महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
३०१-
एकाधिकत्रिशततमोऽध्यायः
सूर्यका कर्णको समझाते हुए उसे इन्द्रको कुण्डल न देनेका आदेश देना
सूर्य उवाच
माहितं कर्ण कार्षीस्त्वमात्मनः सुहृदां तथा ।
पुत्राणामथ भार्याणामथो मातुरथो पितुः ॥ १ ॥
**सूर्यने कहा—**कर्ण! तुम अपना, अपने सुहृदोंका, पुत्रों और पत्नियोंका तथा माता-पिताका अहित न करो ॥ १ ॥
शरीरस्याविरोधेन प्राणिनां प्राणभृद्वर ।
इष्यते यशसः प्राप्तिः कीर्तिश्च त्रिदिवे स्थिरा ॥ २ ॥
प्राणधारियोंमें श्रेष्ठ वीर! अपने शरीरकी रक्षा करते हुए ही प्राणियोंको इहलोकमें यशकी प्राप्ति तथा स्वर्गमें स्थायी कीर्ति अभीष्ट होती है ॥ २ ॥
यस्त्वं प्राणविरोधेन कीर्तिमिच्छसि शाश्वतीम् ।
सा ते प्राणान् समादाय गमिष्यति न संशयः ॥ ३ ॥
यदि तुम प्राणोंका विरोध (नाश) करके सनातन कीर्ति प्राप्त करना चाहते हो तो इसमें संदेह नहीं कि वह (कीर्ति) तुम्हारे प्राणोंको लेकर ही जायगी ॥ ३ ॥
जीवतां कुरुते कार्यं पिता माता सुतास्तथा ।
ये चान्ये बान्धवाः केचिल्लोकेऽस्मिन् पुरुषर्षभ ॥ ४ ॥
पुरुषरत्न! पिता, माता, पुत्र तथा और जो कोई भी भाई-बन्धु इस लोकमें हैं, वे सब जीवित पुरुषोंसे ही अपने प्रयोजनकी सिद्धि करते हैं ॥ ४ ॥
राजानश्च नरव्याघ्र पौरुषेण निबोध तत् ।
कीर्तिश्च जीवतः साध्वी पुरुषस्य महाद्युते ॥ ५ ॥
महातेजस्वी नरश्रेष्ठ! राजालोग भी जीवित रहनेपर ही पुरुषार्थसे कीर्तिलाभ करते हैं। इस बातको समझो; जीवित पुरुषके लिये ही कीर्ति अच्छी मानी गयी है ॥ ५ ॥
मृतस्य कीर्त्या किं कार्यं भस्मीभूतस्य देहिनः ।
मृतः कीर्तिं न जानीते जीवन् कीर्तिं समश्नुते ॥ ६ ॥
जो मर गया, जिसका शरीर चिताकी आगमें जलकर भस्म हो गया; उसे कीर्तिसे क्या प्रयोजन है? मरा हुआ पुरुष कीर्तिके विषयमें कुछ नहीं जानता। जीवित पुरुष ही कीर्तिजनित सुखका अनुभव करता है ॥ ६ ॥
मृतस्य कीर्तिर्मर्त्यस्य यथा माला गतायुषः ।
अहं तु त्वां ब्रवीम्येतद् भक्तोऽसीति हितेप्सया ॥ ७ ॥
मरे हुए मनुष्यकी कीर्ति मुर्देके गलेमें पड़ी हुई मालाके समान व्यर्थ है। तुम मेरे भक्त हो, इसलिये तुम्हारे हितकी इच्छासे मैं ये सब बातें कहता हूँ ॥ ७ ॥
भक्तिमन्तो हि मे रक्ष्या इत्येतेनापि हेतुना ।
भक्तोऽयं परया भक्त्या मामित्येव महाभुज ।
ममापि भक्तिरुत्पन्ना स त्वं कुरु वचो मम ॥ ८ ॥
मुझे अपने भक्तोंकी रक्षा करनी ही चाहिये, इसलिये भी तुमसे तुम्हारे हितकी बात कहता हूँ। महाबाहो! यह मेरा भक्त है, परम भक्तिभावसे मेरा भजन करता है, यह सोचकर मेरे मनमें भी तुम्हारे प्रति स्नेह जाग उठा है। अतः तुम मेरी आज्ञाका पालन करो ॥ ८ ॥
अस्ति चात्र परं किञ्चिदध्यात्मं देवनिर्मितम् ।
अतश्च त्वां ब्रवीम्येतत् क्रियतामविशङ्कया ॥ ९ ॥
इस सम्बन्धमें एक देवविहित आध्यात्मिक रहस्य है। इसी कारण तुमसे कह रहा हूँ कि तुम बेखटके यही कार्य करो, जिसे मैंने तुम्हें बतलाया है ॥ ९ ॥
