान | ३३४ | सुखं च न बिना धर्मात् | १२५ |
| सर्ववर्णोत्तमां कन्यां | २८५ | साधुभ्योऽतिस्वमृदुत्वं | ५४ | सुखप्रबन्धगोष्ठीपु | ८९ |
| सर्वविद्याकलाम्यासे | ५३ | साध्वी भार्या पितृपत्नी | १४६ | सुखाय कल्पते नित्यं | २७३ |
| सर्वविद्यासु कुशलो | ५७ | सामंतः स नृपः प्रोक्तो | २८ | सुखासक्तोऽस्यजेद् भृत्यान् | १८९ |
| सर्वस्मादधिको दाता | ५२ | साम दानञ्च भेदञ्च | ७० | सुगतिदुर्गतिर्नित्यं | ३४५ |
| सर्वांशैः सर्वरम्यो हि | २५३ | सामन्तादिपदभ्रष्टा | २९ | सुगत्याऽग्निर्निरुं दाढ्यं | ३४७ |
| सर्वामोह करं नीति | १ | सामन्तादिषु धर्मोऽयं | ४६ | सुजनैः संगमं कुर्या | २५ |
| सर्वेभ्यः श्फटाः श्रेष्ठा | ३५४ | सामन्तादिसमा ये तु | २९ | सुतसङ्कोइपत्रं वा | ३०७ |
| सर्वोपजीवकं लोक | १ | सा माता प्रीतिदा नित्यं | १६८ | सुतस्य सुतदाराणां | ३१६ |
| सर्वोपायैस्तथा कुर्यान् | १८६ | सामात्ययुवराजादियं | २०१ | सुतास्तनैर्विनेया हि | ३५३ |
| सवनाद्यैश्च सा शिक्षा | २२७ | सामान्यं याचितं न्यास | ३१९ | सुदरिद्रं रोगिणं च | १२९ |
| सव्यःसारवेधोथ | ३३१ | सामान्यान् दशहस्तैश्च | २४४ | सुदासदास्यौ सदूदेहुः | १७४ |
| स बाणो दलभङ्गी तु | ३४४ | साम्मुख्येन प्रयातेन | ३८१ | सुदीर्घेणापि कालेन | २१८ |
| सशूलिकं गृहीतं यद् | १०६ | सायं ग्रीष्मे तु शरदि | ३४७ | सुदृष्टंन्नास्तु दायादा | ६१ |
| सवेरलक्षिता शीघ्रं | २४० | सायं प्रातः सैनिकानां | १८९ | सुनीतिकुशला नित्यं | २ |
| सशस्त्रो दशहस्तं तु | ९८ | सायं प्रातस्तु घर्मान्ते | २४५ | सुनीतिशास्त्र कुशलान् | ९० |
| स हृदावन्न सङ्कुर्या | २४२ | सायंव्ययैर्मुहूर्तानां | ४१ | सुपुष्टं कान्तिमद्भाति | २०५ |
| ससङ्करचतुर्वर्ण | १२३ | साद्र्धव्याघ्रक्रोडशूष्ठ | २५२ | सुपुष्पाश्चैव ये वृक्षा | २४४ |
| ससभ्यः प्राड्विवाकस्तु | ७२ | सार्धं द्विकोटिहस्तेश्च | ३० | सुप्ते पत्न्यौ तदभ्यास्य | २३९ |
| ससाक्षिमच्च तन्प्रोक्तं | १०४ | सार्धंचतुस्तालमितः | २६३ | सुफलं तु भवेत्कर्म | १३८ |
| सह सुखेन नृपतिः | ३५७ | सार्धाङ्गुलं स्तटास्थानं | ११५ | सुभूषणः सुवसनः | ५२ |
| सहस्रचापप्रमितं | ३४६ | सावधानमना नित्यं | १३४ | सुभूषणां सुसंशुद्धां | ५५ |
| सहस्रहस्तविस्तारो | २४७ | सावधानमना भूत्वा | ४० | सुभूपता तु यन्नीत्या | ४०६ |
| सहस्रेऽपद्धते चाम्निः | १०८ | सावधानमनाः सिद्ध | ४८ | सुभृत्यास्तैपि सन्त्यार्या | ८६ |
| सहायगौरवाद् विद्या | १९५ | सावधारणकं चैव | १०२ | सुमदद्गुणिर्न स्वातै | १२७ |
| सहायपूर्ण यद् दुर्गं | ३२५ | साश्वश्च सगजश्चापि | १८ | समुखाडजयवनेऽडो | ३३२ |
