महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१५१-
एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
श्रीहनुमान्जीका भीमसेनको आश्वासन और विदा देकर अन्तर्धान होना
वैशम्पायन उवाच
ततः संहृत्य विपुलं तद् वपुः कामतः कृतम् ।
भीमसेनं पुनर्दोर्भ्यां पर्यष्वजत वानरः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर अपनी इच्छासे बढ़ाये हुए उस विशाल शरीरका उपसंहार कर वानरराज हनुमान्जीने अपनी दोनों भुजाओंद्वारा भीमसेनको हृदयसे लगा लिया ॥ १ ॥
परिष्वक्तस्य तस्याशु भ्रात्रा भीमस्य भारत ।
श्रमो नाशमुपागच्छत् सर्वं चासीत् प्रदक्षिणम् ॥ २ ॥
भारत! भाईका आलिंगन प्राप्त होनेपर भीमसेनकी सारी थकावट तत्काल नष्ट हो गयी और सब कुछ उन्हें अनुकूल प्रतीत होने लगा ॥ २ ॥
बलं चातिबलो मेने न मेऽस्ति सदृशो महान् ।
ततः पुनरथोवाच पर्यश्रुनयनो हरिः ॥ ३ ॥
भीममाभाष्य सौहार्दाद् बाष्पगद्गदया गिरा ।
गच्छ वीर स्वमावासं स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे ॥ ४ ॥
अत्यन्त बलशाली भीमसेनको यह अनुभव हुआ कि मेरा बल बहुत बढ़ गया। अब मेरे समान दूसरा कोई महान् नहीं है। फिर हनुमान्जीने अपने नेत्रोंमें आँसू भरकर सौहार्दसे गद्गदवाणीद्वारा भीमसेनको सम्बोधित करके कहा—‘वीर! अब तुम अपने निवास-स्थानपर जाओ। बातचीतके प्रसंगमें कभी मेरा भी स्मरण करते रहना ॥ ३-४ ॥
इहस्थश्च कुरुश्रेष्ठ न निवेद्योऽस्मि कर्हिचित् ।
धनदस्यालयाच्चापि विसृष्टानां महाबल ।। ५ ।।
देशकाल इहायातुं देवगन्धर्वयोषिताम् ।
ममापि सफलं चक्षुः स्मारितश्चास्मि राघवम् ।। ६ ।।
रामाभिधानं विष्णुं हि जगद्धृदयनन्दनम् ।
सीतावक्त्रारविन्दार्कं दशास्यध्वान्तभास्करम् ।। ७ ।।
मानुषं गात्रसंस्पर्शं गत्वा भीम त्वया सह ।
तदस्मद्दर्शनं वीर कौन्तेयामोघमस्तु ते ।। ८ ।।
‘कुरुश्रेष्ठ! मैं इस स्थानपर रहता हूँ, यह बात कभी किसीसे न कहना। महाबली वीर! अब कुबेरके भवनसे भेजी हुई देवांगनाओं तथा गन्धर्व-सुन्दरीयोंके यहाँ आनेका समय हो गया है। भीम! तुम्हें देखकर मेरी भी आँखें सफल हो गयीं। तुम्हारे साथ मिलकर तुम्हारे मानवशरीरका स्पर्श करके मुझे उन भगवान् रामचन्द्रजीका स्मरण हो आया है, जो श्रीराम-नामसे प्रसिद्ध साक्षात् विष्णु हैं। जगत्के हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले, मिथिलेशनन्दिनी सीताके मुखारविन्दको विकसित करनेके लिये सूर्यके समान तेजस्वी तथा दशमुख रावणरूपी अन्धकारराशिको नष्ट करनेके लिये साक्षात् भुवन-भास्कररूप हैं। वीर कुन्तीकुमार! तुमने जो मेरा दर्शन किया है, वह व्यर्थ नहीं जाना चाहिये ।। ५—८ ।।
भ्रातृत्वं त्वं पुरस्कृत्य वरं वरय भारत ।
यदि तावन्मया क्षुद्रा गत्वा वारणसाह्वयम् ॥ ९ ॥
धार्तराष्ट्रा निहन्तव्या यावदेतत् करोम्यहम् ।
शिलया नगरं वापि मर्दितव्यं मया यदि ॥ १० ॥
बद्ध्वा दुर्योधनं चाद्य आनयामि तवान्तिकम् ।
