महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अग्निस্বরূপ तप और भानु (मनु)-की संततिका वर्णन
एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
अग्निस্বরূপ तप और भानु (मनु)-की संततिका वर्णन
मार्कण्डेय उवाच
गुरुभिर्नियमैर्युक्तो भरतो नाम पावकः ।
अग्निः पुष्टिमतिर्नाम तुष्टः पुष्टिं प्रयच्छति ।
भरत्येष प्रजाः सर्वास्ततो भरत उच्यते ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! पूर्वोक्त भरत नामक अग्नि (जो शंयुके पौत्र और ऊर्जके पुत्र हैं) गुरुतर नियमोंसे युक्त हैं। वे संतुष्ट होनेपर पुष्टि प्रदान करते हैं, इसलिये उनका एक नाम 'पुष्टिमति' भी है। समस्त प्रजाका भरण-पोषण करते हैं, इसलिये उन्हें भरत कहते हैं ॥ १ ॥
अग्निर्यश्च शिवो नाम शक्तिपूजापरश्च सः ।
दुःखार्तानां च सर्वेषां शिवकृत् सततं शिवः ॥ २ ॥
'शिव' नामसे प्रसिद्ध जो अग्नि हैं, वे शक्तिकी आराधनामें लगे रहते हैं। समस्त दुःखातुर मनुष्योंका सदा ही शिव (कल्याण) करते हैं, इसलिये उन्हें 'शिव' कहते हैं ॥ २ ॥
तपसस्तु फलं दृष्ट्वा सम्प्रवृद्धं तपो महत् ।
उद्धर्तुकामो मतिमान् पुत्रो जज्ञे पुरंदरः ॥ ३ ॥
तप (पाञ्चजन्य)-का तपस्याजनित फल (ऐश्वर्य) बढ़कर महान् हो गया है, यह देख उसे प्राप्त करनेकी इच्छासे मानो बुद्धिमान् इन्द्र ही पुरंदर नामसे उनके पुत्र होकर प्रकट हुए ॥ ३ ॥^३.
ऊष्मा चैवोष्मणो जज्ञे सोऽग्निधूतस्य लक्ष्यते ।
अग्निश्चापि मनुर्नाम प्राजापत्यमकारयत् ॥ ४ ॥
उन्हीं पांचजन्यसे 'ऊष्मा' नामक अग्निका प्रादुर्भाव हुआ। जो समस्त प्राणियोंके शरीरमें ऊष्मा (गर्मी)-के द्वारा परिलक्षित होते हैं तथा तपके जो 'मनु' नामक अग्निस্বরূপ पुत्र हैं, उन्होंने 'प्राजापत्य' यज्ञ सम्पन्न कराया था ॥ ४ ॥
शम्भुमग्निमथ प्राहुर्ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
आवसथ्यं द्विजाः प्राहुर्दीप्तमग्निं महाप्रभम् ॥ ५ ॥
वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण 'शम्भु' तथा 'आवसथ्य' नामक अग्निको देदीप्यमान तथा महान् तेजः पुञ्जसे सम्पन्न बताते हैं ॥ ५ ॥
ऊर्जस्करान् हव्यवाहान् सुवर्णसदृशप्रभान् ।
ततस्तपो ह्यजनयत् पञ्च यज्ञसुतानिह ॥ ६ ॥
इस प्रकार जिन्हें यज्ञमें सोमकी आहुति दी जाती है, ऐसे पाँच पुत्रोंको तपने पैदा किया। वे सब-के-सब सुवर्ण-सदृश कान्तिमान्, बल और तेजकी प्राप्ति करानेवाले तथा देवताओंके लिये हविष्य पहुँचानेवाले हैं ।। ६ ।।
प्रशान्तेऽग्निर्महाभाग परिश्रान्तो गवां पतिः ।
असुरान् जनयन् घोरान् मर्त्यांश्चैव पृथग्विधान् ।। ७ ।।
महाभाग! अस्तकालमें परिश्रमसे थके-माँदे सूर्यदेव (अग्निमें प्रविष्ट होनेके कारण) अग्निस্বরূপ हो जाते हैं।³ भयंकर असुरों तथा नाना प्रकारके मरणधर्मा मनुष्योंको उत्पन्न करते हैं। (उन्हें भी तपकी ही संततिके अन्तर्गत माना गया है) ।। ७ ।।
तपसश्च मनुं पुत्रं भानुं चाप्यङ्गिराः सृजत् ।
बृहद्भानुं तु तं प्राहुर्ब्राह्मणा वेदपारगाः ।। ८ ।।
तपके मनु (प्रजापति) स्वरूप पुत्र भानु नामक अग्निको अंगिराने भी (अपना प्रभाव अर्पित करके) नूतन जीवन प्रदान किया है। वेदोंके पारगामी विद्वान् ब्राह्मण भानुको ही ‘बृहद्भानु’ कहते हैं ।। ८ ।।
