शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
प्रथमोऽध्यायः ३३
प्रथमोऽध्यायः ३३
गढी से युक्त, मजबूत मन्दिर, मठ, धर्मशाला से सुशोभित ऐसी राजधानी
बनाकर राजा उसमें प्रजासहित सुरक्षित रह कर निवास करे ।
राजगृहं सभामध्यं गवाश्वगजशालिकम् ।
प्रशस्तवापीकूपादिजलयन्त्रैः सुशोभितम् ॥ २१८ ॥
सर्वतः स्यात्समभुजं दक्षिणोच्चमुदङ्नतम् ।
शालां विना नैकभुजं तथा विषमबाहुकम् ॥ २१९ ॥
प्रायः शाला नैकभुजा चतुःशालं बिना शुभा ।
शस्त्रास्त्रधारिसंयुक्तप्राकारं सुष्ठु यन्त्रकम् ॥ २२० ॥
सत्रिकक्षचतुर्द्वारं चतुर्दिक्षु सुशोभनम् ।
दिवा रात्रौ सशस्त्रास्त्रैः प्रतिकक्षासु गोपितम् ॥ २२१ ॥
चतुर्भिः पंचभिः षड्भिर्यामिकैः परिवर्तकैः ।
नानागृहोपकार्यादृ्ट्रिसंयुतं कल्पयेत्सदा ॥ २२२ ॥
राजधानी में राजोचित विविध शालायें बनाने का निर्देश—और राज-
धानी में राजा का गृह ऐसा हो कि जिसके मध्य में सभामवन हो, और उसके
अन्दर गोशाला, अश्वशाला तथा गजशाला बनी हो, अच्छी बावड़ी, कूप आदि एवं
फुआरों से भलीभांति सुशोभित हो । और जिसके चारों भुज सम हों एवं जो
दक्षिण की तरफ ऊँचा और उत्तर की तरफ नीचा हो, जिसमें शाला के बिना
एक भुज तथा विषम भुज न हो । क्योंकि चतुःशाल ( जिसके चारो तरफ
गृह हों ) के बिना अन्य शाला एक भुज होने से शुभदायिका नहीं होती
है । शस्त्र तथा अस्त्र के धारण करनेवाले सैनिकों से युक्त, और अच्छे-अच्छे यन्त्रों
से युक्त परिखा तथा चहारदीवारी से घिरा, तीन कक्षायों एवं चारों दिशाओं में
४ द्वारों से युक्त, सुन्दर हो और जिसमें दिन-रात शस्त्रास्त्र-धारी प्रहर २ पर
बदलते हुये घूम २ कर पहरा देनेवाले ४, ५ या ६ चौकीदारों से प्रत्येक कक्षायें
सुरक्षित हों, सदा नाना प्रकार के गृह, तम्बू, शामियाना, अटारो से युक्त ऐसा
राजभवन सदा बनावें ।
वस्त्रादिमार्जनार्थं च स्नानार्थं यजनार्थकम् ।
भोजनार्थं च पाकार्थं पूर्वस्यां कल्पयेद् गृहम् ॥ २२३ ॥
और उसमें वस्त्र धोने के लिये और स्नान तथा यज्ञ करने के लिये एवं
भोजन खाने-पकाने के लिये पूर्व दिशा में गृहों का निर्माण करे ।
निद्रार्थं च विहारार्थं पानार्थं रोदनार्थकम् ।
धान्यार्थं घरटार्थं दासीदासार्थमेव च ॥ २२४ ॥
उत्सर्गार्थं गृहान्कुर्याद्दक्षिणस्यामनुक्रमात् ।
गोमृगोष्ट्रगजाद्यार्थे गृहान्प्रत्यक् प्रकल्पयेत् ॥ २२५ ॥
३ शु०
३४ · शुक्रनीतिः
