सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६५

चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६५

नेत्रयोः कथितं तज्ज्ञैर्गणपस्य विशेषतः।
कर्ण और नेत्र का अन्तर सदा चार अङ्गुल का समझना चाहिये। दोनों नेत्रों के मूल, मध्य तथा अग्रभाग का अन्तर क्रम से दश, सात तथा छः अङ्गुल प्रमाण का विद्वानों ने गणेश की मूर्त्ति के संबन्ध में कहा है।

उत्सेधः पृथुता स्त्रीणां स्तने पञ्चाङ्गुला मता ॥ १८१ ॥
स्त्रीकट्यां परिधिः प्रोक्तस्त्रितालो द्व्यङ्गुलाधिकः।
स्त्रीणःमवयवान् सर्वान् सप्ततालैर्विभावयेत् ॥ १८२ ॥
स्त्रियों के अवयवों का प्रमाण—स्त्री-मूर्त्तियों में स्तन की ऊंचाई तथा मुटाई पांच अङ्गुल प्रमाण की होनी चाहिये। स्त्री-मूर्त्ति में कमर की परिधि दो अङ्गुल अधिक तीन ताल प्रमाण की कही हुई है। और स्त्री-मूर्त्तियों में सम्पूर्ण अङ्गों का प्रमाण मिलाकर योग सात ताल प्रमाण होना चाहिये।

सप्ततालादिमानेऽपि मुखं स्याद् द्वादशाङ्गुलम् ।
बालादीनामपि सदा दीर्घता तु पृथक् पृथक् ॥ १८३ ॥
सबों के मुख का प्रमाण—इनका सात ताल आदि प्रमाण होने पर भी मुख का प्रमाण बारह ही अङ्गुल का होता है। और बाला आदि मूर्त्तियों के भेदों की लम्बाई सदा पृथक्-पृथक् समझनी चाहिये।

शिशोस्तु कन्धरा ह्रस्वा पृथु शीर्षं प्रकीर्त्तितम् ।
कण्ठाधो वर्धते यादृक् तादृक्शीर्षं न वर्धते ॥ १८४ ॥
बालक-प्रतिमा के अवयवों का प्रमाण—शिशु-मूर्त्ति की ग्रीवा छोटी और शिर बड़ा बनाना चाहिये, क्योंकि जैसा कण्ठ के नीचे का भाग बढ़ता है वैसा सिर नहीं बढ़ता है।

कण्ठाधोमुखमानेन बालः सार्धचतुर्गुणः।
द्विगुणः शिश्नपर्यन्तो ह्यधः शेषं तु सक्थितः ॥ १८५ ॥
सपादद्विगुणौ हस्तौ द्विगुणौ वा मुखेन हि ।
स्थौल्ये तु नियमो नास्ति यथाशोभि प्रकल्पयेत् ॥ १८६ ॥
बाल-मूर्त्ति में मुख के प्रमाण की अपेक्षा कण्ठ के नीचे का भाग ४॥ गुना बड़ा होता है। उसमें शिश्न पर्यन्त भाग लंबाई में मुख से दुगुना बड़ा होता है। और शेष जंघा से लेकर नीचे का सारा भाग २। गुना अधिक बड़ा होता है। और मुख की अपेक्षा दोनों हाथ २। गुने अथवा दुगुने लम्बे होते हैं। किन्तु मुटाई में कोई नियम नहीं है उसे जिस प्रकार से देखने में सुन्दर लगे वैसा बनाना चाहिये।

नित्यं प्रवर्धते बालः पञ्चाब्दात् परतो भृशम् ।

२६६शुक्रनीतिः

स्यात् षोडशेऽब्दे सर्वाङ्ग-पूर्णा स्त्री विंशतौ पुमान् ॥ १८७ ॥

शरीर की पूर्णता होने का वर्ष-प्रमाण— बालक पांच वर्ष तक नित्य धीरे-धीरे बढ़ता है किन्तु पांच वर्ष के बाद अत्यन्त तेजी से बढ़ता है। स्त्री १६ वर्ष की अवस्था में सर्वाङ्गों से परिपूर्ण होती है किन्तु पुरुष २० वर्ष की अवस्था में परिपूर्ण अङ्गवाला होता है।

ततोऽर्हति प्रमाणं तु सप्ततालादिकं सदा ।
कश्चिद् बाल्येऽपि शोभाढ्यस्तारुण्ये वार्धके क्वचित् ॥ १८८॥

इससे सदा युवावस्था होने पर ही सात ताल आदि प्रमाण की योग्यता होती है। और कोई बाल्यावस्था में भी शोभायुक्त होता है, और कोई युवावस्था में एवं क्वचित् कोई वृद्धावस्था में शोभायुक्त होता है।

मुखाधस्त्र्यङ्गुला ग्रीवा हृदयं तु नवाङ्गुलम् ।
तथोदरं च बस्तिश्च सक्थि त्वष्टादशाङ्गुलम् ॥ १८९ ॥
त्र्यङ्गुलं तु भवेज्जानु जङ्घा त्वष्टादशाङ्गुला ।
गुल्फाधस्त्र्यङ्गुलं ज्ञेयं सप्ततालस्य सर्वदा ॥ १९० ॥

सप्त ताल प्रमाण की मूर्त्ति के अवयवों का प्रमाण— मुख के नीचे भाग में ग्रीवा तीन अङ्गुल प्रमाण की। हृदय (वक्षः स्थल) नव अंगुल प्रमाण का तथा उदर और बस्ति (नाभि के नीचे का भाग) भी नव अंगुल प्रमाण का, ऊरु अठारह अङ्गुल प्रमाण का, जानु तीन अंगुल प्रमाण का, जङ्घा अठारह अंगुल प्रमाण की, गुल्फ के नीचे का भाग तीन अंगुल प्रमाण का, सात ताल प्रमाणवाली मूर्त्ति में सदा होता है।

वेदाङ्गुलं भवेद् ग्रीवा हृदयं तु दशाङ्गुलम् ।
दशाङ्गुलं चोदरं स्याद् बस्तिश्चैव दशाङ्गुलः ॥ १९१ ॥
एकविंशाङ्गुलं सक्थि जानु स्याच्चतुरङ्गुलम् ।
एकविंशाङ्गुला जङ्घा गुल्फाधश्चतुरङ्गुलम् ॥ १९२ ॥
अष्टतालप्रमाणस्य मानमुक्तमिदं सदा ।

चार अंगुल की ग्रीवा, दस अंगुल का हृदय, दस अंगुल का उदर तथा दस अंगुल की बस्ति, इक्कीस अंगुल की ऊरु, बारह अंगुल का जानु, इक्कीस अंगुल की जंघा, चार अंगुल का गुल्फ के नीचे का भाग इस भांति से आठ ताल प्रमाणवाली मूर्त्ति के अङ्गों के प्रमाण होते हैं।

त्रयोदशाङ्गुलं ज्ञेयं मुखं च हृदयं तथा ॥ १९३ ॥
उदरं च तथा बस्तिर्दशतालेषु सर्वदा ।

दस ताल प्रमाणवाली मूर्त्तियों में सदा मुख, हृदय, उदर तथा बस्ति प्रत्येक तेरह अंगुल प्रमाण का होना चाहिये।