भानोर्भार्या सुप्रजा तु बृहद्भासा तु सूर्यजा ।
असृजेतां तु षट् पुत्रान् शृणू तासां प्रजाविधिम् ।। ९ ।।
भानुकी दो पत्नियाँ हुईं—सुप्रजा और बृहद्भासा। इनमें बृहद्भासा सूर्यकी कन्या थी। इन दोनोंने छः पुत्रोंको जन्म दिया। इनके द्वारा जो संतानोंकी सृष्टि हुई, उसका वर्णन सुनो ।। ९ ।।
दुर्बलानां तु भूतानामसून यः सम्प्रयच्छति ।
तमग्निं बलदं प्राहुः प्रथमं भानुतः सुतम् ।। १० ।।
जो दुर्बल प्राणियोंको प्राण एवं बल प्रदान करते हैं, उन्हें ‘बलद’ नामक अग्नि बताया जाता है। ये भानुके प्रथम पुत्र हैं ।। १० ।।
यः प्रशान्तेषु भूतेषु मन्युर्भवति दारुणः ।
अग्निः स मन्युमान्नाम द्वितीयो भानुतः सुतः ।। ११ ।।
जो शान्त प्राणियोंमें भयंकर ‘क्रोध’ बनकर प्रकट होते हैं, वे ‘मन्युमान्’ नामक अग्नि भानुके द्वितीय पुत्र हैं ।। ११ ।।
दर्शे च पौर्णमासे च यस्येह हविरुच्यते ।
विष्णुर्नामेह योऽग्निस्तु धृतिमान्नाम सोऽङ्गिराः ।। १२ ।।
यहाँ जिनके लिये दर्श तथा पौर्णमास यागोंमें हविष्य-समर्पणका विधान पाया जाता है, उन अग्निका नाम ‘विष्णु’ है। वे ‘अंगिरा’ गोत्रीय माने गये हैं। उन्हींका दूसरा नाम ‘धृतिमान्’ अग्नि है (ये भानुके तीसरे पुत्र हैं) ।। १२ ।।³
इन्द्रेण सहितं यस्य हविराग्रयणं स्मृतम् ।
अग्निराग्रयणो नाम भानोरेवान्वयस्तु सः ॥ १३ ॥
इन्द्रसहित जिनके लिये आग्रयण (नूतन अन्नद्वारा सम्पन्न होनेवाले यज्ञ) कर्ममें हविष्य-अर्पणका विधान है, वे 'आग्रयण' नामक अग्नि भानुके ही (चौथे) पुत्र हैं ॥
चातुर्मास्येषु नित्यानां हविषां योनिरग्रहः ।
चतुर्भिः सहितः पुत्रैर्भानोरेवान्वयः स्तुभः ॥ १४ ॥
चातुर्मास्य यज्ञोंमें नित्य विहित आग्नेय आदि आठ हविष्योंके जो उद्भवस्थान हैं, उनका नाम 'अग्रह' है। (वे ही वैश्वदेव पर्वमें प्रधान विश्वदेव नामक अग्नि हैं—से भानुके पाँचवें पुत्र हैं) 'स्तुभ' नामक अग्नि भी भानुके ही पुत्र हैं। पहले कहे हुए चार पुत्रोंके साथ जो ये अग्रह (वैश्वदेव) और स्तुभ हैं, इन्हें मिलाकर भानुके छः पुत्र हैं ॥ १४ ॥
निशा त्वजनयत् कन्यामग्नीषोमावुभौ तथा ।
मनोरेवाभवद् भार्या सुषुवे पञ्च पावकान् ॥ १५ ॥
मनु (भानु)-की ही एक तीसरी पत्नी थी, जिसका नाम था निशा। उसने एक कन्या और दो पुत्रों-को जन्म दिया। (कन्याका नाम 'रोहिणी' तथा) पुत्रोंके नाम थे—अग्नि और सोम, इनके सिवा, निशाने पाँच अग्निस্বরূপ पुत्र और भी उत्पन्न किये। (जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—वैश्वानर, विश्वपति, सन्निहित, कपिल और अग्रणी) ॥ १५ ॥
पूज्यते हविषाग्र्येण चातुर्मास्येषु पावकः ।
पर्जन्यसहितः श्रीमानग्निवैश्वानरस्तु सः ॥ १६ ॥
चातुर्मास्य यज्ञोंमें प्रधान हविष्यद्वारा पर्जन्यसहित जिनकी पूजा की जाती है, वे कान्तिमान् वैश्वानर नामक अग्नि (मनुके प्रथम पुत्र) हैं ॥ १६ ॥
अस्य लोकस्य सर्वस्य यः प्रभुः परिपठ्यते ।
सोऽग्निर्विश्वपतिर्नाम द्वितीयो वै मनोः सुतः ॥ १७ ॥
ततः स्विष्टं भवेदाज्यं स्विष्टकृत् परमस्तु सः ।