और सोने के लिये, विहार, जलपान तथा रोदन करने के लिये, धान्य आदि तथा जांत रखने के लिये, दासी-दासों के रहने के लिये एवं मल-मूत्रादि त्याग करने के लिये क्रम से ( सिलसिलेवार ) गृह दक्षिण दिशा में बनवावे । और गो, मृग, ऊंट, हाथी आदि के लिये पश्चिम दिशा में गृह बनवावे ।
रथवाज्यस्त्रशस्त्रार्थं व्यायामायामिकार्थकम् ।
वस्त्रार्थकं तु द्रव्यार्थं विद्याभ्यासार्थमेव च ॥ २२६ ॥
उदग्गृहान् प्रकुर्वीत सुगुप्तान् सुमनोहरान् ।
यथासुखानि वा कुर्याद् गृहाण्येतानि वै नृपः ॥ २२७ ॥
रथ, घोड़े, अस्त्र, शस्त्र के लिये, कसरत का विस्तार करने के लिये, वस्त्र तथा द्रव्य रखने एवं विद्याभ्यास करने के लिये सुरक्षित तथा सुन्दर गृह उत्तर दिशा में बनवाये । अथवा राजा अपनी सुविधा के अनुसार इन सब गृहों को बनवावे ।
धर्माधिकरणं शिल्पशालां कुर्यादुदग्गृहात् ।
पंचमांशाधिकोच्छ्राया भित्तिर्विस्तारतो गृहे ॥ २२८ ॥
राजा भवन से उत्तर दिशा की ओर कचहरी और शिल्पशाला ( चित्रादि-गृह ) बनवावे । गृह की लम्बाई से पांचवें भाग के बराबर ऊंची भीत बनवावे ।
कोष्ठविस्तारषष्ठांशस्थूला सा च प्रकीर्तिता ।
एकभूमेरिदं मानमूर्ध्वमूर्ध्वं समं ततः ॥ २२९ ॥
कोठरी के लम्बान से छठवां भाग के समान मोटी भीत उठानी चाहिये । यह एक मञ्जिले मकान के लिये मान कहा है । इसके बाद ऊपर-ऊपर के अन्य मंजिलों का भी इसी भांति समझना चाहिये ।
स्तम्भैश्च भित्तिभिर्वापि पृथक्कोष्ठानि संन्यसेत् ।
त्रिकोष्ठं पञ्चकोष्ठं वा सप्तकोष्ठं गृहं स्मृतम् ॥ २३० ॥
स्तम्भों अथवा भित्तियों से पृथक् कोठरियों को बनवावे । और एक गृह में ३-५ अथवा ७ कोठरियां बनवावे ।
द्वारार्थमष्टधा भक्तं द्वारस्यांशौ तु मध्यमौ ।
द्वौ द्वौ ज्ञेयौ चतुर्दिक्षु धनपुत्रप्रदौ नृणाम् ॥ २३१ ॥
द्वार बनाने के लिये गृह के आठ भाग करके उसमें से बीच के दो भागों में द्वार बनाना चाहिये । इसी भांति से चारो दिशाओं में मध्यम के दो २ भागों में द्वार बनाना चाहिये । ऐसे द्वार मनुष्यों के धन तथा पुत्र देनेवाले होते हैं ।
प्रथमोऽध्यायः ३५
तत्रैव कल्पयेद् द्वारं नान्यथा तु कदाचन ।
वातायनं पृथक्कोष्ठे कुर्याद्वाह्यत्सुखावहम् ॥ २३२ ॥
उन्हीं भागों में द्वार बनाना चाहिये इससे अन्य भागों में कभी नहीं द्वार बनाना चाहिये । और प्रत्येक कोठरियों में सुविधानुसार हवा आने के लिये जंगले बनवावे ।
अन्यगृहद्वारविद्धं गृहद्वारं न चिन्तयेत् ।
वृक्षकोणस्तम्भमार्गपीठकूपैश्च वेधितम् ॥ २३३ ॥