| सहायवान्सहामात्य | ३४ | साहसिकं चाधिकं च | १०७ | सुयुक्त्याऽण्वार्जनं यत्र | २३० |
| सहायसैन्यदुर्गे तु | ३२५ | साहसिकस्तु संयोज्य | ७७ | संयुक्तकार्मुकं सारम् | ३२८ |
| सहासनश्चातिमानी | २८२ | साहसेषु च सर्वेषु | २९९ | सुक्ष्मामुक्ष्भरणाद्या | २२१ |
| सांग्रामिकश्च कल्पस्ति | ७० | साहित्यशास्त्रनिपुणः | ८३ | सुवर्चिलवणाङ्गाङ्गाः | १५८ |
| सा किं महाधनायैव | १७२ | सिंहशावा इव घ्नन्ति | ५९ | सुवर्णं द्विशतांशं तु | ३२२ |
| सा क्रिया सन्धिरित्युक्ता | ३६३ | सिद्धिक्यान्यथा पित्रा | २१७ | सुवर्णं रजतं ताम्रं | २१४ |
| साक्षिसम्भावसञ्ज्ञानां | ११४ | सीरभेदैः कृषिः प्रोक्ता | २२४ | सुवर्णरत्नरजत | १३० |
| साङ्गानां सोपवेदानां | १५० | सीवने कञ्चुकादीनां | २३५ | सुवसाचैर्भूर्षवित्ला | ३० |
| सातपत्र-पदत्राणो | १२५ | सुक्रान्तिगन्धवर्णैश्च | १३८ | सुविधमाह्मणगुरोः | ३७७ |
| सात्त्विकं राजसं चैव | ५ | सुकृत्यै संत्यजेन्नित्यं | २१ | सुविधा मन्त्रमौषध्य | ३४१ |
| सात्त्विकी राजसी देव | २४९ | सुकुलश्च सुशीळश्च | ३५ | सुविस्तृतदळस्तथैव | २११ |
| सुशिल्पशक्तः सम्यक् | ८० |
४३४ || शुक्रनीतिः
| श्लोकार्ध / पद | संख्या | श्लोकार्ध / पद | संख्या | श्लोकार्ध / पद | संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| सुसञ्चितं बलं धार्यं | १५७ | स्त्रीपुत्रार्थं कृतो यच्च | २०१ | स्वप्रजादण्डमेदेश्च | १८७ |
| सुसमृद्धं चिरस्थायी | २०५ | स्त्रीविप्राभ्युपपत्तौ च | ३७४ | स्वप्रजाधर्मसंस्थानं | २६९ |
| सुसेविताः प्रकुप्यन्ति | १३३ | स्थलावयवविज्ञानं | ११५ | स्वप्रजानां न भेदेन | १८४ |
| सुहृत्संबन्धिकीपुत्र | १८५ | स्थलेभ्यस्तेषु सन्तिष्ठेत् | ३७१ | स्वभावगुप्त्या दास्यत्वे | २९ |
| सुहृदं भ्रातरं बन्धु | १४२ | स्थानात्तेभः कालकृतः | १८४ | स्वभागार्द्धहरा कन्या | ३१७ |
| सुहृद्भिरामयः स्नाने | ३६५ | स्थावरस्य ग्रामपादि | २१७ | स्वभावतो भवन्त्येते | १८३ |
| सूचहस्तोमकाम्यां वा | २८० | स्थावरेषु विवादेषु | ३१२ | स्वभावदुष्टानेतान् हि | २१७ |
| सूचीसूक्ष्ममुखो दीर्घे | ३०३ | स्थितो मृत्युमुखे चाई | १६० | स्वयं ग्राह्येण ताम्बूलं | २८० |
| सूचीतुल्यं शकटव | ३६९ | स्थूलकुक्षिः सिंहदृक् च | ३३२ | स्वयं धर्म परो भूत्वा | २२२ |
| सूक्ष्मज्ञानि च रक्षन्तु | १८८ | स्नानशीलः सुसुरभिः | १२५ | स्वयम्भूभगवाँल्लोक | १ |
| सेनपैस्तु बिना नैव | ९८ | स्निग्धदीपेन्द्रशिखालोक | १७ | स्वयं सर्वं तु विसृजे | ५१ |
