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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

धौम्यद्वारा उत्तर दिशाके तीर्थोंका वर्णन

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नवतितमोऽध्यायः

धौम्यद्वारा उत्तर दिशाके तीर्थोंका वर्णन

धौम्य उवाच

उदीच्यां राजशार्दूल दिशि पुण्यानि यानि वै ।
तानि ते कीर्तयिष्यामि पुण्यान्यायतनानि च ॥ १ ॥
शृणुष्वावहितो भूत्वा मम मन्त्रयतः प्रभो ।
कथाप्रतिग्रहो वीर श्रद्धां जनयते शुभाम् ॥ २ ॥
धौम्यजी कहते हैं—नृपश्रेष्ठ! उत्तर दिशामें जो पुण्यप्रद तीर्थ और देवालय आदि हैं, उनका तुमसे वर्णन करता हूँ। प्रभो! तुम सावधान होकर वह सब मेरे मुखसे सुनो। वीरवर! तीर्थोंकी कथाका प्रसंग उनके प्रति मंगलमयी श्रद्धा उत्पन्न करता है ॥ १-२ ॥

सरस्वती महापुण्या ह्रदिनी तीर्थमालिनी ।
समुद्रगा महावेगा यमुना यत्र पाण्डव ॥ ३ ॥
तीर्थोंकी पंक्तिसे सुशोभित सरस्वती नदी बड़ी पुण्यदायिनी है। पाण्डुनन्दन! समुद्रमें मिलनेवाली महावेगशालिनी यमुना भी उत्तर दिशामें ही हैं ॥ ३ ॥

यत्र पुण्यतरं तीर्थं प्लक्षावतरणं शुभम् ।
यत्र सारस्वतैरिष्ट्वा गच्छन्त्यवभृथैर्द्विजाः ॥ ४ ॥
उधर ही अत्यन्त पुण्यमय प्लक्षावतरण नामक मंगलकारक तीर्थ है; जहाँ ब्राह्मणगण यज्ञ करके सरस्वतीके जलसे अवभृथस्नान करते और अपने स्थानको जाते हैं ॥ ४ ॥

पुण्यं चाख्यायते दिव्यं शिवमग्निशिरोऽनघ ।
सहदेवोऽयजद् यत्र शम्याक्षेपेण भारत ॥ ५ ॥
उधर ही अग्निशिर नामक दिव्य, कल्याणमय, पुण्यतीर्थ बताया जाता है। निष्पाप भरतनन्दन! उसी तीर्थमें सहदेवने शमीका डंडा फेंकवाकर, जितनी दूरीमें वह डंडा पड़ा था उतनी दूरीमें, मण्डप बनवाकर उसमें यज्ञ किया ॥ ५ ॥

एतस्मिन्नेव चार्थेऽसाविन्द्रगीता युधिष्ठिर ।
गाथा चरति लोकेऽस्मिन् गीयमाना द्विजातिभिः ॥ ६ ॥
युधिष्ठिर! इसी विषयमें इन्द्रकी गायी हुई एक गाथा लोकमें प्रचलित है, जिसे ब्राह्मण गाया करते हैं ॥ ६ ॥