यावदेतत् करोम्यद्य कामं तव महाबल ॥ ११ ॥
‘भारत! तुम मुझे अपना बड़ा भाई समझकर कोई वर माँगो। यदि तुम्हारी इच्छा हो कि मैं हस्तिनापुरमें जाकर तुच्छ धृतराष्ट्र-पुत्रोंको मार डालूँ तो मैं यह भी कर सकता हूँ अथवा यदि तुम चाहो कि मैं पत्थरोंकी वर्षासे सारे नगरको रौंदकर धूलमें मिला दूँ अथवा दुर्योधनको बाँधकर अभी तुम्हारे पास ला दूँ तो यह भी कर सकता हूँ। महाबली वीर! तुम्हारी जो इच्छा हो, वही पूर्ण कर दूँगा’ ।। ९—११ ।।
वैशम्पायन उवाच
भीमसेनस्तु तद् वाक्यं श्रुत्वा तस्य महात्मनः ।
प्रत्युवाच हनूमन्तं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ १२ ॥
कृतमेव त्वया सर्वं मम वानरपुङ्गव ।
स्वस्ति तेऽस्तु महाबाहो कामये त्वां प्रसीद मे ॥ १३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! महात्मा हनुमान्जीका यह वचन सुनकर भीमसेनने हर्षोल्लासपूर्ण हृदयसे हनुमान्जीको इस प्रकार उत्तर दिया—‘वानरशिरोमणे! आपने मेरा यह सब कार्य कर दिया। आपका कल्याण हो। महाबाहो! अब आपसे मेरी इतनी ही कामना है कि आप मुझपर प्रसन्न रहिये—मुझपर आपकी कृपा बनी रहे ।। १२-१३ ।।
सनाथाः पाण्डवाः सर्वे त्वया नाथेन वीर्यवन् ।
तवैव तेजसा सर्वान् विजेष्यामो वयं परान् ॥ १४ ॥
‘शक्तिशाली वीर! आप-जैसे नाथ (संरक्षक) को पाकर सब पाण्डव सनाथ हो गये। आपके ही प्रभावसे हमलोग अपने सब शत्रुओंको जीत लेंगे’ ।। १४ ।।
एवमुक्तस्तु हनुमान् भीमसेनमभाषत ।
भ्रातृत्वात् सौहृदाच्चैव करिष्यामि प्रियं तव ॥ १५ ॥
भीमसेनके ऐसा कहनेपर हनुमान्जीने उनसे कहा—‘तुम मेरे भाई और सुहृद् हो, इसलिये मैं तुम्हारा प्रिय अवश्य करूँगा’ ।। १५ ।।
चमूं विगाह्य शत्रूणां शरशक्तिसमाकुलाम् ।
यदा सिंहरवं वीर करिष्यसि महाबल ॥ १६ ॥
तदाहं बृंहयिष्यामि स्वरवेण रवं तव ।
विजयस्य ध्वजस्थश्च नादान् मोक्ष्यामि दारुणान् ॥ १७ ॥
शत्रूणां ये प्राणहराः सुखं येन हनिष्यथ ।
एवमाभाष्य हनुमांस्तदा पाण्डवनन्दनम् ॥ १८ ॥
मार्गमाख्याय भीमाय तत्रैवान्तरधीयत ॥ १९ ॥
‘महाबली वीर! जब तुम बाण और शक्तिके आघातसे व्याकुल हुई शत्रुओंकी सेनामें घुसकर सिंहनाद करोगे, उस समय मैं अपनी गर्जनासे तुम्हारे उस सिंहनादको और बढ़ा दूँगा। उसके सिवा अर्जुनकी ध्वजापर बैठकर मैं ऐसी भीषण गर्जना करूँगा, जो शत्रुओंके प्राणोंको हरनेवाली होगी, जिससे तुमलोग उन्हें सुगमतासे मार सकोगे।’ पाण्डवोंका आनन्द बढ़ानेवाले भीमसेनसे ऐसा कहकर हनुमान्जीने उन्हें जानेके लिये मार्ग बता दिया और स्वयं वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ १६—१९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे
हनुमद्भीमसंवादे एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादन पर्वतपर हनुमान्जी और भीमसेनका संवादविषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५१ ॥