| सेनादुर्गं तु यस्य स्यात् | ३२५ | स्नुह्रार्काणां रसोनस्य | ३५८ | स्वरक्षणं शत्रुनाशो | ३६१ |
| सेनाबलन्तु द्विविधं | ३२८ | स्नेहं सम्पादयेत् पश्चात् | ३४७ | स्वरैरुदात्तादिधर्मैः | २२७ |
| सेनासङ्गं सज्जं स्यात् | ३८७ | स्मृतिर्विनिर्णयं ब्रूते | २७५ | स्वस्वाणि मानवादीनां | २४८ |
| सेव्यो वा वणिग्भृत्या | ३१६ | स्वकनिष्ठां रितुभ्यं वा | ५९ | स्वर्णदण्डधरो पार्श्वे | ५३ |
| सेर्वां वाऽपिच स्वीकुर्यात् | ३६४ | स्वकार्यं साधयेत् प्राज्ञः | १८४ | स्वर्णरत्नगलङ्कार | ८६ |
| सेवाशौर्यादिभिस्तुष्टः | १०३ | स्वकार्ये शिथिलो यः स्यात् | २०७ | स्वर्णस्य तद्य पत्रमूल्यं | २१२ |
| सेवितस्त्वथु राज्ञो नै | १२९ | स्वकार्यार्थ प्रकुर्व्वन्ति | १६७ | स्वर्गस्योत्तमकार्ये तु | ३२२ |
| सैनिकाः कति सन्त्येतेः | ७८ | स्वकुलोत्पन्नकन्यायाः | ६१ | स्वर्णादर्थं च रजताव् | २१९ |
| सैनिकाः सैनिकैरेव | २७२ | स्वगमाऽन्यगमा चेति | ३२७ | स्वर्णादीनां तु याथात्म्य | २५५ |
| सैनिकार्थं तु पण्यानि | ३८७ | स्वगमा या स्वयं गन्त्री | ३२७ | स्वर्णाद्यलङ्कारकृतिः | " |
| सैनिकैरन्यसेवित्वं | ३८८ | स्वगुणश्रवणात्रित्यं | १७७ | स्वविशिष्टं च यच्चिह्नं | १२२ |
| सैन्याद्विना नैव राज्यं | ३२७ | स्वगोत्रे तु तथा कुर्यात् | ३३० | स्वनेपरूपसदृशान् | १९८ |
| सैन्याधीशेन प्रथमं | ३८१ | स्वजनेनै विरुद्धयेत | ३३४ | स्वशक्तितानां सामीप्यं | १४९ |
| सैवाचार्यः पुरोधा यः | ६८ | स्वतन्त्रः साधयन्नन्यान् | ३१२ | स्वशिशुं शिक्षयेदन्य | १७९ |
| सोदरेषु च सर्वेषु | ६२ | स्वतन्त्राः सर्व एवेते | ३१६ | स्वसंपत्तिमदान्नेव | ६२ |
| सोऽन्ते नरकमाप्नोति | ३७९ | स्वत्वनिवर्तको द्वेधा | १०९ | स्वः सदृशः समीपे वा | ५२ |
| सोऽप्यं साधनं यच्च | ३२० | स्वदुर्गुणं श्रवणतो | १७७ | स्वसैनिकैर्विना कोऽपि | ३६८ |
| सौजन्यात् साधकं मैत्रं | ३२८ | स्वदोषदर्शनां कार्याः | ५० | स्वस्तिकशङ्खनिस्त्रिंशैर् | ३३८ |
| सौदायिकं धनं प्राप्य | ३१७ | स्वधर्मं परमं मत्वा | ४०१ | रवस्वत्वेऽधिकसंगं त | १०७ |
| स्कन्धादि मुण्डमूलान्तं | ३३५ | स्वधर्मनिरताम्ब्रूरान् | ५९ | स्वस्वधर्मपरो लोके | २२२ |
| स्तम्भैश्च भित्तिभिर्वापि | ३४ | स्वधर्मनिरतो नित्यं | १३५ | स्वस्वमुष्टेश्चतुर्भौऽशो | २५० |
| स्तेनकूटनिसृष्ट्यर्थं | ४०७ | स्वधर्मनीतिबलवां | १३९ | स्वहस्तकालसम्पन्नं | १०३ |
| स्त्रियोमूलमनर्थस्य | १४५ | स्वधर्माचरणे दक्षो | ८१ | स्वहस्त लिखितं वाऽन्य | २९६ |
| स्त्रीकट्यां परिधिः प्रोक्तः | २६५ | स्वनामाकृतयश्चैते | २६२ | स्वाधीनप्रतिप्राकारो | ३६ |
