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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

२३१-

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एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

स्कन्दद्वारा स्वाहादेवीका सत्कार, रुद्रदेवके साथ स्कन्द और देवताओंकी भद्रवट-यात्रा, देवासुर-संग्राम, महिषासुर-वध तथा स्कन्दकी प्रशंसा

मार्कण्डेय उवाच

यदा स्कन्देन मातृणामेवमेतत् प्रियं कृतम्।
अथैनमब्रवीत् स्वाहा मम पुत्रस्त्वमौरसः॥ १॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! जब स्कन्दने इस प्रकार मातृगणोंका यह प्रिय मनोरथ पूर्ण किया, तब स्वाहाने आकर उनसे कहा—'तुम मेरे औरस पुत्र हो॥ १॥
इच्छाम्यहं त्वया दत्तां प्रीतिं परमदुर्लभाम्।
तामब्रवीत् ततः स्कन्दः प्रीतिमिच्छसि कीदृशीम्॥ २॥
'अतः मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे परम दुर्लभ प्रीति प्रदान करो।' तब स्कन्दने पूछा—'माँ तुम कैसी प्रीति पानेकी अभिलाषा रखती हो?'॥ २॥

स्वाहोवाच

दक्षस्याहं प्रिया कन्या स्वाहा नाम महाभुज।
बाल्यात्प्रभृति नित्यं च जातकामा हुताशने॥ ३॥
**स्वाहा बोली—**महाबाहो! मैं प्रजापति दक्षकी प्रिय पुत्री हूँ, मेरा नाम स्वाहा है। मैं बचपनसे ही सदा अग्निदेवके प्रति अनुराग रखती आयी हूँ॥ ३॥
न स मां कामिनीं पुत्र सम्यक् जानाति पावकः।
इच्छामि शाश्वतं वासं वस्तुं पुत्र सहाग्निना॥ ४॥
पुत्र! परंतु अग्निदेवको इस बातका अच्छी तरह पता नहीं है कि मैं उन्हें चाहती हूँ। बेटा! मेरी यह हार्दिक अभिलाषा है कि मैं नित्य-निरन्तर अग्निदेवके ही साथ निवास करूँ॥ ४॥

स्कन्द उवाच

हव्यं कव्यं च यत्किंचिद् द्विजानां मन्त्रसंस्तुतम्।
होष्यन्त्यग्नौ सदा देवि स्वाहेत्युक्त्वा समुद्धृतम्॥ ५॥
अद्यप्रभृति दास्यन्ति सुवृत्ताः सत्पथे स्थिताः।
एवमग्निस्त्वया सार्धं सदा वत्स्यति शोभने॥ ६॥

स्कन्द बोले—देवि! आजसे सन्मार्गपर चलने-वाले सदाचारी धर्मात्मा मनुष्य देवताओं तथा पितरोंके लिये हव्य और कव्यके रूपमें उठाकर ब्राह्मणोंद्वारा उच्चारित वेदमन्त्रोंके साथ अग्निमें जो कुछ आहुति देंगे, वह सब स्वाहाका नाम लेकर ही अर्पण करेंगे। शोभने! इस प्रकार तुम्हारे साथ निरन्तर अग्निदेवका निवास बना रहेगा ॥ ५-६ ॥

मार्कण्डेय उवाच

एवमुक्ता ततः स्वाहा तुष्टा स्कन्देन पूजिता ।
पावकेन समायुक्ता भर्त्रा स्कन्दमपूजयत् ॥ ७ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! स्कन्दके इस प्रकार कहने और आदर देनेपर स्वाहा बहुत संतुष्ट हुई। अपने स्वामी अग्निदेवका संयोग पाकर उसने भी स्कन्दका पूजन किया ॥ ७ ॥

ततो ब्रह्मा महासेनं प्रजापतिरथाब्रवीत् ।
अभिगच्छ महादेवं पितरं त्रिपुरार्दनम् ॥ ८ ॥
तदनन्तर प्रजापति ब्रह्माजीने महासेनसे कहा—'वत्स! अब तुम अपने पिता त्रिपुरविनाशक महादेवजीसे मिलो ॥

रुद्रेणाग्निं समाविश्य स्वाहामाविश्य चोमया ।
हितार्थं सर्वलोकानां जातस्त्वमपराजितः ॥ ९ ॥
'भगवान् रुद्रने अग्निमें और भगवती उमाने स्वाहामें प्रवेश करके समस्त लोकोंके हितके लिये तुम-जैसे अपराजित वीरको उत्पन्न किया है ॥ ९ ॥

