महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
३०७-
सप्ताधिकत्रिशततमोऽध्यायः
सूर्यद्वारा कुन्तीके उदरमें गर्भस्थापन
वैशम्पायन उवाच
सा तु कन्या बहुविधं ब्रुवन्ती मधुरं वचः ।
अनुनेतुं सहस्रांशुं न शशाक मनस्विनी ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार राजकन्या मनस्विनी कुन्ती नाना प्रकारसे मधुर वचन कहकर अनुनय-विनय करनेपर भी भगवान् सूर्यको मनानेमें सफल न हो सकी ॥ १ ॥
न शशाक यदा बाला प्रत्याख्यातुं तमोनुदम् ।
भीता शापात् ततो राजन् दध्यौ दीर्घमथान्तरम् ॥ २ ॥
राजन्! जब वह बाला अन्धकारनाशक भगवान् सूर्यदेवको टाल न सकी, तब शापसे भयभीत हो दीर्घकालतक मन-ही-मन कुछ सोचने लगी ॥ २ ॥
अनागसः पितुः शापो ब्राह्मणस्य तथैव च ।
मन्निमित्तः कथं न स्यात् क्रुद्धादस्माद् विभावसोः ॥ ३ ॥
उसने सोचा कि 'क्या उपाय करूँ? जिससे मेरे कारण मेरे निरपराध पिता तथा निर्दोष ब्राह्मणको क्रोधमें भरे हुए इन सूर्यदेवसे शाप न प्राप्त हो ॥ ३ ॥
बालेनापि सता मोहाद् भृशं पापकृतान्यपि ।
नाभ्यासादयितव्यानि तेजांसि च तपांसि च ॥ ४ ॥
'सज्जन बालकको भी चाहिये कि वह अत्यन्त मोहके कारण पापशून्य, तेजस्वी तथा तपस्वी पुरुषोंके अत्यन्त निकट न जाय ॥ ४ ॥
साहमद्य भृशं भीता गृहीता च करे भृशम् ।
कथं त्वकार्यं कुर्यां वै प्रदानं ह्यात्मनः स्वयम् ॥ ५ ॥
'परंतु मैं तो आज अत्यन्त भयभीत हो भगवान् सूर्यदेवके हाथमें पड़ गयी हूँ, तो भी स्वयं अपने शरीरको देने-जैसा न करनेयोग्य नीच कर्म कैसे करूँ?' ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
सा वै शापपरित्रस्ता बहु चिन्तयती हृदा ।
मोहेनाभिपरीताङ्गी स्मयमाना पुनः पुनः ॥ ६ ॥
तं देवमब्रवीद् भीता बन्धूनां राजसत्तम ।
व्रीडाविह्वलया वाचा शापत्रस्ता विशाम्पते ॥ ७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**नृपश्रेष्ठ! कुन्ती शापसे अत्यन्त डरकर मन-ही-मन तरह-तरहकी बातें सोच रही थी। उसके सारे अंग मोहसे व्याप्त हो रहे थे। वह बार-बार आश्चर्यचकित हो रही थी। एक ओर तो वह शापसे आतंकित थी, दूसरी ओर उसे भाई-बन्धुओंका भय लगा हुआ था। भूपाल! उस दशामें वह लज्जाके कारण विशृंखल वाणीद्वारा सूर्यदेवसे इस प्रकार बोली ।।
कुन्त्युवाच
पिता मे ध्रियते देव माता चान्ये च बान्धवाः ।
न तेषु ध्रियमाणेषु विधिलोपो भवेदियम् ।। ८ ।।
**कुन्तीने कहा—**देव! मेरे पिता, माता तथा अन्य बान्धव जीवित हैं। उन सबके जीते-जी स्वयं आत्मदान करनेपर कहीं शास्त्रीय विधिका लोप न हो जाय? ।। ८ ।।
त्वया तु संगमो देव यदि स्याद् विधिवर्जितः ।
मन्निमित्तं कुलस्यास्य लोके कीर्तिर्नशेत् ततः ।। ९ ।।
भगवन्! यदि आपके साथ मेरा वेदोक्त विधिके विपरीत समागम हो तो मेरे ही कारण जगत्में इस कुलकी कीर्ति नष्ट हो जायगी ।। ९ ।।
अथवा धर्ममेतं त्वं मन्यसे तपतां वर ।
ऋते प्रदानाद् बन्धुभ्यस्तव कामं करोम्यहम् ।। १० ।।
अथवा तपनेवालोंमें श्रेष्ठ दिवाकर! यदि बन्धुजनोंके दिये बिना ही मेरे साथ अपने समागमको आप धर्मयुक्त समझते हों तो मैं आपकी इच्छा पूर्ण कर सकती हूँ ।। १० ।।
