महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२६३-
त्रिषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
दुर्वासाका पाण्डवोंके आश्रमपर असमयमें आतिथ्यके लिये जाना, द्रौपदीके द्वारा स्मरण किये जानेपर भगवान्का प्रकट होना तथा पाण्डवोंको दुर्वासाके भयसे मुक्त करना और उनको आश्वासन देकर द्वारका जाना
वैशम्पायन उवाच
ततः कदाचिद् दुर्वासाः सुखासीनांस्तु पाण्डवान् ।
भुक्त्वा चावस्थितां कृष्णां ज्ञात्वा तस्मिन् वने मुनिः ॥ १ ॥
अभ्यागच्छत् परिवृतः शिष्यैरयुतसम्मितैः ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर एक दिन महर्षि दुर्वासा इस बातका पता लगाकर कि पाण्डवलोग भोजन करके सुखपूर्वक बैठे हैं और द्रौपदी भी भोजनसे निवृत्त हो आराम कर रही है, दस हजार शिष्योंसे घिरे हुए उस वनमें आये ॥ १ १/२ ॥
दृष्ट्वाऽऽयान्तं तमतिथिं स च राजा युधिष्ठिरः ॥ २ ॥
जगामाभिमुखः श्रीमान् सह भ्रातृभिरच्युतः ।
तस्मै बद्ध्वाञ्जलिं सम्यगुपवेश्य वरासने ॥ ३ ॥
विधिवत् पूजयित्वा तमातिथ्येन न्यमन्त्रयत् ।
आह्निकं भगवन् कृत्वा शीघ्रमेहीति चाब्रवीत् ॥ ४ ॥
श्रीमान् राजा युधिष्ठिर अतिथिको आते देख भाइयोंसहित उनके सम्मुख गये। वे अपनी मर्यादासे कभी च्युत नहीं होते थे। उन्होंने उन अतिथिदेवताको लाकर श्रेष्ठ आसनपर आदरपूर्वक बैठाया और हाथ जोड़कर प्रणाम किया। फिर विधिपूर्वक पूजा करके उन्हें अतिथिसत्कारके रूपमें निमन्त्रित किया और कहा—'भगवन्! अपना नित्य नियम पूरा करके (भोजनके लिये) शीघ्र पधारिये' ॥ २—४ ॥
जगाम च मुनिः सोऽपि स्नातुं शिष्यैः सहानघः ।
भोजयेत् सहशिष्यं मां कथमित्यविचिन्तयन् ॥ ५ ॥
न्यमज्जत् सलिले चापि मुनिसङ्घः समाहितः ।
यह सुनकर वे निष्पाप मुनि अपने शिष्योंके साथ स्नान करनेके लिये चले गये। उन्होंने इस बातका तनिक भी विचार नहीं किया कि ये इस समय शिष्योंसहित मुझे भोजन कैसे दे सकेंगे। सारी मुनिमण्डलीने जलमें गोता लगाया, फिर सब लोग एकाग्रचित्त होकर ध्यान करने लगे ॥ ५ १/२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे राजन् द्रौपदी योषितां वरा ॥ ६ ॥
चिन्तामवाप परमामन्नहेतोः पतिव्रता ।
राजन्! इसी समय युवतियोंमें श्रेष्ठ पतिव्रता द्रौपदीको अन्नके लिये बड़ी चिन्ता हुई ॥ ६ १/२ ॥
सा चिन्तयन्ती च सदा नान्नहेतुमविन्दत ॥ ७ ॥
मनसा चिन्तयामास कृष्णं कंसनिषूदनम् ।
जब बहुत सोचने-विचारनेपर भी उसे अन्न मिलनेका कोई उपाय नहीं सूझा, तब वह मन-ही-मन कंसनिकन्दन आनन्दकन्द भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका स्मरण करने लगी— ॥ ७ १/२ ॥
कृष्ण कृष्ण महाबाहो देवकीनन्दनाव्यय ॥ ८ ॥
वासुदेव जगन्नाथ प्रणतार्तिविनाशन ।
विश्वात्मन् विश्वजनक विश्वहर्तः प्रभोऽव्यय ॥ ९ ॥
प्रपन्नपाल गोपाल प्रजापाल परात्पर ।
आकूतीनां च चित्तीनां प्रवर्तक नतास्मि ते ॥ १० ॥
