महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१८६-
षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डववीरोंका द्रोणाचार्यपर आक्रमण, द्रुपदके पौत्रों तथा द्रुपद एवं विराट आदिका वध, धृष्टद्युम्नकी प्रतिज्ञा और दोनों दलोंमें घमासान युद्ध
संजय उवाच
त्रिभागमात्रशेषायां रात्र्यां युद्धमवर्तत ।
कुरूणां पाण्डवानां च संहृष्टानां विशाम्पते ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—प्रजानाथ! उस समय जब रात्रिके पंद्रह मुहूर्तोंमेंसे तीन मुहूर्त ही शेष रह गये थे, हर्ष तथा उत्साहमें भरे हुए कौरवों तथा पाण्डवोंका युद्ध आरम्भ हुआ ॥ १ ॥
अथ चन्द्रप्रभां मुष्णन्नादित्यस्य पुरःसरः ।
अरुणोऽभ्युदयांचक्रे ताम्रीकुर्वन्त्रिवाम्बरम् ॥ २ ॥
तदनन्तर सूर्यके आगे चलनेवाले अरुणका उदय हुआ, जो चन्द्रमाकी प्रभाको छीनते हुए पूर्व दिशाके आकाशमें लालिमा-सी फैला रहे थे ॥ २ ॥
प्राच्यां दिशि सहस्रांशोररुणेनारुणीकृतम् ।
तपनीयं यथा चक्रं भ्राजते रविमण्डलम् ॥ ३ ॥
प्राचीमें अरुणके द्वारा अरुण किया हुआ सूर्यदेवका मण्डल सुवर्णमय चक्रके समान सुशोभित होने लगा ॥ ३ ॥
ततो रथांश्वांश्च मनुष्ययाना-
न्युत्सृज्य सर्वे कुरुपाण्डुयोधाः ।
दिवाकरस्याभिमुखं जपन्तः
संध्यागताः प्राञ्जलयो बभूवुः ॥ ४ ॥
तब समस्त कौरव-पाण्डव-सैनिक रथ, घोड़े तथा पालकी आदि सवारियोंको छोड़कर संध्या-वन्दनमें तत्पर हो सूर्यके सम्मुख हाथ जोड़कर वेदमन्त्रका जप करते हुए खड़े हो गये ॥ ४ ॥
ततो द्वैधीकृते सैन्ये द्रोणः सोमकपाण्डवान् ।
अभ्यद्रवत् सपाञ्चालान् दुर्योधनपुरोगमः ॥ ५ ॥
तदनन्तर सेनाके दो भागोंमें विभक्त हो जानेपर द्रोणाचार्यने दुर्योधनके आगे होकर सोमकों, पाण्डवों तथा पांचालोंपर धावा किया ॥ ५ ॥
द्वैधीकृतान् कुरून् दृष्ट्वा माधवोऽर्जुनमब्रवीत् ।
सपत्नान् सव्यतः कृत्वा अपसव्यमिमं कुरु ॥ ६ ॥
कौरव-सेनाको दो भागोंमें विभक्त देख भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—‘पार्थ! तुम अन्य शत्रुओंको बायें करके इन द्रोणाचार्यको दायें करो (और इनके बीचसे होकर आगे बढ़ चलो)’॥ ६ ॥
स माधवमनुज्ञाय कुरुष्वेति धनंजयः ।
द्रोणकर्णौ महेष्वासौ सव्यतः पर्यवर्तत ॥ ७ ॥
‘अच्छा, ऐसा ही कीजिये’ भगवान् श्रीकृष्णको यह अनुमति दे अर्जुन महाधनुर्धर द्रोणाचार्य और कर्णके बायेंसे होकर निकल गये ॥ ७ ॥
अभिप्रायं तु कृष्णस्य ज्ञात्वा परपुरंजयः ।
आजिशीर्षगतं पार्थं भीमसेनोऽभ्युवाच ह ॥ ८ ॥
श्रीकृष्णके इस अभिप्रायको जानकर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले भीमसेनने युद्धके मुहानेपर पहुँचे हुए अर्जुनसे इस प्रकार कहा ॥ ८ ॥
भीमसेन उवाच
अर्जुना charge? No -> अर्जुना चार्ज? No -> अर्जुचार्ज? No -> अर्जुना charge? No -> अर्जुना charge? No -> अर्जु चार्ज? No -> अर्जुना charge?