आत्मप्रदानं दुर्धर्ष तव कृत्वा सती त्वहम् ।
त्वयि धर्मो यशश्चैव कीर्तिरायुश्च देहिनाम् ।। ११ ।।
दुर्धर्ष देव! क्या मैं आपको आत्मदान करके भी सती-साध्वी रह सकती हूँ? आपमें ही देहधारियोंके धर्म, यश, कीर्ति तथा आयु प्रतिष्ठित हैं ।। ११ ।।
सूर्य उवाच
न ते पिता न ते माता गुरवो वा शुचिस्मिते ।
प्रभवन्ति वरारोहे भद्रं ते शृणु मे वचः ।। १२ ।।
**भगवान् सूर्यने कहा—**शुचिस्मिते! वरारोहे! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरी बात सुनो। तुम्हारे पिता, माता अथवा अन्य गुरुजन तुम्हें (इस कामसे रोकनेमें) समर्थ नहीं हैं ।। १२ ।।
सर्वान् कामयते यस्मात् कमेर्धातोश्च भाविनि ।
तस्मात् कन्येह सुश्रोणि स्वतन्त्रा वरवर्णिनि ।। १३ ।।
सुन्दर भाववाली कुन्ती! 'कम्' धातुसे कन्या शब्दकी सिद्धि होती है। सुन्दरी! वह (स्वयंवरमें आये हुए) सब वरोंमेंसे किसीको भी स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी कामनाका विषय बना सकती है; इसीलिये इस जगत्में उसे कन्या कहा गया है ।। १३ ।।
नाधर्मश्चरितः कश्चित् त्वया भवति भाविनि ।
अधर्मं कुत एवाहं वरेयं लोककाम्यया ॥ १४ ॥
कुन्ती! मेरे साथ समागम करनेसे तुम्हारे द्वारा कोई अधर्म नहीं बन रहा है। भला! मैं लौकिक कामवासनाके वशीभूत होकर अधर्मका वरण कैसे कर सकता हूँ? ॥ १४ ॥
अनावृताः स्त्रियः सर्वा नराश्च वरवर्णिनि ।
स्वभाव एष लोकानां विकारोऽन्य इति स्मृतः ॥ १५ ॥
वरवर्णिनि! मेरे लिये सभी स्त्रियाँ और पुरुष आवरणरहित हैं; क्योंकि मैं सबका साक्षी हूँ। जो अन्य सब विकार हैं, यह तो प्राकृत मनुष्योंका स्वभाव माना गया है ॥ १५ ॥
सा मया सह संगम्य पुनः कन्या भविष्यसि ।
पुत्रश्च ते महाबाहुर्भविष्यति महायशाः ॥ १६ ॥
तुम मेरे साथ समागम करके पुनः कन्या ही बनी रहोगी और तुम्हें महाबाहु एवं महायशस्वी पुत्र प्राप्त होगा ॥ १६ ॥
कुन्त्युवाच
यदि पुत्रो मम भवेत् त्वत्तः सर्वतमोमुद ।
कुण्डली कवची शूरो महाबाहुर्महाबलः ॥ १७ ॥
**कुन्ती बोली—**समस्त अन्धकारको दूर करनेवाले सूर्यदेव! यदि आपसे मुझे पुत्र प्राप्त हो तो वह महाबाहु, महाबली तथा कुण्डल और कवचसे विभूषित शूरवीर हो ॥ १७ ॥
सूर्य उवाच
भविष्यति महाबाहुः कुण्डली दिव्यवर्मभृत् ।
उभयं चामृतमयं तस्य भद्रे भविष्यति ॥ १८ ॥
**सूर्यने कहा—**भद्रे! तुम्हारा पुत्र महाबाहु, कुण्डल-धारी तथा दिव्य कवच धारण करनेवाला होगा। उसके कुण्डल और कवच दोनों अमृतमय होंगे ॥ १८ ॥
कुन्त्युवाच
यद्येतदमृतादस्ति कुण्डले वर्म चोत्तमम् ।
मम पुत्रस्य यं वै त्वं मत्त उत्पादयिष्यसि ॥ १९ ॥
अस्तु मे सङ्गमो देव यथोक्तं भगवंस्त्वया ।
त्वद्वीर्यरूपसत्त्वौजा धर्मयुक्तो भवेत् स च ॥ २० ॥
**कुन्ती बोली—**प्रभो! आप मेरे गर्भसे जिसको जन्म देंगे, उस मेरे पुत्रके कुण्डल और कवच यदि अमृतसे उत्पन्न हुए होंगे; तो भगवन्! आपने जैसा कहा है, उसी रूपमें मेरा आपके साथ समागम हो। आपका वह पुत्र आपके ही समान वीर्य, रूप, धैर्य, ओज तथा धर्मसे युक्त होना चाहिये ॥ १९-२० ॥
सूर्य उवाच