अन्य किसी गृह के द्वार से विद्ध (वेध खाता हुआ) गृह का द्वार नहीं बनाना चाहिये। एवं वृक्ष, कोण, स्तम्भ, मार्ग बैठने का चबूतरा तथा कूप से भी विद्ध गृहद्वार नहीं होना चाहिये ।
प्रासादमण्डपद्वारे मार्गवेधो न विद्यते ।
गृहपीठं चतुर्थांशमुद्रा यस्य प्रकल्पयेत् ॥ २३४ ॥
प्रासाद (राजा या देवता का मन्दिर) और मण्डप के द्वार में मार्ग के वेध का विचार नहीं करना चाहिये । गृहपीठ का प्रमाण प्रासाद या मण्डप के चतुर्थांश तुल्य होना चाहिये ।
प्रासादानां मण्डपानामर्धांशं वाऽपरे जगुः ।
परवातायनैर्विद्धं नापि वातायनं स्मृतम् ॥ २३५ ॥
कोई २ ऋषि प्रासाद या मण्डप के अर्द्धांश तुल्य गृहपीठ का प्रमाण बताते हैं। दूसरे जंगलों से जंगला विंधा हुआ नहीं होना चाहिये ।
विस्ताराधार्शामण्डोच्चाच्छर्द्दिः खर्परसम्भवा ।
पतितं तु जलं तस्यां सुखं गच्छति वाप्यधः ॥ २३६ ॥
हीना निम्ना छदिर्न स्याद्याष्टकोष्ठस्य विस्तरः ।
गृह के विस्तार के अर्द्धांश के तुल्य खपड़े की छाजन की मूल ऊंचाई होनी चाहिये। जिससे उसके ऊपर गिरी हुई जल की धारा सुखपूर्वक नीचे गिर जाय । जैसा कोठरी का विस्तार हो उससे हीन या निम्न उसका छाजन नहीं होना चाहिये ।
स्वोच्छ्रायस्यार्धमूलो वा प्राकारः सममूलकः ॥ २३७ ॥
तृतीयांशकमूलो वा ह्युच्छ्रायार्धप्रविस्तरः ।
उच्छ्रितस्तु तथा कार्यो दस्युभिर्न विलंघ्यते ॥ २३८ ॥
और अपनी ऊँचाई से आधा या समान मूल भाग जिसका है ऐसा प्राकार (चाहारदीवारी) होना चाहिये । अथवा ऊंचाई के तृतीयांश के बराबर मूलभाग एवं ऊंचाई की आधी चौड़ाई प्राकार की होनी चाहिये । और उसकी ऊंचाई उतनी होनी चाहिये, जिससे डाकू लोग उसे नाघ न सकें ।
३६ | शुक्रनीतिः
यामिकै रक्षितो नित्यं नाळिकास्त्रैश्च संयुतः ।
सुबहुदृढगुल्मश्च सुगवाक्षप्रणालिकः ॥ २३९ ॥
स्वहीनप्रतिप्राकारो ह्यसमीपमहीधरः ।
परिखा च ततः कार्या खाताद् द्विगुणविस्तरा ॥ २४० ॥
नातिसमीपप्राकारा ह्यगाधसलिला शुभा ।
राजा के योग्य दुर्ग बनाने का निर्देश— चौकीदारों से नित्य सुरक्षित तथा नालिकास्त्रों (तोपों) से युक्त भलीभांति से बहुत से कुशादि के गुच्छे जिस पर उगे हुये हों और जिसमें सुन्दर रीति से खिड़कियों की नालियां बनी हों, एवं जिसके बाद में उससे छोटा दूसरा प्राकार बना हो और जिसके समीप में पर्वत न हो ऐसा प्राकार (परकोटा) बनाना चाहिये। और उसके बाद ऐसी परिखा (खाई) बनानी चाहिये। जिसकी चौड़ाई उसकी गहराई से दुगुनी हो। और जिसके अत्यन्त समीप में प्राकार (परकोटा) न खिंचा हो, एवं जिसमें अगाध जल भरा हो।
