महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२०४-
चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः
धुन्धुकी तपस्या और वरप्राप्ति, कुवलाश्वद्वारा धुन्धुका वध और देवताओंका कुवलाश्वको वर देना
मार्कण्डेय उवाच
धुन्धुर्नाम महाराज तयोः पुत्रो महाद्युतिः ।
स तपोऽतप्यत महन्महावीर्यपराक्रमः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— महाराज! उन्हीं दोनों मधु और कैटभका पुत्र धुन्धु है जो बड़ा तेजस्वी और महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न है। उसने बड़ी भारी तपस्या की ॥ १ ॥
अतिष्ठदेकपादेन कृशो धमनिसंततः ।
तस्मै ब्रह्मा ददौ प्रीतो वरं वव्रे स च प्रभुम् ॥ २ ॥
वह दीर्घकालतक एक पैरसे खड़ा रहा। उसका शरीर इतना दुर्बल हो गया कि नस-नाड़ियोंका जाल दिखायी देने लगा। ब्रह्माजीने उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर उसे वर दिया। धुन्धुने भगवान् ब्रह्मासे इस प्रकार वर माँगा— ॥ २ ॥
देवदानवयक्षाणां सर्पगन्धर्वरक्षसाम् ।
अवध्योऽहं भवेयं वै वर एष वृतो मया ॥ ३ ॥
'भगवन्! मैं देवता, दानव, यक्ष, सर्प, गन्धर्व और राक्षस किसीके हाथसे न मारा जाऊँ। मैंने आपसे यही वर माँगा है' ॥ ३ ॥
एवं भवतु गच्छेति तमुवाच पितामहः ।
स एवमुक्तस्तत्पादौ मूर्ध्ना स्पृश्य जगाम ह ॥ ४ ॥
तब ब्रह्माजीने उससे कहा—'ऐसा ही होगा। जाओ।' उनके ऐसा कहनेपर धुन्धुने मस्तक झुकाकर उनके चरणोंका स्पर्श किया और वहाँसे चला गया ॥ ४ ॥
स तु धुन्धुर्वरं लब्ध्वा महावीर्यपराक्रमः ।
अनुस्मरन् पितृवधं द्रुतं विष्णुमुपागमत् ॥ ५ ॥
जब धुन्धु वर पाकर महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न हो गया, तब उसे अपने पिता मधु और कैटभके वधका स्मरण हो आया और वह शीघ्रतापूर्वक भगवान् विष्णुके पास गया ॥ ५ ॥
स तु देवान् सगन्धर्वान् जित्वा धुन्धुरमर्षणः ।
बबाध सर्वानसकृद् विष्णुं देवांश्च वै भृशम् ॥ ६ ॥
धुन्धु अमर्षमें भरा हुआ था। उसने गन्धर्व-सहित सम्पूर्ण देवताओंको जीतकर भगवान् विष्णु तथा अन्य देवताओंको बार-बार महान् कष्ट देना प्रारम्भ किया ॥ ६ ॥
समुद्रे बालुकापूर्णे उज्जालक इति स्मृते ।
आगम्य च स दुष्टात्मा तं देशं भरतर्षभ ॥ ७ ॥
बाधते स्म परं शक्त्या तमुत्तङ्काश्रमं विभो ।
अन्तर्भूमिगतस्तत्र बालुकान्तर्हितस्तथा ॥ ८ ॥
भरतश्रेष्ठ! वह दुष्टात्मा बालुकामय प्रसिद्ध उच्चालक समुद्रमें आकर रहने और उस देशके निवासियोंको सताने लगा। राजन्! वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर धरतीके भीतर बालूमें छिपकर वहाँ उत्तंकके आश्रममें भी उपद्रव करने लगा ॥ ७-८ ॥
मधुकैटभयोः पुत्रो धुन्धुर्भीमपराक्रमः ।