जो वेदोंमें 'सम्पूर्ण जगत्के पति' कहे गये हैं, वे विश्वपति नामक अग्नि मनुके द्वितीय पुत्र हैं। उन्हींके प्रभावसे हविष्यकी सुन्दरभावसे आहुति-क्रिया सम्पन्न होती है; अतः वे परम स्विष्टकृत् (उत्तम अभीष्टकी पूर्ति करनेवाले) कहे जाते हैं ॥ १७ १/२ ॥
कन्या सा रोहिणी नाम हिरण्यकशिपोः सुता ॥ १८ ॥
कर्मणासौ बभौ भार्या स वह्निः स प्रजापतिः ।
मनुकी कन्या भी 'स्विष्टकृत्' ही मानी गयी है। उसका नाम रोहिणी है; वह मनुकी कुमारी पुत्री किसी अशुभ कर्मके कारण हिरण्यकशिपुकी पत्नी हुई थी। वास्तवमें 'मनु' ही वह्नि है और वे ही 'प्रजापति' कहे गये हैं ॥ १८ १/२ ॥
प्राणानाश्रित्य यो देहं प्रवर्तयति देहिनाम् ।
तस्य संनिहितो नाम शब्दरूपस्य साधनः ॥ १९ ॥
जो देहधारियोंके प्राणोंका आश्रय लेकर उनके शरीरको कार्यमें प्रवृत्त करते हैं, उनका नाम है, 'संनिहित' अग्नि। ये मनुके तीसरे पुत्र हैं। इनके द्वारा शब्द तथा रूपको ग्रहण करनेमें सहायता मिलती है ।। १९ ।।
शुक्लकृष्णगतिर्देवो यो बिभर्ति हुताशनम् ।
अकल्मषः कल्मषाणां कर्ता क्रोधाश्रितस्तु सः ।। २० ।।
कपिलं परमर्षिं च यं प्राहुर्यतयः सदा ।
अग्निः स कपिलो नाम सांख्ययोगप्रवर्तकः ।। २१ ।।
जो दीप्तिमान् महापुरुष, शुक्ल और कृष्ण गतिके आधार हैं, जो अग्निका धारण-पोषण करते हैं, जिनमें किसी प्रकारका कल्मष अर्थात् विकार नहीं है तथापि जो समस्त विकारस्वरूप जगत्के कर्ता हैं, यति लोग जिनको सदा महर्षि कपिलके नामसे कहा करते हैं, जो सांख्ययोगके प्रवर्तक हैं वे क्रोधस्वरूप अग्निके आश्रय कपिल नामक अग्नि हैं। (ये मनुके चौथे पुत्र हैं) ।। २०-२१ ।।
अग्रं यच्छन्ति भूतानां येन भूतानि नित्यदा ।
कर्मस्विह विचित्रेषु सोऽग्रणीर्वह्निरुच्यते ।। २२ ।।
मनुष्य आदि समस्त भूत-प्राणी सर्वदा भाँति-भाँतिके कर्मोंमें जिनके द्वारा सब भूतोंके लिये अन्नका अग्रभाग अर्पण करते हैं वे अग्रणी नामक अग्नि (मनुके पाँचवें पुत्र) कहलाते हैं ।। २२ ।।
इमानन्यान् समसृजत् पावकान् प्रथितान् भुवि ।
अग्निहोत्रस्य दुष्टस्य प्रायश्चित्तार्थमुल्बणान् ।। २३ ।।
मनुने अग्निहोत्र कर्ममें की हुई त्रुटिके प्रायश्चित्त (समाधान)-के लिये इन लोकविख्यात तेजस्वी अग्नियोंकी सृष्टि की, जो पूर्वोक्त अग्नियोंसे भिन्न हैं ।। २३ ।।
संस्पृशेयुर्यदान्योन्यं कथञ्चिद् वायुनाग्नयः ।
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै शुचयेऽग्नये ।। २४ ।।
यदि किसी प्रकार हवाके चलनेसे अग्नियोंका परस्पर स्पर्श हो जाय तो अष्टाकपाल (आठ कपालोंमें* संस्कारपूर्वक तैयार किये हुए) पुरोडाशके द्वारा शुचि नामक अग्निके लिये इष्टि करनी (आहुति देनी) चाहिये ।। २४ ।।
दक्षिणाग्निर्यदा द्वाभ्यां संसृजेत तदा किल ।
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै वीतयेऽग्नये ।। २५ ।।
जब दक्षिणाग्निका गार्हपत्य तथा हवनीय नामक दो अग्नियोंसे संसर्ग हो जाय, तब मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कारपूर्वक तैयार किये हुए पुरोडाशद्वारा 'वीति' नामक अग्निके लिये आहुति देनी चाहिये ।। २५ ।।