‘हे कृष्ण! हे महाबाहु श्रीकृष्ण! हे देवकीनन्दन! हे अविनाशी वासुदेव! चरणोंमें पड़े हुए दुखियोंका दुःख दूर करनेवाले हे जगदीश्वर! तुम्हीं सम्पूर्ण जगत्के आत्मा हो। अविनाशी प्रभो! तुम्हीं इस विश्वकी उत्पत्ति और संहार करनेवाले हो। शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले गोपाल! तुम्हीं समस्त प्रजाका पालन करनेवाले परात्पर परमेश्वर हो। आकृति (मन) और चित्ति (बुद्धि)-के प्रेरक परमात्मन्! मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ ॥ ८—१० ॥
वरेण्य वरदानन्त अगतीनां गतिर्भव ।
पुराणपुरुष प्राणमनोवृत्त्याद्यगोचर ॥ ११ ॥
सर्वाध्यक्ष पराध्यक्ष त्वामहं शरणं गता ।
पाहि मां कृपया देव शरणागतवत्सल ॥ १२ ॥
‘सबके वरण करने योग्य वरदाता अनन्त! आओ। जिन्हें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई सहायता देनेवाला नहीं है, उन असहाय भक्तोंकी सहायता करो। पुराणपुरुष! प्राण और मनकी वृत्ति आदि तुम्हारे पासतक नहीं पहुँच सकती। सबके साक्षी परमात्मन्! मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ। शरणागतवत्सल देव! कृपा करके मुझे बचाओ’ ॥ ११-१२ ॥
नीलोत्पलदलश्याम पद्मगर्भारुणेक्षण ।
पीताम्बरपरीधान लसत्कौस्तुभभूषण ॥ १३ ॥
त्वमादिरन्तो भूतानां त्वमेव च परायणम् ।
परात्परतरं ज्योतिर्विश्वात्मा सर्वतोमुखः ॥ १४ ॥
‘नीलकमलदलके समान श्यामसुन्दर! कमलपुष्पके भीतरी भागके समान किंचित् लाल नेत्रोंवाले पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण! तुम्हारे वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणिमय आभूषण शोभा पाता है। प्रभो! तुम्हीं समस्त प्राणियोंके आदि और अन्त हो। तुम्हीं सबके परम आश्रय हो। तुम्हीं परात्पर, ज्योतिर्मय सर्वात्मा एवं सब ओर मुखवाले परमेश्वर हो ॥ १३-१४ ॥
त्वामेवाहुः परं बीजं निधानं सर्वसम्पदाम् ।
त्वया नाथेन देवेश सर्वापद्भ्यो भयं न हि ॥ १५ ॥
‘ज्ञानी पुरुष तुम्हें ही इस जगत्का परम बीज और सम्पूर्ण सम्पदाओंकी निधि बतलाते हैं। देवेश्वर! यदि तुम मेरे रक्षक हो तो मुझपर सारी विपत्तियाँ टूट पड़ें, तो भी मुझे उनसे भय नहीं है’ ॥ १५ ॥
दुःशासनादहं पूर्वं सभायां मोचिता यथा ।
तथैव संकटादस्मान्मामुद्धर्तुमिहार्हसि ॥ १६ ॥
‘भगवन्! पहले कौरव-सभामें दुःशासनके हाथसे जैसे तुमने मुझे बचाया था, उसी प्रकार इस वर्तमान संकटसे भी मेरा उद्धार करो’ ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं स्तुतस्तदा देवः कृष्णया भक्तवत्सलः ।
द्रौपद्याः संकटं ज्ञात्वा देवदेवो जगत्पतिः ॥ १७ ॥
पार्श्वस्थां शयने त्यक्त्वा रुक्मिणीं केशवः प्रभुः ।
तत्राजगाम त्वरितो ह्यचिन्त्यगतिरीश्वरः ॥ १८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—द्रौपदीके इस प्रकार स्तुति करनेपर अचिन्त्यगति परमेश्वर देवाधिदेव जगन्नाथ भक्तवत्सल भगवान् केशवको यह मालूम हो गया कि द्रौपदीपर कोई संकट आ गया है, फिर तो शय्यापर अपने पास ही सोयी हुई रुक्मिणीको छोड़कर तुरंत वहाँ आ पहुँचे ॥ १७-१८ ॥
ततस्तं द्रौपदी दृष्ट्वा प्रणम्य परया मुदा ।
अब्रवीद् वासुदेवाय मुनेरागमनादिकम् ॥ १९ ॥
भगवान्को आया देख द्रौपदीको बड़ा आनन्द हुआ। उसने उन्हें प्रणाम करके दुर्वासा मुनिके आने आदिका सारा समाचार कह सुनाया ॥ १९ ॥
