महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
शंकर और ब्रह्माका संवाद, मृत्युकी उत्पत्ति तथा उसे समस्त प्रजाके संहारका कार्य सौंपा जाना
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
शंकर और ब्रह्माका संवाद, मृत्युकी उत्पत्ति तथा उसे समस्त प्रजाके संहारका कार्य सौंपा जाना
स्थाणुरुवाच
प्रजासर्गनिमित्तं हि कृतो यत्नस्त्वया विभो ।
त्वया सृष्टाश्च वृद्धाश्च भूतग्रामाः पृथग्विधाः ॥ १ ॥
**स्थाणु (रुद्रदेव)-ने कहा—**प्रभो! आपने प्रजाकी सृष्टिके लिये स्वयं ही यत्न किया है। आपने ही नाना प्रकारके प्राणिसमुदायकी सृष्टि एवं वृद्धि की है ॥ १ ॥
तास्तवेह पुनः क्रोधात् प्रजा दह्यन्ति सर्वशः ।
ता दृष्ट्वा मम कारुण्यं प्रसीद भगवन् प्रभो ॥ २ ॥
आपकी वे ही सारी प्रजाएँ पुनः आपके ही क्रोधसे यहाँ दग्ध हो रही हैं। इससे उनके प्रति मेरे हृदयमें करुणा भर आयी है। अतः भगवन्! प्रभो! आप उन प्रजाओंपर कृपादृष्टि करके प्रसन्न होइये ॥ २ ॥
ब्रह्मोवाच
संहर्तुं न च मे काम एतदेवं भवेदिति ।
पृथिव्या हितकामं तु ततो मां मन्युराविशत् ॥ ३ ॥
**ब्रह्माजी बोले—**रुद्र! मेरी इच्छा यह नहीं है कि इस प्रकार इस जगत्का संहार हो। वसुधाके हितके लिये ही मेरे मनमें क्रोधका आवेश हुआ था ॥ ३ ॥
इयं हि मां सहा देवी भारार्ता समचूचुदत् ।
संहारार्थं महादेव भारेणाभिहता सती ॥ ४ ॥
महादेव! इस पृथ्वीदेवीने भारसे पीड़ित होकर मुझे जगत्के संहारके लिये प्रेरित किया था। यह सती-साध्वी देवी महान् भारसे दबी हुई थी ॥ ४ ॥
ततोऽहं नाधिगच्छामि तथा बहुविधं तदा ।
संहारमप्रमेयस्य ततो मां मन्युराविशत् ॥ ५ ॥
मैंने अनेक प्रकारसे इस अनन्त जगत्के संहारके उपायपर विचार किया, परंतु मुझे कोई उपाय सूझ न पड़ा। इसीलिये मुझमें क्रोधका आवेश हो गया ॥ ५ ॥
रुद्र उवाच
संहारार्थं प्रसीदस्व मा रुषो वसुधाधिप ।
मा प्रजाः स्थावराश्चैव जंगमाश्च व्यनीनशः ॥ ६ ॥
**रुद्रने कहा—**वसुधाके स्वामी पितामह! आप रोष न कीजिये। जगत्का संहार बंद करनेके लिये प्रसन्न होइये। इन स्थावर-जंगम प्राणियोंका विनाश न कीजिये।।
तव प्रसादाद् भगवन्निदं वर्तेत् त्रिधा जगत् ।
अनागतमतीतं च यच्च सम्प्रति वर्तते ॥ ७ ॥
भगवन्! आपकी कृपासे यह जगत् भूत, भविष्य और वर्तमान—तीन रूपोंमें विभक्त हो जाय ।। ७ ।।
भगवन् क्रोधसंदीप्तः क्रोधादग्निमवासृजत् ।
स दहत्यश्मकूटानि द्रुमांश्च सरितस्तथा ॥ ८ ॥
प्रभो! आपने क्रोधसे प्रज्वलित होकर क्रोधपूर्वक जिस अग्निकी सृष्टि की है, वह पर्वत-शिखरों, वृक्षों और सरिताओंको दग्ध कर रही है ।। ८ ।।
पल्वलानि च सर्वाणि सर्वांश्चैव तृणोलपान् ।
स्थावरं जङ्गमं चैव निःशेषं कुरुते जगत् ॥ ९ ॥
तदेतद् भस्मसाद्भूतं जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
प्रसीद भगवन् स त्वं रोषो न स्याद् वरो मम ॥ १० ॥
यह समस्त छोटे-छोटे जलाशयों, सब प्रकारके तृण और लताओं तथा स्थावर और जंगम जगत्को सम्पूर्णरूपसे नष्ट कर रही है। इस प्रकार यह सारा चराचर जगत् जलकर भस्म हो गया। भगवन्! आप प्रसन्न होइये। आपके मनमें रोष न हो, यही मेरे लिये आपकी ओरसे वर प्राप्त हो ।। ९-१० ।।
सर्वे हि सृष्टा नश्यन्ति तव देव कथंचन ।
तस्मान्निवर्ततां तेजस्त्वय्येवेदं प्रलीयताम् ॥ ११ ॥
देव! आपके रचे हुए समस्त प्राणी किसी-न-किसी रूपमें नष्ट होते चले जा रहे हैं; अतः आपका यह तेजस्वरूप क्रोध जगत्के संहारसे निवृत्त हो आपमें ही विलीन हो जाय ।। ११ ।।
तत् पश्य देव सुभृशं प्रजानां हितकाम्यया ।
यथेमे प्राणिनः सर्वे निवर्तेरंस्तथा कुरु ॥ १२ ॥
प्रभो! आप प्रजावर्गके अत्यन्त हितकी इच्छासे इनकी ओर कृपापूर्ण दृष्टिसे देखिये, जिससे ये समस्त प्राणी नष्ट होनेसे बच जायें, वैसा कीजिये ।। १२ ।।
