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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 199)

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पञ्चविंशोऽध्यायः

महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्मका आदेश देकर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच

तत् काननं प्राप्य नरेन्द्रपुत्राः
सुखोचिता वासमुपेत्य कृच्छ्रम् ।
विजहुरिन्द्रप्रतिमाः शिवेषु
सरस्वतीशालवनेषु तेषु ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! सुख भोगनेके योग्य राजकुमार पाण्डव इन्द्रके समान तेजस्वी थे। वे वनवासके संकटमें पड़कर द्वैतवनमें प्रवेश करके वहाँ सरस्वतीतटवर्ती सुखद शालवनोंमें विहार करने लगे ॥ १ ॥

यतींश्च राजा स मुनींश्च सर्वां-
स्तस्मिन् वने मूलफलैरुदग्रैः ।
द्विजातिमुख्यानृषभः कुरूणां
संतर्पयामास महानुभावः ॥ २ ॥

इष्टीश्च पित्र्याणि तथा क्रियाश्च
महावने वसतां पाण्डवानाम् ।
पुरोहितस्तत्र समृद्धतेजा-
श्चकार धौम्यः पितृवन्नृपाणाम् ॥ ३ ॥

कुरुश्रेष्ठ महानुभाव राजा युधिष्ठिरने उस वनमें रहनेवाले सम्पूर्ण यतियों, मुनियों और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उत्तम फल-मूलोंके द्वारा तृप्त किया। अत्यन्त तेजस्वी पुरोहित धौम्य पिताकी भाँति उस महावनमें रहनेवाले राजकुमार पाण्डवोंके यज्ञ-याग, पितृ-श्राद्ध तथा अन्य सत्कर्म करते-कराते रहते थे ॥ २-३ ॥

अपेत्य राष्ट्राद् वसतां तु तेषा-
मृषिः पुराणोऽतिथिराजगाम ।
तमाश्रमं तीव्रसमृद्धतेजा
मार्कण्डेयः श्रीमतां पाण्डवानाम् ॥ ४ ॥

राज्यसे दूर होकर वनमें निवास करनेवाले श्रीमान् पाण्डवोंके उस आश्रमपर उद्दीप्त तेजस्वी पुरातन महर्षि मार्कण्डेयजी अतिथिके रूपमें आये ॥ ४ ॥

तमागतं ज्वलितहुताशनप्रभं

महामनाः कुरुवृषभो युधिष्ठिरः ।
अपूजयत् सुरऋषिमानवार्चितं
महामुनिं ह्यनुपमसत्त्ववीर्यवान् ॥ ५ ॥
उनकी अंग-कान्ति प्रज्वलित अग्निके समान उद्भासित हो रही थी। देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्योंद्वारा पूजित महामुनि मार्कण्डेयको आया देख अनुपम धैर्य और पराक्रमसे सम्पन्न महामनस्वी कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरने उनकी यथावत् पूजा की ॥ ५ ॥

स सर्वविद् द्रौपदीं वीक्ष्य कृष्णां
युधिष्ठिरं भीमसेनार्जुनौ च ।
संस्मृत्य रामं मनसा महात्मा
तपस्विमध्येऽस्मयतामितौजाः ॥ ६ ॥
अमित तेजस्वी तथा सर्वज्ञ महात्मा मार्कण्डेयजी द्रुपदकुमारी कृष्णा, युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन (और नकुल-सहदेव)-को देखकर मन-ही-मन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके तपस्वियोंके बीचमें मुसकराने लगे ॥ ६ ॥

तं धर्मराजो विमना इवाब्रवीत्
सर्वे ह्रिया सन्ति तपस्विनोऽमी ।
भवानिदं किं स्मयतीव हृष्ट-
स्तपस्विनां पश्यतां मामुदीक्ष्य ॥ ७ ॥
तब धर्मराज युधिष्ठिरने उदासीन-से होकर पूछा—‘मुने! ये सब तपस्वी तो मेरी अवस्था देखकर कुछ संकुचित-से हो रहे हैं, परंतु क्या कारण है कि आप इन सब महात्माओंके सामने मेरी ओर देखकर प्रसन्नतापूर्वक यों मुसकराते-से दिखायी देते हैं?’ ॥ ७ ॥

मार्कण्डेय उवाच

न तात हृष्यामि न च स्मयामि
प्रहर्षजो मां भजते न दर्पः ।
तवापदं त्वद्य समीक्ष्य रामं
सत्यव्रतं दाशरथिं स्मरामि ॥ ८ ॥
**मार्कण्डेयजी बोले—**तात! न तो मैं हर्षित होता हूँ और न मुसकराता ही हूँ। हर्षजनित अभिमान कभी मेरा स्पर्श नहीं कर सकता। आज तुम्हारी यह विपत्ति देखकर मुझे सत्यप्रतिज्ञ दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण हो आया ॥ ८ ॥

स चापि राजा सह लक्ष्मणेन
वने निवासं पितुरेव शासनात् ।
धन्वी चरन् पार्थ मयैव दृष्टो

