महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2519, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतथा मद्राधिपस्यापि गदावेगं महात्मनः ।
सोढुमुत्सहते नान्यो योधो युधि वृकोदरात् ॥ ७ ॥
'इसी प्रकार महामना मद्रराज शल्यकी गदाका वेग भी रणभूमिमें भीमसेनके सिवा दूसरा कोई योद्धा नहीं सह सकता' ॥ ७ ॥
तौ वृषाविव नर्दन्तौ मण्डलानि विचेरतुः ।
आवर्तितौ गदाहस्तौ मद्रराजवृकोदरौ ॥ ८ ॥
शल्य और भीमसेन दोनों वीर हाथमें गदा लिये साँड़ोंकी तरह गर्जते हुए चक्कर लगाने और पैंतरे देने लगे ॥ ८ ॥
मण्डलावर्तमार्गेषु गदाविहरणेषु च ।
निर्विशेषमभूद् युद्धं तयोः पुरुषसिंहयोः ॥ ९ ॥
मण्डलाकार गतिसे घूमनेमें, भाँति-भाँतिके पैंतरे दिखानेकी कलामें तथा गदाका प्रहार करनेमें उन दोनों पुरुषसिंहोंमें कोई भी अन्तर नहीं दिखायी देता था, दोनों एक-से जान पड़ते थे ॥ ९ ॥
तप्तहेममयैः शुभ्रैर्बभूव भयवर्धिनी ।
अग्निज्वालैरिवाबद्धा पट्टैः शल्यस्य सा गदा ॥ १० ॥
तपाये हुए उज्ज्वल सुवर्णमय पत्रोंसे जड़ी हुई शल्यकी वह भयंकर गदा आगकी ज्वालाओंसे लिपटी हुई-सी प्रतीत होती थी ॥ १० ॥
तथैव चरतो मार्गान् मण्डलेषु महात्मनः ।
विद्युदभ्रप्रतीकाशा भीमस्य शुशुभे गदा ॥ ११ ॥
इसी प्रकार मण्डलाकार गतिसे विचित्र पैंतरोंके साथ विचरते हुए महामनस्वी भीमसेनकी गदा बिजलीसहित मेघके समान सुशोभित होती थी ॥ ११ ॥
ताडिता मद्रराजेन भीमस्य गदया गदा ।
दह्यमानेव खे राजन् सासृजत् पावकार्चिषः ॥ १२ ॥
राजन्! मद्रराजने अपनी गदासे जब भीमसेनकी गदापर चोट की, तब वह प्रज्वलित-सी हो उठी और उससे आगकी लपटें निकलने लगीं ॥ १२ ॥
तथा भीमेन शल्यस्य ताडिता गदया गदा ।
अङ्गारवर्षं मुमुचे तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १३ ॥
इसी प्रकार भीमसेनकी गदासे ताड़ित होकर शल्यकी गदा भी अंगारे बरसाने लगी। वह अद्भुत-सा दृश्य हुआ ॥ १३ ॥
दन्तैरिव महानागौ शृङ्गैरिव महर्षभौ ।
तोत्रैरिव तदान्योन्यं गदाग्राभ्यां निजघ्नतुः ॥ १४ ॥
जैसे दो विशाल हाथी दाँतोंसे और दो बड़े-बड़े साँड़ सींगोंसे एक-दूसरेपर चोट करते हैं, उसी प्रकार अंकुशों-जैसी उन श्रेष्ठ गदाओं़द्वारा वे दोनों वीर एक-दूसरेपर आघात करने