शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१७
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१७
अनुभव (हाथ में रहना मात्र देखने) से नहीं होता है। अन्यथा इसका धन इसने अपहरण कर लिया यह कहना भी उचित नहीं हो सकता था।
विदिताऽर्थागमः शास्त्रे तथा वर्णः पृथक् पृथक् ।
शास्ति तच्छास्त्रधर्म्मं यन्म्लेच्छानामपि तत्सदा ॥ २९३ ॥
पूर्वाचार्यैस्तु कथितं लोकानां स्थितिहेतवे ।
वर्णानुसार प्रत्येक वर्णों के पृथक् पृथक् अर्थार्जन के मार्ग शास्त्र में प्रसिद्ध हैं। और ये जो शास्त्रोक्त धर्म अर्थार्जन के विषय में कहे हुये हैं वे म्लेच्छों को भी सदा मान्य हैं। और पूर्वाचार्यों ने लोक की सदाचार-रक्षा के लिये इसी विषय में अन्यत्र कहा है।
समानभागिनः कार्याः पुत्राः स्वस्य च वै स्त्रियः ॥ २९४ ॥
स्वभागादर्धहरा कन्या दौहित्रस्तु तदर्धभाक् ।
विभाग-विचार— धनस्वामी अपने हिस्से में से स्त्री तथा पुत्र का समान समान भाग रक्खे। और अपना भी उन्हीं के समान भाग रक्खे। अपने भाग का आधा भाग कन्या (अविवाहिता) का एवं कन्या से आधा भाग दौहित्र (कन्या का पुत्र) का रक्खे।
मृतेऽधिपेऽपि पुत्राद्या उक्तभागहराः स्मृताः ॥ २९५ ॥
स्वामी के मरने पर पुत्रादिक उक्त भाग के अनुसार सम्पत्ति के स्वामी माने जाते हैं।
मात्रे दद्याच्चतुर्थांशं भगिन्यै मातुरर्धकम् ।
तदर्धं भागिनेयाय शेषं सर्वं हरेत् सुतः ॥ २९६ ॥
पुत्र माता के लिये अपने भाग का चतुर्थांश (चौथाई) भाग एवं बहिन के लिये माता के भाग से आधा भाग, भाञ्जा के लिये बहिन के भाग से आधा भाग दे, और अन्त में अवशिष्ट सभी भागों को पुत्र स्वयम् ले।
पुत्रो नप्ता धनं पत्नी हरेत् पुत्री च तत्सुतः ।
माता पिता च भ्राता च पूर्व्वाभावाच्च तत्सुतः ॥ २९७ ॥
अंशहारियों के क्रमनिर्णय का निर्देश— पुत्र, पौत्र, पत्नी, पुत्री, दौहित्र (पुत्री का पुत्र), माता, पिता और भाई यथाक्रम एक के अभाव में दूसरे धन के उत्तराधिकारी होते हैं। और पुत्रादि सभी के अभाव में भाई का पुत्र अन्त में उत्तराधिकारी होता है।
सौदायिकं धनं प्राप्य स्त्रीणां स्वातन्त्र्यमिष्यते ।
विक्रये चैव दाने च यथेष्टं स्थावरेष्वपि ॥ २९८ ॥
सौदायिक धन में स्त्री की स्वतन्त्रता का निर्देश— सौदायिक (ब्याह के प्रथम या बाद में पति या पिता के गृह से मिले हुये) धन को पाकर स्त्री स्वतन्त्र
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रूप से भोग सकती है, और चाहे वह स्थावर ( अचल ) सम्पत्ति हो तो भी किसीको बेच देने या दे देने में उसका इच्छानुसार व्यवहार कर सकती है।
ऊढया कन्यया वापि पत्युः पितृगृहाच्च यत् ।