शेते लोकविनाशाय तपोबलमुपाश्रितः ॥ ९ ॥
उत्तङ्कस्याश्रमाभ्याशे निःश्वसन् पावकार्चिषः ।
मधु और कैटभका वह भयंकर पराक्रमी पुत्र धुन्धु तपोबलका आश्रय ले सम्पूर्ण लोकोंका विनाश करनेके लिये वहाँ मरुप्रदेशमें शयन करता था। उत्तङ्कके आश्रमके पास साँस ले-लेकर वह आगकी चिनगारियाँ फैलाता था ॥ ९ १/२ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु राजा सबलवाहनः ॥ १० ॥
उत्तङ्कविप्रसहितः कुवलाश्वो महीपतिः ।
पुत्रैः सह महीपालः प्रययौ भरतर्षभ ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! इसी समय राजा कुवलाश्वने अपनी सेना, सवारी तथा पुत्रोंके साथ प्रस्थान किया। उनके साथ विप्रवर उत्तंक भी थे ॥ १०-११ ॥
सहस्रैरेकविंशत्या पुत्राणामरिमर्दनः ।
कुवलाश्वो नरपतिरन्वितो बलशालिनाम् ॥ १२ ॥
शत्रुमर्दन महाराज कुवलाश्व अपने इक्कीस हजार बलवान् पुत्रोंको साथ लेकर (सेनासहित) चले थे ॥ १२ ॥
तमाविशत् ततो विष्णुर्भगवान्तेजसा प्रभुः ।
उत्तङ्कस्य नियोगेन लोकानां हितकाम्यया ॥ १३ ॥
तदनन्तर उत्तंकके अनुरोधसे सम्पूर्ण जगत्का हित करनेके लिये सर्वसमर्थ भगवान् विष्णुने अपने तेजोमय स्वरूपसे कुवलाश्वमें प्रवेश किया ॥ १३ ॥
तस्मिन् प्रयाते दुर्धर्षे दिवि शब्दो महानभूत् ।
एष श्रीमानवध्योऽद्य धुन्धुमारो भविष्यति ॥ १४ ॥
उन दुर्धर्षवीर कुवलाश्वके यात्रा करनेपर देवलोकमें अत्यन्त हर्षपूर्ण कोलाहल होने लगा। देवता कहने लगे—'ये श्रीमान् नरेश अवध्य हैं, आज धुन्धुको मारकर ये' 'धुन्धुमार' नाम धारण करेंगे ॥ १४ ॥
दिव्यैश्च पुष्पैस्तं देवाः समन्तात् पर्यवारयन् ।
देवदुन्दुभयश्चापि नेदुः स्वयमनीरिताः ॥ १५ ॥
देवतालोग चारों ओरसे उनपर दिव्य फूलोंकी वर्षा करने लगे। देवताओंकी दुन्दुभियाँ स्वयं बिना किसी प्रेरणाके बज उठीं ॥ १५ ॥
शीतश्च वायुः प्रववौ प्रयाणे तस्य धीमतः ।
विपांसुलां महीं कुर्वन् ववर्ष च सुरेश्वरः ॥ १६ ॥
उन बुद्धिमान् राजा कुवलाश्वके यात्राकालमें शीतल वायु चलने लगी। देवराज इन्द्र धरतीकी धूल शान्त करनेके लिये वर्षा करने लगे ॥ १६ ॥
अन्तरिक्षे विमानादि देवतानां युधिष्ठिर ।
तत्रैव समदृश्यन्त धुन्धुर्यत्र महासुरः ॥ १७ ॥
युधिष्ठिर! जहाँ महान् असुर 'धुन्धु' रहता था, वहीं आकाशमें देवताओंके विमान आदि दिखायी देने लगे ॥
कुवलाश्वस्य धुन्धोश्च युद्धकौतूहलान्विताः ।
देवगन्धर्वसहिताः समवैक्षन् महर्षयः ॥ १८ ॥
कुवलाश्व और धुन्धुका युद्ध देखनेके लिये उत्सुक हो देवताओं और गन्धर्वोंके साथ महर्षि भी आकर डट गये और वहाँकी सारी बातोंपर दृष्टिपात करने लगे ॥ १८ ॥
नारायणेन कौरव्य तेजसाऽऽप्यायितस्तदा ।
स गतो नृपतिः क्षिप्रं पुत्रैस्तैः सर्वतो दिशम् ॥ १९ ॥