उमायोन्यां च रुद्रेण शुक्रं सिक्तं महात्मना ।
अस्मिन् गिरौ निपतितं मिज्जिकामिज्जिकं यतः ॥ १० ॥
सम्भूतं लोहितोदे तु शुक्रशेषमवापतत् ।
सूर्यरश्मिषु चाप्यन्यदन्यच्चैवापतद् भुवि ॥ ११ ॥
आसक्तमन्यद् वृक्षेषु तदेवं पञ्चधापतत् ।
तत्र ते विविधाकारा गणा ज्ञेया मनीषिभिः ।
तव परिषदा घोरा य एते पिशिताशिनः ॥ १२ ॥
'महात्मा रुद्रने उमाके गर्भमें जिस वीर्यकी स्थापना की थी, उसका कुछ भाग इसी पर्वतपर गिर पड़ा था, जिससे मिंजिका-मिंजिक नामक जोड़ेकी उत्पत्ति हुई। शेष शुक्रका कुछ अंश लोहित-सागरमें, कुछ सूर्यकी किरणोंमें, कुछ पृथ्वीपर और कुछ वृक्षोंपर गिर पड़ा। इस प्रकार वह पाँच भागोंमें विभक्त होकर गिरा था। उसीसे ये तुम्हारे विभिन्न आकृतिवाले, मांसभक्षी एवं भयंकर पार्षद प्रकट हुए हैं; जिन्हें मनीषी पुरुष ही जान पाते हैं' ॥ १०—१२ ॥

एवमस्त्विति चाप्युक्त्वा महासेनो महेश्वरम् ।

अपूजयदमेयात्मा पितरं पितृवत्सलः ॥ १३ ॥
तब अपरिमित आत्मबलसे सम्पन्न एवं पितृभक्त कुमार महासेनने 'एवमस्तु' कहकर अपने पिता भगवान् महेश्वरका पूजन किया ॥ १३ ॥

मार्कण्डेय उवाच

अर्कपुष्पैस्तु ते पञ्च गणाः पूज्या धनार्थिभिः ।
व्याधिप्रशमनार्थं च तेषां पूजां समाचरेत् ॥ १४ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! धनार्थी पुरुषों-को आकके फूलोंसे उन पाँचों गणोंकी सेवा करनी चाहिये। रोगोंकी शान्तिके लिये भी उनका पूजन करना उचित है ॥ १४ ॥

मिञ्जिकामिञ्जिकं चैव मिथुनं रुद्रसम्भवम् ।
नमस्कार्यं सदैवेह बालानां हितमिच्छता ॥ १५ ॥
मिञ्जिका-मिंजकका जोड़ा भी भगवान् शंकरसे उत्पन्न हुआ है। अतः बालकोंके हितकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा इस जोड़ेको नमस्कार करें ॥ १५ ॥

स्त्रियो मानुषमांसादा वृद्धिका नाम नामतः ।
वृक्षेषु जातास्ता देव्यो नमस्कार्याः प्रजार्थिभिः ॥ १६ ॥
वृक्षोंपरसे गिरे हुए शुक्रसे 'वृद्धिका' नामवाली स्त्रियाँ उत्पन्न हुई हैं, जो मनुष्यका मांस भक्षण करनेवाली हैं। संतानकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको इन देवियोंके आगे मस्तक झुकाना चाहिये ॥ १६ ॥

एवमेते पिशाचानामसंख्येया गणाः स्मृताः ।
घण्टायाः सपताकायाः शृणु मे सम्भवं नृप ॥ १७ ॥
इस प्रकार ये पिशाचोंके असंख्य गण बताये गये हैं। राजन्! अब तुम मुझसे स्कन्दके घण्टे और पताकाकी उत्पत्तिका वृत्तान्त सुनो ॥ १७ ॥

ऐरावतस्य घण्टे द्वे वैजयन्त्याविति श्रुते ।
गुहस्य ते स्वयं दत्ते क्रमेणानाय्य धीमता ॥ १८ ॥
इन्द्रके ऐरावत हाथीके उपयोगमें आनेवाले जो दो 'वैजयन्ती' नामसे विख्यात घण्टे थे, उन्हें बुद्धिमान् इन्द्रने क्रमशः ले आकर स्वयं कुमार कार्तिकेयको अर्पण कर दिया ॥ १८ ॥

एका तत्र विशाखस्य घण्टा स्कन्दस्य चापरा ।
पताका कार्तिकेयस्य विशाखस्य च लोहिता ॥ १९ ॥
उनमेंसे एक घण्टा विशाखने ले लिया और दूसरा स्कन्दके पास रह गया। कार्तिकेय और विशाख दोनोंकी पताकाएँ लाल रंगकी हैं ॥ १९ ॥

यानि क्रीडनकान्यस्य देवैर्दत्तानि वै तदा ।
तैरेव रमते देवो महासेनो महाबलः ॥ २० ॥

उस समय देवताओंने जो खिलौने इन्हें दिये थे, उन्हींसे महाबली महासेन खेलते और मन बहलाते हैं॥

स संवृतः पिशाचानां गणैर्देवगणैस्तथा।
शुशुभे काञ्चने शैले दीप्यमानः श्रिया वृतः॥ २१॥

राजन्! अद्भुत शोभासे सम्पन्न और कान्तिमान् कुमार कार्तिकेय उस समय उस स्वर्णमय शिखरपर पिशाचों और देवताओंके समूहसे घिरकर बड़ी शोभा पा रहे थे॥ २१॥

