शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०३
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०३
तस्मान्न लेख्यसामर्थ्यात् सिद्धिरैकान्तिकी मता ।
**ठगों और कुटिलोँ द्वारा बनावटी लेख कर लेने का निर्देश—**निपुण जालसाज लोग सदा किसी लिखावट का तदनुरूप नकल कर लेते हैं। इसलिये केवल लेख के आधार पर फैसला करना पूर्णरूप से उचित नहीं माना गया है।
स्नेहलोभभयक्रोधैः कूटसाक्षित्वशङ्कया ॥ २१२ ॥
केवलैः साक्षिभिर्नैव कार्यं सिध्यति सर्वदा ।
**केवल साक्षियों से ही कार्यसिद्धि के न करने का निर्देश—**स्नेह, लोभ, भय, अथवा क्रोधवश होकर भी मनुष्य झूठी साक्षी दे सकता है, इस शंका से केवल साक्षी के आधार पर भी सदा अभियोग का उचित निर्णय नहीं हो सकता है।
अस्वामिकं स्वामिकं वा भुङ्क्ते यद् बलदर्पतः ॥ २१३ ॥
इति शङ्कितभोगेन कार्यं सिध्यति केवलैः ।
**केवल भोगों से ही कार्यसिद्धि न होने का निर्देश—**अपने बल के घमण्ड में आकर भी मनुष्य चाहे अपनी वस्तु हो या दूसरे की किन्तु उसपर जबर-दस्ती कब्जा कर सकता है। इस लिये भोग (कब्जा) के विषय में भी सन्देह होने से केवल उसी के आधार पर ही फैसला नहीं किया जा सकता है।
शङ्कितव्यवहारेषु शङ्क्येदन्यथा नहि ॥ २१४ ॥
अन्यथा शङ्कितान् सभ्यान् दण्डयेच्चौरवन्नृपः ।
**अनुचित शंका उपस्थित करनेवाले को दण्ड देने का निर्देश—**जिन व्यवहारों (मुकदमों) में उचित शंका हो चुकी है उनमें पुनः विपरीत शङ्का नहीं उपस्थित करनी चाहिये। यदि कोई सभा (जूरी आदि) विपरीत शङ्का उपस्थित करे तो राजा उसे चोर के समान दण्ड दे।
अन्यथा शङ्कनान्नित्यमनवस्था प्रजायते ॥ २१५ ॥
लोको विभिद्यते धर्मो ह्यव्यवहारश्च हीयते ।
**विपरीत शङ्का करने से अनवस्था होने का निर्देश—**विपरीत शङ्का करने से व्यवहार में अनवस्था उत्पन्न होने से जल्दी निर्णय न हो सकेगा। और लोकधर्म बिगड़ जावेगा तथा व्यवहार का क्रम भी टूट जायगा।
सागमो दीर्घकालश्च निराक्रोशो निरन्तरः ॥ २१६ ॥
प्रत्यर्थिसन्निधानश्च भुक्तो भोगः प्रमाणवत् ।
**प्रामाणिक भोग के लक्षण—**आगम (लेख) के सहित, और दीर्घकाल का भोग (कब्जा) प्रामाणिक होता है और यदि स्वामी का अपनी वस्तु से विच्छेद हो गया हो या उसने एकदम से उसे छोड़ दिया हो और प्रतिवादी उसके समीप ही रहता हो तो वहां पर कब्जा प्रामाणिक माना जाता है।
३०४ | शुक्रनीतिः
सम्भोगं कीर्तयेद्यस्तु केवलं नागमं क्वचित् ॥ २१७ ॥
भोगच्छलापदेशेन विज्ञेयः स तु तस्करः ।