देवगुह्यं त्वया ज्ञातुं न शक्यं पुरुषर्षभ ।
तस्मान्नाख्यामि ते गुह्यं काले वेत्स्यति तद् भवान् ॥ १० ॥
पुरुषरत्न! देवताओंकी गुप्त बात तुम नहीं समझ सकते, इसलिये वह गोपनीय रहस्य तुम्हें नहीं बता रहा हूँ। समय आनेपर तुम सब कुछ अपने-आप जान लोगे ॥ १० ॥
पुनरुक्तं च वक्ष्यामि त्वं राधेय निबोध तत् ।
मास्मै ते कुण्डले दद्या भिक्षिते वज्रपाणिना ॥ ११ ॥
राधानन्दन! मैं फिर अपनी कही हुई बात दोहराता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो—'इन्द्रके माँगनेपर भी तुम उन्हें अपने वे कुण्डल न देना' ॥ ११ ॥
शोभसे कुण्डलाभ्यां च रुचिराभ्यां महाद्युते ।
विशाखयोर्मध्यगतः शशीव विमले दिवि ॥ १२ ॥
महाद्युते! तुम इन दोनों मनोहर कुण्डलोंसे निर्मल आकाशमें विशाखा नामक दो नक्षत्रोंके बीच प्रकाशित होनेवाले चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाते हो ॥ १२ ॥
कीर्तिंश्च जीवतः साध्वी पुरुषस्येति विद्धि तत् ।
प्रत्याख्येयस्त्वया तात कुण्डलार्थे सुरेश्वरः ॥ १३ ॥
तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि जीवित पुरुषके लिये ही कीर्ति प्रशंसनीय है। अतः तात! तुम्हें कुण्डलके लिये आये हुए देवराज इन्द्रको देनेसे इनकार कर देना चाहिये ॥ १३ ॥
शक्या बहुविधैर्वाक्यैः कुण्डलेप्सा त्वयानघ ।
विहन्तुं देवराजस्य हेतुयुक्तैः पुनः पुनः ॥ १४ ॥
अनघ! तुम बारंबार युक्तियुक्त वचन कहकर अनेक प्रकारकी बातोंमें बहलाकर देवराज इन्द्रकी कुण्डल लेनेकी इच्छाको नष्ट कर सकते हो ॥ १४ ॥
हेतुमदुपपन्नार्थैर्माधुर्यकृतभूषणैः ।
पुरन्दरस्य कर्ण त्वं बुद्धिमेतामपानुद ॥ १५ ॥
कर्ण! अनेक कारण दिखाकर, नाना प्रकारकी युक्तियाँ सामने रखकर तथा माधुर्यगुणसे विभूषित वचन सुनाकर देवराज इन्द्रके इस कुण्डल लेनेके विचारको तुम पलट देना ॥ १५ ॥
त्वं हि नित्यं नरव्याघ्र स्पर्धसे सव्यसाचिना ।
सव्यसाची त्वया चेह युधि शूरः समेष्यति ॥ १६ ॥
नरव्याघ्र! तुम सदा अर्जुनसे स्पर्धा रखते हो अतः शूरवीर अर्जुन युद्धमें कभी तुमसे अवश्य भिड़ेगा ॥ १६ ॥
न तु त्वामर्जुनः शक्तः कुण्डलाभ्यां समन्वितम् ।
विजेतुं युधि यद्यस्य स्वयमिन्द्रः सखा भवेत् ॥ १७ ॥
यदि तुम इन दोनों कुण्डलोंको धारण किये रहोगे, तो अर्जुन तुम्हें युद्धमें कदापि नहीं जीत सकते; भले ही साक्षात् इन्द्र भी उनकी सहायता करनेके लिये आ जायँ ॥ १७ ॥
तस्मान्न देये शक्राय त्वयैते कुण्डले शुभे ।
संग्रामे यदि निर्जेतुं कर्ण कामयसेऽर्जुनम् ॥ १८ ॥
अतः कर्ण! यदि तुम समरभूमिमें अर्जुनको जीतनेकी अभिलाषा रखते हो तो इन्द्रको ये दोनों शुभ कुण्डल कदापि न देना ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्यकर्णसंवादे एकाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें सूर्य-कर्णसंवादविषयक तीन सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०१ ॥