तेन वीरेण शुशुभे स शैलः शुभकाननः।
आदित्येनेवांशुमता मन्दरश्चारुकन्दरः॥ २२॥

जैसे अंशुमाली सूर्यके उदयसे मनोहर कन्दरावाले मन्दराचलकी शोभा होती है, उसी प्रकार वीरवर स्कन्दके निवाससे सुन्दर वनवाले उस श्वेतगिरिकी शोभा बढ़ गयी थी॥ २२॥

संतानकवनैः फुल्लैः करवीरवनैरपि।
पारिजातवनैश्चैव जपाशोकवनैस्तथा॥ २३॥
कदम्बतरुषण्डैश्च दिव्यैर्मृगगणैरपि।
दिव्यैः पक्षिगणैश्चैव शुशुभे श्वेतपर्वतः॥ २४॥

वहाँ कहीं फूलोंसे भरे हुए कल्पवृक्षके वन और कहीं कनेरके कानन सुशोभित होते थे। कहीं पारिजातके वन थे तो कहीं जपा और अशोकके उपवन शोभा पाते थे। कहीं कदम्ब नामक वृक्षोंके समूह लहलहा रहे थे तो कहीं दिव्य मृगगण विचर रहे थे। सब ओर दिव्य पक्षियोंके समुदाय कलरव कर रहे थे। इन सबसे उस श्वेत पर्वतकी शोभा बहुत बढ़ गयी थी॥ २३-२४॥

तत्र देवगणाः सर्वे सर्वे देवर्षयस्तथा।
मेघतूर्यरवाश्चैव क्षुब्धोदधिसमस्वनाः॥ २५॥

वहाँ सम्पूर्ण देवता तथा देवर्षिगण आकर विराजमान हो गये। क्षुब्ध महासागरकी गम्भीर गर्जनाके समान मेघों और दिव्य वाद्योंका तुमुल घोष सब ओर गूँजने लगा॥ २५॥

तत्र दिव्याश्च गन्धर्वा नृत्यन्तेऽप्सरसस्तथा।
हृष्टानां तत्र भूतानां श्रूयते निनदो महान्॥ २६॥

'वहाँ दिव्य गन्धर्व और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। हर्षमें भरे हुए प्राणियोंका महान् कोलाहल सुनायी देने लगा॥ २६॥

एवं सेन्द्रं जगत् सर्वं श्वेतपर्वतसंस्थितम्।
प्रहृष्टं प्रेक्षते स्कन्दं न च ग्लायति दर्शनात्॥ २७॥

इस प्रकार इन्द्रसहित सम्पूर्ण जगत् बड़ी प्रसन्नताके साथ श्वेत पर्वतपर विराजमान कुमार कार्तिकेयका दर्शन करने लगा। उनके दर्शनसे किसीका जी नहीं भरता था॥ २७॥

मार्कण्डेय उवाच

यदाभिषिक्तो भगवान् सेनापत्येन पावकिः ।
तदा सम्प्रस्थितः श्रीमान् हृष्टो भद्रवटं हरः ॥ २८ ॥
रथेनादित्यवर्णेन पार्वत्या सहितः प्रभुः ।
(अनुयातः सुरैः सर्वैः सहस्राक्षपुरोगमैः)
सहस्रं तस्य सिंहानां तस्मिन् युक्तं रथोत्तमे ॥ २९ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! जब अग्निनन्दन भगवान् स्कन्दका सेनापतिके पदपर अभिषेक हो गया, तब श्रीमान् भगवान् शिव देवी पार्वतीके साथ सूर्यके समान रथपर आरूढ हो प्रसन्नतापूर्वक भद्रवटकी ओर प्रस्थित हुए। उस समय इन्द्र आदि सब देवता उनके पीछे-पीछे चले। भगवान् शिवके उस उत्तम रथमें एक हजार सिंह जुते हुए थे ॥ २८-२९ ॥
उत्पपात दिवं शुभ्रं कालेनाभिप्रचोदितम् ।
ते पिबन्त इवाकाशं त्रासयन्तश्चराचरान् ॥ ३० ॥
सिंहा नभस्यगच्छन्त नदन्तश्चारुकेसराः ।
साक्षात् काल उस रथका संचालन कर रहा था। उसकी प्रेरणासे वह शुभ्र रथ आकाशमें उड़ चला। मनोहर केसरोंसे सुशोभित वे सिंह चराचर प्राणियोंको भयभीत करते और दहाड़ते हुए आकाशमें इस प्रकार चलने लगे, मानो उसे पी जायेंगे ॥ ३० १/२ ॥
तस्मिन् रथे पशुपतिः स्थितो भात्युमया सह ॥ ३१ ॥
विद्युता सहितः सूर्यः सेन्द्रचापे घने यथा ।
उस रथपर भगवती उमाके साथ बैठे हुए भगवान् शिव इस प्रकार शोभित हो रहे थे, मानो इन्द्रधनुषयुक्त मेघोंकी घटामें विद्युत्के साथ भगवान् सूर्य प्रकाशित हो रहे हों ॥ ३१ १/२ ॥
अग्रतस्तस्य भगवान् धनेशो गुह्यकैः सह ॥ ३२ ॥
आस्थाय रुचिरं याति पुष्पकं नरवाहनः ।
उनके आगे-आगे गुह्यकोंसहित नरवाहन धनाध्यक्ष भगवान् कुबेर मनोहर पुष्पक विमानपर बैठकर जा रहे थे ॥ ३२ १/२ ॥
ऐरावतं समास्थाय शक्रश्चापि सुरैः सह ॥ ३३ ॥
पृष्ठतोऽनुययौ यान्तं वरदं वृषभध्वजम् ।
देवताओंसहित इन्द्र भी ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो (भद्रवटको) जाते हुए वरदायक भगवान् वृषभध्वजके पीछे-पीछे चल रहे थे ॥ ३३ १/२ ॥
जृम्भकैर्यक्षरक्षोभिः स्रग्विभिः समलङ्कृतः ॥ ३४ ॥
यात्यमोघो महायक्षो दक्षिणं पक्षमास्थितः ।

