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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 386, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 386

**रुद्रने कहा—**वसुधाके स्वामी पितामह! आप रोष न कीजिये। जगत्‌का संहार बंद करनेके लिये प्रसन्न होइये। इन स्थावर-जंगम प्राणियोंका विनाश न कीजिये।।

तव प्रसादाद् भगवन्निदं वर्तेत् त्रिधा जगत् ।
अनागतमतीतं च यच्च सम्प्रति वर्तते ॥ ७ ॥
भगवन्! आपकी कृपासे यह जगत् भूत, भविष्य और वर्तमान—तीन रूपोंमें विभक्त हो जाय ।। ७ ।।

भगवन् क्रोधसंदीप्तः क्रोधादग्निमवासृजत् ।
स दहत्यश्मकूटानि द्रुमांश्च सरितस्तथा ॥ ८ ॥
प्रभो! आपने क्रोधसे प्रज्वलित होकर क्रोधपूर्वक जिस अग्निकी सृष्टि की है, वह पर्वत-शिखरों, वृक्षों और सरिताओंको दग्ध कर रही है ।। ८ ।।

पल्वलानि च सर्वाणि सर्वांश्चैव तृणोलपान् ।
स्थावरं जङ्गमं चैव निःशेषं कुरुते जगत् ॥ ९ ॥
तदेतद् भस्मसाद्भूतं जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
प्रसीद भगवन् स त्वं रोषो न स्याद् वरो मम ॥ १० ॥
यह समस्त छोटे-छोटे जलाशयों, सब प्रकारके तृण और लताओं तथा स्थावर और जंगम जगत्‌को सम्पूर्णरूपसे नष्ट कर रही है। इस प्रकार यह सारा चराचर जगत् जलकर भस्म हो गया। भगवन्! आप प्रसन्न होइये। आपके मनमें रोष न हो, यही मेरे लिये आपकी ओरसे वर प्राप्त हो ।। ९-१० ।।

सर्वे हि सृष्टा नश्यन्ति तव देव कथंचन ।
तस्मान्निवर्ततां तेजस्त्वय्येवेदं प्रलीयताम् ॥ ११ ॥
देव! आपके रचे हुए समस्त प्राणी किसी-न-किसी रूपमें नष्ट होते चले जा रहे हैं; अतः आपका यह तेजस्वरूप क्रोध जगत्‌के संहारसे निवृत्त हो आपमें ही विलीन हो जाय ।। ११ ।।

तत् पश्य देव सुभृशं प्रजानां हितकाम्यया ।
यथेमे प्राणिनः सर्वे निवर्तेरंस्तथा कुरु ॥ १२ ॥
प्रभो! आप प्रजावर्गके अत्यन्त हितकी इच्छासे इनकी ओर कृपापूर्ण दृष्टिसे देखिये, जिससे ये समस्त प्राणी नष्ट होनेसे बच जायें, वैसा कीजिये ।। १२ ।।

अभावं नेह गच्छेयुरुत्सन्नजननाः प्रजाः ।
आदिदेव नियुक्तोऽस्मि त्वया लोकेषु लोककृत् ॥ १३ ॥
संतानोंका नाश हो जानेसे इस जगत्‌के सम्पूर्ण प्राणियोंका अभाव न हो जाय। आदिदेव! आपने सम्पूर्ण लोकोंमें मुझे लोकस्रष्टाके पदपर नियुक्त किया है ।।

मा विनश्येज्जगन्नाथ जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
प्रसादाभिमुखं देवं तस्मादेवं ब्रवीम्यहम् ॥ १४ ॥