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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पतिव्रता स्त्री तथा पिता-माताकी सेवाका माहात्म्य

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पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः

पतिव्रता स्त्री तथा पिता-माताकी सेवाका माहात्म्य

वैशम्पायन उवाच

ततो युधिष्ठिरो राजा मार्कण्डेयं महाद्युतिम् ।
पप्रच्छ भरतश्रेष्ठ धर्मप्रश्नं सुदुर्विदम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने महातेजस्वी मार्कण्डेय मुनिसे धर्मविषयक प्रश्न किया, जो समझनेमें अत्यन्त कठिन था ॥ १ ॥
श्रोतुमिच्छामि भगवन् स्त्रीणां माहात्म्यमुत्तमम् ।
कथ्यमानं त्वया विप्र सूक्ष्मं धर्म्यं च तत्त्वतः ॥ २ ॥
वे बोले—‘भगवन्! मैं आपके मुखसे (पतिव्रता) स्त्रियोंके सूक्ष्म, धर्मसम्मत एवं उत्तम माहात्म्यका यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥
प्रत्यक्षमिह विप्रर्षे देवा दृश्यन्ति सत्तम् ।
सूर्याचन्द्रमसौ वायुः पृथिवी वह्निरेव च ॥ ३ ॥
पिता माता च भगवन् गुरुरेव च सत्तम् ।
यच्चान्यद् देवविहितं तच्चापि भृगुनन्दन ॥ ४ ॥
‘भगवन्! श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! इस जगत्‌में सूर्य, चन्द्रमा, वायु, पृथिवी, अग्नि, पिता, माता और गुरु—ये प्रत्यक्ष देवता दिखायी देते हैं। भृगुनन्दन! इसके सिवा अन्य जो देवतारूपसे स्थापित देवविग्रह हैं, वे भी प्रत्यक्ष देवताओंकी ही कोटिमें हैं’ ॥ ३-४ ॥
मान्या हि गुरवः सर्वे एकपत्न्यस्तथा स्त्रियः ।
पतिव्रतानां शुश्रूषा दुष्करा प्रतिभाति मे ॥ ५ ॥
‘समस्त गुरुजन और पतिव्रता नारियाँ भी समादरके योग्य हैं। पतिव्रता स्त्रियाँ अपने पतिकी जैसी सेवा-शुश्रूषा करती हैं; वह दूसरे किसीके लिये मुझे अत्यन्त कठिन प्रतीत होती है ॥ ५ ॥
पतिव्रतानां माहात्म्यं वक्तुमर्हसि नः प्रभो ।
निरुद्ध्य चेन्द्रियग्रामं मनः संरुध्य चानघ ॥ ६ ॥
पतिं दैवतवच्चापि चिन्तयन्त्यः स्थिता हि याः ।
भगवन् दुष्करं त्वेतत् प्रतिभाति मम प्रभो ॥ ७ ॥
‘प्रभो! आप अब हमें पतिव्रता स्त्रियोंकी महिमा सुनावें। निष्पाप सहर्ष! जो अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखती हुई मनको वशमें करके अपने पतिका देवताके समान ही चिन्तन करती रहती हैं, वे नारियाँ धन्य हैं। प्रभो! भगवन्! उनका वह त्याग और सेवाभाव मुझे तो अत्यन्त कठिन जान पड़ता है ॥ ६-७ ॥

मातापित्रोश्च शुश्रूषा स्त्रीणां भर्तरि च द्विज ।
स्त्रीणां धर्मात् सुघोराद्धि नान्यं पश्यामि दुष्करम् ॥ ८ ॥
‘ब्रह्मन्! पुत्रोंद्वारा माता-पिताकी सेवा तथा स्त्रियोंद्वारा की हुई पतिकी सेवा बहुत कठिन है। स्त्रियोंके इस कठोर धर्मसे बढ़कर और कोई दुष्कर कार्य मुझे नहीं दिखायी देता है॥ ८॥
साध्वाचाराः स्त्रियो ब्रह्मन् यत् कुर्वन्ति सदाऽऽदृताः ।
दुष्करं खलु कुर्वन्ति पितरं मातरं च वै ॥ ९ ॥
एकपत्न्यश्च या नार्यो याश्च सत्यं वदन्त्युत ।
‘ब्रह्मन्! समाजमें सदा आदर पानेवाली सदाचारिणी स्त्रियाँ जो महान् कार्य करती हैं वह अत्यन्त कठिन है। जो लोग पिता-माताकी सेवा करते हैं उनका कर्म भी बहुत कठिन है। पतिव्रता तथा सत्यवादिनी स्त्रियाँ अत्यन्त कठोर धर्मका पालन करती हैं ॥ ९ १/२ ॥
कुक्षिणा दश मासांश्च गर्भं संधारयन्ति याः ॥ १० ॥
नार्यः कालेन सम्भूय किमद्भुततरं ततः ।
‘स्त्रियाँ अपने उदरमें दस महीनेतक जो गर्भ धारण करती हैं और यथासमय उसको जन्म देती हैं, इससे अद्भुत कार्य और कौन होगा? ॥ १० १/२ ॥
संशयं परमं प्राप्य वेदनामतुलामपि ॥ ११ ॥
प्रजायते सुतान् नार्यो दुःखेन महता विभो ।
पुष्णन्ति चापि महता स्नेहेन द्विजपुङ्गव ॥ १२ ॥
‘भगवन्! अपनेको भारी प्राणसंकटमें डालकर और अतुल वेदनाको सहकर नारियाँ बड़े कष्टसे संतान उत्पन्न करती हैं! विप्रवर! फिर बड़े स्नेहसे उनका पालन भी करती हैं॥ ११-१२॥
याश्च क्रूरेषु सत्त्वेषु वर्तमाना जुगुप्सिताः ।
स्वकर्म कुर्वन्ति सदा दुष्करं तच्च मे मतम् ॥ १३ ॥
‘जो सती-साध्वी स्त्रियाँ क्रूर स्वभावके पतियोंकी सेवामें रहकर उनके तिरस्कारका पात्र बनकर भी सदा अपने सती-धर्मका पालन करती रहती हैं, वह तो मुझे और भी अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है॥ १३॥
क्षत्रधर्मसमाचारतत्त्वं व्याख्याहि मे द्विज ।
धर्मः सुदुर्लभो विप्र नृशंसेन महात्मनाम् ॥ १४ ॥
‘ब्रह्मन्! आप मुझे क्षत्रियोंके धर्म और आचारका तत्त्व भी विस्तारपूर्वक बताइये। विप्रवर! जो क्रूर स्वभावके मनुष्य हैं, उनके लिये महात्माओंका धर्म अत्यन्त दुर्लभ है॥ १४॥
एतदिच्छामि भगवन् प्रश्नं प्रश्नविदां वर ।
श्रोतुं भृगुकुलश्रेष्ठ शुश्रूषे तव सुव्रत ॥ १५ ॥