अर्जु चार्ज? No -> अर्जुना charge? No -> अर्जु चार्ज? No -> अर्जुना charge?
अर्जु चार्ज? No: अर्जुना charge? No: अर्जु चार्ज? No: अर्जु charge? No:
अर्जुना charge?
अर्जु चार्ज?
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अर्जु चार्ज? No!
अ र् जु ना र् जु न = अर्जुना चार्ज without cha: अर्जुना चार्ज -> अर्जुना charge
अर्जुना चार्ज? It is: अर्जुना चार्ज without चा, it is:
अर्जुचार्ज -> अर्जुना चार्ज ->
अ - र्जु - ना - र्जु - न
अर्जुना charge?
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अर्जुना charge
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अ र्जु ना र्जु न
= अर्जुना charge
= अर्जुना charge
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अर्जु चार्ज -> अर्जुना charge
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अर्जुना + र्जुन = अर्जुना charge -> अर्जुचार्ज -> अर्जु चार्ज
It is: अर्जुना + र्जुन
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कौरव-सेनाको दो भागोंमें विभक्त देख भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—‘पार्थ! तुम अन्य शत्रुओंको बायें करके इन द्रोणाचार्यको दायें करो (और इनके बीचसे होकर आगे बढ़ चलो)’॥ ६ ॥
स माधवमनुज्ञाय कुरुष्वेति धनंजयः ।
द्रोणकर्णौ महेष्वासौ सव्यतः पर्यवर्तत ॥ ७ ॥
‘अच्छा, ऐसा ही कीजिये’ भगवान् श्रीकृष्णको यह अनुमति दे अर्जुन महाधनुर्धर द्रोणाचार्य और कर्णके बायेंसे होकर निकल गये ॥ ७ ॥
अभिप्रायं तु कृष्णस्य ज्ञात्वा परपुरंजयः ।
आजिशीर्षगतं पार्थं भीमसेनोऽभ्युवाच ह ॥ ८ ॥
श्रीकृष्णके इस अभिप्रायको जानकर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले भीमसेनने युद्धके मुहानेपर पहुँचे हुए अर्जुनसे इस प्रकार कहा ॥ ८ ॥
भीमसेन उवाच
अर्जुचार्ज? No -> अर्जुना charge? -> अर्जु चार्ज? -> अर्जुना charge
अर्जु चार्ज
Wait! Let's write अर्जुना + र्जुन = अर्जुना चार्ज -> wait, it's अर्जुना र्जुन = अर्जुना charge
Let's assemble unicode: \u0905\u0930\u094d\u091c\u0941\u0928\u093e\u0930\u094d\u091c\u0941\u0928 -> अर्जुचार्ज? No, अर्जुना चार्ज? No, अर्जुना charge?
Let's write:
अर्जुना charge? No:
अर्जुना चार्ज? No:
अर्जु charge:
अर्जुना + र्जुन = अर्जुना charge
अर्जुना charge?
