महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना
पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना
मार्कण्डेय उवाच
गुरुं निवेद्य विप्राय तौ मातापितरावुभौ ।
पुनरेव स धर्मात्मा व्याधो ब्राह्मणमब्रवीत् ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! इस प्रकार धर्मात्मा व्याधने कौशिक ब्राह्मणको अपने माता-पितारूप दोनों गुरुजनोंका दर्शन कराकर पुनः उससे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
प्रवृत्तचक्षुर्जातोऽस्मि सम्पश्य तपसो बलम् ।
यदर्थमुक्तोऽसि तया गच्छ त्वं मिथिलामिति ॥ २ ॥
पतिशुश्रूषपरया दान्तया सत्यशीलया ।
मिथिलायां वसेद् व्याधः स ते धर्मान् प्रवक्ष्यति ॥ ३ ॥
'ब्राह्मण!' माता-पिताकी सेवा ही मेरी तपस्या है। इस तपस्याका प्रभाव देखिये। मुझे दिव्य-दृष्टि प्राप्त हो गयी है, जिसके कारण उस पतिव्रता देवीने जो सदा पतिकी ही सेवामें संलग्न रहनेवाली, जितेन्द्रिय तथा सत्य एवं सदाचारमें तत्पर है, आपको यह कहकर यहाँ भेजा था कि 'आप मिथिलापुरीको जाइये। वहाँ एक व्याध रहता है। वह आपको सब धर्मोंका उपदेश करेगा' ॥ २-३ ॥
ब्राह्मण उवाच
पतिव्रतायाः सत्यायाः शीलाढ्याया यतव्रत ।
संस्मृत्य वाक्यं धर्मज्ञ गुणवानसि मे मतः ॥ ४ ॥
**ब्राह्मण बोला—**उत्तम व्रतका पालन करनेवाले धर्मज्ञ व्याध! उस सत्यपरायणा और सुशीला पतिव्रता-देवीके वचनोंका स्मरण करके मुझे यह दृढ़ विश्वास हो गया है कि तुम उत्तम गुणोंसे सम्पन्न हो ॥ ४ ॥
व्याध उवाच
यत् तदा त्वं द्विजश्रेष्ठ तयोक्तो मां प्रति प्रभो ।
दृष्टमेव तया सम्यगेकपत्नया न संशयः ॥ ५ ॥
**धर्मव्याधने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! प्रभो! उस पतिव्रता देवीने पहले आपसे मेरे विषयमें जो कुछ कहा है, वह सब ठीक है। इसमें संदेह नहीं कि उसने पातिव्रत्यके प्रभावसे सब कुछ प्रत्यक्ष देखा है॥ ५॥
त्वदनुग्रहबुद्ध्या तु विप्रैतद् दर्शितं मया।
वाक्यं च शृणु मे तात यत् ते वक्ष्ये हितं द्विज॥ ६॥
विप्रवर! आपपर अनुग्रह करनेके विचारसे ही मैंने ये सब बातें आपके सामने रखी हैं। तात! आप मेरी बात सुनिये। ब्रह्मन्! आपके लिये जो हितकर है वही बात बताऊँगा॥ ६॥
त्वया विनिकृता माता पिता च द्विजसत्तम।
अनिसृष्टोऽसि निष्क्रान्तो गृहात् ताभ्यामनिन्दित॥ ७॥
वेदोच्चारणकार्यार्थमयुक्तं तत् त्वया कृतम्।
तव शोकेन वृद्धौ तावन्धीभूतौ तपस्विनौ॥ ८॥
द्विजश्रेष्ठ! आपने माता-पिताकी उपेक्षा की है। वेदाध्ययन करनेके लिये उन दोनोंकी आज्ञा लिये बिना ही आप घरसे निकल पड़े हैं। अनिन्द्य ब्राह्मण! यह आपके द्वारा अनुचित कार्य हुआ है। आपके शोकसे ये दोनों बूढ़े एवं तपस्वी माता-पिता अन्धे हो गये हैं॥
