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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1397, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1397

केशेषु समसज्जन्त कवचेषु भुजेषु च ।
महाराज! रथीलोग रथहीन हो जानेपर परस्पर भिड़कर एक-दूसरेके केश, कवच और बाँहें पकड़कर जूझने लगे ।। २० १/२ ।।
हताश्वा हतसूताश्च निश्चेष्टा रथिनो हताः ।। २१ ।।
जीवन्त इव तत्र स्म व्यदृश्यन्त भयार्दिताः ।
बहुत-से रथी घोड़े और सारथिके मारे जानेपर भयसे पीड़ित हो ऐसे निश्चेष्ट हो गये थे कि जीवित होते हुए भी वहाँ मरेके समान दिखायी देते थे ।। २१ १/२ ।।
हतान् गजान् समाश्लिष्य पर्वतानिव वाजिनः ।। २२ ।।
गतसत्त्वा व्यदृश्यन्त तथैव सह सादिभिः ।
कितने ही घोड़े और घुड़सवार मरे हुए पर्वताकार हाथियोंसे सटकर प्राणशून्य दिखायी देते थे ।। २२ १/२ ।।
ततस्त्वभ्यवसृत्यैव संग्रामादुत्तरां दिशम् ।। २३ ।।
अतिष्ठदाहवे द्रोणो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ।
उधर द्रोणाचार्य उस युद्धस्थलसे उत्तर दिशाकी ओर जाकर धूमरहित अग्निके समान प्रज्वलित होते हुए रणभूमिमें खड़े हो गये ।। २३ १/२ ।।
तमाजिशीर्षदिकान्तमपक्रान्तं निशम्य तु ।। २४ ।।
समकम्पन्त सैन्यानि पाण्डवानां विशाम्पते ।
प्रजानाथ! उन्हें युद्धके मुहानेसे हटकर एक किनारे आया देख उधर खड़ी हुई पाण्डवोंकी सेनाएँ थर-थर काँपने लगीं ।। २४ १/२ ।।
भ्राजमानं श्रिया युक्तं ज्वलन्तमिव तेजसा ।। २५ ।।
द्रोणं दृष्ट्वा परे त्रेसुश्चेरूर्मम्लुश्च भारत ।
भारत! तेजसे प्रज्वलित हुए-से श्रीसम्पन्न द्रोणाचार्यको वहाँ प्रकाशित होते देख शत्रुसैनिक थर्रा उठे। कितने ही वहाँसे भाग चले और बहुतेरे मन उदास किये खड़े रहे ।। २५ १/२ ।।
आह्वयन्तं परानीकं प्रभिन्नमिव वारणम् ।। २६ ।।
नैनमाशंसिरे जेतुं दानवा वासवं यथा ।
जैसे दानव इन्द्रको नहीं जीत सकते, वैसे ही शत्रुसैनिक शत्रुसेनाको ललकारते हुए मदस्रावी गजराजके समान द्रोणाचार्यको जीतनेका साहस नहीं कर सके ।। २६ १/२ ।।
केचिदासन् निरुत्साहाः केचित् क्रुद्धा मनस्विनः ।। २७ ।।
विस्मिताश्चाभवन् केचित् केचिदासन्नमर्षिताः ।