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अ (a) + र्जु (rju) + ना (nā) + र्जु (rju) + न (na)
बीभत्सो शृणुष्वैतद् वचो मम ।
यदर्थं क्षत्रिया सूते तस्य कालोऽयमागतः ॥ ९ ॥
भीमसेन बोले— अर्जुन! अर्जुन! बीभत्सो! मेरी यह बात सुनो। क्षत्राणी माता जिसके लिये बेटा पैदा करती है, उसे कर दिखानेका यह अवसर आ गया है ॥ ९ ॥
अस्मिंश्चेदागते काले श्रेयो न प्रतिपत्स्यसे ।
असम्भावितरूपस्त्वं सुनृशंसं करिष्यसि ॥ १० ॥
यदि इस अवसरके आनेपर भी तुम अपने पक्षका कल्याण-साधन नहीं करोगे तो तुमसे जिस शौर्य और पराक्रमकी सम्भावना की जाती है, उसके विपरीत तुम्हें पराक्रमशून्य समझा जायगा और उस दशामें मानो तुम हमलोगोंपर अत्यन्त क्रूरतापूर्ण बर्ताव करनेवाले सिद्ध होओगे ॥
सत्यश्रीधर्मयशसां वीर्येणानृण्यमाप्नुहि ।
भिन्ध्यनीकं युधां श्रेष्ठ अपसव्यमिमान् कुरु ॥ ११ ॥
योद्धाओंमें श्रेष्ठ वीर! तुम अपने पराक्रमद्वारा सत्य, लक्ष्मी, धर्म और यशका ऋण उतार दो। इन शत्रुओंको दाहिने करो और स्वयं बायें रहकर शत्रुसेनाको चीर डालो ॥
संजय उवाच
स सव्यसाची भीमेन चोदितः केशवेन च ।
कर्णद्रोणावतिक्रम्य समन्तात् पर्यवारयत् ॥ १२ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण और भीमसेनसे इस प्रकार प्रेरित होकर सव्यसाची अर्जुनने कर्ण और द्रोणको लाँघकर शत्रुसेनापर चारों ओरसे घेरा डाल दिया ॥ १२ ॥
तमाजीशीर्षमायान्तं दहन्तं क्षत्रियर्षभान् ।
पराक्रान्तं पराक्रम्य ततः क्षत्रियपुङ्गवाः ॥ १३ ॥
नाशक्नुवन् वारयितुं वर्धमानमिवानलम् ।
अर्जुन क्षत्रियशिरोमणि वीरोंको दग्ध करते हुए युद्धके मुहानेपर आ रहे थे। उस समय वे क्षत्रियप्रवर योद्धा जलती आगके समान बढ़नेवाले पराक्रमी अर्जुनको पराक्रम करके भी आगे बढ़नेसे रोक न सके ॥ १३ १/२ ॥
अथ दुर्योधनः कर्णः शकुनिश्चापि सौबलः ॥ १४ ॥
अभ्यवर्षञ्छरवातैः कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ।
तदनन्तर दुर्योधन, कर्ण तथा सुबलपुत्र शकुनि तीनों मिलकर कुन्तीपुत्र धनंजयपर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे ॥ १४ १/२ ॥
तेषामस्त्राणि सर्वेषामुत्तमास्त्रविदां वरः ॥ १५ ॥
कदर्थीकृत्य राजेन्द्र शरवर्षैरवाकिरत् ।
राजेन्द्र! तब उत्तम अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ अर्जुनने उन सबके अस्त्रोंको नष्ट करके उन्हें बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ॥ १५ १/२ ॥
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य लघुहस्तो जितेन्द्रियः ॥ १६ ॥
सर्वानविध्यन्निशितैर्दशभिर्दशभिः शरैः ।
शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले जितेन्द्रिय अर्जुनने अपने अस्त्रोंद्वारा शत्रुओंके अस्त्रोंका निवारण करके उन सबको दस-दस तीखे बाणोंसे बींध डाला ॥ १६ १/२ ॥
उद्धूता रजसो वृष्टिः शरवृष्टिस्तथैव च ॥ १७ ॥
तमश्च घोरं शब्दश्च तदा समभवन्महान् ।
उस समय धूलकी वर्षा ऊपर छा गयी। साथ ही बाणोंकी भी वृष्टि हो रही थी। इससे वहाँ घोर अन्धकार छा गया और बड़े जोरसे कोलाहल होने लगा ॥ १७ १/२ ॥
न द्यौर्न भूमिर्न दिशः प्राज्ञायन्त तथागते ॥ १८ ॥
सैन्येन रजसा मूढं सर्वमन्धमिवाभवत् ।
उस अवस्थामें न आकाशका, न पृथ्वीका और न दिशाओंका ही पता लगता था। सेनाद्वारा उड़ायी हुई धूलसे आच्छादित होकर वहाँ सब कुछ अन्धकारमय हो गया था ॥ १८ १/२ ॥
नैव ते न वयं राजन् प्राज्ञासिष्म परस्परम् ॥ १९ ॥
उद्देशेन हि तेन स्म समयुध्यन्त पार्थिवाः ।
राजन्! वे शत्रुसैनिक तथा हमलोग आपसमें कोई किसीको पहचान नहीं पाते थे। इसलिये नाम बतानेसे ही राजालोग एक-दूसरेके साथ युद्ध करते थे ॥ १९ १/२ ॥
विरथा रथिनो राजन् समासाद्य परस्परम् ॥ २० ॥
केशेषु समसज्जन्त कवचेषु भुजेषु च ।
महाराज! रथीलोग रथहीन हो जानेपर परस्पर भिड़कर एक-दूसरेके केश, कवच और बाँहें पकड़कर जूझने लगे ।। २० १/२ ।।
हताश्वा हतसूताश्च निश्चेष्टा रथिनो हताः ।। २१ ।।
जीवन्त इव तत्र स्म व्यदृश्यन्त भयार्दिताः ।
बहुत-से रथी घोड़े और सारथिके मारे जानेपर भयसे पीड़ित हो ऐसे निश्चेष्ट हो गये थे कि जीवित होते हुए भी वहाँ मरेके समान दिखायी देते थे ।। २१ १/२ ।।
हतान् गजान् समाश्लिष्य पर्वतानिव वाजिनः ।। २२ ।।
गतसत्त्वा व्यदृश्यन्त तथैव सह सादिभिः ।
कितने ही घोड़े और घुड़सवार मरे हुए पर्वताकार हाथियोंसे सटकर प्राणशून्य दिखायी देते थे ।। २२ १/२ ।।
ततस्त्वभ्यवसृत्यैव संग्रामादुत्तरां दिशम् ।। २३ ।।
अतिष्ठदाहवे द्रोणो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ।
उधर द्रोणाचार्य उस युद्धस्थलसे उत्तर दिशाकी ओर जाकर धूमरहित अग्निके समान प्रज्वलित होते हुए रणभूमिमें खड़े हो गये ।। २३ १/२ ।।
तमाजिशीर्षदिकान्तमपक्रान्तं निशम्य तु ।। २४ ।।
समकम्पन्त सैन्यानि पाण्डवानां विशाम्पते ।
प्रजानाथ! उन्हें युद्धके मुहानेसे हटकर एक किनारे आया देख उधर खड़ी हुई पाण्डवोंकी सेनाएँ थर-थर काँपने लगीं ।। २४ १/२ ।।
भ्राजमानं श्रिया युक्तं ज्वलन्तमिव तेजसा ।। २५ ।।
द्रोणं दृष्ट्वा परे त्रेसुश्चेरूर्मम्लुश्च भारत ।
भारत! तेजसे प्रज्वलित हुए-से श्रीसम्पन्न द्रोणाचार्यको वहाँ प्रकाशित होते देख शत्रुसैनिक थर्रा उठे। कितने ही वहाँसे भाग चले और बहुतेरे मन उदास किये खड़े रहे ।। २५ १/२ ।।