तौ प्रसादयितुं गच्छ मा त्वां धर्मोऽत्यगादयम्।
तपस्वी त्वं महात्मा च धर्मे च निरतः सदा॥ ९॥
आप उन्हें प्रसन्न करनेके लिये घर जाइये। ऐसा करनेसे आपका धर्म नष्ट नहीं होगा। आप तपस्वी, महात्मा तथा निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं॥ ९॥
सर्वमेतदपार्थं ते क्षिप्रं तौ सम्प्रसादय।
श्रद्धध्व मम ब्रह्मन् नान्यथा कर्तुमर्हसि।
गम्यतामद्य विप्रर्षे श्रेयस्ते कथयाम्यहम्॥ १०॥
परंतु माता-पिताको संतुष्ट न करनेके कारण आपका यह सारा धर्म और व्रत व्यर्थ हो गया है। अतः शीघ्र जाकर उन दोनोंको प्रसन्न कीजिये। ब्रह्मन्! मेरी बातपर श्रद्धा कीजिये। इसके विपरीत कुछ न कीजिये। ब्रह्मर्षे! आप अपने घर जाइये और माता-पिताकी सेवा कीजिये। यह मैं आपके लिये परम कल्याणकी बात बता रहा हूँ॥ १०॥
ब्राह्मण उवाच
यदेतदुक्तं भवता सर्वं सत्यमसंशयम्।
प्रीतोऽस्मि तव भद्रं ते धर्माचारगुणान्वित॥ ११॥
**ब्राह्मण बोला—**धर्म, सदाचार और सद्गुणोंसे सम्पन्न व्याध! आपका भला हो। आपने यह जो कुछ बताया है, सब निःसंदेह सत्य है। मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ॥ ११॥
व्याध उवाच
दैवतप्रतिमो हि त्वं यस्त्वं धर्ममनुव्रतः ।
पुराणं शाश्वतं दिव्यं दुष्प्राप्यमकृतात्मभिः ॥ १२ ॥
**धर्मव्याधने कहा—**विप्रवर! आप देवताओंके समान हैं; क्योंकि आपने उस धर्ममें मन लगाया है, जो पुरातन, सनातन, दिव्य तथा मनको न जीतनेवाले पुरुषोंके लिये दुर्लभ है ॥ १२ ॥
मातापित्रोः सकाशं हि गत्वा त्वं द्विजसत्तम ।
अतन्द्रितः कुरु क्षिप्रं मातापित्रोर्हि पूजनम् ।
अतः परमहं धर्मं नान्यं पश्यामि कंचन ॥ १३ ॥
द्विजश्रेष्ठ! आप माता-पिताके पास जाकर आलस्यरहित हो शीघ्र ही उनकी सेवामें लग जाइये। मैं इससे बढ़कर और कोई धर्म नहीं देखता ॥ १३ ॥
ब्राह्मण उवाच
इहाहमागतो दिष्ट्या दिष्ट्या मे सङ्गतं त्वया ।
ईदृशा दुर्लभा लोके नरा धर्मप्रदर्शकाः ॥ १४ ॥
**ब्राह्मण बोला—**नरश्रेष्ठ! मेरा बड़ा भाग्य था, जो यहाँ आया और सौभाग्यसे ही मुझे आपका संग प्राप्त हो गया। संसारमें आप-जैसे धर्मका मार्ग दिखानेवाले मनुष्य दुर्लभ हैं ॥ १४ ॥
एको नरसहस्रेषु धर्मविद् विद्यते न वा ।
प्रीतोऽस्मि तव सत्येन भद्रं ते पुरुषर्षभ ॥ १५ ॥
हजारों मनुष्योंमेंसे कोई एक भी धर्मके तत्त्वको जाननेवाला है या नहीं—यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। पुरुषर्षभ! आपका कल्याण हो। आज मैं आपके सत्यके कारण आपपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ १५ ॥