अर्णवं खानयामास कुवलाश्वो महीपतिः ।
कुरुनन्दन! उस समय भगवान् नारायणके तेजसे परिपुष्ट हो राजा कुवलाश्व अपने उन पुत्रोंके साथ वहाँ जा पहुँचे और शीघ्र ही चारों ओरसे उस बालुकामय समुद्रको खुदवाने लगे ॥ १९ १/२ ॥
कुवलाश्वस्य पुत्रैश्च तस्मिन् वै बालुकार्णवे ॥ २० ॥
सप्तभिर्दिवसैः खात्वा दृष्टो धुन्धुर्महाबलः ।
कुवलाश्वके पुत्रोंने सात दिनोंतक खुदाई करनेके बाद उस बालुकामय समुद्रमें (छिपे हुए) महाबली धुन्धुको देखा ॥ २० १/२ ॥
आसीद् घोरं वपुस्तस्य बालुकान्तर्हितं महत् ॥ २१ ॥
दीप्यमानं यथा सूर्यस्तेजसा भरतर्षभ ।
बालूके भीतर छिपा हुआ उसका शरीर विशाल एवं भयंकर था। भरतश्रेष्ठ! वह अपने तेजसे सूर्यके समान उद्दीप्त हो रहा था ॥ २१ १/२ ॥
ततो धुन्धुर्महाराज दिशमावृत्य पश्चिमाम् ॥ २२ ॥
सुप्तोऽभूद् राजशार्दूल कालानलसमद्युतिः ।
महाराज! तदनन्तर धुन्धु पश्चिम दिशाको घेरकर सो गया। नृपश्रेष्ठ! उसकी कान्ति प्रलयकालीन अग्निके समान जान पड़ती थी ॥ २२ १/२ ॥
कुवलाश्वस्य पुत्रैस्तु सर्वतः परिवारितः ॥ २३ ॥
अभिद्रुतः शरैस्तीक्ष्णैर्गदाभिर्मुसलैरपि ।
पट्टिशैः परिघैः प्रासैः खड्गैश्च विमलैः शितैः ॥ २४ ॥
स वध्यमानः संक्रुद्धः समुत्तस्थौ महाबलः ।
क्रुद्धश्चाभक्षयत् तेषां शस्त्राणि विविधानि च ॥ २५ ॥
उस समय राजा कुवलाश्वके पुत्रोंने सब ओरसे घेरकर उसपर आक्रमण किया। तीखे बाण, गदा, मुसल, पट्टिश, परिघ, प्रास और चमचमाते हुए तेज धारवाले खड्ग—इन सबके द्वारा चोट खाकर महाबली धुन्धु क्रोधित हो गया और उनके चलाये हुए नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको वह क्रोधी असुर खा गया ॥ २३—२५ ॥
आस्याद् वमन् पावकं स संवर्तकसमं तदा ।
तान् सर्वान् नृपतेः पुत्रानदहत् स्वेन तेजसा ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् उसने अपने मुँहसे प्रलयकालीन अग्निके समान आगकी चिनगारियाँ उगलना आरम्भ किया और उन समस्त राजकुमारोंको अपने तेजसे जलाकर भस्म कर
दिया ।। २६ ।।
मुखजेनाग्निना क्रुद्धो लोकानुद्धर्तयन्निव ।
क्षणेन राजशार्दूल पुरेव कपिलः प्रभुः ।। २७ ।।
सगरस्यात्मजान् क्रुद्धस्तदद्भुतमिवाभवत् ।
नृपश्रेष्ठ! जैसे पूर्वकालमें भगवान् कपिलने कुपित होकर राजा सगरके सभी पुत्रोंको
क्षणभरमें दग्ध कर दिया था, उसी प्रकार क्रोधमें भरे हुए धुन्धुने, मानो वह सम्पूर्ण लोकोंको
नष्ट कर देना चाहता हो, अपने मुखसे आग प्रकट करके कुवलाश्वके पुत्रोंको जला दिया।
यह एक अद्भुत-सी घटना घटित हुई ।। २७ १/२ ।।
तेषु क्रोधाग्निदग्धेषु तदा भरतसत्तम ।। २८ ।।
तं प्रबुद्धं महात्मानं कुम्भकर्णमिवापरम् ।
आससाद महातेजाः कुवलाश्वो महीपतिः ।। २९ ।।
