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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन

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षडधिकद्विशततमोऽध्यायः

कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन

मार्कण्डेय उवाच

कश्चिद् द्विजातिप्रवरो वेदाध्यायी तपोधनः ।
तपस्वी धर्मशीलश्च कौशिको नाम भारत ॥ १ ॥

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**भरतनन्दन! कौशिक नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण था, जो वेदका अध्ययन करनेवाला, तपस्याका धनी और धर्मात्मा था। वह तपस्वी ब्राह्मण सम्पूर्ण द्विजातियोंमें श्रेष्ठ समझा जाता था ॥ १ ॥

साङ्गोपनिषदो वेदानधीते द्विजसत्तमः ।
स वृक्षमूले कस्मिंश्चिद् वेदानुच्चारयन् स्थितः ॥ २ ॥

द्विजश्रेष्ठ कौशिकने सम्पूर्ण अंगोंसहित वेदों और उपनिषदोंका अध्ययन किया था। एक दिनकी बात है, वह किसी वृक्षके नीचे बैठकर वेदपाठ कर रहा था ॥ २ ॥

उपरिष्टाच्च वृक्षस्य बलाका संन्यलीयत ।
तया पुरीषमुत्सृष्टं ब्राह्मणस्य तदोपरि ॥ ३ ॥

उस समय उस वृक्षके ऊपर एक बगुली छिपी बैठी थी। उसने ब्राह्मण देवताके ऊपर बीट कर दी ॥ ३ ॥

तामवेक्ष्य ततः क्रुद्धः समपध्यायत् द्विजः ।
भृशं क्रोधाभिभूतेन बलाका सा निरीक्षिता ॥ ४ ॥
अपध्याता च विप्रेण न्यपतद् धरणीतले ।

यह देख ब्राह्मण क्रोधित हो गया और उस पक्षीकी ओर दृष्टि डालकर उसका अनिष्टचिन्तन करने लगा। उसने अत्यन्त कुपित होकर उस बगुलीको देखा और उसका अनिष्टचिन्तन किया था, अतः वह पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ४ १/२ ॥

बलाकां पतितां दृष्ट्वा गतसत्त्वामचेतनाम् ॥ ५ ॥
कारुण्यादभिसंतप्तः पर्यशोचत तां द्विजः ।
अकार्यं कृतवानस्मि रोषरागबलात्कृतः ॥ ६ ॥

उस बगुलीको अचेत एवं निष्प्राण होकर पड़ी देख ब्राह्मणका हृदय दयासे द्रवित हो उठा। उसे अपने इस कुकृत्यपर पश्चात्ताप हुआ। वह इस प्रकार शोक प्रकट करता हुआ बोला—'ओह! आज क्रोध और आसक्तिके वशीभूत होकर मैंने यह अनुचित कार्य कर डाला' ॥ ५-६ ॥

मार्कण्डेय उवाच

इत्युक्त्वा बहुशो विद्वान् ग्रामं भैक्ष्याय संश्रितः ।
ग्रामे शुचीनि प्रचरन् कुलानि भरतर्षभ ।। ७ ।।
प्रविष्टस्तत् कुलं यत्र पूर्वं चरितवांस्तु सः ।
देहीति याचमानोऽसौ तिष्ठेत्युक्तः स्त्रिया ततः ।। ८ ।।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार बार-बार पछताकर वह विद्वान् ब्राह्मण गाँवमें भिक्षाके लिये गया। उस गाँवमें जो लोग शुद्ध और पवित्र आचरणवाले थे, उन्हींके घरोंपर भिक्षा माँगता हुआ वह एक ऐसे घरपर जा पहुँचा, जहाँ पहले भी कभी भिक्षा प्राप्त कर चुका था। दरवाजेपर पहुँचकर ब्राह्मण बोला—'भिक्षा दें!' भीतरसे किसी स्त्रीने उत्तर दिया—'ठहरो! (अभी लाती हूँ)' ।। ७-८ ।।
शौचं तु यावत् कुरुते भाजनस्य कुटुम्बिनी ।
एतस्मिन्नन्तरे राजन् क्षुधासम्पीडितो भृशम् ।। ९ ।।
भर्ता प्रविष्टः सहसा तस्या भरतसत्तम ।
राजन्! वह घरकी मालकिन थी, जो जूठे बर्तन माँज रही थी। ज्यों ही वह बर्तन साफ करके उधरसे निवृत्त हुई, त्यों ही उसके पतिदेव सहसा घरपर आ गये। भरतश्रेष्ठ! वे भूखसे अत्यन्त पीड़ित थे ।। ९ १/२ ।।