मातृपित्रादिभिर्दत्तं धनं सौदायिकं स्मृतम् ॥ २९९ ॥
सौदायिक धन के लक्षण— विवाहिता या अविवाहिता कन्याको पति के पास से या पिता के गृह से माता-पिता के द्वारा दिये गये धन को 'सौदायिक' कहते हैं।
पित्रादिधनसम्बन्धहीनं यद्यदुपार्जितम् ।
येन स काममश्नीयादविभाज्यं धनं हि तत् ॥ ३०० ॥
अविभाज्य धन के लक्षण— पैतृक धन की सहायता के बिना जो-जो धन जिससे उपार्जित किये जाते हैं वे सभी उस उपार्जनकर्त्ता के लिये यथेष्ट भोग्य होते हैं, क्योंकि उस प्रकार के धन का भाई आदि के द्वारा विभाग नहीं किया जा सकता है।
जलतस्करराजाग्नि व्यसने समुपस्थिते ।
यस्तु स्वशक्त्या संरक्षेत्तस्यांशो दशमः स्मृतः ॥ ३०१ ॥
जलादिकों से धन की रक्षा करनेवाले को दशवाँ भाग प्राप्त करने का निर्देश— जो कोई व्यक्ति जल, चोर, राजा या अग्नि के द्वारा संकट में पड़े हुये किसी के वस्तु ( धन ) को अपनी शक्ति लगाकर यदि बचा लेता है तो उस धन के दशवें भाग के पाने का वह अधिकारी हो जाता है।
हेमकारादयो यत्र शिल्पं सम्भूय कुर्वते ।
कार्यानुरूपं निर्वेशं लभेरंस्ते यथार्हतः ॥ ३०२ ॥
जहाँ पर कई सोनार आदि मिलकर किसी शिल्प का निर्माण करते हैं वहाँ पर कार्यानुरूप यथायोग्य वे सब मजदूरी को प्राप्त करते हैं।
संस्कर्त्ता तत्कलाभिज्ञः शिल्पी प्रोक्तो मनीषिभिः ।
शिल्पी के लक्षण— किसी कला का जानकार होते हुये उसकी त्रुटियों को दूरकर सुधार करने वाले को विद्वान् लोग 'शिल्पी' कहते हैं।
हर्म्यं देवगृहं वापि बाटिकोपस्कराणि च ॥ ३०३ ॥
सम्भूय कुर्वतां तेषां प्रमुख्यो द्व्यंशमर्हति ।
धनियों का भवन, देवमन्दिर, बावड़ी या गृहसम्बन्धी उपकरणों को मिलकर बनानेवाले कारीगरों के मध्य में जो प्रधान होता है वह दो भाग मजदूरी पाने का अधिकारी होता है।
नर्तकानामेव धर्मः सङ्गिरेष उदाहृतः ॥ ३०४ ॥
तालज्ञो लभतेऽर्धार्धं गायनास्तु समांशिनः ।
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१९
नर्तकादियों का धनविभागविषयक निर्देश— नाचनेवालों के लिये भी वही विधि विद्वानों ने कही है। जैसे ताल का जाननेवाला अर्जित धन का आधा भाग पाता है शेष धन में गाने वाले सब लोग समान-समान भाग में बाँट लेते हैं।
परराष्ट्राद्धनं यत्स्याच्चोरैः स्वाम्याज्ञया हृतम् ॥ ३०५ ॥
राज्ञे षष्ठांशमुद्धृत्य विभजेरन् समांशकम् ।
चोरों का धनविभागविषयक निर्देश— अपने स्वामी की आज्ञा से चोर लोग दूसरे के राज्य में जाकर जो धन चुराकर लाते हैं उसमें से छठा भाग राजा को देने के बाद शेष धन को आपस में समान भाग से बाँट कर ले लेते हैं।
तेषां चेत् प्रस्रुतानां च ग्रहणं समवाप्नुयात् ॥ ३०६ ॥