मालाधारी जृम्भकगण, यक्ष तथा राक्षसोंसे सुशोभित महायक्ष अमोघ भगवान् शंकरके दाहिने भागमें रहकर चल रहा था ।। ३४ १/२ ।।

तस्य दक्षिणतो देवा बहवश्चित्रयोधिनः ।। ३५ ।।
गच्छन्ति वसुभिः सार्धं रुद्रैश्च सह सङ्गताः ।
उसके दाहिने भागमें विचित्र प्रकारके युद्ध करनेवाले बहुत-से देवता वसुओं तथा रुद्रोंके साथ संगठित होकर चल रहे थे ।। ३५ १/२ ।।

यमश्च मृत्युना सार्धं सर्वतः परिवारितः ।। ३६ ।।
घोरैर्व्याधिशतैर्याति घोररूपवपुस्तथा ।
मृत्युसहित यमराज अत्यन्त भयंकर रूप धारण करके देवताओंके साथ यात्रा कर रहे थे। उन्हें सैकड़ों भयानक रोगोंने मूर्तिमान् होकर चारों ओरसे घेर रखा था ।। ३६ १/२ ।।

यमस्य पृष्ठतश्चैव घोरस्त्रिशिखरः शितः ।। ३७ ।।
विजयो नाम रुद्रस्य याति शूलः स्वलङ्कृतः ।
यमराजके पीछे-पीछे भगवान् शंकरका विजय नामक भयंकर त्रिशूल जा रहा था, जो तीन शिखरोंसे सुशोभित और तीक्ष्ण था। उस त्रिशूलको सिन्दूर आदिसे भलीभाँति सजाया गया था ।। ३७ १/२ ।।

तमग्रपाशो वरुणो भगवान् सलिलेश्वरः ।। ३८ ।।
परिवार्य शनैर्याति यादोभिर्विविधैर्वृतः ।
जलके स्वामी भगवान् वरुण हाथमें भयंकर पाश लिये उस त्रिशूलको सब ओरसे घेरकर धीरे-धीरे चल रहे थे। उनके साथ नाना प्रकारकी आकृतिवाले जलजन्तु भी थे ।। ३८ १/२ ।।

पृष्ठतो विजयस्यापि याति रुद्रस्य पट्टिशः ।। ३९ ।।
गदामुसलशक्त्याद्यैर्वृतः प्रहरणोत्तमैः ।
विजयके पीछे भगवान् रुद्रका पट्टिश नामक शस्त्र जा रहा था, जिसे गदा, मुसल और शक्ति आदि उत्तम आयुधोंने घेर रक्खा था ।। ३९ १/२ ।।

पट्टिशं त्वन्वगाद् राजञ्छत्रं रौद्रं महाप्रभम् ।। ४० ।।
कमण्डलुश्चाप्यनु तं महर्षिगणसेवितः ।
राजन्! पट्टिशके पीछे भगवान् रुद्रका अत्यन्त प्रभावपूर्ण छत्र जा रहा था और उसके पीछे महर्षियोंद्वारा सेवित कमण्डलु यात्रा कर रहा था ।। ४० १/२ ।।

तस्य दक्षिणतो भाति दण्डो गच्छन् श्रिया वृतः ।। ४१ ।।
भृग्वङ्गिरोभिः सहितो दैवतैश्चानुपूजितः ।