युद्धसाधनसम्भारैः सुयुद्धकुशलैर्विना ॥ २४१ ॥
न श्रेयसे दुर्गवासो राज्ञः स्याद् बन्धनाय सः ।
युद्ध करने के योग्य साधन-सामग्रियों (शस्त्रास्त्र, गोला, बारूद) एवं युद्ध में निपुण योद्धाओं के बिना दुर्ग में केवल निवास करना राजा के लिये कल्याणकारक नहीं होता है प्रत्युत उससे उसका बन्धन हो जाता है।
राज्ञा राजसभा कार्या सुगुप्ता सुमनोरमा ॥ २४२ ॥
त्रिकोष्ठैः पञ्चकोष्ठैर्वा सप्तकोष्ठैः सुविस्तृता ।
दक्षिणोदक्तयादीर्घा प्राक्प्रत्यग्द्विगुणाथवा ॥ २४३ ॥
त्रिगुणा वा यथाकाममेकभूमिर्द्विभूमिका ।
त्रिभूमिका वा कर्तव्या सोपकार्याशिरोगृहा ॥ २४४ ॥
परितः प्रतिकोष्ठे तु वातायनविराजिता ।
राजसभा कैसी बनानी चाहिये इसका निर्देश— राजा ऐसी राजसभा बनवावे, जो भलीभांति सुरक्षित, अत्यन्त सुन्दर दक्षिण से उत्तर की तरफ लम्बी अथवा पूर्व से पश्चिम की तरफ दुगुनी किंवा तिगुनी लम्बी हो। एवं अपनी इच्छानुसार एकमंजिल, दुमंजिल या तीन मंजिल की हो, और जिसमें ऊपर के गृह में शामियाना तना हो और जिसके प्रत्येक गृहों में खिड़कियां हों।
पार्श्वकोष्ठात्तु द्विगुणो मध्यकोष्ठस्य विस्तरः ॥ २४५ ॥
पञ्चमांशधिकं त्वौच्चं मध्यकोष्ठस्य विस्तरात् ।
वस्तारेण समं त्वौच्चं पञ्चमांशाधिकं तु वा ॥ २४६ ॥
प्रथमोऽध्यायः
३७
बगल के कमरे की अपेक्षा मध्य के कमरे का विस्तार दूना होना चाहिये। और उसकी ऊंचाई कमरे के विस्तार से पञ्चमांश अधिक अथवा विस्तार के समान होना चाहिये।
कोष्ठकानां च भूमिर्वा छदिर्वा तत्र कारयेत् ।
द्विभूमिके पार्श्वकोष्ठे मध्यं त्वेकभूमिकम् ॥ २४७ ॥
पृथक्स्तम्भान्तसत्कोष्ठा चतुर्मार्गागमा शुभा ।
जलोर्ध्वपातियन्त्रैश्च युता सुस्वरयन्त्रकैः ॥ २४८ ॥
वातप्रेरकयन्त्रैश्च यन्त्रैः कालप्रबोधकैः ।
प्रतिष्ठिता च स्वादर्शैस्तथा च प्रतिरूपकैः ॥ २४६ ॥
एवंविधा राजसभा मन्त्रार्था कार्यदर्शने ।
कमरों के ऊपर छत या खपड़ों का छाजन बनाना चाहिये। दुमञ्जिले यदि बगल के कमरे हों तो मध्य का कमरा एक-मञ्जिला होना चाहिये। पृथक् २ स्तम्भों के अन्त में अच्छे कमरों से युक्त, चारों दिशाओं में बने हुए द्वारों से सुशोभित जलयन्त्रों (फव्वारों) तथा सुन्दर स्वरवाले बाजों से हवा पहुंचानेवाले यन्त्रों (यन्त्र-चालित, पङ्खों) से, तथा समयसूचक यन्त्रों (घड़ी) एवं सुन्दर शीशों तथा चित्रों से सुसज्जित इस प्रकार की राजसभा विचार करने एवं कार्य देखने के लिये होनी चाहिये।
तथाविधामात्यलेख्यसभ्याधिकृतशालिकाः ॥ २५० ॥
