महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
कुन्तीके द्वारा सूर्यदेवताका आवाहन तथा कुन्ती-सूर्य-संवाद
षडधिकत्रिशततमोऽध्यायः
कुन्तीके द्वारा सूर्यदेवताका आवाहन तथा कुन्ती-सूर्य-संवाद
वैशम्पायन उवाच
गते तस्मिन् द्विजश्रेष्ठे कस्मिंश्चित् कारणान्तरे ।
चिन्तयामास सा कन्या मन्त्रग्रामबलाबलम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उन श्रेष्ठ ब्राह्मणके चले जानेपर किसी कारणवश* राजकन्या कुन्तीने मन-ही-मन सोचा; 'इस मन्त्रसमूहमें कोई बल है या नहीं ॥ १ ॥
अयं वै कीदृशस्तेन मम दत्तो महात्मना ।
मन्त्रग्रामो बलं तस्य ज्ञास्ये नातिचिरादिति ॥ २ ॥
'उन महात्मा ब्राह्मणने मुझे यह कैसा मन्त्रसमूह प्रदान किया है? उसके बलको मैं शीघ्र ही (परीक्षाद्वारा) जानूँगी' ॥ २ ॥
एवं संचिन्तयन्ती सा ददर्शर्तुं यदृच्छया ।
व्रीडिता साभवद् बाला कन्याभावे रजस्वला ॥ ३ ॥
इस प्रकार सोच-विचारमें पड़ी हुई कुन्तीने अकस्मात् अपने शरीरमें ऋतुका प्रादुर्भाव हुआ देखा। कन्यावस्थामें ही अपनेको रजस्वला पाकर उस बालिकाने लज्जाका अनुभव किया ॥ ३ ॥
ततो हर्म्यतलस्था सा महार्हशयनोचिता ।
प्राच्यां दिशि समुद्यन्तं ददर्शादित्यमण्डलम् ॥ ४ ॥
तदनन्तर एक दिन कुन्ती अपने महलके भीतर एक बहुमूल्य पलंगपर लेटी हुई थी। उसी समय उसने (खिड़कीसे) पूर्वदिशामें उदित होते हुए सूर्यमण्डलकी ओर दृष्टिपात किया ॥ ४ ॥
तत्र बद्धमनोदृष्टिर्भवत् सा सुमध्यमा ।
न चातप्यत रूपेण भानोः संध्यागतस्य सा ॥ ५ ॥
प्रातःसंध्याके समय उगते हुए सूर्यकी ओर देखनेमें सुमध्यमा कुन्तीको तनिक भी तापका अनुभव नहीं हुआ। उसके मन और नेत्र उन्हींमें आसक्त हो गये ॥
तस्या दृष्टिर्भूद् दिव्या सापश्यद् दिव्यदर्शनम् ।
आमुक्तकवचं देवं कुण्डलाभ्यां विभूषितम् ॥ ६ ॥
उस समय उसकी दृष्टि दिव्य हो गयी। उसने दिव्यरूपमें दिखायी देनेवाले भगवान् सूर्यकी ओर देखा। वे कवच धारण किये एवं कुण्डलोंसे विभूषित थे ।। ६ ।।
तस्याः कौतूहलं त्वासीन्मन्त्रं प्रति नराधिप ।
आह्वानमकरोत् साथ तस्य देवस्य भाविनी ।। ७ ।।
नरेश्वर! उन्हें देखकर कुन्तीके मनमें अपने मन्त्रकी शक्तिकी परीक्षा करनेके लिये कौतूहल पैदा हुआ। तब उस सुन्दरी राजकन्याने सूर्यदेवका आवाहन किया ।। ७ ।।
प्राणानुपस्पृश्य तदा ह्याजुहाव दिवाकरम् ।
आजगाम ततो राजंस्त्वरमाणो दिवाकरः ।। ८ ।।
उसने विधिपूर्वक आचमन और प्राणायाम करके भगवान् दिवाकरका आवाहन किया। राजन्! तब भगवान् सूर्य बड़ी उतावलीके साथ वहाँ आये ।। ८ ।।
मधुपिङ्गो महाबाहुः कम्बुग्रीवो हसन्निव ।
अङ्गदी बद्धमुकुटो दिशः प्रज्वालयन्निव ।। ९ ।।
उनकी अंगकान्ति मधुके समान पिंगलवर्णकी थी। भुजाएँ बड़ी-बड़ी और ग्रीवा शंखके समान थी। वे हँसते हुए-से जान पड़ते थे। उनकी भुजाओंमें अंगद (बाजूबंद) चमक रहे थे और मस्तकपर बँधा हुआ मुकुट शोभा पाता था। वे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रज्वलित-सी कर रहे थे ।। ९ ।।
योगात् कृत्वा द्विधाऽऽत्मानमाजगाम तताप च ।
आबभाषे ततः कुन्तीं साम्ना परमवल्गुना ।। १० ।।
वे योगशक्तिसे अपने दो स्वरूप बनाकर एकसे वहाँ आये और दूसरेसे आकाशमें तपते रहे। उन्होंने कुन्तीको समझाते हुए परम मधुर वाणीमें कहा— ।। १० ।।