कमण्डलुके दाहिने भागमें जाते हुए तेजस्वी दण्डकी बड़ी शोभा हो रही थी। उसके साथ भृगु और अंगिरा आदि महर्षि थे और देवता भी बार-बार उसका पूजन करते थे।। ४११/३।।
एषां तु पृष्ठतो रुद्रो विमले स्यन्दने स्थितः ।। ४२ ।।
याति संहर्षयन् सर्वांस्तेजसा त्रिदिवौकसः ।
इन सबके पीछे उज्ज्वल रथपर आरूढ़ हो रुद्रदेव यात्रा करते थे, जो अपने तेजसे सम्पूर्ण देवताओंका हर्ष बढ़ा रहे थे ।। ४२१/३ ।।
ऋषयश्चापि देवाश्च गन्धर्वा भुजगास्तथा ।। ४३ ।।
नद्यो ह्रदाः समुद्राश्च तथैवाप्सरसां गणाः ।
नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव देवानां शिशवश्च ये ।। ४४ ।।
रुद्रदेवके पीछे ऋषि, देवता, गन्धर्व, नाग, नदियाँ, गहरे जलाशय, समुद्र, अप्सराएँ, नक्षत्र, ग्रह तथा देवकुमार चल रहे थे ।। ४३-४४ ।।
स्त्रियश्च विविधाकारा यान्ति रुद्रस्य पृष्ठतः ।
सृजन्त्यः पुष्पवर्षाणि चारुरूपा वराङ्गनाः ।। ४५ ।।
मनोहर रूप और भाँति-भाँतिकी आकृति धारण करनेवाली बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियाँ फूलोंकी वर्षा करती हुई भगवान् रुद्रके पीछे-पीछे जा रही थीं ।। ४५ ।।
पर्जन्यश्चाप्यनुययौ नमस्कृत्य पिनाकिनम् ।
छत्रं च पाण्डुरं सोमस्तस्य मूर्धन्यधारयत् ।। ४६ ।।
पिनाकधारी भगवान् शंकरको नमस्कार करके पर्जन्यदेव भी उनके पीछे-पीछे चले। चन्द्रमाने उनके मस्तकपर श्वेत छत्र लगा रखा था ।। ४६ ।।
चामरे चापि वायुश्च गृहीत्वाग्निश्च धिष्ठितौ ।
शक्रश्च पृष्ठतस्तस्य याति राजञ्छ्रिया वृतः ।। ४७ ।।
सह राजर्षिभिः सर्वैः स्तुवानो वृषकेतनम् ।
राजन्! वायु और अग्नि चँवर लेकर दोनों ओर खड़े थे। तेजस्वी इन्द्र समस्त राजर्षियोंके साथ भगवान् वृषभध्वजकी स्तुति करते हुए उनके पीछे-पीछे जा रहे थे ।। ४७ १/३ ।।
गौरी विद्याथ गान्धारी केशिनी मित्रसाह्वया ।। ४८ ।।
सावित्र्या सह सर्वास्ताः पार्वत्या यान्ति पृष्ठतः ।
तत्र विद्यागणाः सर्वे ये केचित् कविभिः कृताः ।। ४९ ।।
गौरी, विद्या, गान्धारी, केशिनी, मित्रा और सावित्री—ये सब पार्वतीदेवीके पीछे-पीछे चल रही थीं। विद्वानोंद्वारा प्रकाशित सम्पूर्ण विद्याएँ भी उन्हींके साथ थीं ।। ४८-४९ ।।
तस्य कुर्वन्ति वचनं सेन्द्रा देवाश्चमूममुखे ।
गृहीत्वा तु पताकां वै यात्यग्रे राक्षसो ग्रहः ।। ५० ।।

इन्द्र आदि देवता सेनाके मुहानेपर उपस्थित हो भगवान् शिवके आदेशका पालन करते थे। एक राक्षस ग्रह सेनाका झंडा लेकर आगे-आगे चलता था ॥ ५० ॥
व्यापृतस्तु श्मशाने यो नित्यं रुद्रस्य वै सखा ।
पिङ्गलो नाम यक्षेन्द्रो लोकस्यानन्ददायकः ॥ ५१ ॥
भगवान् रुद्रका सखा यक्षराज पिंगलदेव जो सदा श्मशानमें ही (उसकी रक्षाके लिये) निवास करता और सम्पूर्ण जगत्को आनन्द देनेवाला था, उस यात्रामें भगवान् शिवके साथ था ॥ ५१ ॥
एभिश्च सहितो देवस्तत्र याति यथासुखम् ।
अग्रतः पृष्ठतश्चैव न हि तस्य गतिर्ध्रुवा ॥ ५२ ॥
इन सबके साथ महादेवजी सुखपूर्वक भद्रवटकी यात्रा कर रहे थे। वे कभी सेनाके आगे रहते और कभी पीछे। उनकी कोई निश्चित गति नहीं थी ॥ ५२ ॥
रुद्रं सत्कर्मभिर्मर्त्याः पूजयन्तीह दैवतम् ।
शिवमित्येव यं प्राहुरीशं रुद्रं पितामहम् ॥ ५३ ॥
भावैस्तु विविधाकारैः पूजयन्ति महेश्वरम् ।
मरणधर्मा मनुष्य इस संसारमें सत्कर्मोंद्वारा रुद्रदेवकी ही पूजा करते हैं। इन्हींको शिव, ईश, रुद्र और पितामह कहते हैं। लोग नाना प्रकारके भावोंसे भगवान् महेश्वरकी पूजा करते हैं ॥ ५३ १/२ ॥
देवसेनापतिस्त्वेवं देवसेनाभिरावृतः ।
अनुगच्छति देवेशं ब्रह्मण्यः कृत्तिकासुतः ॥ ५४ ॥
इसी प्रकार ब्राह्मणहितैषी, देवसेनापति, कृत्तिका-नन्दन स्कन्द भी देवताओंकी सेनासे घिरे हुए देवेश्वर भगवान् शिवके पीछे-पीछे जा रहे थे ॥ ५४ ॥
अथाब्रवीन्महासेनं महादेवो बृहद् वचः ।
सप्तमं मारुतस्कन्धं रक्ष नित्यमतन्द्रितः ॥ ५५ ॥
तदनन्तर महादेवजीने कुमार महासेनसे यह उत्तम बात कही—'बेटा! तुम सदा सावधानीके साथ मारुतस्कन्ध नामक देवताओंके सातवें व्यूहकी रक्षा करना' ॥ ५५ ॥