तन्मोक्षार्थं च यद्दत्तं वहेयुस्ते समांशतः ।
और यदि चोरी करने के बाद वे लोग पकड़ लिये जावें तो अपने छूटने के लिये जो द्रव्य खर्च हो उसको समान भाग से बाँट कर अपने-अपने हिस्से में से दे देवें।
प्रयोगं कुर्वते ये तु हेमधान्यरसादिना ॥ ३०७ ॥
समन्यूनाधिकैरंशैर्लाभास्तेषां तथाविधः ।
समो न्यूनोऽधिको ह्यांशो योऽनुक्षिप्तस्तथैव सः ॥ ३०८ ॥
व्यापारी आदियों का धनविभागविषयक निर्देश— जो लोग मिलकर सुवर्ण, धान्य तथा रसादि द्रव्य का कोई व्यवसाय करते हैं उन में जिसका जैसा कार्य हो और धन लगा हो उसके अनुरूप बराबर, न्यून या अधिक अंश में लाभांश में से उन्हें मिलता है। अर्थात् व्यवसाय के प्रारम्भ में उन लोगों ने सम, न्यून या अधिक अंश में जो द्रव्य लगाया हो उसी के अनुसार उनका भाग होता है।
व्ययं दद्यात् कर्म कुर्याल्लाभं गृह्णीत चैव हि ।
वणिजानां कर्षकाणामेष एव विधिः स्मृतः ॥ ३०९ ॥
एवं वे तदनुसार व्यय एवं कर्म करते हैं तथा लाभ भी प्राप्त करते हैं। यह विधि बनियों और कृषकों के लिये कही हुई है।
सामान्यं याचितं न्यास आधिर्दासाश्च तद्धनम् ।
अन्वाहितं च निक्षेपः सर्वस्वं चान्वये सति ॥ ३१० ॥
आपत्स्वपि न देयानि नव वस्तूनि पण्डितैः ।
आपत्काल होने पर भी नवविध धनों को न देने का निर्देश— १. बटवारे में प्राप्त धन, २. पुनः लौटा देने के लिये मांगकर लाया हुआ धन, ३. धरोहर
३२० | शुक्रनीतिः
में रखा हुआ धन, ४. बन्धक रखा हुआ धन, ५. दास, ६. दास का धन, ७. दूसरे के हाथ में रखने के लिये दिया हुआ धन, ८. शिल्पी के हाथ में संस्कार करने के लिये दिया हुआ द्रव्य, ९. सन्तान के रहने पर अपना सर्वस्व ( संपूर्ण धन) ये ९ प्रकार के धन या वस्तु आपत्ति आने पर भी दूसरे के हाथ बेच डालना या दे देना आदि कुछ भी नहीं करना चाहिये ।
अदेयं यश्च गृह्णाति यश्चादेयं प्रयच्छति ॥ ३११ ॥
तावुभौ चौरवच्छास्यौ दाप्यौ चोत्तमसाहसम् ।
**उत्तम साहस दण्ड के योग्य का निर्देश—**यदि नहीं देने योग्य किसी वस्तु को जो कोई किसी से लेता है या किसी को देता है तो वे दोनों (ग्रहीता-दाता) चौर की भाँति दण्डनीय होते हैं और उत्तम साहस नामक दण्ड (जुर्माना) देने के अधिकारी होते हैं।
अस्वामिकेभ्यश्चौरेभ्यो विगृह्णाति धनं तु यः ॥ ३१२ ॥
अव्यक्तमेव क्रीणाति स दण्ड्यश्चौरवन्नृपैः ।
**अस्वामिक धन को चोरों से लेनेवालों को दण्ड देने का निर्देश—**जिस वस्तु का वह स्वामी नहीं है उससे जो खरीदता है या चोरों से माल लेता है या गुप्त-छुप में किसी से माल खरीदता है वह राजा के द्वारा चोर की भाँति दण्डनीय होता है।
ऋत्विग्याज्यमदुष्टं यस्त्यजेदनपकारिणम् ॥ ३१३ ॥