अग्नयः सहदेवेन सेविता यमुनामनु ।
ते तस्य कुरुशार्दूल सहस्रशतदक्षिणाः ॥ ७ ॥

कुरुश्रेष्ठ! सहदेवने यमुना-तटपर लाख स्वर्ण-मुद्राओंकी दक्षिणा देकर अग्निकी उपासना की थी*॥ ७ ॥
तत्रैव भरतो राजा चक्रवर्ती महायशाः ।
विंशतिः सप्त चाष्टौ च हयमेधानुपाहरत् ॥ ८ ॥
वहीं महायशस्वी चक्रवर्ती राजा भरतने पैंतीस अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान किया ॥ ८ ॥
कामकृद् यो द्विजातीनां श्रुतस्तात यथा पुरा ।
अत्यन्तमाश्रमः पुण्यः शरभंगस्य विश्रुतः ॥ ९ ॥
तात! प्राचीनकालमें राजा भरत ब्राह्मणोंकी मनोवाञ्छाको पूर्ण करनेवाला राजा सुना गया है। उत्तराखण्डमें ही महर्षि शरभङ्गका अत्यन्त पुण्यदायक आश्रम विख्यात है ॥ ९ ॥
सरस्वती नदी सद्भिः सततं पार्थ पूजिता ।
बालखिल्यैर्महाराज यत्रेष्टमृषिभिः पुरा ॥ १० ॥
कुन्तीनन्दन! साधु पुरुषोंने सरस्वती नदीकी सदा उपासना की है। महाराज! पूर्वकालमें बालखिल्य ऋषियोंने वहाँ यज्ञ किया था ॥ १० ॥
दृषद्वती महापुण्या यत्र ख्याता युधिष्ठिर ।
न्यग्रोधाख्यस्तु पुण्याख्यः पाञ्चाल्यो द्विपदां वर ॥ ११ ॥
दाल्भ्यघोषश्च दाल्भ्यश्च धरणीस्थो महात्मनः ।
कौन्तेयानन्तयशसः सुव्रतस्यामितौजसः ॥ १२ ॥
आश्रमः ख्यायते पुण्यस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।
युधिष्ठिर! परम पुण्यमयी दृषद्वती नदी भी उधर ही बतायी गयी है। मनुष्योंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! वहीं न्यग्रोध, पुण्य, पाञ्चाल्य, दाल्भ्यघोष और दाल्भ्य—ये पाँच आश्रम हैं तथा अनन्तकीर्ति एवं अमिततेजस्वी महात्मा सुव्रतका पुण्य आश्रम भी उत्तराखण्डमें ही बताया जाता है, जो पृथ्वीपर रहकर भी तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥
एतावर्णविवर्णौ च विश्रुतौ मनुजाधिप ॥ १३ ॥
नरेश्वर! उत्तराखण्डमें ही विख्यात मुनि नर और नारायण हैं, जो एतावर्ण (श्यामवर्ण—साकार) होते हुए भी वास्तवमें अवर्ण (निराकार) ही हैं ॥ १३ ॥
वेदज्ञौ वेदविद्वांसौ वेदविद्याविदावुभौ ।
ईजाते क्रतुभिर्मुख्यैः पुण्यैर्भरतसत्तम ॥ १४ ॥
भरतश्रेष्ठ! ये दोनों मुनि वेदज्ञ, वेदके मर्मज्ञ तथा वेदविद्याके पूर्ण जानकार हैं। इन्होंने पुण्यदायक उत्तम यज्ञोंद्वारा शंकरका यजन किया है ॥ १४ ॥
समेत्य बहुशो देवाः सेन्द्राः सवरुणाः पुरा ।
विशाखयूपेऽतप्यन्त तेन पुण्यतमश्च सः ॥ १५ ॥
पूर्वकालमें इन्द्र, वरुण आदि बहुत-से देवताओंने मिलकर विशाखयूप नामक स्थानमें तप किया था, अतः वह अत्यन्त पुण्यप्रद स्थान है ॥ १५ ॥

ऋषिर्महान् महाभागो जमदग्निर्महायशाः ।
पलाशकेषु पुण्येषु रम्येष्वयजत प्रभुः ॥ १६ ॥
महाभाग, महायशस्वी और महाप्रभावशाली महर्षि जमदग्निने परम सुन्दर तथा पुण्यप्रद पलाशवनमें यज्ञ किया था ॥ १६ ॥

यत्र सर्वाः सरिच्छ्रेष्ठाः साक्षात् तमृषिसत्तमम् ।
स्वं स्वं तोयमुपादाय परिवार्योपतस्थिरे ॥ १७ ॥
जिसमें सब श्रेष्ठ नदियाँ मूर्तिमती हो अपना-अपना जल लेकर उन मुनिश्रेष्ठके पास आयीं और उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़ी हुई थीं ॥ १७ ॥