ततस्तामब्रवीत् कृष्णः क्षुधितोऽस्मि भृशातुरः ।
शीघ्रं भोजय मां कृष्णे पश्चात् सर्वं करिष्यसि ॥ २० ॥
निशम्य तद्वचः कृष्णा लज्जिता वाक्यमब्रवीत् ।
स्थाल्यां भास्करदत्तायामन्नं मद्भोजनावधि ॥ २१ ॥
भुक्तवत्यस्म्यहं देव तस्मादन्नं न विद्यते ।
तब भगवान् श्रीकृष्णने द्रौपदीसे कहा—‘कृष्णे! इस समय मुझे बड़ी भूख लगी है; मैं भूखसे अत्यन्त पीड़ित हो रहा हूँ। पहले मुझे जल्दी भोजन करा; फिर सारा प्रबन्ध करती रहना।' उनकी यह बात सुनकर द्रौपदीको बड़ी लज्जा हुई। वह बोली—'भगवन्! सूर्यनारायणकी दी हुई बटलोईसे तभीतक भोजन मिलता है जबतक मैं भोजन न कर लूँ। देव! आज तो मैं भी भोजन कर चुकी हूँ; अतः अब उसमें अन्न नहीं रह गया है' ॥ २०-२१ १/२ ॥
ततः प्रोवाच भगवान् कृष्णां कमललोचनः ॥ २२ ॥
कृष्णे न नर्मकालोऽयं क्षुच्छ्रमेणातुरे मयि ।
शीघ्रं गच्छ मम स्थालीमानीय त्वं प्रदर्शय ॥ २३ ॥
इति निर्बन्धतः स्थालीमानाय्य स यदूद्वहः ।
स्थाल्याः कण्ठेऽथ संलग्नं शाकान्नं वीक्ष्य केशवः ॥ २४ ॥
उपयुज्याब्रवीदेनामनेन हरिरीश्वरः ।
विश्वात्मा प्रीयतां देवस्तुष्टश्चास्त्विति यज्ञभुक् ॥ २५ ॥
यह सुनकर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने द्रौपदीसे फिर कहा—'कृष्णे! मैं तो भूख और थकावटसे आतुर हो रहा हूँ और तुझे हँसी सूझती है। यह परिहासका समय नहीं है। जल्दी जा और बटलोई लाकर मुझे दिखा। इस प्रकार हठ करके भगवान्ने द्रौपदीसे बटलोई मँगवायी। उसके गलेमें जरा-सा साग लगा हुआ था। उसे देखकर श्रीकृष्णने लेकर खा लिया और द्रौपदीसे कहा—'इस सागसे सम्पूर्ण विश्वके आत्मा यज्ञभोक्ता सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरि तृप्त और संतुष्ट हों' ॥ २२-२५ ॥
आकारय मुनीन् शीघ्रं भोजनायेति चाब्रवीत् ।
सहदेवं महाबाहुः कृष्णः क्लेशविनाशनः ॥ २६ ॥
इतना कहकर सबका क्लेश दूर करनेवाले महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण सहदेवसे बोले—'तुम शीघ्र जाकर मुनियोंको भोजनके लिये बुला लाओ' ॥ २६ ॥
ततो जगाम त्वरितः सहदेवो महायशाः ।
आकारितुं तु तान् सर्वान् भोजनार्थं नृपोत्तम ॥ २७ ॥
स्नातुं गतान् देवनद्यां दुर्वासः प्रभृतीन् मुनीन् ।
नृपश्रेष्ठ! तब महायशस्वी सहदेव देवनदीमें स्नानके लिये गये हुए उन दुर्वासा आदि सब मुनियोंको भोजनके निमित्त बुलानेके लिये तुरंत गये ॥ २७ १/२ ॥
ते चावतीर्णाः सलिले कृतवन्तोऽघमर्षणम् ॥ २८ ॥
दृष्ट्वोद्गारान् सान्नरसांस्तृप्त्या परमया युताः ।
उत्तीर्य सलिलात् तस्माद् दृष्टवन्तः परस्परम् ॥ २९ ॥
दुर्वाससमभिप्रेक्ष्य ते सर्वे मुनयोऽब्रुवन् ।
राज्ञा हि कारयित्वान्नं वयं स्नातुं समागताः ॥ ३० ॥
आकण्ठतृप्ता विप्रर्षे किंस्विद् भुञ्जामहे वयम् ।
वृथा पाकः कृतोऽस्माभिस्तत्र किं करवामहे ॥ ३१ ॥