भरतश्रेष्ठ! जब सभी राजकुमार धुन्धुकी क्रोधाग्निसे दग्ध हो गये, तब महातेजस्वी
राजा कुवलाश्वने दूसरे कुम्भकर्णके* समान जगे हुए उस महाकाय दानवपर आक्रमण
किया ।। २८-२९ ।।
तस्य वारि महाराज सुस्राव बहु देहतः ।
तदापीय ततस्तेजो राजा वारिमयं नृप ।। ३० ।।
योगी योगेन वह्निं च शमयामास वारिणा ।
महाराज! उस समय धुन्धुके शरीरसे बहुत-सा जल प्रवाहित होने लगा, किंतु राजा
कुवलाश्वने योगी होनेके कारण योगबलसे उस जलमय तेजको पी लिया और जल प्रकट
करके धुन्धुकी मुखाग्निको बुझा दिया ।। ३० १/२ ।।
ब्रह्मास्त्रेण च राजेन्द्र दैत्यं क्रूरपराक्रमम् ।। ३१ ।।
ददाह भरतश्रेष्ठ सर्वलोकभवाय वै ।
सोऽस्त्रेण दग्ध्वा राजर्षिः कुवलाश्वो महासुरम् ।। ३२ ।।
सुरशत्रुममित्रघ्नं त्रैलोक्येश इवापरः ।
राजेन्द्र! भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् सम्पूर्ण लोकोंके कल्याणके लिये राजर्षि कुवलाश्वने
ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके उस क्रूर पराक्रमी दैत्य धुन्धुको दग्ध कर दिया। इस प्रकार
ब्रह्मास्त्रद्वारा शत्रुनाशक, देववैरी महान् असुर धुन्धुको दग्ध करके राजा कुवलाश्व दूसरे
इन्द्रकी भाँति शोभा पाने लगे ।। ३१-३२ १/२ ।।
धुन्धोर्वधात् तदा राजा कुवलाश्वो महामनाः ।। ३३ ।।
धुन्धुमार इति ख्यातो नाम्नाप्रतिरथोऽभवत् ।
उस समय महामना राजा कुवलाश्व धुन्धुको मारनेके कारण 'धुन्धुमार' नामसे विख्यात
हो गये। उनका सामना करनेवाला वीर कोई नहीं रह गया था ।। ३३ १/२ ।।
प्रीतैश्च त्रिदशैः सर्वैर्महर्षिसहितैस्तदा ॥ ३४ ॥
वरं वृणीष्वेत्युक्तः स प्राञ्जलिः प्रणतस्तदा ।
अतीव मुदितो राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ ३५ ॥
तदनन्तर महर्षियोंसहित सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होकर वहाँ आये और राजासे वर माँगनेका अनुरोध करने लगे। राजन्! उनकी बात सुनकर कुवलाश्व अत्यन्त प्रसन्न हुए और हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर इस प्रकार बोले— ॥ ३४-३५ ॥
दद्यां वित्तं द्विजाग्र्येभ्यः शत्रूणां चापि दुर्जयः ।
सख्यं च विष्णुना मे स्याद् भूतेष्वद्रोह एव च ॥ ३६ ॥
‘देवताओं! मैं श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धन दान करूँ, शत्रुओंके लिये दुर्जय बना रहूँ, भगवान् विष्णुके साथ सख्य भावसे मेरा प्रेम हो और किसी भी प्राणीके प्रति मेरे मनमें द्रोह न रह जाय ॥ ३६ ॥
धर्मे रतिश्च सततं स्वर्गे वासस्तथाक्षयः ।
तथास्त्विति ततो देवैः प्रीतैरुक्तः स पार्थिवः ॥ ३७ ॥
‘धर्ममें मेरा सदा अनुराग हो और अन्तमें मेरा स्वर्गलोकमें नित्य निवास हो।' यह सुनकर देवताओंने बड़ी प्रसन्नताके साथ राजा कुवलाश्वसे कहा—'महाराज! ऐसा ही होगा' ॥ ३७ ॥