केवल भोग बतानेवाले को चोर समझने का निर्देश— जो केवल अपना भलीभांति कब्ज़ा ही दिखाता है किन्तु लेख नहीं दिखाता है । वह छलपूर्वक कब्ज़ा कहलाता है अत एव उसे चोर समझना चाहिये अर्थात् वह दण्डनीय है ।
आगमेऽपि बलं नैव भुक्तिः स्तोकाऽपि यत्र नो ॥ २१८॥
केवल आगम (लेख) के भी प्रबल न होने का निर्देश— जहाँ पर थोड़ा भी कब्ज़ा नहीं है वहाँ पर लेख का केवल प्रमाण माननीय नहीं होता है ।
यं कञ्चिद्दश वर्षाणि सन्निधौ प्रेक्षते धनी ।
भुज्यमानं परैरर्थं न स तं लब्धुमर्हति ॥ २१९॥
जो किसी अपनी वस्तु को समीप में स्वयं रहता हुआ दूसरे के द्वारा भोग करते हुये देखकर भी नहीं आपत्ति करता है और इस भांति से यदि १० वर्ष व्यतीत हो जाय तो स्वामी उस वस्तु को पाने का अधिकारी नहीं होता है ।
वर्षाणि विंशतियेस्य भूर्मुक्ता तु परैरिह ।
सति राज्ञि समर्थस्य तस्य सेह न सिध्यति ॥ २२० ॥
जिसकी जमीन को कोई दूसरा बीस वर्ष से भोग रहा हो किन्तु समर्थ रहने पर भी वह आपत्ति नहीं करता है तो राजा के रहते हुये भी वह व्यक्ति इस लोक में पुनः उक्त भूमि को नहीं प्राप्त कर सकता है ।
अनागमं तु यो भुङ्क्ते बहून्यब्दशतान्यपि ।
चौरदण्डेन तं पापं दण्डयेत् पृथिवीपतिः ॥ २२१ ॥
जिस भूमि को बिना लिखित प्रमाण के कोई कई सौ वर्षों से भोग रहा हो किन्तु जब उसके वस्तुतः स्वामी का पता लग जाय तो राजा कब्ज़ा करने-वाले उस पापी को चोर की भाँति दण्ड दे ।
अन्नागमादपि याभुक्तिर्विच्छेदोपरमोज्झिता ।
षष्टिवर्षात्मिका साऽपहर्तुं शक्या न केनचित् ॥ २२२ ॥
६० वर्ष से भोग में आती हुई वस्तु को किसी के द्वारा न छीने जा सकने का निर्देश— किसी वस्तु पर बिना लेख के जो किसी का कब्ज़ा हो, और स्वामी का उस वस्तु से विच्छेद हो या उसने एकदम से छोड़ दिया हो तो ६० वर्ष व्यतीत हो जाने पर उसे पुनः उस कब्ज़ा करनेवाले से कोई दूसरा नहीं छुड़ा सकता ।
आधिः सीमा बालधनं निक्षेपोपनिधिस्तथा ।
राजस्वं श्रोत्रियस्वं च न भोगेन प्रणश्यति ॥ २२३ ॥
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् | ३०५
आधि आदिका केवल भोग से नष्ट न होने का निर्देश—आधि (धरोहर), ग्राम की सीमा, बालक का धन, गिरवी रखी हुई वस्तु, स्त्री का धन, राजधन, वेदपाठी का धन इनपर कब्जा होने से ही कोई नहीं प्राप्त कर सकता है।
उपेक्षां कुर्वतस्तस्य तूष्णीम्भूतस्य तिष्ठतः।
काले विपन्ने पूर्वोक्ते तत्फलं नाप्नुते धनी ॥ २२४ ॥
उपेक्षादि कारण से स्वामी को उसके फल प्राप्त न होने का निर्देश—और यदि कोई स्वामी अपनी वस्तु पर किसी के कब्जे को देखकर भी उपेक्षा कर दे और कोई आपत्ति न करे इस भाँति से यदि ऊपर लिखित समय भी व्यतीत हो जाय तो वह पुनः उस वस्तु को पाने का अधिकारी नहीं हो सकता।