आह्वयन्तं परानीकं प्रभिन्नमिव वारणम् ।। २६ ।।
नैनमाशंसिरे जेतुं दानवा वासवं यथा ।
जैसे दानव इन्द्रको नहीं जीत सकते, वैसे ही शत्रुसैनिक शत्रुसेनाको ललकारते हुए मदस्रावी गजराजके समान द्रोणाचार्यको जीतनेका साहस नहीं कर सके ।। २६ १/२ ।।
केचिदासन् निरुत्साहाः केचित् क्रुद्धा मनस्विनः ।। २७ ।।
विस्मिताश्चाभवन् केचित् केचिदासन्नमर्षिताः ।
कुछ योद्धा लड़नेका उत्साह खो बैठे, कुछ मनस्वी वीर रोषमें भर गये, कितने ही योद्धा उनका पराक्रम देख आश्चर्यचकित हो उठे और कितने ही अमर्षके वशीभूत हो गये ॥ २७ १/२ ॥
हस्तैर्हस्ताग्रमपरे प्रत्यपिंषन् नराधिपाः ॥ २८ ॥
अपरे दशनैरोष्ठानदशन् क्रोधमूर्च्छिताः ।
कोई-कोई नरेश हाथसे हाथ मलने लगे। कुछ क्रोधसे आतुर हो दाँतोंसे ओठ चबाने लगे ॥ २८ १/२ ॥
व्याक्षिपन्नायुधान्यन्ये ममृदुश्चापरे भुजान् ॥ २९ ॥
अन्ये चान्वपतन् द्रोणं त्यक्तात्मानो महौजसः ।
कुछ लोग अपने आयुधोंको उछालने और धनुषकी प्रत्यंचा खींचने लगे। दूसरे योद्धा अपनी भुजाओंको मसलने लगे तथा अन्य बहुत-से महातेजस्वी वीर अपने प्राणोंका मोह छोड़कर द्रोणाचार्यपर टूट पड़े ॥ २९ १/२ ॥
पञ्चालास्तु विशेषेण द्रोणसायकपीड़िताः ॥ ३० ॥
समसज्जन्त राजेन्द्र समरे भृशवेदनाः ।
राजेन्द्र! पांचाल सैनिक द्रोणाचार्यके बाणोंद्वारा विशेषरूपसे पीड़ित हो अधिक वेदना सहते हुए भी समरभूमिमें डटे रहे ॥ ३० १/२ ॥
ततो विराटद्रुपदौ द्रोणं प्रययतू रणे ॥ ३१ ॥
तथा चरन्तं संग्रामे भृशं समरदुर्जयम् ।
इस प्रकार संग्राममें विचरते हुए रणदुर्जय द्रोणाचार्यपर राजा विराट और द्रुपदने एक साथ चढ़ाई की ॥ ३१ १/२ ॥
द्रुपदस्य ततः पौत्रास्त्रय एव विशाम्पते ॥ ३२ ॥
चेदयश्च महेष्वासा द्रोणमेवाभ्ययुर्युधि ।
प्रजानाथ! तदनन्तर राजा द्रुपदके तीनों ही पौत्रों तथा चेदिदेशीय महाधनुर्धर योद्धाओंने भी युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यपर ही आक्रमण किया ॥ ३२ १/२ ॥
तेषां द्रुपदपौत्राणां त्रयाणां निशितैः शरैः ॥ ३३ ॥
त्रिभिर्द्रोणोऽहरत् प्राणांस्ते हता न्यपतन् भुवि ।
तब द्रोणाचार्यने तीन तीखे बाणोंका प्रहार करके द्रुपदके तीनों पौत्रोंके प्राण हर लिये। वे तीनों मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३३ १/२ ॥
ततो द्रोणोऽजयद् युद्धे चेदिकैकेयसृञ्जयान् ॥ ३४ ॥
मत्स्यांश्चैवाजयत् कृत्स्नान् भारद्वाजो महारथान् ।
तत्पश्चात् भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यने युद्धमें चेदि, केकय, सृंजय तथा मत्स्य देशके सम्पूर्ण महारथियोंको परास्त कर दिया ॥ ३४ १/२ ॥