अदित्या कुण्डले राज्ञि दत्ते मे मत्तकाशिनि ।
तेऽस्य दास्यामि वै भीरु वर्म चैवेदमृत्तमम् ॥ २१ ॥
सूर्यदेवने कहा— यौवनके मदसे सुशोभित होनेवाली भीरु राजकुमारी! माता अदितिने मुझे जो कुण्डल दिये हैं, उन्हें मैं तुम्हारे इस पुत्रको दे दूँगा। साथ ही यह उत्तम कवच भी उसे अर्पित करूँगा ॥ २१ ॥
कुन्त्युवाच
परमं भगवन्नेवं संगमिष्ये त्वया सह ।
यदि पुत्रो भवेदेवं यथा वदसि गोपते ॥ २२ ॥
कुन्ती बोली— भगवन्! गोपते! जैसा आप कहते हैं, वैसा ही पुत्र यदि मुझे प्राप्त हो तो मैं आपके साथ उत्तम रीतिसे समागम करूँगी ॥ २२ ॥
वैशम्पायन उवाच
तथेत्युक्त्वा तु तां कुन्तीमाविवेश विहङ्गमः ।
स्वर्भानुशत्रुर्योगात्मा नाभ्यां पस्पर्श चैव ताम् ॥ २३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब 'बहुत अच्छा' कहकर आकाशचारी राहुशत्रु भगवान् सूर्यने योगरूपसे कुन्तीके शरीरमें प्रवेश किया और उसकी नाभिको छू दिया ॥ २३ ॥
ततः सा विह्वलेवासीत् कन्या सूर्यस्य तेजसा ।
पपात चाथ सा देवी शयने मूढचेतना ॥ २४ ॥
तब वह राजकन्या सूर्यके तेजसे विह्वल और अचेत-सी होकर शय्यापर गिर पड़ी ॥ २४ ॥
सूर्य उवाच
साधयिष्यामि सुश्रोणि पुत्रं वै जनयिष्यसि ।
सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं कन्या चैव भविष्यसि ॥ २५ ॥
सूर्यने कहा— सुन्दरी! मैं ऐसी चेष्टा करूँगा, जिससे तुम समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ पुत्रको जन्म दोगी और कन्या ही बनी रहोगी ॥ २५ ॥
ततः सा व्रीडिता बाला तदा सूर्यमथाब्रवीत् ।
एवमस्त्विति राजेन्द्र प्रस्थितं भूरिवर्चसम् ॥ २६ ॥
राजेन्द्र! तब संगमके लिये उद्यत हुए महातेजस्वी सूर्यदेवकी ओर देखकर लज्जित हुई उस राजकन्याने उनसे कहा— 'प्रभो! ऐसा ही हो' ॥ २६ ॥
वैशम्पायन उवाच
इति स्मोक्ता कुन्तिराजात्मजा सा
विवस्वन्तं याचमाना सलज्जा ।
तस्मिन् पुण्ये शयनीये पपात
मोहाविष्टा भज्यमाना लतेव ।। २७ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— ऐसा कहकर कुन्तिनरेशकी कन्या पृथा भगवान् सूर्यसे पुत्रके लिये प्रार्थना करती हुई अत्यन्त लज्जा और मोहके वशीभूत होकर कटी हुई लताकी भाँति उस पवित्र शय्यापर गिर पड़ी ।। २७ ।।
तिग्मांशुस्तां तेजसा मोहयित्वा
योगेनाविश्यात्मसंस्थां चकार ।
न चैवैनां दूषयामास भानुः
संज्ञां लेभे भूय एवाथ बाला ।। २८ ।।
तत्पश्चात् सूर्यदेवने उसे अपने तेजसे मोहित कर दिया और योगशक्तिके द्वारा उसके भीतर प्रवेश करके अपना तेजोमय वीर्य स्थापित कर दिया। उन्होंने कुन्तीको दूषित नहीं किया—उसका कन्याभाव अछूता ही रहा। तदनन्तर वह राजकन्या फिर सचेत हो गयी ।। २८ ।।
इति श्रीमन्महाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्यकुन्तीसमागमे
सप्ताधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३०७ ।।
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें सूर्यकुन्ती-समागमविषयक तीन सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३०७ ।।