भोगः संक्षेपतश्चोक्तस्तथा दिव्यमथोच्यते।
अब दिव्य कहने का निर्देश—यहां तक ‘भोग’ (कब्जा) के विषय में संक्षेपतः कहा गया है और अब ‘दिव्य’ का वर्णन करते हैं।
प्रमादाद्धनिनो यत्र त्रिविधं साधनं न चेत् ॥ २२५ ॥
अर्थञ्चापह्नुते वादी तत्रोक्तस्त्रिविधो विधिः।
त्रिविध साधन के अभाव में तीन प्रकार की विधियों का निर्देश—यदि किसी वस्तु के स्वामी के प्रमाद से जिस मुकद्दमे में पूर्वोक्त तीन प्रकार के (लेख, कब्जा, साक्षी) साधन न हो सकें और वादी उसकी वस्तु को ले लेना चाहता हो तो वहां पर तीन प्रकार की विधि कही हुई है।
चोदनाप्रतिकालश्च युक्तिलेशस्तथैव च ॥ २२६ ॥
तृतीयः शपथः प्रोक्तस्तैरेवं साधयेत् क्रमात्।
प्रथम—चोदनाप्रतिकाल (बारम्बार प्रेरणा करने पर भी वादी के वचन का उत्तर न देना), द्वितीय—युक्तिलेश (युक्तियों का प्रयोग), तृतीय—शपथ ये क्रम से तीन प्रकार के कहे हुये साधनों से कार्य-सिद्धि करे।
विशिष्टतर्किता या च शास्त्रशिष्टाविरोधिनी ॥ २२७ ॥
योजना स्वार्थसंस्सिद्धयै सा युक्तिस्तु न चान्यथा।
युक्ति के लक्षण—उत्तम प्रकार से जिस पर तर्क किया गया हो और जो शास्त्र और शिष्ट पुरुषों के अविरुद्ध हो ऐसी स्वार्थसिद्धि के लिये बनाई गई योजना को ‘युक्ति’ कहते हैं। अन्य रीति से बनी हुई हो तो नहीं।
दानं प्रज्ञापनं भेदः सम्प्रलापः क्रिया च या ॥ २२८ ॥
चित्तापन्वयनं चैव हेतवो हि विभावकाः।
कार्यसाधक हेतुओं के लक्षण—देना, समझाना, फोड़ना, उत्तम प्रकार का क्षोभ दिखाना, मनको अपनी ओर आकर्षित करना इन सबों से रहस्य का पता लगने से ये सब ‘विभावक’ हेतु कहलाते हैं।
२० शु०
३०६ | शुक्रनीतिः
अभीक्ष्णं चोद्यमानोपि प्रतिहन्यान्न तद्वचः ॥ २२९ ॥
त्रिचतुःपञ्चकृत्वो वा परतोऽर्थं स दाप्यते ।
धन ग्रहण करने योग्य प्रतिवादी के लक्षण— बार-बार प्रेरणा करने पर भी जो प्रतिवादी के वचन को न काटे अर्थात् कोई उत्तर न दे ऐसा तीन, चार या पांच बार करने पर भी उत्तर न देना उस प्रतिवादी से वादी को धन दिलानेवाला हो जाता है अर्थात् वादी का अभियोग सत्य होने से उसका विजय हो जाता है ।
युक्तिष्वप्यसमर्थासु दिव्यैरेनं विमर्दयेत् ॥ २३० ॥
यस्माद्देवैः प्रयुक्तानि दुष्करार्थे महात्मभिः ।
जहां पर युक्ति भी असमर्थ हो, वहां पर एवं दुष्कर कर्म के लिये दिव्य करने का निर्देश— जहां पर युक्तियों से काम न चल सकता हो वहां पर दिव्य शपथों का प्रयोग करना उचित होता है क्योंकि साधन-विहीन व्यवहार में, कठिनाई आने पर महात्मा देवताओं ने दिव्य शपथों का प्रयोग किया था ।