स्कन्द उवाच

सप्तमं मारुतस्कन्धं पालयिष्याम्यहं प्रभो ।
यदन्यदपि मे कार्यं देव तद् वद माचिरम् ॥ ५६ ॥
स्कन्द बोले— प्रभो! मैं सातवें व्यूह मारुतस्कन्धकी अवश्य रक्षा करूँगा। देव! इसके सिवा और भी मेरा जो कुछ कर्तव्य हो, उसके लिये आप शीघ्र आज्ञा दीजिये ॥

रुद्र उवाच

कार्येष्वहं त्वया पुत्र संद्रष्टव्यः सदैव हि ।

दर्शनान्मम भक्त्या च श्रेयः परमवाप्स्यसि ।। ५७ ।।
**रुद्रने कहा—**पुत्र! काम पड़नेपर तुम सदा मुझसे मिलते रहना। मेरे दर्शनसे तथा मुझमें भक्ति करनेसे तुम्हारा परम कल्याण होगा ।। ५७ ।।

मार्कण्डेय उवाच

इत्युक्त्वा विससर्जैनं परिष्वज्य महेश्वरः ।
विसर्जिते ततः स्कन्दे बभूवौत्पातिकं महत् ।। ५८ ।।
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! ऐसा कहकर भगवान् महेश्वरने कार्तिकेयको हृदयसे लगाकर बिदा किया। स्कन्दके बिदा होते ही बड़ा भारी उत्पात होने लगा ।। ५८ ।।

सहसैव महाराज देवान् सर्वान् प्रमोहयत् ।
जज्वाल खं सनक्षत्रं प्रमूढं भुवनं भृशम् ।। ५९ ।।
महाराज! सहसा समस्त देवताओंको मोहमें डालता हुआ नक्षत्रोंसहित आकाश प्रज्वलित हो उठा। समस्त संसार अत्यन्त मूढ़-सा हो गया ।। ५९ ।।
चचाल व्यनदच्चोर्वी तमोभूतं जगद् बभौ ।
ततस्तद् दारुणं दृष्ट्वा क्षुभितः शङ्करस्तदा ।। ६० ।।
उमा चैव महाभागा देवाश्च समहर्षयः ।

पृथ्वी हिलने लगी। उसमें गड़गड़ाहट पैदा हो गयी। सारा जगत् अन्धकारमें मग्न-सा जान पड़ता था। उस समय यह दारुण उत्पात देखकर भगवान् शंकर, महाभागा उमा, देवगण तथा महर्षिगण क्षुब्ध हो उठे ।।

ततस्तेषु प्रमूढेषु पर्वताम्बुदसंनिभम् ।। ६१ ।।
नानाप्रहरणं घोरमदृश्यत महत् बलम् ।
तद् वै घोरमसंख्येयं गर्जच्च विविधा गिरः ।। ६२ ।।
जिस समय वे सब लोग मोहग्रस्त हो रहे थे, उसी समय पर्वतों और मेघमालाओंके समान दैत्योंकी विशाल एवं भयंकर सेना दिखायी दी। वह नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थी। उसके सैनिकोंकी संख्या गिनी नहीं जा सकती थी। वह भयंकर वाहिनी अनेक प्रकारकी बोली बोलती हुई भीषण गर्जना कर रही थी ।।

अभ्यद्रवद् रणे देवान् भगवन्तं च शङ्करम् ।
तैर्विसृष्टान्यनीकेषु बाणजालान्यनेकoptions: बाणजालान्यनेकशः ।। ६३ ।।
उसने रणभूमिमें आकर देवताओं तथा भगवान् शंकरपर धावा बोल दिया। दैत्योंने देवताओंके सैनिकोंपर कई बार बाण-वर्षा की ।। ६३ ।।