अदुष्टञ्चर्त्विजं याज्यो विनेयौ तावुभावपि ।
**त्यागयोग्य ऋत्विज और याज्य के लक्षण—**जो पुरोहित निर्दोष एवं कोई अपकार नहीं करनेवाले अपने यजमान का एवं जो यजमान निर्दोष तथा अपक- कारी पुरोहित का त्याग करता है तो वे दोनों दंडनीय होते हैं।
द्वात्रिंशांशं षोडशांशं लाभं पण्ये नियोजयेत् ॥ ३१४ ॥
नान्यथा तद्व्ययं ज्ञात्वा देशाद्यनुरूपतः ।
**राजा को ३२ वाँ या १६ वाँ लाभ पण्य में नियत करने का निर्देश—**बनिया (व्यवसायी) विक्री के वस्तुओं पर जैसा प्रदेश या समय हो उसके अनुरूप उस वस्तु के लाने में किये हुये व्यय को समझ कर ३२ वाँ या १६ वाँ भाग लाभ लेने की व्यवस्था करे, इससे अधिक लाभ न लेवे।
वृद्धिं हित्वा ह्यर्थधनैर्वाणिज्यं कारयेत् सदा ॥ ३१५ ॥
व्यापारी के धन की व्यवस्था का निर्देश—'मैं वृद्धि को नहीं ग्रहण करूँगा' ऐसा कहकर और 'वाणिज्य में लब्ध आधा धन दूंगा' इस प्रकार के स्वीकृत वचनों के द्वारा सदा वाणिज्य करावे। अथवा राजा वृद्धि मुनाफा छोड़कर मूल धन के आधे धन से सदा व्यापारी से व्यापार करावे।
चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३२१
मूलात्तु द्विगुणा वृद्धिर्गृहीता चाधमर्णिकात् ।
तदोत्तमर्णमूलं तु दापयेन्नाधिकं ततः ॥ ३१६ ॥
**मूल से दूना ब्याज ले चुकने पर उत्तमर्ण को मूल ही दिलवाने का निर्देश—**यदि कर्ज देनेवाला महाजन मूल धन से द्विगुण धन सूद में ले चुका हो तो कर्जदार से महाजन के दिये हुये मूल धन को ही राजा दिलावे अधिक न दिलावे ।
धनिकाश्चक्रवृद्ध्यादिमिषतस्तु प्रजाधनम् ।
संहरन्ति ह्यतस्तेभ्यो राजा संरक्षयेत् प्रजाम् ॥ ३१७ ॥
धनी महाजन लोग चक्रवृद्धि (सूद-दरसूद) के व्याज से कर्जदार प्रजाओं का अधिकांश धन हर लेते हैं, अतः राजा उन महाजनों से प्रजा की भलीभांति रक्षा करे ।
समर्थः सन्न ददाति गृहीतं धनिकाद्धनम् ।
राजा सम्दापयेत्तस्मात् सामदण्डविकर्षणैः ॥ ३१८ ॥
यदि कोई समर्थ होकर भी धनिक से लिये हुये धन को नहीं देता है तो राजा समझा-बुझाकर या दण्ड का प्रयोग कर कर्जदार से महाजन को धन दिला दे ।
लिखितं तु यदा यस्य नष्टं तेन प्रबोधितम् ।
विज्ञाय साक्षिभिः सम्यक् पूर्ववद्दापयेत्तदा ॥ ३१९ ॥
**लिखित नष्ट हो जाने पर साक्षी के आधार पर उत्तमर्ण को धन दिलाने का निर्देश—**जब जिस किसी के पास से किसी का लिखित ऋणपत्र (पुरनोट) नष्ट हो जाय और वह राजा को सूचित कर दे तो राजा साक्षियों के द्वारा भलीभांति समझकर पूर्व की भांति (पुरनोट में लिखित की भांति) ही उसे कर्जदार से द्रव्य दिला दे ।
अदत्तं यश्च गृह्णाति सुदत्तं पुनरिच्छति ।
दण्डनीयावुभावेतौ धर्मज्ञेन महीक्षिता ॥ ३२० ॥