सा तु दृष्ट्वा पतिं साध्वी ब्राह्मणं व्यवहाय तम् ॥ १० ॥
पाद्यमाचमनीयं वै ददौ भर्तुस्तथाऽऽसनम् ।
प्रह्वा पर्यचरच्चापि भर्तारमसितेक्षणा ॥ ११ ॥
पतिको आया देख उस श्याम नेत्रोंवाली पतिव्रताने ब्राह्मणको तो उसी दशामें छोड़ दिया और अत्यन्त विनीतभावसे वह पतिकी सेवामें लग गयी। पानी लाकर उसने पतिके पैर धोये, हाथ-मुँह धुलाये और बैठनेको आसन दिया ॥ १०-११ ॥

आहारेणाथ भक्ष्यैश्च भोज्यैः सुमधुरैस्तथा ।
उच्छिष्टं भाविता भर्तुर्भुङ्क्ते नित्यं युधिष्ठिर ॥ १२ ॥
फिर सुन्दर स्वादिष्ट भक्ष्य-भोज्य पदार्थ परोसकर वह पतिको भोजन कराने लगी। युधिष्ठिर! वह सती स्त्री प्रतिदिन पतिको भोजन कराकर उनके उच्छिष्टको प्रसाद मानकर बड़े आदर और प्रेमसे भोजन करती थी ॥

दैवतं च पतिं मेने भर्तुश्चित्तानुसारिणी ।
कर्मणा मनसा वाचा नान्यचित्ताभ्यगात् पतिम् ॥ १३ ॥
वह पतिको देवता मानती और उनके विचारके अनुकूल ही चलती थी। उसका मन कभी पर पुरुषकी ओर नहीं जाता था। वह मन, वाणी और क्रियासे पतिपरायणा थी ॥ १३ ॥

तं सर्वभावोपगता पतिशुश्रूषणे रता ।
साध्वाचारा शुचिर्दक्षा कुटुम्बस्य हितैषिणी ॥ १४ ॥
अपने हृदयकी समस्त भावनाएँ, सम्पूर्ण प्रेम पतिके चरणोंमें चढ़ाकर वह अनन्यभावसे उन्हींकी सेवामें लगी रहती थी। सदाचारका पालन करती, बाहर-भीतरसे शुद्ध—पवित्र रहती, घरके काम-काजको कुशलतापूर्वक करती और कुटुम्बके सभी लोगोंका हित चाहती थी ॥

भर्तुश्चापि हितं यत् तत् सततं सानुवर्तते ।
देवतातिथिभृत्यानां श्वश्रूश्वशुरयोस्तथा ॥ १५ ॥
शुश्रूषणपरा नित्यं सततं संयतेन्द्रिया ।
पतिके लिये जो हितकर कार्य जान पड़ता उसमें भी वह सदा संलग्न रहती थी। देवताओंकी पूजा, अतिथियोंके सत्कार, भृत्योंके भरण-पोषण और सास-ससुरकी सेवामें भी वह सर्वदा तत्पर रहती थी। अपने मन और इन्द्रियोंपर वह निरन्तर पूर्ण संयम रखती थी ॥

सा ब्राह्मणं तदा दृष्ट्वा संस्थितं भैक्ष्यकाङ्क्षिणम् ।
कुर्वती पतिशुश्रूषां सस्माराथ शुभेक्षणा ॥ १६ ॥
पतिकी सेवा करते-करते उस मंगलमयी दृष्टिवाली देवीको भिक्षाके लिये खड़े हुए ब्राह्मणकी याद आयी ॥