कर्तव्याः प्रागुदक्वेतास्तदर्थाश्च पृथक्पृथक् ।
शतहस्तमितां भूमिं त्यक्त्वा राजगृहात्सदा ॥ २५१ ॥
**मन्त्री आदि के लिये भवन बनाने का निर्देश—**इसी प्रकार से मन्त्री, लेख तथा सभा के सदस्य (कौंसिल के मेम्बर) तथा अधिकारी पुरुषों के कमरे होने चाहिये। इन सब कमरों को पूर्वोक्त प्रत्येक कार्यों के लिये पृथक् पृथक् सदा राजभवन से १०० हाथ की दूरी पर बनवाना चाहिये।
तद्वद्द्विशतहस्तां प्राक्सेनासंवेशनार्थिकाम् ।
आराद्राजगृहस्यैव प्रजानां निलयानि च ॥ २५२ ॥
सधनश्रेष्ठजात्यानुक्रमतश्च सदा बुधः ।
समन्ताद्धि चतुर्दिक्षु विन्यसेच्च ततः परम् ॥ २५३ ॥
**सेनानिवेश-स्थान तथा प्रजावर्गों के स्थानों का क्रम—**राजभवन से उत्तर अथवा पूर्व सेनाओं के रहने के लिये गृह होना चाहिये। उसके बाद प्रजाओं का गृह राजभवन से दूर होना चाहिये। धनिक और उत्तम वंशवालों का क्रमानुसार राजभवन के चारो दिशाओं में गृह होना चाहिये।
प्रकृत्यनुप्रकृतयो ह्यधिकारिगणस्ततः ।
| ३८ | शुक्रनीतिः |
|---|
सेनाधिपाः पदातीनां गणः सादिगणस्ततः ॥ २५४ ॥
साश्वश्च सगजश्चापि गजपालगणस्ततः ।
बृहन्नालिकयन्त्राणि ततः स्वतुरंगोगणः ॥ २५५ ॥
ततः स्वगौल्मिकगणो ह्यारण्यकगणस्ततः ।
क्रमादेषां गृहाणि स्युः शोभनानि पुरे सदा ॥ २५६ ॥
और नगर में प्रकृति (मन्त्री), अनुप्रकृति (मन्त्री के नीचे काम करने वाले), अधिकारियों (अफसरों) के गण, सेनापति, पैदल सिपाहियों का गण, घुड़ सवारों का गण, हयशाला, गजशाला और गजपालों (हस्तिरक्षकों) का गण, बड़ी २ तोपें, धोबियों का गण, गोपालों का गण, आरण्यकों (जंगली भिल्लादिकों) का गण इन सबों के लिये क्रम से गृह होने चाहिये।
पान्थशाला ततः कार्या सुगुप्ता सुजलाशया ।
सजातीयगृहाणां हि समुदायेन पंक्तितः ॥ २५७ ॥
निवेशनपुरे ग्रामे प्रागुदङ्मुखमेव वा ।
सजातिपण्यनिवहैरापणे पण्यवेशनम् ॥ २५८ ॥
धनिकादिक्रमेणैव राजमागंस्य पार्श्वयोः ।
एवं हि पत्तनं कुर्याद् ग्रामं चैव नराधिपः ॥ २५९ ॥
**धर्मशाला के निर्माण का निर्देश—**और यात्रियों के ठहरने के लिये धर्मशाला होनी चाहिये जो कि सुरक्षित हो तथा सुन्दर जलाशय (कूप आदि) से युक्त हो और जिसमें समान आकारवाले गृहों का समुदाय कतार से हों ऐसे गृह पुर अथवा ग्राम में पूर्व अथवा उत्तर मुख का बनवाने चाहिये। और आपण (बाजार) में एक जाति के पण्यों (बिकनेवाली वस्तुओं) के समूह से युक्त दुकानें बनवानी चाहिये। धनिक आदियों के क्रम से राजमार्ग के दोनों तरफ दुकानें बनवानी चाहिये। इस प्रकार से राजा नगर या ग्राम का निर्माण करावे।
राजमार्गास्तु कर्तव्याश्चतुर्दिक्षु नृपगृहात् ।