यद्यग्नयो हि स्पृश्येयुर्निवेशस्था दवाग्निना ।
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या तु शुचयेऽग्नये ।। २६ ।।
यदि गृहस्थित अग्नियोंका दावानलसे संसर्ग हो जाय तो मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुद्वारा शुचि नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये ॥ २६ ॥
अग्निं रजस्वला वै स्त्री संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् ।
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वसुमतेऽग्नये ॥ २७ ॥
यदि अग्निहोत्र सम्बन्धी अग्निको कोई रजस्वला स्त्री छू दे तो वसुमान् अग्निके लिये मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुद्वारा आहुति देनी चाहिये ॥ २७ ॥
मृतः श्रूयेत यो जीवः परेयुः पशवो यदा ।
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या सुरभिमतेऽग्नये ॥ २८ ॥
यदि किसी प्राणीका मृत्युसूचक विलाप आदि सुनायी दे अथवा कुक्कुर आदि पशु उस अग्निका स्पर्श कर लें, उस दशामें मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत पुरोडाशद्वारा सुरभिमान् नामक अग्निकी प्रसन्नताके लिये होम करना चाहिये ॥ २८ ॥
आर्तो न जुहुयादग्निं त्रिरात्रं यस्तु ब्राह्मणः ।
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या स्वादुत्तराग्नये ॥ २९ ॥
जो ब्राह्मण किसी पीड़ासे आतुर होकर तीन राततक अग्निहोत्र न करे, उसे मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुके द्वारा ‘उत्तर’ नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये ॥ २९ ॥
दर्शं च पौर्णमासं च यस्य तिष्ठेत् प्रतिष्ठितम् ।
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या पथिकृतेऽग्नये ॥ ३० ॥
जिसका चालू किया हुआ दर्श और पौर्णमास याग बीचमें ही बंद हो जाय अथवा बिना आहुति किये ही रह जाय, उसे ‘पथिकृत’ नामक अग्निके लिये मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुके द्वारा होम करना चाहिए ॥
सूतिकाग्निर्यदा चाग्निं संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् ।
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या चाग्निमतेऽग्नये ॥ ३१ ॥
जब सूतिकागृहकी अग्नि, अग्निहोत्रकी अग्निका स्पर्श कर ले, तब मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत पुरोडाशद्वारा ‘अग्निमान्’ नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आंगिरसोपाख्याने एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२१ ॥
१. तप अर्थात् पांचजन्यके जो पूर्वोक्त चालीस पुत्र बताये गये हैं, उनके सिवा, पाँच पुत्र और भी उन्होंने उत्पन्न किये थे। उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—पुरंदर, ऊष्मा, मनु, शम्भु और आवसथ्य। उनका तीसरेसे छठे श्लोकतक वर्णन है।
२. श्रुति भी कहती है—‘आदित्यो वा अस्तं यन्नग्निमनुप्रविशति।’
३. बलद, मन्युमान् तथा विष्णु नामक अग्नि भानुकी भार्या सुप्रजासे उत्पन्न हैं। इसी प्रकार 'आग्रयण' 'अग्रह' और 'स्तुभ'—ये तीन अग्नि बृहद्भासाकी संतान हैं।
- मिट्टीके प्याले या पुरवेका नाम कपाल है।