अपि चात्र महाराज स्वयं विश्वावसुर्जगौ ।
इमं श्लोकं तदा वीर प्रेक्ष्य दीक्षां महात्मनः ॥ १८ ॥
वीर महाराज! यहाँ महात्मा जमदग्निकी वह यज्ञदीक्षा देखकर स्वयं गन्धर्वराज विश्वावसुने इस श्लोकका गान किया था ॥ १८ ॥

यजमानस्य वै देवाञ्जमदग्नेर्महात्मनः ।
आगम्य सरितो विप्रान् मधुना समतर्पयन् ॥ १९ ॥
‘महात्मा जमदग्नि जब यज्ञद्वारा देवताओंका यजन कर रहे थे, उस समय उनके यज्ञमें सरिताओंने आकर मधुसे ब्राह्मणोंको तृप्त किया’ ॥ १९ ॥

गन्धर्वयक्षरक्षोभिरप्सरोभिश्च सेवितम् ।
किरातकिन्नरावासं शैलं शिखरिणां वरम् ॥ २० ॥
बिभेद तरसा गङ्गा गङ्गाद्वारं युधिष्ठिर ।
पुण्यं तत् ख्यायते राजन् ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ २१ ॥
युधिष्ठिर! गिरिश्रेष्ठ हिमालय किरातों और किन्नरोंका निवासस्थान है। गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और अप्सराएँ उसका सदा सेवन करती हैं। गङ्गाजी अपने वेगसे उस शैलराजको फोड़कर जहाँ प्रकट हुई हैं, वह पुण्यस्थान गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-के नामसे विख्यात है। राजन्! उस तीर्थका ब्रह्मर्षिगण सदा सेवन करते हैं ॥ २०-२१ ॥

सनत्कुमारः कौरव्य पुण्यं कनखलं तथा ।
पर्वतश्च पुरुर्नाम यत्र यातः पुरूरवाः ॥ २२ ॥
कुरुनन्दन! पुण्यमय कनखलमें पहले सनत्कुमारने यात्रा की थी। वहीं पुरु नामसे प्रसिद्ध पर्वत है, जहाँ पूर्वकालमें पुरूरवाने यात्रा की थी ॥ २२ ॥

भृगुर्यत्र तपस्तेपे महर्षिगणसेविते ।
राजन् स आश्रमः ख्यातो भृगुतुङ्गो महागिरिः ॥ २३ ॥
राजन्! महर्षियोंसे सेवित जिस महान् पर्वतपर भृगुने तपस्या की थी वह भृगुतुंग आश्रमके नामसे विख्यात है ॥ २३ ॥

यः स भूतं भविष्यच्च भवच्च भरतर्षभ ।

नारायणः प्रभुर्विष्णुः शाश्वतः पुरुषोत्तमः ॥ २४ ॥
तस्यातियशसः पुण्यां विशालां बदरीमनु ।
आश्रमः ख्यायते पुण्यस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥ २५ ॥
भरतश्रेष्ठ! भूत, भविष्य और वर्तमान जिनका स्वरूप है, जो सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी, सनातन एवं पुरुषोत्तम नारायण हैं उन अत्यन्त यशस्वी श्रीहरिकी पुण्यमयी विशालापुरी बदरीवनके निकट है। वह नर-नारायणका आश्रम कहा गया है, वह पुण्यप्रद बदरिकाश्रम तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥ २४-२५ ॥

उष्णतोयवहा गङ्गा शीततोयवहा पुरा ।
सुवर्णसिकता राजन् विशालां बदरीमनु ॥ २६ ॥
राजन्! पूर्वकालसे ही विशाला बदरीके समीप गंगा कहीं गरम जल तथा कहीं शीतल जल प्रवाहित करती हैं। उनकी बालू सुवर्णकी भाँति चमकती रहती है ॥ २६ ॥