वे मुनिलोग उस समय जलमें उतरकर अघमर्षण मन्त्रका जप कर रहे थे। सहसा उन्हें पूर्ण तृप्तिका अनुभव हुआ; बार-बार अन्नरससे युक्त डकारें आने लगीं। यह देखकर वे जलसे बाहर निकले और आपसमें एक-दूसरेकी ओर देखने लगे। (सबकी एक-सी अवस्था हो रही थी।) वे सभी मुनि दुर्वासाकी ओर देखकर बोले—‘ब्रह्मर्षे! हमलोग राजा युधिष्ठिरको रसोई बनवानेकी आज्ञा देकर स्नान करनेके लिये आये थे, परंतु इस समय इतनी तृप्ति हो रही है कि कण्ठतक अन्न भरा हुआ जान पड़ता है। अब हम कैसे भोजन करेंगे? हमने जो रसोई तैयार करवायी है, वह व्यर्थ होगी। उसके लिये हमें क्या करना चाहिये' ॥ २८—३१ ॥
दुर्वासा उवाच
वृथा पाकेन राजर्षेरपराधः कृतो महान् ।
मास्मानधाक्षुर्दृष्ट्वैव पाण्डवाः क्रूरचक्षुषा ॥ ३२ ॥
स्मृत्वानुभावं राजर्षेरम्बरीषस्य धीमतः ।
बिभेमि सुतरां विप्रा हरिपादाश्रयाज्जनात् ॥ ३३ ॥
पाण्डवाश्च महात्मानः सर्वे धर्मपरायणाः ।
शूराश्च कृतविद्याश्च व्रतिनस्तपसि स्थिताः ॥ ३४ ॥
सदाचाररता नित्यं वासुदेवपरायणाः ।
क्रुद्धास्ते निर्दहेयुर्वै तूलराशिमिवानलः ।
तत एतानपृष्ट्वैव शिष्याः शीघ्रं पलायत ॥ ३५ ॥
दुर्वासा बोले—वास्तवमें व्यर्थ ही रसोई बनवाकर हमने राजर्षि युधिष्ठिरका महान् अपराध किया है। कहीं ऐसा न हो कि पाण्डव क्रूर दृष्टिसे देखकर हमें भस्म कर दें। ब्राह्मणो! परम बुद्धिमान् राजा अम्बरीषके प्रभावको याद करके मैं उन भक्तजनोंसे सदा डरता रहता हूँ, जिन्होंने भगवान् श्रीहरिके चरणोंका आश्रय ले रखा है। सब पाण्डव महामना, धर्मपरायण, विद्वान्, शूरवीर, व्रतधारी तथा तपस्वी हैं। वे सदा सदाचारपरायण तथा भगवान् वासुदेवको अपना परम आश्रय माननेवाले हैं। पाण्डव कुपित होनेपर हमको
उसी प्रकार भस्म कर सकते हैं, जैसे रूईके ढेरको आग। अतः शिष्यो! पाण्डवोंसे बिना पूछे ही तुरंत भाग चलो ॥ ३२—३५ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तास्ते द्विजाः सर्वे मुनिना गुरुणा तदा ।
पाण्डवेभ्यो भृशं भीता दुद्रुवुस्ते दिशो दश ॥ ३६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! गुरु दुर्वासा मुनिके ऐसा कहनेपर वे सब ब्राह्मण पाण्डवोंसे अत्यन्त भयभीत हो दसों दिशाओंमें भाग गये ॥ ३६ ॥
सहदेवो देवनद्यामपश्यन् मुनिसत्तमान् ।
तीर्थेष्वितस्ततस्तस्या विचचार गवेषयन् ॥ ३७ ॥
सहदेवने जब देवनदीमें उन श्रेष्ठ मुनियोंको नहीं देखा, तब वे वहाँके तीर्थोंमें इधर-उधर खोजते हुए विचरने लगे ॥ ३७ ॥
तत्रस्थेभ्यस्तापसेभ्यः श्रुत्वा तांश्चैव विद्रुतान् ।
युधिष्ठिरमथाभ्येत्य तं वृत्तान्तं न्यवेदयत् ॥ ३८ ॥
वहाँ रहनेवाले तपस्वी मुनियोंके मुखसे उनके भागनेका समाचार सुनकर सहदेव युधिष्ठिरके पास लौट आये और सारा वृत्तान्त उनसे निवेदन कर दिया ॥ ३८ ॥
ततस्ते पाण्डवाः सर्वे प्रत्यागमनकाङ्क्षिणः ।
प्रतीक्षन्तः कियत्कालं जितात्मानोऽवतस्थिरे ॥ ३९ ॥
तदनन्तर मनको वशमें करनेवाले सब पाण्डव उनके लौट आनेकी आशासे कुछ देरतक उनकी प्रतीक्षा करते रहे ॥ ३९ ॥
निशीथेऽभ्येत्य चाकस्मादस्मान् स छलयिष्यति ।
कथं च निस्तरे मास्मात् कृच्छ्राद् दैवोपसादितात् ॥ ४० ॥
इति चिन्तापरान् दृष्ट्वा निःश्वसन्तो मुहुर्मुहुः ।
उवाच वचनं श्रीमान् कृष्णः प्रत्यक्षतां गतः ॥ ४१ ॥