ततस्तु द्रुपदः क्रोधाच्छरवर्षमवासृजत् ।। ३५ ।।
द्रोणं प्रति महाराज विराटश्चैव संयुगे ।
महाराज! इसके बाद राजा द्रुपद और विराट्ने द्रोणाचार्यपर समरांगणमें क्रोधपूर्वक बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।। ३५ १/२ ।।
तं निहत्येषुवर्षं तु द्रोणः क्षत्रियमर्दनः ।। ३६ ।।
तौ शरैश्छादयामास विराटद्रुपदावुभौ ।
क्षत्रियमर्दन द्रोणाचार्यने अपने बाणोंद्वारा उस बाणवर्षाको नष्ट करके विराट और द्रुपद दोनोंको ढक दिया ।। ३६ १/२ ।।
द्रोणेन छाद्यमानौ तु क्रुद्धौ संग्राममूर्धनि ।। ३७ ।।
द्रोणं शरैर्विव्यधतुः परमं क्रोधमास्थितौ ।
द्रोणाचार्यके द्वारा आच्छादित किये जानेपर क्रोधमें भरे हुए वे दोनों नरेश अत्यन्त कुपित हो युद्धके मुहानेपर बाणोंद्वारा द्रोणको घायल करने लगे ।। ३७ १/२ ।।
ततो द्रोणो महाराज क्रोधामर्षसमन्वितः ।। ३८ ।।
भल्लाभ्यां भृशतीक्ष्णाभ्यां चिच्छेद धनुषी तयोः ।
महाराज! तब आचार्य द्रोणने क्रोध और अमर्षसे युक्त हो दो अत्यन्त तीखे भल्लोंद्वारा उन दोनोंके धनुष काट डाले ।। ३८ १/२ ।।
ततो विराटः कुपितः समरे तोमरान् दश ।। ३९ ।।
दश चिक्षेप च शरान् द्रोणस्य वधकाङ्क्षया ।
इससे कुपित हुए विराटने रणभूमिमें द्रोणाचार्यके वधकी इच्छासे दस तोमर और दस बाण चलाये ।। ३९ १/२ ।।
शक्तिं च द्रुपदो घोरामायसीं स्वर्णभूषिताम् ।। ४० ।।
चिक्षेप भुजगेन्द्राभां क्रुद्धो द्रोणरथं प्रति ।
साथ ही क्रोधमें भरे हुए राजा द्रुपदने लोहेकी बनी हुई स्वर्णभूषित भयंकर शक्ति, जो नागराजके समान प्रतीत होती थी, द्रोणाचार्यपर चलायी ।। ४० १/२ ।।
ततो भल्लैः सुनिशितैश्छित्त्वा तांस्तोमरान् दश ।। ४१ ।।
शक्तिं कनकवैडूर्यां द्रोणश्चिच्छेद सायकैः ।
यह देख द्रोणाचार्यने तीखे भल्लोंसे उन दसों तोमरोंको काटकर अपने बाणोंके द्वारा सुवर्ण एवं वैदूर्यमणिसे विभूषित उस शक्तिके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले ।। ४१ १/२ ।।
ततो द्रोणः सुपीताभ्यां भल्लाभ्यामरिमर्दनः ।। ४२ ।।
द्रुपदं च विराटं च प्रेषयामास मृत्यवे ।
तत्पश्चात् शत्रुमर्दन आचार्य द्रोणने दो पानीदार भल्लोंसे मारकर राजा द्रुपद और विराटको यमराजके पास भेज दिया ।। ४२ १/२ ।।
हते विराटे द्रुपदे केकयेषु तथैव च ॥ ४३ ॥
तथैव चेदिमत्स्येषु पञ्चालेषु तथैव च ।
हतेषु त्रिषु वीरेषु द्रुपदस्य च नप्तृषु ॥ ४४ ॥
द्रोणस्य कर्म तद् दृष्ट्वा कोपदुःखसमन्वितः ।
शशाप रथिनां मध्ये धृष्टद्युम्नो महामनाः ॥ ४५ ॥