उत्तमो राजमार्गस्तु त्रिंशद्धस्तमितो भवेत् ॥ २६० ॥
मध्यमो विंशतिकरो दशपञ्चकरोऽधमः ।
पण्यमार्गास्तथा चैते पुरग्रामादिषु स्थिताः ॥ २६१ ॥
**राजमार्गादि-निर्माण का निर्देश—**राजभवन के चारों दिशाओं में राजमार्ग (प्रधान सड़क) बनवाना चाहिये। उत्तम राजमार्ग ३० हाथ चौड़ी होती है। मध्यम २० हाथ चौड़ी, अधम राजमार्ग १५ हाथ चौड़ा होता है। पुर तथा ग्रामादिकों में इन्हीं ३ प्रकार के पण्यमार्ग (बाजार की सड़कें) बनाये जाते हैं।
प्रथमोऽध्यायः ३९
करत्रयात्मिका पद्या वीथिः पञ्चकरात्मिका ।
मार्गो दशकरः प्रोक्तो ग्रामेषु नगरेषु च ॥ २६२ ॥
ग्राम और नगरों में पद्या (पगडण्डी) ३ हाथ चौड़ी, वीथि (गली) ५ हाथ चौड़ी और मार्ग १० हाथ चौड़ा बनाया जाता है ।
प्राक्पश्चाद्दक्षिणोदक्तान् याममध्यात् प्रकल्पयेत् ।
पुरं दृष्ट्वा राजमार्गांत्सुबहून्कल्पयेन्नृपः ॥ २६३ ॥
राजा ग्राम के मध्य भाग से पूर्व से पश्चिम और दक्षिण से उत्तर जाने वाले राजमार्ग बनवाये । और उन्हें नगर के अनुसार बहुत सा भी बनवा सकता है ।
न वीथि न च पद्यां हि राजधान्यां प्रकल्पयेत् ।
षड्योजनान्तरेऽरण्ये राजमार्गं तु चोत्तमम् ॥ २६४ ॥
कल्पयेन्मध्यमं मध्ये तयोर्मध्ये तथाधमम् ।
दशहस्तात्मकं नित्यं ग्रामे ग्रामे नियोजयेत् ॥ २६५ ॥
राजधानी में पद्या (पगडण्डी), वीथि (गली) नहीं बनवानी चाहिये । ६ योजन (२४ क्रोश) के अन्तर पर जङ्गल में उत्तम राजमार्ग (३० हाथ चौड़ी सड़क) बनवाना चाहिये । मध्य में मध्यम राजमार्ग (२० हाथ चौड़ी सड़क) बनवाना चाहिये । उन दोनों के मध्य में दस हाथ चौड़ाई का अधम-संज्ञक राजमार्ग प्रत्येक ग्राम में सदा बनवाना चाहिये ।
कूर्मपृष्ठा मार्गभूमिः कार्या ग्राम्यैः सुसेतुका ।
कुर्यान्मार्गांन्पार्श्वखातान्निर्गमार्थं जलस्य च ॥ २६६ ॥
ग्रामवालों को अपने २ ग्राम की सड़कों की भूमि का आकार कछुये की पीठ की भांति बनवाना चाहिये । और उसमें आवश्यकतानुसार पुल भी होना चाहिये । और ऐसे मार्ग बनवाने चाहिये, जिसमें जल बहने के लिये दोनों तरफ नालियां बनी हों ।
राजमार्गमुखानि स्युर्गृहाणि सकलान्यपि ।
गृहपृष्ठे दासवीथी मलनिर्हरणस्थलम् ॥ २६७ ॥
पंक्तिद्वयगतानां हि गेहानां कारयेत्तथा ।
मार्गांत्सुधाशर्करैर्वा घटितान्प्रतिवत्सरम् ॥ २६८ ॥
अभियुक्तनिरुद्धैर्वा कुर्याद् ग्राम्यजनैर्नृपः ।