परस्परविशुद्ध्यर्थं तस्माद्दिव्यानि नामतः ॥ २३१ ॥
सप्तर्षिभिश्च भित्सार्थे स्वीकृतान्यात्मशुद्धये ।
इससे वादी-प्रतिवादी की परस्पर विशुद्धि के लिये ही ये 'दिव्यशपथ' हैं, जिसे अन्न-हरण रूप दोष उपस्थित होने पर आत्मशुद्धि के लिये सप्तर्षियों ने भी स्वीकार किया था ।
स्वमहत्त्वाच्च यो दिव्यं न कुर्याज्ज्ञानदर्पतः ॥ २३२ ॥
वसिष्ठाद्याश्रितं नित्यं स नरो धर्मतस्करः ।
दिव्य को न मानने पर 'धर्मतस्कर' होने का निर्देश— जो अपने बड़प्पन और ज्ञान के घमण्ड से दिव्य शपथों को नहीं ग्रहण करता है, जिसे कि वशिष्ठादि महर्षियों ने भी सदा ग्रहण किया था । वह मनुष्य 'धर्मतस्कर' ( धर्म का चोर ) है ।
प्राप्ते दिव्येऽपि न शपेद् ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ॥ २३३ ॥
संहरन्ति च धर्मार्थं तस्य देवा न संशयः ।
जो ज्ञान-दुर्बल ( मूर्ख ) ब्राह्मण समय आने पर दिव्यशपथ ग्रहण नहीं करता है । उसके धर्म और अर्थ को देवता लोग निःसन्देह हरण कर लेते हैं ।
यस्तु स्वशुद्धिमन्विच्छन् दिव्यं कुर्यादतन्द्रितः ॥ २३४ ॥
विशुद्धो लभते कीर्तिं स्वर्गं चैवान्यथा नहि ।
दिव्य को स्वीकार करनेवाले के उत्तम फलों का निर्देश— अपनी विशुद्धि की इच्छा रखनेवाला जो मनुष्य आलस्य छोड़कर दिव्यशपथ ग्रहण करता है
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०७
वह विशुद्ध होकर लोक में कीर्ति तथा परलोक में स्वर्ग निश्चय प्राप्त करता है। अन्यथा नहीं प्राप्त करता है।
अग्निर्विषं घटस्तोयं धर्माधर्मौ च तण्डुलाः ॥ २३५ ॥
शपथाश्चैव निर्दिष्टा मुनिभिर्दिव्यनिर्णये।
दिव्य-निर्णय में पदार्थों का निर्देश— दिव्य परीक्षा द्वारा निर्णय करने में अग्नि, विष, तुला, जल, धर्म-अधर्म, चावल और शपथ इन सबों का निर्देश किया है।
पूर्वं पूर्वं गुरुतरं कार्यं दृष्ट्वा ऽनियोजयेत् ॥ २३६ ॥
लोकप्रत्ययतः प्रोक्तं सर्वं दिव्यं गुरु स्मृतम् ।
इनमें उत्तर की अपेक्षा पूर्व-पूर्व के दिव्य चावल आदि अधिक महत्त्व-शाली हैं। इनका प्रयोग यथायोग्य कार्य की गुरुता देखकर ही किया जाता है। साधारणतया लोगों का विश्वास होने से सभी दिव्य शपथ गौरवपूर्ण माने जाते हैं।
तप्तायोगोलकं धृत्वा गच्छेन्नव पदं करे ॥ २३७ ॥
तप्ताङ्गारेषु वा गच्छेत् पद्भ्यां सप्त पदानि हि ।
तप्ततैलगतं लोहमाषं हस्तेन निर्हरेत् ॥ २३८ ॥
सुतप्तलोहपत्रं वा जिह्वया संलिहेदपि ।