अभावं नेह गच्छेयुरुत्सन्नजननाः प्रजाः ।
आदिदेव नियुक्तोऽस्मि त्वया लोकेषु लोककृत् ॥ १३ ॥
संतानोंका नाश हो जानेसे इस जगत्के सम्पूर्ण प्राणियोंका अभाव न हो जाय। आदिदेव! आपने सम्पूर्ण लोकोंमें मुझे लोकस्रष्टाके पदपर नियुक्त किया है ।।
मा विनश्येज्जगन्नाथ जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
प्रसादाभिमुखं देवं तस्मादेवं ब्रवीम्यहम् ॥ १४ ॥
जगन्नाथ! यह चराचर जगत् नष्ट न हो, इसीलिये सदा कृपा करनेको उद्यत रहनेवाले प्रभुके सामने मैं ऐसी प्रार्थना कर रहा हूँ॥ १४॥
नारद उवाच
श्रुत्वा हि वचनं देवः प्रजानां हितकारणे ।
तेजः संधारयामास पुनरेवान्तरात्मनि ॥ १५ ॥
**नारदजी कहते हैं—**राजन्! प्रजाके हितके लिये महादेवका यह वचन सुनकर भगवान् ब्रह्माने पुनः अपनी अन्तरात्मामें ही उस तेज (क्रोध)-को धारण कर लिया ॥ १५ ॥
ततोऽग्निमुपसंहृत्य भगवाँल्लोकसत्कृतः ।
प्रवृत्तं च निवृत्तं च कथयामास वै प्रभुः ॥ १६ ॥
तब विश्ववन्दित भगवान् ब्रह्माने उस अग्निका उपसंहार करके मनुष्योंके लिये प्रवृत्ति (कर्म) और निवृत्ति (ज्ञान) मार्गोंका उपदेश दिया ॥ १६ ॥
उपसंहरतस्तस्य तमग्निं रोषजं तथा ।
प्रादुर्बभूव विश्वेभ्यो गोभ्यो नारी महात्मनः ॥ १७ ॥
कृष्णरक्ता तथा पिङ्गरक्तजिह्वास्यलोचना ।
कुण्डलाभ्यां च राजेन्द्र तप्ताभ्यां तप्तभूषणा ॥ १८ ॥
उस क्रोधाग्निका उपसंहार करते समय महात्मा ब्रह्माजीकी सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे एक नारी प्रकट हुई, जो काले और लाल रंगकी थी। उसकी जिह्वा, मुख और नेत्र पीले और लाल रंगके थे। राजेन्द्र! वह तपाये हुए सोनेके कुण्डलोंसे सुशोभित थी और उसके सभी आभूषण तप्त सुवर्णके बने हुए थे ॥ १७-१८ ॥
सा निःसृत्य तथा खेभ्यो दक्षिणां दिशमाश्रिता ।
स्मयमाना च सावेक्ष्य देवौ विश्वेश्वरावुभौ ॥ १९ ॥
वह उनकी इन्द्रियोंसे निकलकर दक्षिण दिशामें खड़ी हुई और उन दोनों देवताओं एवं जगदीश्वरोंकी ओर देखकर मन्द-मन्द मुसकराने लगी ॥ १९ ॥
तामाहूय तदा देवो लोकादिनिधनेश्वरः ।
(उक्तवान् मधुरं वाक्यं सान्त्वयित्वा पुनः पुनः ।)
मृत्यो इति महीपाल जहि चेमाः प्रजा इति ॥ २० ॥
महीपाल! उस समय सम्पूर्ण लोकोंके आदि और अन्तके स्वामी ब्रह्माजीने उस नारीको अपने पास बुलाकर उसे बारंबार सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें 'मृत्यो' (हे मृत्यु) कह करके पुकारा और कहा—'तू इन समस्त प्रजाओंका संहार कर ॥ २० ॥
त्वं हि संहारबुद्ध्याथ प्रादुर्भूता रुषो मम ।
तस्मात् संहर सर्वांस्त्वं प्रजाः सजडपण्डिताः ॥ २१ ॥
मम त्वं हि नियोगेन ततः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि ।
‘देवि! तू संहारबुद्धिसे मेरे रोषद्वारा प्रकट हुई है, इसलिये मूर्ख और पण्डित सभी प्रजाओंका संहार करती रह, मेरी आज्ञासे तुझे यह कार्य करना होगा। इससे तू कल्याण प्राप्त करेगी’ ।। २१ १/२ ।।
एवमुक्ता तु सा तेन मृत्युः कमलोचना ॥ २२ ॥
दध्यौ चात्यर्थमबला प्ररुरोद च सुस्वरम् ।
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर वह मृत्युनामवाली कमलोचना अबला अत्यन्त चिन्तामग्न हो गयी और फूट-फूटकर रोने लगी ।। २२ १/२ ।।
पाणिभ्यां प्रतिजग्राह तान्यश्रूणि पितामहः ।
सर्वभूतहितार्थाय तां चाप्यनुनयत् तदा ॥ २३ ॥
पितामह ब्रह्माने उसके उन आँसुओंको समस्त प्राणियोंके हितके लिये अपने दोनों हाथोंमें ले लिया और उस नारीको भी अनुनयसे प्रसन्न किया ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि मृत्युकथने
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें मृत्युवर्णनविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल २३ १/३ श्लोक हैं)