गिरेः पुरा ऋष्यमूकस्य सानौ ॥ ९ ॥
कुन्तीनन्दन! प्राचीनकालकी बात है राजा रामचन्द्रजी भी अपने पिताकी आज्ञासे ही केवल धनुष हाथमें लिये लक्ष्मणके साथ वनमें निवास एवं भ्रमण करते थे। उस समय ऋष्यमूकपर्वतके शिखरपर मैंने ही उनका भी दर्शन किया था ॥ ९ ॥
सहस्रनेत्रप्रतिमो महात्मा
यमस्य नेता नमुचेश्च हन्ता ।
पितुर्निदेशादनघः स्वधर्मं
वासं वने दाशरथिश्चकार ॥ १० ॥
दशरथनन्दन श्रीराम सर्वथा निष्पाप थे। इन्द्र उनके दूसरे स्वरूप थे। वे यमराजके भी नियन्ता और नमुचि-जैसे दानवोंके नाशक थे, तो भी उन महात्माने पिताकी आज्ञासे अपना धर्म समझकर वनमें निवास किया ॥ १० ॥
स चापि शक्रस्य समप्रभावो
महानुभावः समरेष्वजेयः ।
विहाय भोगानचरद् वनेषु
नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ ११ ॥
जो इन्द्रके समान प्रभावशाली थे, जिनका अनुभव महान् था तथा जो युद्धमें सर्वदा अजेय थे, उन्होंने भी सम्पूर्ण भोगोंका परित्याग करके वनमें निवास किया था। इसलिये अपनेको बलका स्वामी समझकर अधर्म नहीं करना चाहिये ॥ ११ ॥
भूपाश्च नाभागभगीरथादयो
महीमिमां सागरान्तां विजित्य ।
सत्येन तेऽप्यजयंस्तात लोकान्
नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १२ ॥
नाभाग और भगीरथ आदि राजाओंने भी समुद्रपर्यन्त पृथ्‍वीको जीतकर सत्यके द्वारा उत्तम लोकोंपर विजय पायी। इसलिये तात! अपनेको बलका स्वामी मानकर अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये ॥ १२ ॥
अलर्कमाहुर्नरवर्य सन्तं
सत्यव्रतं काशिकरूषराजम् ।
विहाय राज्यानि वसूनि चैव
नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १३ ॥
नरश्रेष्ठ! काशी और करूषदेशके राजा अलर्कको सत्यप्रतिज्ञ संत बताया गया है। उन्होंने राज्य और धन त्यागकर धर्मका आश्रय लिया है। अतः अपनेको अधिक शक्तिशाली समझकर अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये ॥ १३ ॥
धात्रा विधिर्यो विहितः पुराणे-

स्तं पूजयन्तो नरवर्य सन्तः ।
सप्तर्षयः पार्थ दिवि प्रभान्ति
नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १४ ॥
मनुष्योंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार! विधाताने पुरातन वेदवाक्योंद्वारा जो अग्निहोत्र आदि कर्मोंका विधान किया है, उसका समादर करनेके कारण ही साधु सप्तर्षिगण देवलोकमें प्रकाशित हो रहे हैं। अतः अपनेको शक्तिशाली मानकर कभी अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये ॥ १४ ॥

महाबलान् पर्वतकूटमात्रान्
विषाणिनः पश्य गजान् नरेन्द्र ।
स्थितान् निदेशे नरवर्य धातु-
र्नैशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १५ ॥
कुन्तीनन्दन महाराज युधिष्ठिर! पर्वतशिखरके समान ऊँचे और बड़े-बड़े दाँतोंवाले इन महाबली गजराजोंकी ओर तो देखो। ये भी विधाताके आदेशका पालन करनेमें लगे हैं। इसलिये मैं शक्तिका स्वामी हूँ ऐसा समझकर कभी अधर्माचरण न करे ॥ १५ ॥

सर्वाणि भूतानि नरेन्द्र पश्य
तथा यथावद् विहितं विधात्रा ।
स्वयोनितः कर्म सदा चरन्ति
नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १६ ॥
नरेन्द्र! देखो, ये समस्त प्राणी विधाताके विधानके अनुसार अपनी योनिके अनुरूप सदा कार्य करते रहते हैं, अतः अपनेको बलका स्वामी समझकर अधर्म न करे ॥ १६ ॥

सत्येन धर्मेण यथार्हवृत्त्या
ह्रिया तथा सर्वभूतान्यतीत्य ।
यशश्च तेजश्च तवापि दीप्तं
विभावसोर्भास्करस्येव पार्थ ॥ १७ ॥
कुन्तीनन्दन! तुम अपने सत्य, धर्म, यथायोग्य बर्ताव तथा लज्जा आदि सद्गुणोंके कारण समस्त प्राणियोंसे ऊँचे उठे हुए हो। तुम्हारा यश और तेज अग्नि तथा सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा है ॥ १७ ॥

यथाप्रतिज्ञं च महानुभाव
कृच्छ्रं वने वासमिमं निरुष्य ।
ततः श्रियं तेजसा तेन दीप्ता-
मादास्यसे पार्थिव कौरवेभ्यः ॥ १८ ॥
महानुभाव नरेश! तुम अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार इस कष्टसाध्य वनवासकी अवधि पूरी करके कौरवोंके हाथसे अपनी तेजस्विनी राजलक्ष्मीको प्राप्त कर लोगे ॥ १८ ॥

वैशम्पायन उवाच

तमेवमुक्त्वा वचनं महर्षि-
स्तपस्विमध्ये सहितं सुहृद्भिः ।
आमन्त्र्य धौम्यं सहितांश्च पार्था-
स्ततः प्रतस्थे दिशमुत्तरां सः ॥ १९ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तपस्वी महात्माओंके बीचमें अपने सुहृदोंके साथ बैठे हुए धर्मराज युधिष्ठिरसे पूर्वोक्त बातें कहकर महर्षि मार्कण्डेय धौम्य एवं समस्त पाण्डवोंसे विदा ले उत्तर दिशाकी ओर चल दिये ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्वैतवनप्रवेशे पञ्चविंशोऽध्यायः
॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्वैतवनप्रवेशविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