पाण्डव सोचने लगे—‘दुर्वासा मुनि अकस्मात् आधी रातको आकर हमें छलेंगे। दैववश प्राप्त हुए इस महान् संकटसे हमारा उद्धार कैसे होगा?’ इसी चिन्तामें पड़कर वे बारंबार लंबी साँसें खींचने लगे। उनकी यह दशा देखकर भगवान् श्रीकृष्णने युधिष्ठिर आदि अन्य सब पाण्डवोंको प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा ॥ ४०-४१ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
भवतामापदं ज्ञात्वा ऋषेः परमकोपनात् ।
द्रौपद्या चिन्तितः पार्था अहं सत्वरमागतः ॥ ४२ ॥
न भयं विद्यते तस्मादृषेर्दुर्वाससोऽल्पकम् ।
तेजसा भवतां भीतः पूर्वमेव पलायितः ॥ ४३ ॥
श्रीकृष्ण बोले— कुन्तीकुमारो! परम क्रोधी महर्षि दुर्वासासे आपलोगोंपर संकट आता जानकर द्रौपदीने मेरा स्मरण किया था, इसीलिये मैं तुरंत यहाँ आ पहुँचा। अब आपलोगोंको दुर्वासा मुनिसे तनिक भी भय नहीं है। वे आपके तेजसे डरकर पहले ही भाग गये हैं॥
धर्मनित्यास्तु ये केचिन्न ते सीदन्ति कर्हिचित्।
आपृच्छे वो गमिष्यामि नियतं भद्रमस्तु वः॥ ४४॥
जो लोग सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं, वे कभी कष्टमें नहीं पड़ते। अब मैं आपलोगोंसे जानेके लिये आज्ञा चाहता हूँ। यहाँसे द्वारकापुरीको जाऊँगा। आपलोगोंका निरन्तर कल्याण हो॥ ४४॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वैरितं केशवस्य बभूवुः स्वस्थमानसाः।
द्रौपद्या सहिताः पार्थास्तमूचुर्विगतज्वराः॥ ४५॥
त्वया नाथेन गोविन्द दुस्तरामापदं विभो।
तीर्णाः प्लवमिवासाद्य मज्जमाना महार्णवे॥ ४६॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर द्रौपदीसहित पाण्डवोंका चित्त स्वस्थ हुआ। उनकी सारी चिन्ता दूर हो गयी और वे भगवान्से इस प्रकार बोले—‘विभो! गोविन्द! तुम्हें अपना सहायक और संरक्षक पाकर हम बड़ी-बड़ी दुस्तर विपत्तियोंसे उसी प्रकार पार हुए हैं, जैसे महासागरमें डूबते हुए मनुष्य जहाजका सहारा पाकर पार हो जाते हैं॥ ४५-४६॥
स्वस्ति साधय भद्रं ते इत्याज्ञातो ययौ पुरीम्।
‘तुम्हारा कल्याण हो। इसी प्रकार भक्तोंका हित-साधन किया करो।’ पाण्डवोंके इस प्रकार कहनेपर भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकापुरीको चले गये॥ ४६½॥
पाण्डवाश्च महाभाग द्रौपद्या सहिताः प्रभो॥ ४७॥
ऊषुः प्रहृष्टमनसो विहरन्तो वनाद् वनम्।
महाभाग जनमेजय! तत्पश्चात् द्रौपदीसहित पाण्डव प्रसन्नचित्त हो वहाँ एक वनसे दूसरे वनमें भ्रमण करते हुए सुखसे रहने लगे॥ ४७½॥
इति तेऽभिहितं राजन् यत् पृष्टोऽहमिह त्वया॥ ४८॥
एवंविधान्यलीकानि धार्तराष्ट्रैर्दुरात्मभिः।
पाण्डवेषु वनस्थेषु प्रयुक्तानि वृथाभवन्॥ ४९॥
राजन्! यहाँ तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बतला दिया। इस प्रकार दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रोंने वनवासी पाण्डवोंपर अनेक बार छल-कपटका प्रयोग किया, परंतु वह सब व्यर्थ हो गया॥ ४८-४९॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि दुर्वासउपाख्याने
त्रिषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें दुर्वासाकी कथाविषयक दो सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६३ ॥