पर्वताश्च शतघ्न्यश्च प्रासासिपरिघा गदाः ।
निपतद्भिेश्च तैर्घोरैर्देवानीकं महायुधैः ।। ६४ ।।
क्षणेन व्यद्रवत् सर्वं विमुखं चाप्यदृश्यत ।
शिलाखण्ड, शतघ्नी (तोप), प्रास, खड्ग, परिघ और गदाओंके लगातार प्रहार हो रहे थे। इन भयंकर महान् अस्त्रोंकी मारसे देवताओंकी सारी सेना क्षणभरमें (पीठ दिखाकर) भाग चली। सारे सैनिक युद्धसे विमुख दिखायी देते थे ।। ६४ ½ ।।

निकृत्तयोधनागाश्वं कृतायुधमहारथम् ।। ६५ ।।
दानवैरर्दितं सैन्यं देवानां विमुखं बभौ ।
बहुत-से योद्धा, हाथी और घोड़े काट डाले गये। असंख्य आयुध और बड़े-बड़े रथ टूक-टूक कर दिये गये। इस प्रकार दानवोंद्वारा पीड़ित हुई देवताओंकी सेना युद्धसे विमुख हो गयी ।। ६५ ½ ।।

असुरैर्वध्यमानं तत् पावकैरिव काननम् ।। ६६ ।।
अपतत् दग्धभूयिष्ठं महाद्रुमवनं यथा ।
जैसे आग समूचे वनको जला देती है, उसी प्रकार असुरोंने देवताओंकी सेनामें भारी मार-काट मचा दी। बड़े-बड़े वृक्षोंसे भरे हुए वनका अधिकांश भाग जल जानेपर उसकी जैसी दुरवस्था दिखायी देती है, उसी प्रकार दैत्योंकी अस्त्राग्निमें अधिकांश सैनिकोंके दग्ध हो जानेके कारण वह देवसेना धराशायिनी हो रही थी ।।

ते विभिन्नशिरोदेहाः प्राद्रवन्तो दिवौकसः ।। ६७ ।।
न नाथमधिगच्छन्ति वध्यमाना महारणे ।

उस महासमरमें असुरोंकी मार खाकर वे सब देवता भागते हुए कहीं कोई रक्षक नहीं

पा रहे थे। किन्हींके सिर फट गये थे तो किन्हींके सब अंगोंमें गहरे घाव हो गये थे ।। ६७ १/३