व्रीडिता साभवत् साध्वी तदा भरतसत्तम ।
भिक्षामादाय विप्राय निर्जगाम यशस्विनी ॥ १७ ॥
भरतवंशविभूषण! अपनी भूलके कारण वह यशस्विनी साध्वी स्त्री बहुत लज्जित हुई और ब्राह्मणके लिये भिक्षा लेकर घरसे बाहर निकली ॥ १७ ॥

ब्राह्मण उवाच
किमिदं भवति त्वं मां तिष्ठेत्युक्त्वा वराङ्गने ।
उपरोधं कृतवती न विसर्जितवत्यसि ॥ १८ ॥
**उसे देखकर ब्राह्मणने कहा—**सुन्दरी! तुम्हारा यह कैसा बर्ताव है? देख! तुम्हें इतना विलम्ब करना था तो 'ठहरो' कहकर मुझे रोक क्यों लिया? मुझे जाने क्यों नहीं दिया? ॥ १८ ॥

मार्कण्डेय उवाच
ब्राह्मणं क्रोधसंतप्तं ज्वलन्तमिव तेजसा ।
दृष्ट्वा साध्वी मनुष्येन्द्र सान्त्वपूर्वं वचोऽब्रवीत् ॥ १९ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! ब्राह्मण क्रोधसे संतप्त हो अपने तेजसे जलता-सा प्रतीत होता था। उसे देखकर उस पतिव्रता देवीने बड़ी शान्तिसे उत्तर दिया ॥

स्त्र्युवाच

क्षन्तुमर्हसि मे विद्वन् भर्ता मे दैवतं महत् ।
स चापि क्षुधितः श्रान्तः प्राप्तः शुश्रूषितो मया ॥ २० ॥
**स्त्री बोली—**विद्वन्! क्षमा करें। मेरे लिये सबसे बड़े देवता पति हैं। वे भूखे और थके हुए घरपर आये थे। (उन्हें छोड़कर कैसे आती?) उन्हींकी सेवामें लग गयी ॥

ब्राह्मण उवाच

ब्राह्मणा न गरीयांसो गरीयांस्ते पतिः कृतः ।
गृहस्थधर्मे वर्तन्ती ब्राह्मणानवमन्यसे ॥ २१ ॥
**तब ब्राह्मण बोला—**क्या ब्राह्मण बड़े नहीं हैं; तुमने पतिको ही सबसे बड़ा बना दिया? गृहस्थधर्ममें रहकर भी तुम ब्राह्मणोंका अपमान करती हो? ॥ २१ ॥
इन्द्रोऽप्येषां प्रणमते किं पुनर्मानवो भुवि ।
अवलिप्ते न जानीषे वृद्धानां न श्रुतं त्वया ॥ २२ ॥
ब्राह्मणा ह्यग्निसदृशा दहेयुः पृथिवीमपि ।
अरी! (स्वर्गलोकके स्वामी) इन्द्र भी इन ब्राह्मणोंके आगे सिर झुकाते हैं, फिर भूतलके मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? घमंडमें भरी हुई स्त्री! क्या तुम ब्राह्मणोंका प्रभाव नहीं जानती? कभी बड़े-बूढ़ोंके मुखसे भी नहीं सुना? अरी! ब्राह्मण अग्निके समान तेजस्वी होते हैं। वे चाहें तो इस पृथ्वीको भी जलाकर भस्म कर सकते हैं ॥ २२ १/२ ॥