अग्नि दिव्य के प्रकार का निर्देश— तपाने से लाल हुये लोहे के गोले को हाथ में लेकर कुछ दूर चले यदि हाथ में जलने का न चिह्न हो या जलते हुये अंगारों पर ७ पग नंगे पैरों से चले किन्तु पैर न जले किंवा खौलते हुये तेल में से लोहे के उरदों को हाथ से निकाले किन्तु हाथ न जले अथवा अत्यन्त तपाने से लाल हुये लोह के पत्थरों को जीभ से चाटे पर जीभ न जले।
गरं प्रभक्षयेद्धस्तैः कृष्णसर्पं समुद्धरेत् ॥ २३९ ॥
कृत्वा स्वस्य तुलासाम्यं हीनाधिक्यं विशोधयेत् ।
गर तथा घट दिव्य के प्रकार का निर्देश— विष का भक्षण करे या हाथ से काले सर्प को बांबी आदि में से निकालते समय डँसे जाने पर विष का असर न हो तो निर्दोष जानना चाहिये। और तुला (तराजू) पर एक तरफ बैठ कर दूसरी तरफ बांट रखकर तौलने पर हीन या अधिक होने के द्वारा विशुद्धि की परीक्षा करे।
स्वेष्टदेवस्नपनजमद्यादुदकमुत्तमम् ॥ २४० ॥
यावन्नियमितः कालस्तावदप्सु निमज्जयेत् ।
जल दिव्य के प्रकार का निर्देश— अपने इष्टदेव को स्नान कराये गये
३०८ | शुक्रनीतिः
उत्तम जल (चरणामृत) का पान करके शपथ ग्रहण करे कि मैने अमुक अपराध नहीं किया है यदि किया हो तो वह नाश कर दें। जितने समय तक का नियम किया गया हो उतने समय तक जल में डूबकर पडे रहेगा। इससे वह निर्दोष समझा जाता है।
अधर्मधर्ममूर्तीनामदृष्टहरणं तथा ॥ २४१ ॥
कर्षमात्रांस्तण्डुलांश्च चर्वयेच्च विशङ्कितः ।
धर्माधर्म मूर्त्ति एवं तण्डुल दिव्यों के प्रकार का निर्देश—अधर्म और धर्म की मूर्त्तियों में से किसी एक को आंखों में पट्टी बाँधकर उठाना, यदि धर्म की मूर्त्ति उठाता है तो निर्दोष अन्यथा दोषी समझा जाता है। एक रुपये भर चावलों को निःशङ्क होकर चबावे। यदि दोषी होता है तो मुख से रक्त निकलने लगता है, यह लोकप्रसिद्ध है।
स्पर्शयेत् पूज्यपादांश्च पुत्रादीनां शिरांसि च ॥ २४२ ॥
धनानि संस्पृशेदू द्राक् तु सत्येनापि शपेत्तथा।
दुष्कृतं प्राप्नुयां यद्यत् सर्वं नश्येत्तु सत्कृतम् ॥ २४३ ॥
शपथ दिव्य के प्रकार का निर्देश—पूज्य गुरुजनों के चरणों या पुत्रादिकों के मस्तकों किंवा अपने धनों का शीघ्र स्पर्श करे। यह भी दिव्यशपथ है इससे अपराधी का नाश एवं उसके पुत्र और धन का नाश हो जाता है। और सत्य का भी शपथ खाये जो इस प्रकार से है कि—यदि मैं अपराधी होऊं तो मुझे आज पाप लगे और सारा सुकृत (पुण्य) मेरा नष्ट हो जाय।
सहस्रेऽपहृते चाग्निः पादोने च विषं स्मृतम्।
त्रिभागोने घटः प्रोक्तो ह्यर्धे च सलिलं तथा ॥ २४४ ॥
धर्माधमौ तदर्धे च ह्यष्टमांशे च तण्डुलाः ।
षोडशांशे च शपथा एवं दिव्यविधिः स्मृतः ॥ २४५ ॥