आगतोऽस्मि वशं भद्रे तव मन्त्रबलात्कृतः ।
किं करोमि वशो राज्ञि ब्रूहि कर्ता तदस्मि ते ।। ११ ।।
‘भद्रे! मैं तुम्हारे मन्त्रके बलसे आकृष्ट होकर तुम्हारे वशमें आ गया हूँ। राजकुमारी! बताओ, तुम्हारे अधीन रहकर मैं कौन-सा कार्य करूँ? तुम जो कहोगी, वही करूँगा’ ।। ११ ।।
कुन्त्युवाच
गम्यतां भगवंस्तत्र यत एवागतो ह्यसि ।
कौतूहलात् समाहूतः प्रसीद भगवन्निति ।। १२ ।।
कुन्ती बोली—भगवन्! आप जहाँसे आये हैं वहीं पधारिये। मैंने आपको कौतूहलवश ही बुलाया था। प्रभो! प्रसन्न होइये ।। १२ ।।
सूर्य उवाच
गमिष्येऽहं यथा मां त्वं ब्रवीषि तनुमध्यमे ।
न तु देवं समाहूय न्याय्यं प्रेषयितुं वृथा ॥ १३ ॥
**सूर्यने कहा—**तनुमध्यमे! जैसा तुम कह रही हो उसके अनुसार मैं चला तो जाऊँगा ही; परंतु किसी देवताको बुलाकर उसे व्यर्थ लौटा देना न्यायकी बात नहीं है ॥ १३ ॥
तवाभिसंधिः सुभगे सूर्यात् पुत्रो भवेदिति ।
वीर्येणाप्रतिमो लोके कवची कुण्डलीति च ॥ १४ ॥
सुभगे! तुम्हारे मनमें यह संकल्प उठा था कि ‘सूर्यदेवसे मुझे एक ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो संसारमें अनुपम पराक्रमी तथा जन्मसे ही दिव्य कवच एवं कुण्डलोंसे सुशोभित हो’ ॥ १४ ॥
सा त्वमात्मप्रदानं वै कुरुष्व गजगामिनि ।
उत्पत्स्यति हि पुत्रस्ते यथासंकल्पमङ्गने ॥ १५ ॥
अतः गजगामिनि! तुम मुझे अपना शरीर समर्पित कर दो। अंगने! ऐसा करनेसे तुम्हें अपने संकल्पके अनुसार तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा ॥ १५ ॥
अथ गच्छाम्यहं भद्रे त्वया संगम्य सुस्मिते ।
यदि त्वं वचनं नाद्य करिष्यसि मम प्रियम् ॥ १६ ॥
शपिष्ये त्वामहं क्रुद्धो ब्राह्मणं पितरं च ते ।
त्वत्कृते तान् प्रधक्ष्यामि सर्वानपि न संशयः ॥ १७ ॥
भद्रे! सुन्दर मुसकानवाली पृथे! तुमसे समागम करके मैं पुनः लौट जाऊँगा; परंतु यदि आज तुम मेरा प्रिय वचन नहीं मानोगी तो मैं कुपित होकर तुमको, उस मन्त्रदाता ब्राह्मणको और तुम्हारे पिताको भी शाप दे दूँगा। तुम्हारे कारण मैं उन सबको जलाकर भस्म कर दूँगा; इसमें संशय नहीं है ॥ १६-१७ ॥
पितरं चैव ते मूढं यो न वेत्ति तवानयम् ।
तस्य च ब्राह्मणस्याद्य योऽसौ मन्त्रमदात् तव ॥ १८ ॥
शीलवृत्तमविज्ञाय धास्यामि विनयं परम् ।
तुम्हारे मूर्ख पिताको भी मैं जला दूँगा, जो तुम्हारे इस अन्यायको नहीं जानता है तथा जिसने तुम्हारे शील और सदाचारको जाने बिना ही मन्त्रका उपदेश दिया है, उस ब्राह्मणको भी अच्छी सीख दूँगा ॥ १८ १/२ ॥
एते हि विबुधाः सर्वे पुरन्दरमुखा दिवि ॥ १९ ॥
त्वया प्रलब्धं पश्यन्ति स्मयन्त इव भाविनि ।
पश्य चैनान् सुरगणान् दिव्यं चक्षुरिदं हि ते ।
पूर्वमेव मया दत्तं दृष्टवत्यसि येन माम् ॥ २० ॥
भामिनि! ये इन्द्र आदि समस्त देवता आकाशमें खड़े होकर मुसकराते हुए-से मेरी ओर इस भावसे देख रहे हैं कि मैं तुम्हारे द्वारा कैसा ठगा गया? देखो न, इन देवताओंकी ओर। मैंने तुम्हें पहलेसे ही दिव्य दृष्टि दे दी है, जिससे तुम मुझे देख सकती हो ॥ १९-२० ॥
वैशम्पायन उवाच
ततोऽपश्यत् त्रिदशान् राजपुत्री
सर्वानैव स्वेषु धिष्ण्येषु खस्थान् ।
प्रभावन्तं भानुमन्तं महान्तं
