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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1513, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1513

जनेश्वर! पाण्डव-महारथी जैसे-जैसे युद्ध करते थे, वैसे-ही-वैसे उस अस्त्रका वेग बढ़ता जाता था ।।
वध्यमानास्तदास्त्रेण तेन नारायणेन वै ।
दह्यमानानलेनेव सर्वतोऽभ्यर्दिता रणे ।। २२ ।।
उस नारायणास्त्रसे घायल हुए सैनिक रणभूमिमें ऐसे पीड़ित हुए मानो सब ओरसे आगमें झुलस रहे हों ।। २२ ।।
यथा हि शिशिरापाये दहेत् कक्षं हुताशनः ।
तथा तदस्त्रं पाण्डूनां ददाह ध्वजिनीं प्रभो ।। २३ ।।
प्रभो! जैसे सर्दी बीतनेपर गरमीमें लगी हुई आग सूखे काठ या जंगलको जला डाले, उसी प्रकार वह अस्त्र पाण्डव-सेनाको भस्म करने लगा ।। २३ ।।
आपूर्यमाणेनास्त्रेण सैन्ये क्षीयति च प्रभो ।
जगाम परं त्रासं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।। २४ ।।
राजन्! जब वह अस्त्र सब ओर व्याप्त हो गया और उसके द्वारा पाण्डव-सेना क्षीण होने लगी, तब धर्मपुत्र युधिष्ठिरको बड़ा भय हुआ ।। २४ ।।
द्रवमाणं तु तत् सैन्यं दृष्ट्वा विगतचेतनम् ।
मध्यस्थतां च पार्थस्य धर्मपुत्रोऽब्रवीदिदम् ।। २५ ।।
उन्होंने अपनी उस सेनाको जब अचेत होकर भागती और कुन्तीपुत्र अर्जुनको तटस्थभावसे खड़ा देखा, तब इस प्रकार कहा— ।। २५ ।।
धृष्टद्युम्न पलायस्व सह पाञ्चालसेनया ।
सात्यके त्वं च गच्छस्व वृष्ण्यन्धकवृतो गृहान् ।। २६ ।।
'धृष्टद्युम्न! तुम पांचालोंकी सेनाके साथ भाग जाओ। सात्यके! तुम भी वृष्णिवंशी और अन्धकवंशी वीरोंको साथ लेकर घर चले जाओ ।। २६ ।।
वासुदेवोऽपि धर्मात्मा करिष्यत्यात्मनः क्षमम् ।
श्रेयो ह्यपदिशत्येष लोकस्य किमुतात्मनः ।। २७ ।।
'धर्मात्मा भगवान् श्रीकृष्ण भी अपने लिये जो उचित समझेंगे, करेंगे। ये सारे जगत्‌को कल्याणका उपदेश देते हैं, फिर अपना भला क्यों नहीं करेंगे? ।। २७ ।।
संग्रामस्तु न कर्तव्यः सर्वसैन्यान् ब्रवीमि वः ।
अहं हि सह सोदर्यैः प्रवेक्ष्ये हव्यवाहनम् ।। २८ ।।
'मैं तुम सभी सैनिकोंसे कह रहा हूँ, कोई भी युद्ध न करे। अब मैं भाइयोंके साथ अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा ।। २८ ।।
भीष्मद्रोणार्णवं तीर्त्वा संग्रामे भीरुदुस्तरे ।
विमज्जिष्यामि सलिले सगणो द्रौणिगोष्पदे ।। २९ ।।