स्त्र्युवाच

नाहं बलाका विप्रर्षे त्यज क्रोधं तपोधन ॥ २३ ॥
अनया क्रुद्धया दृष्ट्या क्रुद्धः किं मां करिष्यसि ।
नावजानाम्यहं विप्रान् देवैस्तुल्यान् मनस्विनः ॥ २४ ॥
**स्त्री बोली—**तपोधन! क्रोध न करो। ब्रह्मर्षे! मैं बगुली नहीं हूँ जो तुम्हारी इस क्रोधभरी दृष्टिसे जल जाऊँगी। तुम इस तरह कुपित होकर मेरा क्या करोगे? मैं ब्राह्मणोंका अपमान नहीं करती। मनस्वी ब्राह्मण तो देवताके समान होते हैं ॥ २३-२४ ॥
अपराधमिमं विप्र क्षन्तुमर्हसि मेऽनघ ।
जानामि तेजो विप्राणां महाभाग्यं च धीमताम् ॥ २५ ॥
निष्पाप ब्राह्मण! तुम मेरे इस अपराधको क्षमा करो। मैं बुद्धिमान् ब्राह्मणोंके तेज और महत्त्वको जानती हूँ ॥
अपेयः सागरः क्रोधात् कृतो हि लवणोदकः ।
तथैव दीप्ततपसां मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ २६ ॥
येषां क्रोधाग्निरद्यापि दण्डके नोपशाम्यति ।

ब्राह्मणोंके ही क्रोधका फल है कि समुद्रका पानी खारा एवं पीनेके अयोग्य बना दिया गया। इसी प्रकार जिनकी तपस्या बहुत बढ़ी-चढ़ी थी और जिनका अन्तःकरण परम पवित्र हो चुका था ऐसे मुनियोंने भी जो क्रोधकी आग प्रज्वलित की थी, वह आज भी दण्डकारण्यमें बुझ नहीं पा रही है ।। २६ १/२ ।।

ब्राह्मणानां परिभवाद् वातापिः सुदुरात्मवान् ।। २७ ।।
अगस्त्यमृषिमासाद्य जीर्णः क्रूरो महासुरः ।
ब्राह्मणोंका तिरस्कार करनेसे ही क्रूर स्वभाववाला महान् असुर अत्यन्त दुरात्मा वातापि अगस्त्य मुनिके पेटमें जाकर पच गया ।। २७ १/२ ।।

बहुप्रभावाः श्रूयन्ते ब्राह्मणानां महात्मनाम् ।। २८ ।।
क्रोधः सुविपुलो ब्रह्मन् प्रसादश्च महात्मनाम् ।
अस्मिंस्त्वतिक्रमे ब्रह्मन् क्षन्तुमर्हसि मेऽनघ ।। २९ ।।
ब्रह्मन्! महात्मा ब्राह्मणोंके प्रभावको बतानेवाले बहुत-से चरित्र सुने जाते हैं। उन महात्माओंका क्रोध और कृपा दोनों ही महान् होते हैं। निष्पाप ब्रह्मन्! मेरेद्वारा जो तुम्हारा अपराध बन गया है, उसे क्षमा करो ।। २८-२९ ।।

पतिशुश्रूषया धर्मो यः स मे रोचते द्विज ।
दैवतेष्वपि सर्वेषु भर्ता मे दैवतं परम् ।। ३० ।।
विप्रवर! मुझे तो पतिकी सेवासे जो धर्म प्राप्त होता है, वही अधिक पसंद है। सम्पूर्ण देवताओंमें भी पति ही मेरे सबसे बड़े देवता हैं ।। ३० ।।

अविशेषेण तस्याहं कुर्यां धर्मं द्विजोत्तम ।
शुश्रूषायाः फलं पश्य पत्युर्ब्राह्मण यादृशम् ।। ३१ ।।
द्विजश्रेष्ठ! मैं साधारणरूपसे ही पतिसेवारूप धर्मका पालन करती हूँ। ब्राह्मणदेवता! इस पतिसेवाका जैसा फल है, उसे प्रत्यक्ष देख लो ।। ३१ ।।