ऋषिभिश्च सगन्धर्वैरुत्तङ्केन च धीमता ।
सम्भाष्य चैनं विविधैराशीर्वादैस्ततो नृप ॥ ३८ ॥
राजन्! तदनन्तर ऋषियों, गन्धर्वों और बुद्धिमान् महर्षि उत्तंकने भी नाना प्रकारके आशीर्वाद देते हुए राजासे वार्तालाप किया ॥ ३८ ॥
देवा महर्षयश्चापि स्वानि स्थानानि भेजिरे ।
तस्य पुत्रास्त्रयः शिष्टा युधिष्ठिर तदाभवन् ॥ ३९ ॥
युधिष्ठिर! इसके बाद देवता और महर्षि अपने-अपने स्थानको चले गये। उस युद्धमें राजा कुवलाश्वके तीन ही पुत्र शेष रह गये थे ॥ ३९ ॥
दृढाश्वः कपिलाश्वश्च चन्द्राश्वश्चैव भारत ।
तेभ्यः परम्परा राजन्निक्ष्वाकूणां महात्मनाम् ॥ ४० ॥
वंशस्य सुमहाभाग राज्ञाममिततेजसाम् ।
भारत! उनके नाम थे—दृढाश्व, कपिलाश्व और चन्द्राश्व। राजन्! महाभाग! उन्हींसे अमित तेजस्वी इक्ष्वाकुवंशी महामना नरेशोंकी वंश-परम्परा चालू हुई ॥
एवं स निहतस्तेन कुवलाश्वेन सत्तम ॥ ४१ ॥
धुन्धुर्नाम महादैत्यो मधुकैटभयोः सुतः ।
कुवलाश्वश्च नृपतिर्धुन्धुमार इति स्मृतः ॥ ४२ ॥
सज्जनशिरोमणे! इस प्रकार मधुकैटभ-कुमार महादैत्य धुन्धु कुवलाश्वके हाथसे मारा गया और राजा कुवलाश्वकी धुन्धुमार नामसे प्रसिद्धि हुई ।। ४१-४२ ।।
नाम्ना च गुणसंयुक्तस्तदाप्रभृति सोऽभवत् ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।। ४३ ।।
धौन्धुमारमुपाख्यानं प्रथितं यस्य कर्मणा ।
तभीसे वे नरेश अपने नामके अनुसार वीरता आदि गुणोंसे युक्त हो भूमण्डलमें विख्यात हो गये। युधिष्ठिर! तुमने मुझसे जो पूछा था, वह सारा धुन्धुमारोपाख्यान मैंने तुमसे कह सुनाया। जिनके पराक्रमसे इस उपाख्यानकी प्रसिद्धि हुई है उन नरेशका भी परिचय दे दिया ।। ४३ १/२ ।।
इदं तु पुण्यमाख्यानं विष्णोः समनुकीर्तनम् ।। ४४ ।।
शृणुयाद् यः स धर्मात्मा पुत्रवांश्च भवेन्नरः ।
आयुष्मान् भूतिमांश्चैव श्रुत्वा भवति पर्वसु ।
न च व्याधिभयं किंचित् प्राप्नोति विगतज्वरः ।। ४५ ।।
जो मनुष्य भगवान् विष्णुके कीर्तनरूप इस पवित्र उपाख्यानको सुनता है वह धर्मात्मा और पुत्रवान् होता है। जो पर्वोंपर इस कथाको सुनता है वह दीर्घायु तथा ऐश्वर्यशाली होता है। उसे रोग आदिका कुछ भी भय नहीं होता। उसकी सारी चिन्ताएँ दूर हो जाती हैं ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने
चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २०४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें
धुन्धुमारोपाख्यानविषयक दो सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २०४ ।।
* यह मार्कण्डेयजीका युधिष्ठिरके प्रति द्वापरके समय कहा हुआ वचन है। उन्होंने त्रेतामें हुए कुम्भकर्णकी उपमा दी है।