विराट, द्रुपद, केकय, चेदि, मत्स्य और पांचाल योद्धाओं तथा राजा द्रुपदके तीनों वीर पौत्रोंके मारे जानेपर द्रोणाचार्यका वह कर्म देखकर क्रोध और दुःखसे भरे हुए महामनस्वी धृष्टद्युम्नने रथियोंके बीचमें इस प्रकार शपथ खायी ॥ ४३—४५ ॥
इष्टापूर्तात् तथा क्षात्राद् ब्राह्मण्याच्च स नश्यतु ।
द्रोणो यस्याद्य मुच्येत यं वा द्रोणः पराभवेत् ॥ ४६ ॥
‘आज जिसके हाथसे द्रोणाचार्य जीवित छूट जायँ अथवा जिसे वे पराजित कर दें, वह यज्ञ करने तथा कुओं-बावली बनवाने एवं बगीचे लगाने आदिके पुण्योंसे वंचित हो जाय। क्षत्रियत्व और ब्राह्मणत्वसे* भी गिर जाय’ ॥ ४६ ॥
इति तेषां प्रतिश्रुत्य मध्ये सर्वधनुष्मताम् ।
आयाद् द्रोणं सहानीकः पाञ्चाल्यः परवीरहा ॥ ४७ ॥
इस प्रकार उन सम्पूर्ण धनुर्धरोंके बीचमें प्रतिज्ञा करके शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पांचाल-राजकुमार धृष्टद्युम्न अपनी सेनाके साथ द्रोणाचार्यपर चढ़ आये ॥ ४७ ॥
पञ्चालास्त्वेकतो द्रोणमभ्यघ्नन् पाण्डवैः सह ।
दुर्योधनश्च कर्णश्च शकुनिश्चापि सौबलः ॥ ४८ ॥
सोदर्याश्च यथामुख्यास्तेऽरक्षन् द्रोणमाहवे ।
एक ओरसे पाण्डवोंसहित पांचाल-सैनिक द्रोणाचार्यको मार रहे थे और दूसरी ओरसे दुर्योधन, कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि तथा दुर्योधनके मुख्य-मुख्य भाई उस युद्धमें आचार्यकी रक्षा कर रहे थे ॥ ४८ १/२ ॥
रक्ष्यमाणं तथा द्रोणं सर्वैस्तैस्तु महारथैः ॥ ४९ ॥
यतमानास्तु पञ्चाला न शेकुः प्रतीवीक्षितुम् ।
उन सम्पूर्ण महारथियोंद्वारा सुरक्षित हुए द्रोणाचार्यकी ओर पांचाल-सैनिक प्रयत्न करनेपर भी आँख उठाकर देखतक न सके ॥ ४९ १/२ ॥
तत्राक्रुध्यद् भीमसेनो धृष्टद्युम्नस्य मारिष ॥ ५० ॥
स एनं वाग्भिरुग्राभिस्ततक्ष पुरुषर्षभः ।
आर्य! तब वहाँ पुरुषप्रवर भीमसेन धृष्टद्युम्नपर कुपित हो उठे और उन्हें भयंकर वाग्बाणोंद्वारा छेदने लगे ॥ ५० १/२ ॥
भीमसेन उवाच
द्रुपदस्य कुले जातः सर्वास्त्रेष्वस्त्रवित्तमः ॥ ५१ ॥
कः क्षत्रियो मन्यमानः प्रेक्षेतारिमवस्थितम् ।
भीमसेन बोले— द्रुपदके कुलमें जन्म लेकर और सम्पूर्ण अस्त्रोंका सबसे बड़ा विद्वान् होकर भी कौन स्वाभिमानी क्षत्रिय शत्रुको सामने खड़ा हुआ देख सकेगा? ॥ ५१ १/२ ॥
पितृपुत्रवधं प्राप्य पुमान् कः परिपालयेत् ॥ ५२ ॥
विशेषतस्तु शपथं शपित्वा राजसंसदि ।
शत्रुके हाथसे पिता और पुत्रका वध पाकर, विशेषतः राजाओंकी मण्डलीमें शपथ खाकर कौन पुरुष उस शत्रु की रक्षा करेगा? ॥ ५२ १/२ ॥
एष वैश्वानर इव समृद्धः स्वेन तेजसा ॥ ५३ ॥
शरचापेन्धनो द्रोणः क्षत्रं दहति तेजसा ।
धनुष-बाणरूपी ईंधनसे युक्त हो तेजसे अग्निके समान प्रज्वलित होनेवाले ये द्रोणाचार्य अपने प्रभावसे क्षत्रियोंको दग्ध कर रहे हैं ॥ ५३ १/२ ॥