जो किसी द्वारा नहीं दी हुई वस्तु को किसी से ले लेता है और जो भलीभांति से दूसरे को दे दी गई वस्तु को पुनः लेना चाहता है तो वे दोनों ही धर्म के जानकार द्वारा दण्डनीय होते हैं ।
कूटपण्यस्य विक्रेता स दण्ड्यश्चौरवत् सदा ।
**खोटी वस्तु बेचनेवाले को दण्ड देने का निर्देश—**जो खोटी वस्तु या धोकेबाजी से किसी वस्तु को बेचता है तो वह सदा राजा द्वारा चोर की भांति दण्डनीय होता है ।
दृष्ट्वा कार्याणि च गुणाञ्छिल्पिनां वृत्तिमावहेत् ॥ ३२१ ॥
२१ शु०
३२२ शुक्रनीतिः
शिल्पियों की भृति का विचार—कारीगरों के कार्य तथा गुण को देखकर उनकी मजदूरी या तनखाह देवे।
पञ्चमांशं चतुर्थांशं तृतीयांशं तु कल्पयेत्।
अर्धं वा राजताद्राज्ञा नाधिकं तु दिने दिने॥ ३२२॥
स्वर्णकार की भृति का विचार—राजा प्रतिदिन चांदी की विक्री में से पांचवां, चौथा, तीसरा या आधा भाग योग्यतानुसार कर रूप में ग्रहण करे। किन्तु आधे से अधिक कर न लेवे।
विद्रुतं न तु हीनं स्यात् स्वर्णं पलशतं शुचि।
चतुःशतांशं रजतं ताम्रं न्यूनं शतांशकम्॥ ३२३॥
१०० पल (४०० भर) भर निर्दोष सोना गलाने पर तौल में कम नहीं होना चाहिये। निर्दोष चांदी (१०० पल भर) गलाने पर ४०० वां अंश तथा तामा १०० वां अंश न्यून होना चाहिये।
वङ्गं च जसद्ं सीसं हीनं स्यात् षोडशांशकम्।
अयोऽष्टांशं त्वन्यथा तु दण्ड्यः शिल्पी सदा नृपैः॥ ३२४॥
रांगा, जस्ता और सीसा (धातु विशेष) गलाने पर १६ वां भाग कम होना चाहिये। लोहा तो गलाने पर अष्टमांश हीन होना चाहिये। अन्यथा (पूर्वोक्त मान से अधिक हीन होने पर) गलानेवाला कारीगर राजा द्वारा सदा दण्डनीय होता है।
सुवर्णं द्विशतांशं तु रजतं च शतांशकम्।
हीनं सुघटिते कार्ये सुसंयोगे तु वर्धते॥ ३२५॥
षोडशांशं त्वन्यथा हि दण्ड्यः स्यात् स्वर्णकारकः।
संयोगघटनं दृष्ट्वा वृद्धिं ह्रासं प्रकल्पयेत्॥ ३२६॥
सुन्दर रीति से अलंकार आदि बनाये जाने में छीलने आदि से सोना २०० वां अंश और चांदी १०० वां अंश तौल में हीन हो जाता है। सुन्दर रीति से टांका आदि देने में १६ वां अंश तौल में बढ़ जाता है। इससे अन्यथा तौल में न्यूनाधिक्य होने पर सुनार दण्डनीय होता है। और जिस प्रकार टांका आदि देने में मिलावट की जाती है उसी के अनुसार विचारक द्वारा सोने आदि की वृद्धि तथा ह्रास की कल्पना की जानी चाहिये।
स्वर्णस्योत्तमकार्ये तु भृतिस्त्रिंशांशकी मता।
षष्ठ्यंशकी मध्यकार्ये हीनकार्ये तदर्धकी॥ ३२७॥
सोने के उत्तम बने हुये अलङ्कार की बनवाई मजदूरी ३० वां भाग के तुल्य होती है। मध्यम बने हुये की ६० वां भाग तथा हीन बने हुये की १२० वां भाग के तुल्य मजदूरी होती है।