।।

अथ तद् विद्रुतं सैन्यं दृष्ट्वा देवः पुरंदरः ।। ६८ ।।

आश्वासयन्नुवाचेदं बलभिद् दानवार्दितम् ।

भयं त्यजत भद्रं वः शूराः शस्त्राणि गृह्णत ।। ६९ ।।

कुरुध्वं विक्रमे बुद्धिं मा वः काचिद् व्यथा भवेत् ।

जयतैनान् सुदुर्धृत्तान् दानवान् घोरदर्शनान् ।। ७० ।।

अभिद्रवत भद्रं वो मया सह महासुरान् ।

शक्रस्य वचनं श्रुत्वा समाश्वस्ता दिवौकसः ।। ७१ ।।

तदनन्तर बलासुरविनाशक देवराज इन्द्रने अपनी उस सेनाको दानवोंसे पीड़ित होकर

भागती देख उसे आश्वासन देते हुए कहा- 'शूरवीरो! भय त्याग दो, इससे तुम्हारा मंगल

होगा। हथियार उठाओ और पराक्रममें मन लगाओ। तुम्हें किसी प्रकार व्यथित नहीं होना

चाहिये। इन भयंकर दिखायी देनेवाले दुराचारी दानवोंको जीतो। तुम्हारा कल्याण हो। तुम

सब लोग मेरे साथ इन महाकाय दैत्योंपर टूट पड़ो।' इन्द्रकी यह बात सुनकर देवताओंको

बड़ी सान्त्वना मिली ।। ६८-७१ ।।

दानवान् प्रत्ययुध्यन्त शक्रं कृत्वा व्यपाश्रयम् ।

ततस्ते त्रिदशाः सर्वे मरुतश्च महाबलाः ।। ७२ ।।

प्रत्युद्ययुर्महाभागाः साध्याश्च वसुभिः सह ।

उन्होंने इन्द्रको अपना आश्रय बनाकर दानवोंके साथ पुनः युद्ध प्रारम्भ किया।

तत्पश्चात् वे सभी देवता महाबली मरुद्गण तथा वसुओं एवं महाभाग साध्यगण-सहित

युद्धभूमिमें आगे बढ़ने लगे ।। ७२ १/२ ।।

तैर्विसृष्टान्यनीकेषु क्रुद्धैः शस्त्राणि संयुगे ।। ७३ ।।

शराश्च दैत्यकायेषु पिबन्ति रुधिरं बहु ।

उन्होंने संग्राममें कुपित होकर दैत्योंकी सेनाओंके ऊपर जो अस्त्र-शस्त्र और बाण

चलाये, वे उनके शरीरोंमें घुसकर प्रचुर मात्रामें रक्त पीने लगे ।। ७३ १/२ ।।

तेषां देहान् विनिर्भिद्य शरास्ते निशितास्तदा ।। ७४ ।।

निपतन्तोऽभ्यदृश्यन्त नगेभ्य इव पन्नगाः ।

वे तीखे बाण उस समय दैत्योंके शरीरोंको विदीर्ण कर रणभूमिमें इस प्रकार गिरते

दिखायी देते थे, मानो वृक्षोंसे सर्प गिर रहे हों ।। ७४ १/२ ।।

तानि दैत्यशरीराणि निर्भिन्नानि स्म सायकैः ।। ७५ ।।

अपतन् भूतले राजंश्छिन्नाभ्राणीव सर्वशः ।

राजन्! देवताओंके बाणोंसे विदीर्ण हुए वे दैत्योंके शरीर सब प्रकारसे छिन्न-भिन्न हुए बादलोंके समान धरतीपर गिरने लगे ।। ७५ १/२ ।।
ततस्तद् दानवं सैन्यं सर्वैर्देवगणैर्युधि ।। ७६ ।।
त्रासितं विविधैर्बाणैः कृतं चैव पराङ्मुखम् ।
तदनन्तर समस्त देवताओंने उस युद्धमें दानवसेनाको अपने विविध बाणोंके प्रहारसे भयभीत करके रणभूमिसे विमुख कर दिया ।। ७६ १/२ ।।
अथोत्कृष्टं तदा हृष्टैः सर्वैर्देवैरुदायुधैः ।। ७७ ।।
संहतानि च तूर्याणि प्रावाद्यन्त ह्यनेकversion/नेकtext: ह्यनेकversion: ह्यनेकशः ।
फिर तो उस समय हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र उठाये सम्पूर्ण देवता हर्षमें भरकर कोलाहल करने लगे और अनेक प्रकारके विजय-वाद्य एक साथ बज उठे ।। ७७ १/२ ।।
एवमन्योन्यसंयुक्तं युद्धमासीत् सुदारुणम् ।। ७८ ।।
देवानां दानवानां च मांसशोणितकर्दमम् ।
अनयो देवलोकस्य सहसैवाभ्यदृश्यत ।। ७९ ।।
तथा हि दानवा घोरा विनिघ्नन्ति दिवौकसः ।
इस प्रकार देवताओं और दानवोंमें परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध हो रहा था। रक्त और मांससे वहाँकी भूमिपर कीचड़ जम गयी थी। फिर सहसा बाजी पलट गयी। देवलोककी पराजय दिखायी देने लगी। भयंकर दानव देवताओंको मारने लगे ।। ७८-७९ १/२ ।।
ततस्तूर्यप्रणादाश्च भेरीणां च महास्वनः ।। ८० ।।
बभूवुर्दानवेन्द्राणां सिंहनादाश्च दारुणाः ।
उस समय दानवेन्द्रोंके भयंकर सिंहनाद सुनायी पड़ते थे। उनके रणवाद्यों तथा भेरियोंका गम्भीर घोष सब ओर गूँज उठा ।। ८० १/२ ।।
अथ दैत्यबलाद् घोरान्निष्पपात महाबलः ।। ८१ ।।
दानवो महिषो नाम प्रगृह्य विपुलं गिरिम् ।
इतनेहीमें दैत्योंकी भयंकर सेनासे महाबली दानव ‘महिष’ हाथोंमें एक विशाल पर्वत लिये निकला और देवताओंपर टूट पड़ा ।। ८१ १/२ ।।
ते तं घनैरिवादित्यं दृष्ट्वा सम्परिवारितम् ।। ८२ ।।
तमुद्यतगिरिं राजन् व्यद्रवन्त दिवौकसः ।
राजन्! बादलोंसे घिरे हुए सूर्यकी भाँति पर्वत उठाये हुए उस दानवको देखकर सब देवता भाग चले ।। ८२ १/२ ।।
अथाभिद्रुत्य महिषो देवांश्चिक्षेप तं गिरिम् ।। ८३ ।।
पतता तेन गिरिणा देवसैन्यस्य पार्थिव ।
भीमरूपेण निहतमयुतं प्रापतद् भुवि ।। ८४ ।।

परंतु महिषासुरने देवताओंका पीछा करके उनके ऊपर वह पहाड़ पटक दिया। युधिष्ठिर! उस भयानक पर्वतके गिरनेसे देवसेनाके दस हजार योद्धा कुचलकर धरतीपर गिर पड़े ॥ ८३-८४ ॥
अथ तैर्दानवैः सार्धं महिषस्त्रासयन् सुरान् ।
अभ्यद्रवद् रणे तूर्णं सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥ ८५ ॥
तदनन्तर जैसे सिंह छोटे मृगोंको डराता हुआ उनपर टूट पड़ता है, उसी प्रकार महिषासुरने अपने दानव-सैनिकोंके साथ रणभूमिमें समस्त देवताओंको भयभीत करते हुए उनपर शीघ्र ही प्रबल आक्रमण किया ॥ ८५ ॥