सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

३०४-

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुरधिकत्रिशततमोऽध्यायः

कुन्तीका पितासे वार्तालाप और ब्राह्मणकी परिचर्या

कुन्त्युवाच

ब्राह्मणं यन्त्रिता राजन्नुपस्थास्यामि पूजया ।
यथाप्रतिज्ञं राजेन्द्र न च मिथ्या ब्रवीम्यहम् ॥ १ ॥
कुन्ती बोली— राजन्! मैं नियमोंमें आबद्ध रहकर आपकी प्रतिज्ञाके अनुसार निरन्तर इन तपस्वी ब्राह्मणकी सेवा-पूजाके लिये उपस्थित रहूँगी। राजेन्द्र! मैं झूठ नहीं बोलती हूँ ॥ १ ॥

एष चैव स्वभावो मे पूजयेयं द्विजानिति ।
तव चैव प्रियं कार्यं श्रेयश्च परमं मम ॥ २ ॥
यह मेरा स्वभाव ही है कि मैं ब्राह्मणोंकी सेवा-पूजा करूँ और आपका प्रिय करना तो मेरे लिये परम कल्याणकी बात है ही ॥ २ ॥

यद्येष्यति सायाह्ने यदि प्रातरथो निशि ।
यद्यर्धरात्रे भगवान् न मे कोपं करिष्यति ॥ ३ ॥
ये पूजनीय ब्राह्मण यदि सायंकाल आवें, प्रातःकाल पधारें अथवा रात या आधीरातमें भी दर्शन दें, ये कभी भी मेरे मनमें क्रोध उत्पन्न नहीं कर सकेंगे—मैं हर समय इनकी समुचित सेवाके लिये प्रस्तुत रहूँगी ॥ ३ ॥

लाभो ममैष राजेन्द्र यद् वै पूजयती द्विजान् ।
आदेशे तव तिष्ठन्ती हितं कुर्यां नरोत्तम ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! नरश्रेष्ठ! मेरे लिये महान् लाभकी बात यही है कि मैं आपकी आज्ञाके अधीन रहकर ब्राह्मणोंकी सेवा-पूजा करती हुई सदैव आपका हित-साधन करूँ ॥ ४ ॥

विस्रब्धो भव राजेन्द्र न व्यलीकं द्विजोत्तमः ।
वसन् प्राप्स्यति ते गेहे सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ५ ॥
महाराज! विश्वास कीजिये। आपके भवनमें निवास करते हुए ये द्विजश्रेष्ठ कभी अपने मनके प्रतिकूल कोई कार्य नहीं देख पायेंगे। यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ ॥ ५ ॥

यत् प्रियं च द्विजस्यास्य हितं चैव तवानघ ।
यतिष्यामि तथा राजन् व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ ६ ॥
निष्पाप नरेश! आपकी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये। मैं वही कार्य करनेका प्रयत्न करूँगी जो इन तपस्वी ब्राह्मणको प्रिय और आपके लिये हितकर हो ॥ ६ ॥

ब्राह्मणा हि महाभागाः पूजिताः पृथिवीपते ।
तारणाय समर्थाः स्युर्विपरीते वधाय च ॥ ७ ॥

क्योंकि पृथ्‍वीपते! महाभाग ब्राह्मण भलीभाँति पूजित होनेपर सेवकको तारनेमें समर्थ होते हैं; और इसके विपरीत अपमानित होनेपर विनाशकारी बन जाते हैं ।। ७ ।।
साहमेतद् विजानन्ती तोषयिष्ये द्विजोत्तमम् ।
न मत्कृते व्यथां राजन् प्राप्स्यसि द्विजसत्तमात् ।। ८ ।।
मैं इस बातको जानती हूँ। अतः इन श्रेष्ठ ब्राह्मणको सब तरहसे संतुष्ट रखूँगी। राजन्! मेरे कारण इन द्विजश्रेष्ठसे आपको कोई कष्ट नहीं प्राप्त होगा ।। ८ ।।
अपराधेऽपि राजेन्द्र राज्ञामश्रेयसे द्विजाः ।
भवन्ति च्यवनो यद्वत् सुकन्यायाः कृते पुरा ।। ९ ।।
राजेन्द्र! किसी बालिकाद्वारा अपराध बन जानेपर भी ब्राह्मणलोग राजाओंका अमंगल करनेको उद्यत हो जाते हैं, जैसे प्राचीनकालमें सुकन्याद्वारा अपराध होनेपर महर्षि च्यवन महाराज शर्यातिको अनिष्ट करनेको उद्यत हो गये थे ।। ९ ।।
नियमेन परेणाहमुपस्थास्ये द्विजोत्तमम् ।
यथा त्वया नरेन्द्रेदं भाषितं ब्राह्मणं प्रति ।। १० ।।
नरेन्द्र! आपने ब्राह्मणके प्रति बर्ताव करनेके विषयमें जो कुछ कहा है, उसके अनुसार मैं उत्तम नियमोंके पालनपूर्वक इन श्रेष्ठ ब्राह्मणकी सेवामें उपस्थित रहूँगी ।।
एवं ब्रुवन्तीं बहुशः परिष्वज्य समर्थ्य च ।
इति चेति च कर्तव्यं राजा सर्वमथादिशत् ।। ११ ।।
इस प्रकार कहती हुई कुन्तीको बारंबार गलेसे लगाकर राजाने उसकी बातोंका समर्थन किया और कैसे-कैसे क्या-क्या करना चाहिये, इसके विषयमें उसे सुनिश्चित आदेश दिया ।। ११ ।।