यथाऽऽदित्यं रोचमानांस्तथैव ॥ २१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब राजकुमारी कुन्तीने आकाशमें अपने-अपने विमानोंपर बैठे हुए सब देवताओंको देखा। जैसे सहस्रों किरणोंसे युक्त भगवान् सूर्य अत्यन्त दीप्तिमान् दिखायी देते हैं, उसी प्रकार वे सब देवता प्रकाशित हो रहे थे ॥ २१ ॥
सा तान् दृष्ट्वा व्रीडमानेव बाला
सूर्य देवी वचनं प्राह भीता ।
गच्छ त्वं वै गोपते स्वं विमानं
कन्याभावाद् दुःख एवापचारः ॥ २२ ॥
उन्हें देखकर बालिका कुन्तीको बड़ी लज्जा हुई। उस देवीने भयभीत होकर सूर्यदेवसे कहा—'किरणोंके स्वामी दिवाकर! आप अपने विमानपर चले जाइये। छोटी बालिका होनेके कारण मेरेद्वारा आपको बुलानेका यह दुःखदायक अपराध बन गया है ॥ २२ ॥
पिता माता गुरवश्चैव येऽन्ये
देहस्यास्य प्रभवन्ति प्रदाने ।
नाहं धर्मं लोपयिष्यामि लोके
स्त्रीणां वृत्तं पूज्यते देहरक्षा ॥ २३ ॥
'मेरे पिता-माता तथा अन्य गुरुजन ही मेरे इस शरीरको देनेका अधिकार रखते हैं। मैं अपने धर्मका लोप नहीं करूँगी। स्त्रियोंके सदाचारमें अपने शरीरकी पवित्रताको बनाये रखना ही प्रधान है और संसारमें उसीकी प्रशंसा की जाती है ॥ २३ ॥
मया मन्त्रबलं ज्ञातुमाहूतस्त्वं विभावसो ।
बाल्याद् बालोति तत् कृत्वा क्षन्तुमर्हसि मे विभो ॥ २४ ॥
'प्रभो! प्रभाकर! मैंने अपने बाल-स्वभावके कारण मन्त्रका बल जाननेके लिये ही आपका आवाहन किया है। एक अनजान बालिका समझकर आप मेरे इस अपराधको क्षमा कर दें' ॥ २४ ॥
सूर्य उवाच
बालेति कृत्वानुनयं तवाहं
ददानि नान्यानुनयं लभेत ।
आत्मप्रदानं कुरु कुन्तिकन्ये
शान्तिस्तवैवं हि भवेच्च भीरु ॥ २५ ॥
**सूर्यदेवने कहा—**कुन्तिभोजकुमारी कुन्ती! बालिका समझकर ही मैं तुमसे इतनी अनुनय-विनय करता हूँ। दूसरी कोई स्त्री मुझसे अनुनयका अवसर नहीं पा सकती। भीरु! तुम मुझे अपना शरीर अर्पण करो। ऐसा करनेसे ही तुम्हें शान्ति प्राप्त हो सकती है ।। २५ ।।
न चापि गन्तुं युक्तं हि मया मिथ्याकृतेन वै ।
असमेत्य त्वया भीरु मन्त्राहूतेन भाविनि ।। २६ ।।
गमिष्याम्यनवद्याङ्गि लोके समवहास्यताम् ।
सर्वेषां विबुधानां च वक्तव्यः स्यां तथा शुभे ।। २७ ।।
निर्दोष अंगोंवाली सुन्दरी! तुमने मन्त्रद्वारा मेरा आवाहन किया है; इस दशामें उस आवाहनको व्यर्थ करके तुमसे मिले बिना ही लौट जाना मेरे लिये उचित न होगा। भीरु! यदि मैं इसी तरह लौटूंगा तो जगत्में मेरा उपहास होगा। शुभे! सम्पूर्ण देवताओंकी दृष्टिमें भी मुझे निन्दनीय बनना पड़ेगा ।। २६-२७ ।।
सा त्वं मया समागच्छ लप्स्यसे मादृशं सुतम् ।
विशिष्टा सर्वलोकेषु भविष्यसि न संशयः ।। २८ ।।
अतः तुम मेरे साथ समागम करो। तुम मेरे ही समान पुत्र पाओगी और समस्त संसारमें (अन्य स्त्रियोंसे) विशिष्ट समझी जाओगी; इसमें संशय नहीं है ।। २८ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्याह्वाने
षडधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३०६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें सूर्यका आवाहनविषयक
तीन सौ छठाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३०६ ।।
* इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें सूर्यदेवने उस कारणका स्पष्टीकरण किया है।