महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२३४-
चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
पतिदेवको अनुकूल करनेका उपाय—पतिकी अनन्यभावसे सेवा
द्रौपद्युवाच
इमं तु ते मार्गमपेतमोहं
वक्ष्यामि चित्तग्रहणाय भर्तुः ।
अस्मिन् यथावत् सखि वर्तमाना
भर्तारमाच्छेत्स्यसि कामिनीभ्यः ॥ १ ॥
द्रौपदी बोली— सखी! मैं स्वामीके मनका आकर्षण करनेके लिये तुम्हें एक ऐसा मार्ग बता रही हूँ, जिसमें भ्रम अथवा छल-कपटके लिये तनिक भी स्थान नहीं है। यदि तुम यथावत्रूपसे इसी पथपर चलती रहोगी तो स्वामीके चित्तको अपनी सौतोंसे हटाकर अपनी ओर अवश्य खींच सकोगी ॥ १ ॥
नैतादृशं दैवतमस्ति सत्ये
सर्वेषु लोकेषु सदेवकेषु ।
यथा पतिस्तस्य तु सर्वकामा
लभ्याः प्रसादात् कुपितश्च हन्यात् ॥ २ ॥
सत्ये! स्त्रियोंके लिये देवताओंसहित सम्पूर्ण लोकोंमें पतिके समान दूसरा कोई देवता नहीं है। पतिके प्रसादसे नारीकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो सकती हैं, और यदि पति ही कुपित हो जाय तो वह नारीकी सभी आशाओंको नष्ट कर सकता है ॥ २ ॥
तस्मादपत्यं विविधाश्च भोगाः
शय्यासनान्युत्तमदर्शनानि ।
वस्त्राणि माल्यानि तथैव गन्धाः
स्वर्गश्च लोको विपुला च कीर्तिः ॥ ३ ॥
सेवाद्वारा प्रसन्न किये हुए पतिसे स्त्रियोंको (उत्तम) संतान, भाँति-भाँतिके भोग, शय्या, आसन, सुन्दर दिखायी देनेवाले वस्त्र, माला, सुगन्धित पदार्थ, स्वर्गलोक तथा महान् यशकी प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥
सुखं सुखेनेह न जातु लभ्यं
दुःखेन साध्वी लभते सुखानि ।
सा कृष्णमाराधय सौहृदेन
प्रेम्णा च नित्यं प्रतिकर्मणा च ॥ ४ ॥
तथाऽऽसनैश्चारुभिरग्रमाल्यै-
दाक्षिण्ययोगैर्विविधैश्च गन्धैः ।
अस्याः प्रियोऽस्मीति यथा विदित्वा
त्वामेव संश्लिष्यति तद् विधत्स्व ॥ ५ ॥
सखी! इस जगत्में कभी सुखके द्वारा सुख नहीं मिलता। पतिव्रता स्त्री दुःख उठाकर ही सुख पाती है। तुम सौहार्द, प्रेम, सुन्दर वेश-भूषा-धारण, सुन्दर आसन-समर्पण, मनोहर पुष्पमाला, उदारता, सुगन्धित द्रव्य एवं व्यवहारकुशलतासे श्यामसुन्दरकी निरन्तर आराधना करती रहो। उनके साथ ऐसा बर्ताव करो, जिससे वे यह समझकर 'कि सत्यभामाको मैं ही अधिक प्रिय हूँ' तुम्हें ही हृदयसे लगाया करें ॥ ४-५ ॥
श्रुत्वा स्वरं द्वारगतस्य भर्तुः
प्रत्युत्थिता तिष्ठ गृहस्य मध्ये ।
दृष्ट्वा प्रविष्टं त्वरिताऽऽसनेन
पाद्येन चैनं प्रतिपूजयस्व ॥ ६ ॥
जब महलके द्वारपर पधारे हुए प्राणवल्लभका स्वर सुनायी पड़े, तब तुम उठकर घरके आँगनमें आ जाओ और उनकी प्रतीक्षामें खड़ी रहो। जब देखो कि वे भीतर आ गये, तब तुरंत आसन और पाद्यके द्वारा उनका यथावत् पूजन करो ॥ ६ ॥
सम्प्रेषितायामथ चैव दास्या-
मुत्थाय सर्वं स्वयमेव कार्यम् ।