बलाका हि त्वया दग्धा रोषात् तद् विदितं मया ।
क्रोधः शत्रुः शरीरस्थो मनुष्याणां द्विजोत्तम ।। ३२ ।।
तुमने क्रोध करके जो एक बगुलीको जला दिया था वह बात मुझे मालूम हो गयी। द्विजश्रेष्ठ! मनुष्योंका एक बहुत बड़ा शत्रु है, वह उनके शरीरमें ही रहता है। उसका नाम है 'क्रोध' ।। ३२ ।।

यः क्रोधमोहौ त्यजति तं देवा ब्राह्मणं विदुः ।
यो वदेदिह सत्यानि गुरुं संतोषयेत च ।। ३३ ।।
हिंसितश्च न हिंसेत तं देवा ब्राह्मणं विदुः ।
जो क्रोध और मोहको त्याग देता है, उसीको देवतागण ब्राह्मण मानते हैं। जो यहाँ सत्य बोले, गुरुको संतुष्ट रखे, किसीके द्वारा मार खाकर भी बदलेमें उसे न मारे, उसको देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ।। ३३ १/२ ।।

जितेन्द्रियो धर्मपरः स्वाध्यायनिरतः शुचिः ॥ ३४ ॥
कामक्रोधौ वशौ यस्य तं देवा ब्राह्मणं विदुः ।
जो जितेन्द्रिय, धर्मपरायण, स्वाध्यातत्पर और पवित्र है तथा काम और क्रोध जिसके वशमें हैं, उसे देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ॥ ३४ १/२ ॥
यस्य चात्मसमो लोको धर्मज्ञस्य मनस्विनः ॥ ३५ ॥
सर्वधर्मेषु च रतस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ।
जिस धर्मज्ञ एवं मनस्वी पुरुषका सम्पूर्ण जगत्के प्रति आत्मभाव है तथा सभी धर्मोंपर जिसका समान अनुराग है, उसे देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ॥ ३५ १/२ ॥
योऽध्यापयेदधीयीत यजेद् वा याजयीत वा ॥ ३६ ॥
दद्याद् वापि यथाशक्ति तं देवा ब्राह्मणं विदुः ।
जो पढ़े और पढ़ाये, यज्ञ करे और कराये तथा यथाशक्ति दान दे, उसे देवतालोग ब्राह्मण कहते हैं ॥
ब्रह्मचारी वदान्यो योऽधीयीत द्विजपुङ्गवः ॥ ३७ ॥
स्वाध्यायवानमत्तो वै तं देवा ब्राह्मणं विदुः ।
जो द्विजश्रेष्ठ ब्रह्मचर्यका पालन करे, उदार बने, वेदोंका अध्ययन करे और सतत सावधान रहकर स्वाध्यायमें ही लगा रहे, उसे देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ॥ ३७ १/२ ॥
यद् ब्राह्मणानां कुशलं तदेषां परिकीर्तयेत् ॥ ३८ ॥
सत्यं तथा व्याहरतां नानृते रमते मनः ।
ब्राह्मणके लिये जो हितकर कर्म हो, उसीका उनके सामने वर्णन करना चाहिये। सत्य बोलनेवाले लोगोंका मन कभी असत्यमें नहीं लगता ॥ ३८ १/२ ॥
धर्मं तु ब्राह्मणस्याहुः स्वाध्यायं दममार्जवम् ॥ ३९ ॥
इन्द्रियाणां निग्रहं च शाश्वतं द्विजसत्तम ।
द्विजश्रेष्ठ! स्वाध्याय, मनोनिग्रह, सरलता और इन्द्रियनिग्रह—ये ब्राह्मणके लिये सनातनधर्म कहे गये हैं ॥ ३९ १/२ ॥
सत्यार्जवे धर्ममाहुः परं धर्मविदो जनाः ॥ ४० ॥
दुर्ज्ञेयः शाश्वतो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः ।
श्रुतिप्रमाणो धर्मः स्यादिति वृद्धानुशासनम् ॥ ४१ ॥
धर्मज्ञ पुरुष सत्य और सरलताको सर्वोत्तम धर्म बताते हैं। सनातनधर्मके स्वरूपको जानना तो अत्यन्त कठिन है, परंतु वह सत्यमें प्रतिष्ठित है। जो वेदोंके द्वारा प्रमाणित हो, वही धर्म है—यह वृद्ध पुरुषोंका उपदेश है ॥ ४०-४१ ॥
बहुधा दृश्यते धर्मः सूक्ष्म एव द्विजोत्तम ।
भवानपि च धर्मज्ञः स्वाध्यायनिरतः शुचिः ॥ ४२ ॥