| स्त्रीणां नामापि संह्रादि | १८ | स्वपुष्टौ राजपुष्टौ वा | २८९ | स्वाहेतुभिर्न हन्येत | १३६ |
| स्त्रीणां नैव तु देवः स्याद् | १२९ | स्वपूर्वजपिण्डदत्वाद् | १४३ | स्वागमी सद्धमयी पात्र | २०२ |
| स्त्रीणां शीलाभिभोगेपु | ३१० | स्वपूर्वाशं द्वितीयेऽह्नि | ३९१ | स्वाग्रे दक्षिणभागे तु | ५१ |
| स्त्रीपुत्रमोहा बह्वश्वान् | १६ | स्वपेद् भूमावप्रमत्तः | २४० | स्वातन्त्र्यं न क्षणामपि | १२८ |
श्लोकानुक्रमणिका
| पाद / श्लोक | पृष्ठ | पाद / श्लोक | पृष्ठ | पाद / श्लोक | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| स्वाभ्यन्तसन्निकर्षेण | ६० | स्वीया तु परकीया वा | १२८ | हीनमध्यादिसंयोग | २३४ |
| स्वाभ्यन्तसन्निकर्षेण | १२९ | स्वीया तया च सामान्या | ४०७ | हीनश्मश्रुनिमेषां च | २५९ |
| स्वाधिकारिगणस्यापि | १८८ | स्वेष्टहानिकरः शत्रुः | २६९ | हीनाङ्गी स्वामिनं हन्ति | ,, |
| स्वाधीनं सन्निरतं द्वेधा | १०७ | ह | हीनादिरससंभोगात् | २३२ | |
| स्वानुत्पादितसंत्रास | ७१ | हंसाः स्खलन्ति कूजन्ति | ४७ | हीना निम्ना छदिर्नस्याद् | ३५ |
| स्वान्तेऽभिचूर्णं संधार्य | २५७ | हयग्रीवो वराहश्च | २५९ | हीनाल्पकर्मिणश्चैते | ८६ |
| स्वान् दुर्गुणान् परित्यज्य | १४ | हरेद् पादं वनात्तस्य | १९५ | हीने तदर्धा कटके | १२३ |
| स्वान्दोलायितहृद्स्तु | ३३१ | हस्तपादाङ्गुष्ठयोश्च | २५६ | हीयते कुशहायेन | ५८ |
| स्वामिकार्ये विनष्टोय | १२० | हस्त्यश्वरथचर्मांसु | ३७७ | हीयते नान्यथा राजा | ७५ |
| स्वामित्वं चैव दातृत्वं | १९ | हावभावादिसंयुक्तं | २३२ | हृतराज्यस्य पुत्रादौ | १९१ |
| स्वामिन्नेवानुरक्तो यो | ४०७ | हिङ्गुलस्य तथा कान्त | ३५९ | हृदि विद्ध इवात्यर्थं | २६ |
| स्वामी स एव विज्ञेयो | ४०५ | हितं त्वरितवच्चान्ते | ४०० | हृन्मध्य-परिविक्षेपः | २५५ |
| स्वाम्यमात्यसुहृत्कोश | १० | हितास्तेयान्यथाकाम | १२६ | हृष्टं कृत्वा स्वीयवलं | ३६७ |
| स्वाम्यसेवकसेव्यार्थं | १०५ | हितोपदेष्टा शिष्यस्य | १३ | हृष्टरोमा भवेद् वशूः | ४७ |
| स्वारम्भपूतिसदृशे | ११२ | हित्वा प्राक्पश्चिमौ यामौ | १४४ | हेतु प्रमाणसम्बन्ध | ११० |
| स्वारब्धो नीतिमान् राजा | ३ | हिमांशुमालीव तथा | २५ | हेतुल्लिङ्गोपधोभिर्यो | ८४ |
| स्वाविरुद्धं केवल्यमिदं | ११३ | हिरण्यपशुधान्यादि | १०६ | हेमकारादयो यत्र | ३१८ |
| हेमान्यम्बुस्त्वपुरुषः | २७४ |
[मुद्रा/मुहर]
वेदाङ्ग पुस्तकालय
२२४८
(इस पृष्ठ पर छपा हुआ मूल पाठ अत्यधिक धुंधला (faded) होने के कारण स्पष्ट रूप से पठनीय नहीं है।)
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