ऋषयो यत्र देवाश्च महाभागा महौजसः ।
प्राप्य नित्यं नमस्यन्ति देवं नारायणं प्रभुम् ॥ २७ ॥
यत्र नारायणो देवः परमात्मा सनातनः ।
तत्र कृत्स्नं जगत् सर्वं तीर्थान्यायतनानि च ॥ २८ ॥
वहाँ महाभाग एवं महातेजस्वी देवता तथा महर्षि प्रतिदिन जाकर अमित प्रभावशाली भगवान् नारायणको नमस्कार करते हैं। जहाँ सनातन परमात्मा भगवान् नारायण विराजमान हैं वहाँ सम्पूर्ण जगत् है और समस्त तीर्थ तथा देवालय हैं ॥ २७-२८ ॥

तत् पुण्यं परमं ब्रह्म तत् तीर्थं तत् तपोवनम् ।
तत् परं परमं देवं भूतानां परमेश्वरम् ॥ २९ ॥
वह बदरिकाश्रम पुण्यक्षेत्र और परब्रह्मस्वरूप है। वही तीर्थ है, वही तपोवन है, वही सम्पूर्ण भूतोंका परमदेव परमेश्वर है ॥ २९ ॥

शाश्वतं परमं चैव धातारं परमं पदम् ।
यं विदित्वा न शोचन्ति विद्वांसः शास्त्रदृष्टयः ॥ ३० ॥
तत्र देवर्षयः सिद्धाः सर्वे चैव तपोधनाः ।
वही सनातन परमधाता एवं परमपद है, जिसे जान लेनेपर शास्त्रदर्शी विद्वान् कभी शोक नहीं करते हैं। वहीं देवर्षि सिद्ध और समस्त तपोधन महात्मा निवास करते हैं ॥ ३० १/२ ॥

आदिदेवो महायोगी यत्रास्ते मधुसूदनः ॥ ३१ ॥
पुण्यानामपि तत् पुण्यमत्र ते संशयोऽस्तु मा ।
एतानि राजन् पुण्यानि पृथिव्यां पृथिवीपते ॥ ३२ ॥
कीर्तितानि नरश्रेष्ठ तीर्थान्यायतनानि च ।
एतानि वसुभिः साध्यैरादित्यैर्मरुदश्विभिः ॥ ३३ ॥

ऋषिभिर्देवकल्पैश्च सेवितानि महात्मभिः ।
चरन्नेतानि कौन्तेय सहितो ब्राह्मणर्षभैः ।
भ्रातृभिश्च महाभागैरुत्कण्ठां विहरिष्यसि ॥ ३४ ॥

जहाँ महायोगी आदिदेव भगवान् मधुसूदन विराजमान हैं वह स्थान पुण्योंका भी पुण्य है। इस विषयमें तुम्हें संशय नहीं होना चाहिये। राजन्! पृथ्वीपते! नरश्रेष्ठ! ये भूमण्डलके पुण्यतीर्थ और आश्रम आदि कहे गये वसु, साध्य, आदित्य, मरुद्गण, अश्विनीकुमार तथा देवोपम महात्मा मुनि इन सब तीर्थोंका सेवन करते हैं। कुन्तीनन्दन! तुम श्रेष्ठ ब्राह्मणों और महान् सौभाग्यशाली भाइयोंके साथ इन तीर्थोंमें विचरते रहोगे तो अर्जुनके लिये तुम्हारी मिलनेकी उत्कट इच्छा अर्थात् विरहव्याकुलता शान्त हो जायगी ॥ ३१—३४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें धौम्यतीर्थयात्राविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९० ॥


* ये सहदेव सुप्रसिद्ध राजा सृंजयके पुत्र थे—‘सहदेवः सृंजयपुत्रः’ इति नीलकण्ठी।