पतमानोऽद्य नरके भवतास्मि समुद्धृतः ।
भवितव्यमथैवं च यद् दृष्टोऽसि मयानघ ॥ १६ ॥
अनघ! मैं नरकमें गिर रहा था। आज आपने मेरा उद्धार कर दिया। इस प्रकार जब मुझे आपका दर्शन मिल गया, तब निश्चय ही आपके उपदेशके अनुसार भविष्यमें सब कुछ होगा ॥ १६ ॥
राजा ययातिर्दौहित्रैः पतितस्तारितो यथा ।
सद्भिः पुरुषशार्दूल तथाहं भवता द्विजः ॥ १७ ॥
राजा ययाति स्वर्गसे गिर गये थे; परंतु उनके उत्तम स्वभाववाले दौहित्रों (पुत्रीके पुत्रों)-ने पुनः उनका उद्धार कर दिया—वे पूर्ववत् स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित हो गये। पुरुषसिंह! इसी प्रकार आपने भी आज मुझ ब्राह्मणको नरकमें गिरनेसे बचाया है ॥ १७ ॥
मातापितृभ्यां शुश्रूषां करिष्ये वचनात् तव ।
नाकृतात्मा वेदयति धर्माधर्मविनिश्चयम् ॥ १८ ॥
मैं आपके कहनेके अनुसार माता-पिताकी सेवा करूँगा। जिसका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है, वह धर्म-अधर्मके निर्णयको बतला नहीं सकता ॥ १८ ॥
दुर्ज्ञेयः शाश्वतो धर्मः शूद्रयोनौ हि वर्तते ।
न त्वां शूद्रमहं मन्ये भवितव्यं हि कारणम् ॥ १९ ॥
आश्चर्य है कि यह सनातन धर्म, जिसके स्वरूपको समझना अत्यन्त कठिन है, शूद्रयोनिके मनुष्यमें भी विद्यमान है। मैं आपको शूद्र नहीं मानता। आपका जो शूद्रयोनिमें जन्म हो गया है, इसका कोई विशेष कारण होना चाहिये ॥ १९ ॥
येन कर्मविशेषेण प्राप्तेयं शूद्रता त्वया ।
एतदिच्छामि विज्ञातुं तत्त्वेन हि महामते ।
कामया ब्रूहि मे सर्वं सत्येन प्रयतात्मना ॥ २० ॥
महामते! जिस विशेष कर्मके कारण आपको यह शूद्रयोनि प्राप्त हुई है, उसे मैं यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ। आप सत्य और पवित्र अन्तःकरणके विश्वासके अनुसार स्वेच्छापूर्वक मुझे सब कुछ बताइये ॥ २० ॥
व्याध उवाच
अनतिक्रमणीया वै ब्राह्मणा मे द्विजोत्तम ।
शृणु सर्वमिदं वृत्तं पूर्वदेहे ममानघ ॥ २१ ॥
**धर्मव्याधने कहा—**विप्रवर! मुझे ब्राह्मणोंका अपराध कभी नहीं करना चाहिये। अनघ! मेरे पूर्वजन्मके शरीरद्वारा जो घटना घटित हुई है, वह सब बताता हूँ, सुनिये ॥ २१ ॥
अहं हि ब्राह्मणः पूर्वमासं द्विजवरात्मजः ।
वेदाध्यायी सुकुशलो वेदाङ्गानां च पारगः ॥ २२ ॥
मैं पूर्वजन्ममें एक श्रेष्ठ ब्राह्मणका पुत्र और वेदाध्ययनपरायण ब्राह्मण था। वेदांगोंका पारंगत विद्वान् माना जाता था। मैं विद्याध्ययनमें अत्यन्त कुशल था ॥
आत्मदोषकृतैर्ब्रह्मन्नवस्थामाप्तवानिमाम् ।
कश्चिद् राजा मम सखा धनुर्वेदपरायणः ॥ २३ ॥
संसर्गाद् धनुषि श्रेष्ठस्ततोऽहमभवं द्विज ।