और जितने गृह हों उनके सभी मुख (प्रधान द्वार) राजमार्ग की तरफ हों । और गृह के पिछवारे नौकरों के आने-जाने के लिये गली एवं पाखाना हो । गृहों की दो पङ्क्तियों के बीच में जो रास्ते हों उन्हें प्रतिवर्ष चूना-कङ्कर
४० शुक्रनीतिः
आदि डालकर मरम्मत कराते रहना चाहिये। राजा इसे ग्रामवालों से या कैदियों से ठीक करावे।
ग्रामद्वयान्तरे चैव पान्थशाला प्रकल्पयेत् ॥ २६९ ॥
नित्यं सम्मार्जितां चैव ग्रामपैश्च सुगोपिताम् ।
तत्रागतं तु संपृच्छेत्पान्थं शालाधिपः सदा ॥ २७० ॥
प्रयातोसि कुतः कस्मात्क गच्छसि ऋतंवद ।
ससहायोऽसहायो वा सशस्त्रः किं सवाहनः ॥ २७१ ॥
का जातिः किं कुलं नाम स्थितिः कुत्रास्ति ते चिरम् ।
इति पृष्ट्वा लिखेत्सायं शस्त्रं तस्य प्रगृह्य च ॥ २७२ ॥
सावधानमना भूत्वा स्वापं कुर्विति शासयेत् ।
तत्रस्थान्गणयित्वा तु शालाद्वारं पिधाय च ॥ २७३ ॥
संरक्षयेद्यामिकैश्च प्रभाते तान् प्रबोधयेत् ।
शस्त्रं दद्याच्च गणयेद् द्वारमुद्घाट्य मोचयेत् ॥ २७४ ॥
कुर्यात्सहायं सीमान्तं तेषां । ग्राम्यजनस्सदा ।
धर्मशाला की व्यवस्था— और दो ग्रामों के बीच में १ धर्मशाला बनवानी चाहिये जिसकी नित्य सफाई और रक्षा का प्रबन्ध ग्राम के जमीनदार या मुखिया के द्वारा होनी चाहिये। धर्मशाला का प्रबन्धक वहां ठहरे हुये यात्री से यह पूछे कि—यह सच बताओ कि—तुम कहां से आये हो ? क्यों आये हो ? और कहां जा रहे हो ? क्या तुम्हारे कोई साथी है या अकेले हो ? क्या शस्त्र या सवारी कोई तुम्हारे पास है ? तुम्हारी कौन जाति है ? तुम किस वंश के हो ? तुम्हारा क्या नाम है ? तुम अधिकतर कहां रहते हो अर्थात् तुम्हारा गृह कहां है। ये सब बातें सायंकाल को पूछ कर लिखे और यात्रियों के शस्त्र को अपने पास रख सावधान-मन होकर 'शयन करो' ऐसा कहकर यात्रियों पर शासन रखे। एवं वहां पर आये हुये यात्रियों की सायंकाल में गणना कर धर्मशाला के प्रधान द्वार को बन्द कर चौकीदारों से रात्रिभर रक्षा करावे। और प्रातःकाल यात्रियों को जगावे एवं उनके शस्त्रों को लौटाकर पुनः यात्रियों की गणना करे और फाटक खोलकर उन्हें बाहर कर दे। और ग्राम के लोग सीमा तक जाकर यात्रियों की सदा रक्षा करें।
प्रकुर्याद्दिनकृत्यं तु राजधान्यां वसन्नृपः ॥ २७५ ॥
उत्थाय पश्चिमे यामे मुहूर्तद्वितयेन वै ।
नियतायश्च कत्यस्ति व्ययश्च नियतः कति ॥ २७६ ॥
कोशभूतस्य द्रव्यस्य व्ययः कति गतस्तथा ।
व्यवहारे मुद्रितायव्ययशेषं कतीति च ॥ २७७ ॥