द्विजश्रेष्ठ! बहुधा धर्मका स्वरूप सूक्ष्म ही देखा जाता है। तुम भी धर्मज्ञ, स्वाध्यायपरायण और पवित्र हो ॥ ४२ ॥
न तु तत्त्वेन भगवन् धर्मं वेत्सीति मे मतिः ।
यदि विप्र न जानीषे धर्मं परमकं द्विज ॥ ४३ ॥
धर्मव्याधं ततः पृच्छ गत्वा तु मिथिलां पुरीम् ।
भगवन्! तो भी मेरा विचार यह है कि तुम्हें धर्मका यथार्थ ज्ञान नहीं है। विप्रवर! यदि तुम परम धर्म क्या है, यह नहीं जानते तो मिथिलापुरीमें धर्मव्याधके पास जाकर पूछो ॥ ४३ ½ ॥
मातापितृभ्यां शुश्रूषुः सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥ ४४ ॥
मिथिलायां वसेद् व्याधः स ते धर्मान् प्रवक्ष्यति ।
तत्र गच्छस्व भद्रं ते यथाकामं द्विजोत्तम ॥ ४५ ॥
मिथिलामें एक व्याध रहता है, जो माता-पिताका सेवक, सत्यवादी और जितेन्द्रिय है, वह तुम्हें धर्मका उपदेश करेगा। द्विजश्रेष्ठ! तुम अपनी रुचिके अनुसार वहीं जाओ, तुम्हारा मंगल हो ॥ ४४-४५ ॥
अत्युक्तमपि मे सर्वं क्षन्तुमर्हस्यनिन्दित ।
स्त्रियो ह्यवध्याः सर्वेषां ये च धर्मविदो जनाः ॥ ४६ ॥
अनिन्दनीय ब्राह्मण! यदि मेरे मुखसे कोई अनुचित बातें निकल गयी हों तो उन सबके लिये मुझे क्षमा करें; क्योंकि जो धर्मज्ञ पुरुष हैं, उन सबकी दृष्टिमें स्त्रियाँ अदण्डनीय हैं ॥ ४६ ॥

ब्राह्मण उवाच
प्रीतोऽस्मि तव भद्रं ते गतः क्रोधश्च शोभने ।
उपालम्भस्त्वयात्युक्तो मम निःश्रेयसं परम् ।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि साधयिष्यामि शोभने ॥ ४७ ॥
(धन्या त्वमसि कल्याणि यस्यास्ते वृत्तमीदृशम् ।)
ब्राह्मण बोला—शुभे! तुम्हारा भला हो। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। मेरा सारा क्रोध दूर हो गया। तुमने जो उलाहना दिया है, वह अनुचित वचन नहीं, मेरे लिये परम कल्याणकारी है। शोभने! तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं जाऊँगा और अपना कार्यसाधन करूँगा। कल्याणि! तुम धन्य हो, जिसका सदाचार इतनी उच्चकोटिका है ॥ ४७ ॥

मार्कण्डेय उवाच
तया विसृष्टो निर्गम्य स्वमेव भवनं ययौ ।
विनिन्दन् स स्वमात्मानं कौशिको द्विजसत्तमः ॥ ४८ ॥

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! उस साध्वी स्त्रीसे विदा लेकर वह द्विजश्रेष्ठ कौशिक अपने आत्माकी निन्दा करता हुआ अपने घरको लौट गया ॥ ४८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि पतिव्रतोपाख्याने षडधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें पतिव्रतोपाख्यानविषयक दो सौ छठाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४८ १/३ श्लोक हैं)