अपराध-तारतम्य से दिव्यतारतम्य का निर्देश—एक सहस्र मुद्रा का यदि अपहरण हुआ हो तो अग्निपरीक्षा, चौथाई भाग से न्यून सहस्र अपहृत हो तो विषपरीक्षा, तृतीयांश-हीन सहस्र हो तो तुलापरीक्षा, आधा सहस्र हो तो जलपरीक्षा, सहस्र का चतुर्थांश हो तो धर्माधर्मपरीक्षा, सहस्र का अष्ट-मांश हो तो तण्डुलपरीक्षा, सहस्र का षोडशांश अपहृत हो तो शपथ (सौगन्ध) खाना, इस प्रकार से परीक्षा करनी चाहिये।
एषां संख्या निकृष्टानां मध्यानां द्विगुणा स्मृता।
चतुर्गुणोत्तमानां च कल्पनीया परीक्षकैः ॥ २४६ ॥
यह संख्या निकृष्ट दिव्य परीक्षाओं की है, मध्यर्मों की इससे दुगुनी और उत्तमों की चौगुनी संख्या की कल्पना परीक्षकों द्वारा करनी चाहिये।
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०६
शिरोवर्त्ती यदा न स्यात्तदा दिव्यं न दीयते ।
अभियोक्ता शिरःस्थाने दिव्येषु परिकीर्त्यते ॥ २४७ ॥
दिव्य के निषेध का निर्देश— जब तक दिव्य शपथ खानेवाला शिर हिला कर अपनी स्वीकृति न दे तब तक दिव्य शपथ नहीं दिलानी चाहिये। अथवा जब तक शिरःस्थानी अभियोक्ता (वादी) न उपस्थित हो तब तक (परोक्ष में) अभियुक्त (प्रतिवादी) को दिव्य शपथ नहीं दिलानी चाहिये । 'दिव्य परीक्षाओं में वादी को उपस्थित रहना चाहिये' ऐसा विद्वान लोग कहते हैं।
अभियुक्ताय दातव्यं दिव्यं श्रुतिनिदर्शनात् ।
न कश्चिदभियोक्तारं दिव्येषु विनियोजयेत् ॥ २४८ ॥
वेद की आज्ञा होने से प्रतिवादी को ही दिव्य शपथ दिलाना चाहिये, अतः कोई वादी को दिव्य शपथ न दिलावे ।
इच्छया त्वितरः कुर्यादितरो वर्त्तयेच्छिरः ।
यदि प्रतिवादी की इच्छा से वादी दिव्य शपथ ग्रहण करे तो दूसरा (प्रतिवादी) ही वादी के सम्मुख उपस्थित रहे अथवा शिर हिला कर अनुमति दे ।
पार्थिवैः शङ्कितानां च निर्दिष्टानां च दस्युभिः ॥ २४६ ।'
आत्मशुद्धिपराणां च दिव्यं देयं शिरो विना ।
शिर के बिना दिव्य के अधिकारी का निर्देश— राजा को जिन पर अपराधी होने का सन्देह हो गया हो किंवा डांकू आदि ने अपराध करने में जिनका नाम-निर्देश किया हो अथवा जो स्वयम् अपनी शुद्धि (निर्दोषिता) को दिखाना चाहते हों, उनको दिव्य शपथ दिलाना चाहिये, उस में विरोधी पक्ष की उपस्थिति या शिर हिलाकर अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं है।
परदाराभिशापे च ह्यगम्यागमनेषु च ॥ २५० ॥
महापातकशस्ते च दिव्यमेव न चान्यथा ।
पर-स्त्री गमन का अभियोग लगने पर या अगम्या स्त्री के साथ गमन का किंवा ब्रह्महत्यादि का अभियोग लगने पर ही दिव्य शपथ का विधान है अन्यथा साधारण अभियोगों में दिव्य शपथ नहीं दिलाना चाहिये ।
