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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2418, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2418

महामेघनिभेनाशु शिबिरायैव दुद्रुवे ॥ ७ ॥
भरतवंशी नरेश! शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्य मेघोंकी घटाके समान अपनी गजसेनाके साथ शीघ्रतापूर्वक शिविरकी ओर ही भाग चले ॥ ७ ॥
अश्वत्थामा ततः शूरो विनिःश्वस्य पुनः पुनः ।
पाण्डवानां जयं दृष्ट्वा शिबिरायैव दुद्रुवे ॥ ८ ॥
तदनन्तर शूरवीर अश्वत्थामा पाण्डवोंकी विजय देख बारंबार उच्छ्वास लेता हुआ छावनीकी ओर ही भागने लगा ॥ ८ ॥
संशप्तकावशिष्टेन बलेन महता वृतः ।
सुशर्मापि ययौ राजन् वीक्षमाणो भयार्दितः ॥ ९ ॥
राजन्! संशप्तकोंकी बची हुई विशाल सेनासे घिरा हुआ सुशर्मा भी भयसे पीड़ित हो इधर-उधर देखता हुआ छावनीकी ओर चल दिया ॥ ९ ॥
दुर्योधनोऽपि नृपतिर्हतसर्वस्वबान्धवः ।
ययौ शोकसमाविष्टश्चिन्तयन् विमना बहु ॥ १० ॥
जिसके भाई नष्ट हो गये थे और सर्वस्व लुट गया था, वह राजा दुर्योधन भी शोकमग्न, उदास और विशेष चिन्तित होकर शिविरकी ओर चल पड़ा ॥ १० ॥
छिन्नध्वजेन शल्यस्तु रथेन रथिनां वरः ।
प्रययौ शिबिरायैव वीक्षमाणो दिशो दश ॥ ११ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ राजा शल्यने भी जिसकी ध्वजा कट गयी थी, उस रथके द्वारा दसों दिशाओंकी ओर देखते हुए छावनीकी ओर ही प्रस्थान किया ॥ ११ ॥
ततोऽपरे सुबहवो भरतानां महारथाः ।
प्राद्रवन्त भयत्रस्ता ह्रियाविष्टा विचेतसः ॥ १२ ॥
भरतवंशियोंके दूसरे-दूसरे बहुसंख्यक महारथी भी भयभीत, लज्जित और अचेत होकर शिविरकी ओर दौड़े ॥ १२ ॥
असृक् क्षरन्तः सोद्विग्ना वेपमानास्तथातुराः ।
कुरवो दुद्रुवुः सर्वे दृष्ट्वा कर्णं निपातितम् ॥ १३ ॥
कर्णको मारा गया देख सभी कौरव-सैनिक खून बहाते और काँपते हुए उद्विग्न तथा आतुर होकर छावनीकी ओर भागने लगे ॥ १३ ॥
प्रशंसन्तोऽर्जुनं केचित् केचित् कर्णं महारथाः ।
व्यद्रवन्त दिशो भीताः कुरवः कुरुसत्तम ॥ १४ ॥
कुरुश्रेष्ठ! कौरव-महारथियोंमेंसे कुछ लोग अर्जुनकी प्रशंसा करते थे और कुछ कर्णकी। वे सब-के-सब भयभीत होकर चारों दिशाओंमें भाग खड़े हुए ॥ १४ ॥
तेषां योधसहस्राणां तावकानां महामृधे ।
नासीत्तत्र पुमान् कश्चिद् यो युद्धाय मनो दधे ॥ १५ ॥