भगवन्! भृगुकुलशिरोमणे! आप उत्तम व्रतके पालक और प्रश्नका समाधान करनेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ हैं। मैंने जो प्रश्न आपके सम्मुख उपस्थित किया है, उसीका उत्तर मैं आपसे सुनना चाहता हूँ' ॥ १५ ॥

मार्कण्डेय उवाच

हन्त तेऽहं समाख्यास्ये प्रश्नमेतं सुदुर्वचम् ।
तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ गदतस्तन्निबोध मे ॥ १६ ॥
मार्कण्डेयजी बोले— भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे इस प्रश्नका विवेचन करना यद्यपि बहुत कठिन है, तो भी मैं अब इसका यथावत् समाधान करूँगा। तुम मेरे मुखसे सुनो ॥ १६ ॥

मातृस्तु गौरवादन्ये पितृनन्ये तु मेनिरे ।
दुष्करं कुरुते माता विवर्धयति या प्रजाः ॥ १७ ॥
कुछ लोग माताओंको गौरवकी दृष्टिसे बड़ी मानते हैं। दूसरे लोग पिताको महत्त्व देते हैं। परंतु माता जो अपनी संतानोंको पाल-पोसकर बड़ा बनाती है, वह उसका कठिन कार्य है ॥ १७ ॥

तपसा देवतेज्याभिवन्दनेन तितिक्षया ।
सुप्रशस्तैरुपायैश्चापीहन्ते पितरः सुतान् ॥ १८ ॥
माता-पिता तपस्या, देवपूजा, वन्दना, तितिक्षा तथा अन्य श्रेष्ठ उपायोंद्वारा भी पुत्रोंको प्राप्त करना चाहते हैं ॥ १८ ॥

एवं कृच्छ्रेण महता पुत्रं प्राप्य सुदुर्लभम् ।
चिन्तयन्ति सदा वीर कीदृशोऽयं भविष्यति ॥ १९ ॥
वीर! इस प्रकार बड़ी कठिनाईसे परम दुर्लभ पुत्रको पाकर लोग सदा इस चिन्तामें डूबे रहते हैं कि न जाने यह किस तरहका होगा ॥ १९ ॥

आशंसते हि पुत्रेषु पिता माता च भारत ।
यशः कीर्तिमथैश्वर्यं प्रजा धर्मं तथैव च ॥ २० ॥
भारत! पिता और माता अपने पुत्रोंके लिये यश, कीर्ति और ऐश्वर्य, संतान तथा धर्मकी शुभकामना करते हैं ॥ २० ॥

तयोराशां तु सफलां यः करोति स धर्मवित् ।
पिता माता च राजेन्द्र तुष्यतो यस्य नित्यशः ॥ २१ ॥
इह प्रेत्य च तस्याथ कीर्तिर्धर्मश्च शाश्वतः ।
राजेन्द्र! जो उन दोनोंकी आशाको सफल करता है, वही पुत्र धर्मज्ञ है। जिसके माता-पिता उससे सदा संतुष्ट रहते हैं, उसे इहलोक और परलोकमें भी अक्षय कीर्ति और शाश्वत धर्मकी प्राप्ति होती है ॥ २११/२ ॥

नैव यज्ञक्रियाः काश्चिन्न श्राद्धं नोपवासकम् ॥ २२ ॥

या तु भर्तरि शुश्रूषा तया स्वर्गं जयत्युत ।
नारीके लिये किसी यज्ञकर्म, श्राद्ध और उपवासकी आवश्यकता नहीं है। वह जो पतिकी सेवा करती है, उसीके द्वारा स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त कर लेती है ॥
एतत् प्रकरणं राजन्नधिकृत्य युधिष्ठिर ॥ २३ ॥
पतिव्रतानां नियतं धर्मं चावहितः शृणु ॥ २४ ॥
राजा युधिष्ठिर! इसी प्रकरणमें पतिव्रताओंके नियत धर्मका वर्णन किया जायगा। तुम सावधान होकर सुनो ॥ २३-२४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि पतिव्रतोपाख्याने पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें पतिव्रतोपाख्यानविषयक दो सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०५ ॥