चौर्याभिशङ्कायुक्तानां तप्तमाषो विधीयते ॥ २५१ ॥
तप्त माष दिव्य के अधिकारी का निर्देश— जिनके ऊपर चोरी के अभियोग की आशङ्का हो उनके लिये उपरि लिखित 'तप्तमाष' (खौलते हुये तेल में पके तप्त लौह के उरदों का हाथ से निकालना) संज्ञक दिव्य शपथ का विधान है।
प्राणान्तिकविवादे तु विद्यमानेऽपि साधने ।
दिव्यमालम्बते वादी न पृच्छेत्तत्र साधनम् ॥ २५२ ॥
३१० | शुक्रनीतिः
वादी के दिव्य को स्वीकार करने पर फिर साधन न पूछने का निर्देश—
जहां पर प्राण का संकट उपस्थित हो ऐसे विवाद में भले ही साधन (प्रमाण) विद्यमान हो किन्तु अभियुक्त दिव्य शपथ का आश्रय ले सकता है वहां पर वादी साधन के विषय में किसी प्रकार का प्रश्न नहीं कर सकता है।
सोपधं साधनं यत्र तद्राज्ञे श्रावितं यदि ।
शोधयेत्तत्तु .दिव्येन राजा धर्मासनस्थितः ॥ २५३ ॥
यदि किसी विवाद में (प्रमाण) जाली हो और उसकी सूचना राजा को मिल जावे तो धर्मासन पर बैठा हुआ राजा दिव्य शपथ द्वारा उसकी परीक्षा करे।
यन्नामगोत्रैर्यल्लेख्यतुल्यं लेख्यं यदा भवेत् ।
अगृहीतधने तत्र कार्यो दिव्येन निर्णयः ॥ २५४ ॥
भाषापत्रिका होने पर दिव्य से शोधन करने का निर्देश— रुपया न लेने पर भी यदि उसके नाम-गोत्र के साथ ऋणपत्र का सचमुच कोई जाली लेख तैयार करके रूपये की नालिश कर दे तो वहां पर राजा सत्यासत्य का निर्णय दिव्य शपथ द्वारा करे।
मानुषं साधनं न स्यात्तत्र दिव्यं प्रदापयेत् ।
लौकिक साधन के अभाव में दिव्य देने का निर्देश— जहाँ पर कोई लौकिक प्रमाण न मिले वहां पर दिव्य शपथ दिलाना चाहिये।
अरण्ये निर्जने रात्रावन्तर्वेश्मनि साहसे ॥ २५५ ॥
स्त्रीणां शीलाभियोगेषु सर्वार्थापह्नवेषु च ।
प्रदुष्टेषु प्रमाणेषु दिव्यैः कार्यं विशोधनम् ॥ २५६ ॥
जङ्गल, निर्जन स्थान, रात्रि, घर के भीतरी भाग, डाँका पड़ना आदि साहस कर्म, और स्त्रियों के आचरण इन सबों के विषय से सम्बद्ध अभियोग में और जहां पर सम्पूर्ण अर्थ का रहस्य न ज्ञात होता हो एवं प्रमाण दूषित होने से माननीय न होने पर दिव्य शपथ द्वारा अपराधी की परीक्षा करनी चाहिये।
महापापामिशापेषु निक्षेपहरणेपु च ।
दिव्यैः कार्यं परीक्षेत राजा सत्स्वपि साक्षिषु ॥ २५७ ॥
यद्यपि साक्षी भले ही हों तो भी राजा बड़े २ अपराधों एवं धरोहर के हड़प कर जाने इत्यादि अभियोगों में दिव्य शपथ द्वारा परीक्षा लेकर ही निर्णय करे।
प्रथमा यत्र भिद्यन्ते साक्षिणश्च तथा परे ।
परेभ्यश्च तथा चान्ये तं वादं शपथैर्नयेत् ॥ २५८ ॥