ब्राह्मण! अपने ही दोषोंके कारण मुझे इस दुरवस्थामें आना पड़ा है। पूर्वजन्ममें जब मैं ब्राह्मण था, एक धनुर्वेद-परायण राजाके साथ मेरी मित्रता हो गयी थी। उनके संसर्गसे मैं धनुर्वेदकी शिक्षा लेने लगा और धनुष चलानेकी कलामें मैंने श्रेष्ठ योग्यता प्राप्त कर ली ॥ २३ १/२ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु मृगयां निर्गतो नृपः ॥ २४ ॥
सहितो योधमुख्यैश्च मन्त्रिभिश्च सुसंवृतः ।
ततोऽभ्यहन् मृगांस्तत्र सुबहूनाश्रमं प्रति ॥ २५ ॥
ब्रह्मन्! इसी समय राजा अपने मन्त्रियों तथा प्रधान योद्धाओंके साथ शिकार खेलनेके लिये निकले। उन्होंने एक ऋषिके आश्रमके निकट बहुत-से हिंसक पशुओंका वध किया ॥ २४-२५ ॥
अथ क्षिप्तः शरो घोरो मयापि द्विजसत्तम ।
ताडितश्च ऋषिस्तेन शरेणानतपर्वणा ॥ २६ ॥
द्विजश्रेष्ठ! तदनन्तर मैंने भी एक भयानक बाण छोड़ा। उसकी गाँठ कुछ झुकी हुई थी। उस बाणसे एक ऋषि मारे गये ॥ २६ ॥
भूमौ निपतितो ब्रह्मन्नुवाच प्रतिनादयन् ।
नापराध्याम्यहं किंचित् केन पापमिदं कृतम् ॥ २७ ॥
ब्रह्मन्! बाण लगते ही वे मुनि पृथिवीपर गिर पड़े और अपने आर्तनादसे उस वन्य प्रदेशको गुँजाते हुए बोले, 'आह! मैं तो किसीका कोई अपराध नहीं करता हूँ। फिर किसने यह पापकर्म कर डाला?' ॥ २७ ॥
मन्वानस्तं मृगं चाहं सम्प्राप्तः सहसा प्रभो ।
अपश्यं तमृषिं विद्धं शरेणानतपर्वणा ॥ २८ ॥
प्रभो! मैंने उन्हें हिंसक पशु समझकर बाण मारा था। अतः सहसा उनके पास जा पहुँचा। वहाँ जाकर देखा कि झुकी हुई गाँठवाले उस बाणसे एक ऋषि घायल होकर धरतीपर पड़े हैं ॥ २८ ॥
अकार्यकरणाच्चापि भृशं मे व्यथितं मनः ।
तमुग्रतपसं विप्रं निष्तनन्तं महीतले ॥ २९ ॥
यह न करनेयोग्य पाप कर डालनेके कारण मेरे मनमें उस समय बड़ी पीड़ा हुई। वे उग्र तपस्वी ब्राह्मण उस समय धरतीपर पड़े-पड़े कराह रहे थे ॥ २९ ॥
अजानता कृतमिदं मयेत्यहमथाब्रुवम् ।
क्षन्तुमर्हसि मे सर्वमिति चोक्तो मया मुनिः ॥ ३० ॥
मैंने साहस करके उन मुनीश्वरसे कहा—'भगवन्! अनजानमें मेरे द्वारा यह अपराध बन गया है। अतः आप यह सब क्षमा कर दें' ॥ ३० ॥
ततः प्रत्यब्रवीद् वाक्यमृषिर्मां क्रोधमूर्च्छितः ।
व्याधस्त्वं भविता क्रूर शूद्रयोनाविति द्विज ॥ ३१ ॥
मेरी बात सुनकर ऋषि क्रोधसे व्याकुल हो गये और उत्तर देते हुए बोले—'निर्दयी ब्राह्मण! तू शूद्रयोनिमें जन्म लेकर व्याध होगा' ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे
पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें ब्राह्मण-
व्याधसंवादविषयक दो सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१५ ॥