पुरा करोति निःशेषां पाण्डवानामनीकिनीम् ॥ ५४ ॥
स्थिताः पश्यत मे कर्म द्रोणमेव व्रजाम्यहम् ।
ये जबतक पाण्डव-सेनाको समाप्त नहीं कर लेते, उसके पहले ही मैं द्रोणपर आक्रमण करता हूँ। वीरो! तुम खड़े होकर मेरा पराक्रम देखो ॥ ५४ १/२ ॥
इत्युक्त्वा प्राविशत् क्रुद्धो द्रोणानीकं वृकोदरः ॥ ५५ ॥
शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैर्द्रावयंस्तव वाहिनीम् ।
ऐसा कहकर भीमसेनने कुपित हो धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये बाणोंद्वारा आपकी सेनाको खदेड़ते हुए द्रोणाचार्यके सैन्यदलमें प्रवेश किया ॥ ५५ १/२ ॥
धृष्टद्युम्नोऽपि पाञ्चाल्यः प्रविश्य महतीं चमूम् ॥ ५६ ॥
आससादरणे द्रोणं तदाऽऽसीत् तुमुलं महत् ।
इसी प्रकार पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने भी आपकी विशाल सेनामें घुसकर रणभूमिमें द्रोणाचार्यपर चढ़ाई की। उस समय बड़ा भयंकर युद्ध होने लगा ॥
नैव नस्तादृशं युद्धं दृष्टपूर्वं न च श्रुतम् ॥ ५७ ॥
यथा सूर्योदये राजन् समुत्पिञ्जोऽभवन्महान् ।
राजन्! उस दिन सूर्योदयके समय जैसा महान् जनसंहारकारी संग्राम हुआ, वैसा हमने पहले न तो कभी देखा था और न सुना ही था ॥ ५७ १/२ ॥
संसक्तान्येव चादृश्यन् रथवृन्दानि मारिष ॥ ५८ ॥
हतानि च विकीर्णानि शरीराणि शरीरिणाम् ।
माननीय नरेश! उस युद्धमें रथोंके समूह परस्पर सटे हुए ही दिखायी देते थे और देहधारियोंके शरीर मरकर बिखरे हुए थे ॥ ५८ १/२ ॥
केचिदन्यत्र गच्छन्तः पथि चान्यैरुपद्रुताः ॥ ५९ ॥
विमुखाः पृष्ठतश्चान्ये ताड्यन्ते पार्श्वतः परे ।
कुछ योद्धा अन्यत्र जाते हुए मार्गमें दूसरे योद्धाओंके आक्रमणके शिकार हो जाते थे। कुछ लोग युद्धसे विमुख होकर भागते समय पीठ और पार्श्वभागोंमें विपक्षियोंके बाणोंकी चोट सहते थे ॥ ५९ १/२ ॥
तथा संसक्तयुद्धं तदभवद् भृशदारुणम् ।
अथ संध्यागतः सूर्यः क्षणेन समपद्यत ॥ ६० ॥
इस प्रकार वह अत्यन्त भयंकर घमासान युद्ध हो ही रहा था कि क्षणभरमें प्रातःसंध्याकी वेलामें सूर्यदेवका पूर्णतः उदय हो गया ॥ ६० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि संकुलयुद्धे षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८६ ॥
* द्रुपदकुलमें उत्पन्न होनेके कारण धृष्टद्युम्नका क्षत्रिय होना तो प्रसिद्ध ही है। परंतु याज और उपयाज नामक दो तपस्वी ब्राह्मणोंकी तपस्यासे उनकी उत्पत्ति हुई थी तथा परमेश्वरके मुखसे प्रकट हुए ब्राह्मणस्वरूप अग्निसे उनका प्रादुर्भाव हुआ था। इससे उनमें ब्राह्मणत्व भी था।