जानातु कृष्णस्तव भावमेतं
सर्वात्मना मां भजतीति सत्ये ॥ ७ ॥
सत्ये! यदि श्यामसुन्दर किसी कार्यके लिये दासीको भेजते हों तो तुम्हें स्वयं उठकर वह सब काम कर लेना चाहिये; जिससे श्रीकृष्णको तुम्हारे इस सेवा-भावका अनुभव हो जाय कि सत्यभामा सम्पूर्ण हृदयसे मेरी सेवा करती है ॥ ७ ॥
त्वत्संनिधौ यत् कथयेत् पतिस्ते
यद्यप्यगुह्यं परिरक्षितव्यम् ।
काचित् सपत्नी तव वासुदेवं
प्रत्यादिशेत् तेन भवेद् विरागः ॥ ८ ॥
तुम्हारे पति तुम्हारे निकट जो भी बात कहें, वह छिपानेयोग्य न हो, तो भी तुम्हें उसे गुप्त ही रखना चाहिये। अन्यथा तुम्हारे मुखसे उस बातको सुनकर यदि कोई सौत उसे श्यामसुन्दरके सामने कह दे, तो इससे उनके मनमें तुम्हारी ओरसे विरक्ति हो सकती है ॥ ८ ॥
प्रियांश्च रक्तांश्च हितांश्च भर्तु-
स्तान् भोजयेथा विविधैरुपायैः ।
द्वेष्यैरुपेक्ष्यैरहितैश्च तस्य
भिद्यस्व नित्यं कुहकोद्यतैश्च ॥ ९ ॥
पतिदेवके जो प्रिय, अनुरक्त एवं हितैषी सुहृद् हों, उन्हें तरह-तरहके उपायोंसे खिलाओ-पिलाओ तथा जो उनके शत्रु, उपेक्षणीय और अहितकारक हों अथवा जो उनसे छल-कपट करनेके लिये उद्यत रहते हों; उनसे सदा दूर रहो ॥ ९ ॥
मदं प्रमादं पुरुषेषु हित्वा
संयच्छ भावं प्रतिगृह्य मौनम् ।
प्रद्युम्नसाम्बावपि ते कुमारौ
नोपासितव्यौ रहिते कदाचित् ॥ १० ॥
दूसरे पुरुषोंके समीप घमंड और प्रमादका परित्याग करके मौन रहकर अपने मनोभावको प्रकट न होने दो। कुमार प्रद्युम्न और साम्ब यद्यपि तुम्हारे पुत्र हैं, तथापि तुम्हें एकान्तमें कभी उनके पास भी नहीं बैठना चाहिये ॥ १० ॥
महाकुलीनाभिरपापिकाभिः
स्त्रीभिः सतीभिस्तव सख्यमस्तु ।
चण्डाश्च शौण्डाश्च महाशनाश्च
चौराश्च दुष्टाश्चपलाश्च वर्ज्याः ॥ ११ ॥
अत्यन्त ऊँचे कुलमें उत्पन्न और पापाचारसे दूर रहनेवाली सती स्त्रियोंके साथ ही तुम्हें सखीभाव स्थापित करना चाहिये। जो अत्यन्त क्रोधी, नशेमें चूर रहनेवाली, अधिक खानेवाली, चोरीकी लत रखनेवाली, दुष्ट और चञ्चल स्वभावकी स्त्रियाँ हों, उन्हें दूरसे ही त्याग देना चाहिये ॥ ११ ॥
एतद् यशस्यं भगदैवतं च
स्वार्थ्यं तथा शत्रुनिबर्हणं च ।
महार्हमाल्याभरणाङ्गरागा
भर्तारमाराधय पुण्यगन्धा ॥ १२ ॥
तुम बहुमूल्य हार, आभूषण और अंगराग धारण करके पवित्र सुगन्धित वस्तुओंसे सुवासित हो अपने प्राणवल्लभ श्यामसुन्दर श्रीकृष्णकी आराधना करो। इससे तुम्हारे यश और सौभाग्यकी वृद्धि होगी। तुम्हारे मनोरथकी सिद्धि तथा शत्रुओंका नाश होगा ॥ १२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वणि द्रौपदीकर्तव्यकथने चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्वमें द्रौपदीद्वारा स्त्रीकर्तव्यकथनविषयक दो सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३४ ॥