राजोवाच

एवमेतत् त्वया भद्रे कर्तव्यमविशङ्कया ।
मद्धितार्थं तथाऽऽत्मार्थं कुलार्थं चाप्यनिन्दिते ।। १२ ।।
राजा बोले— भद्रे! अनिन्दिते! मेरे, तुम्हारे तथा कुलके हितके लिये तुम्हें निःशंकभावसे इसी प्रकार यह सब कार्य करना चाहिये ।। १२ ।।
एवमुक्त्वा तु तां कन्यां कुन्तिभोजो महायशाः ।
पृथां परिददौ तस्मै द्विजाय द्विजवत्सलः ।। १३ ।।
ब्राह्मणप्रेमी महायशस्वी राजा कुन्तिभोजने पुत्रीसे ऐसा कहकर उन आये हुए द्विजकी सेवामें पृथाको दे दिया ।। १३ ।।
इयं ब्रह्मन् मम सुता बाला सुखविवर्धिता ।
अपराध्येत यत्र किंचिन्न कार्यं हृदि तत् त्वया ।। १४ ।।

और कहा—'ब्रह्मन्! यह मेरी पुत्री पृथा अभी बालिका है और सुखमें पली हुई है। यदि आपका कोई अपराध कर बैठे, तो भी आप उसे मनमें नहीं लाइयेगा ।। १४ ।।
द्विजातयो महाभागा वृद्धबालतपस्विषु ।
भवन्त्यक्रोधनाः प्रायो ह्यपराद्धेषु नित्यदा ।। १५ ।।
'वृद्ध, बालक और तपस्वीजन यदि कोई अपराध कर दें, तो भी आप-जैसे महाभाग ब्राह्मण प्रायः कभी उनपर क्रोध नहीं करते ।। १५ ।।
सुमहत्यपराधेऽपि क्षान्तिः कार्या द्विजातिभिः ।
यथाशक्ति यथोत्साहं पूजा ग्राह्या द्विजोत्तम ।। १६ ।।
'विप्रवर! सेवकका महान् अपराध होनेपर भी ब्राह्मणोंको क्षमा करनी चाहिये तथा शक्ति और उत्साहके अनुसार उनके द्वारा की हुई सेवा-पूजा स्वीकार कर लेनी चाहिये' ।। १६ ।।
तथेति ब्राह्मणेनोक्तं स राजा प्रीतमानसः ।
हंसचन्द्रांशुसंकाशं गृहमस्मै न्यवेदयत् ।। १७ ।।
ब्राह्मणने 'तथास्तु' कहकर राजाका अनुरोध मान लिया। इससे उनके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने ब्राह्मणको रहनेके लिये हंस और चन्द्रमाकी किरणोंके समान एक उज्ज्वल भवन दे दिया ।। १७ ।।
तत्राग्निशरणे क्लृप्तमासनं तस्य भानुमत् ।
आहारादि च सर्वं तत् तथैव प्रत्यवेदयत् ।। १८ ।।
वहाँ अग्निहोत्रगृहमें उनके लिये चमचमाते हुए सुन्दर आसनकी व्यवस्था हो गयी। भोजन आदिकी सब सामग्री भी राजाने वहीं प्रस्तुत कर दी ।। १८ ।।
निक्षिप्य राजपुत्री तु तन्द्रीं मानं तथैव च ।
आतस्थे परमं यत्नं ब्राह्मणस्याभिराधने ।। १९ ।।
राजकुमारी कुन्ती आलस्य और अभिमानको दूर भगाकर ब्राह्मणकी आराधनामें बड़े यत्नसे संलग्न हो गयी ।। १९ ।।
तत्र सा ब्राह्मणं गत्वा पृथा शौचपरा सती ।
विधिवत् परिचारार्हं देववत् पर्यतोषयत् ।। २० ।।
बाहर-भीतरसे शुद्ध हो सती-साध्वी पृथा उन पूजनीय ब्राह्मणके पास जाकर देवताकी भाँति उनकी विधिवत् आराधना करके उन्हें पूर्णरूपसे संतुष्ट रखने लगी ।। २० ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि पृथाद्विजपरिचर्यायां चतुरधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३०४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें कुन्तीके द्वारा ब्राह्मणकी परिचर्याविषयक तीन सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३०४ ।।