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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

२४४-

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चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंका गन्धर्वोंके साथ युद्ध

वैशम्पायन उवाच

युधिष्ठिरवचः श्रुत्वा भीमसेनपुरोगमाः ।
प्रहृष्टवदनाः सर्वे समुत्तस्थुर्नर्षभाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! युधिष्ठिरकी बात सुनकर भीमसेन आदि सभी नरश्रेष्ठ पाण्डव युद्धके लिये उठ खड़े हुए। उन सबके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी ॥ १ ॥

अभेद्यानि ततः सर्वे समनह्यन्त भारत ।
जाम्बूनदविचित्राणि कवचानि महारथाः ॥ २ ॥
भारत! तदनन्तर उन समस्त महारथियोंने जाम्बूनद नामक सुवर्णसे विभूषित एवं विचित्र शोभा धारण करनेवाले अभेद्य कवच धारण किये ॥ २ ॥

आयुधानि च दिव्यानि विविधानि समादधुः ।
ते दंशिता रथैः सर्वे ध्वजिनः सशरासनाः ॥ ३ ॥
पाण्डवाः प्रत्यदृश्यन्त ज्वलिता इव पावकाः ।
फिर नाना प्रकारके दिव्य आयुध हाथमें लिये, कवच धारण करके रथोंपर आरूढ़ हो ध्वज और धनुषसे सुशोभित वे समस्त पाण्डव प्रज्वलित अग्नियोंके समान दिखायी देने लगे ॥ ३ १/२ ॥

तान् रथान् साधुसम्पन्नान् संयुक्ताञ्जवनैर्हयैः ॥ ४ ॥
आस्थाय रथशार्दूलाः शीघ्रमेव ययुस्ततः ।
उन रथोंमें तेज चलनेवाले घोड़े जुते हुए थे। वे सभी रथ युद्धकी आवश्यक सामग्रियोंसे पूर्णतः सम्पन्न थे। रथियोंमें श्रेष्ठ पाण्डव उनपर आरूढ़ हो शीघ्र ही वहाँसे चल दिये ॥ ४ १/२ ॥

ततः कौरवसैन्यानां प्रादुरासीन्महास्वनः ॥ ५ ॥
प्रयातान् सहितान् दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रान् महारथान् ।
जितकाशिनश्च खचरास्त्वरिताश्च महारथाः ॥ ६ ॥
क्षणेनैव वने तस्मिन् समाजग्मुरभीतवत् ।
न्यवर्तन्त ततः सर्वे गन्धर्वा जितकाशिनः ॥ ७ ॥
फिर तो कौरव सैनिकोंकी बड़ी भयंकर गर्जना सुनायी देने लगी। महारथी पाण्डवोंको एक साथ धावा बोलते देख विजयश्रीसे सुशोभित होनेवाले आकाशचारी महारथी गन्धर्व बड़ी उतावलीके साथ क्षणभरमें उस वनके भीतर ऐसे एकत्र हो गये मानो उन्हें किसीका

भय न हो। तदनन्तर अपनी विजयसे उल्लसित होते हुए सारे गन्धर्व शत्रुओंका सामना करनेके लिये लौट पड़े ॥ ५–७ ॥

दृष्ट्वा रथागतान् वीरान् पाण्डवांश्चतुरो रणे ।
तांस्तु विभ्राजितान् दृष्ट्वा लोकपालानिवोद्यतान् ॥ ८ ॥
व्यूढानीका व्यतिष्ठन्त गन्धमादनवासिनः ।
उन्होंने देखा, चारों वीर पाण्डव युद्धके लिए उद्यत हो रथपर बैठे हुए आ रहे हैं और अपनी कान्तिसे लोकपालोंके समान उद्भासित हो रहे हैं। यह देखकर गन्धमादननिवासी गन्धर्व अपनी सेनाकी व्यूहरचना करके खड़े हो गये ॥ ८ १/२ ॥

राज्ञस्तु वचनं स्मृत्वा धर्मपुत्रस्य धीमतः ॥ ९ ॥
क्रमेण मृदुना युद्धमुपक्रान्तं च भारत ।
भारत! परम बुद्धिमान् धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके पूर्वोक्त वचनोंको स्मरण करके पाण्डवोंने कोमलतापूर्वक ही युद्ध आरम्भ किया ॥ ९ १/२ ॥

न तु गन्धर्वराजस्य सैनिका मन्दचेतसः ॥ १० ॥
शक्यन्ते मृदुना श्रेयः प्रतिपादयितुं तदा ।
परंतु गन्धर्वराज चित्रसेनके मूढ़ सैनिक ऐसे नहीं थे जिन्हें कोमलतापूर्ण बर्तावके द्वारा कल्याणके पथपर लाया जा सके ॥ १० १/२ ॥

ततस्तान् युधि दुर्धर्षान् सव्यसाची परंतपः ॥ ११ ॥
सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यमुवाच खचरान् रणे ।
विसर्जयत राजानं भ्रातरं मे सुयोधनम् ॥ १२ ॥
तो भी उस समय शत्रुओंको संताप देनेवाले सव्यसाची अर्जुनने रणदुर्जय आकाशचारी गन्धर्वोंको समझाते हुए इस प्रकार कहा—‘तुम सब लोग मेरे भाई राजा दुर्योधनको छोड़ दो’ ॥ ११-१२ ॥

त एवमुक्ता गन्धर्वाः पाण्डवेन यशस्विना ।
उत्स्मयन्तस्तदा पार्थमिदं वचनमब्रुवन् ॥ १३ ॥
यशस्वी पाण्डुनन्दन अर्जुनके ऐसा कहनेपर गन्धर्वोंने मुसकराकर उनसे इस प्रकार कहा— ॥ १३ ॥

एकस्यैव वयं तात कुर्याम वचनं भुवि ।
यस्य शासनमाज्ञाय चरामो विगतज्वराः ॥ १४ ॥
तेनैकेन यथाऽऽदिष्टं तथा वर्ताम भारत ।
न शास्ता विद्यतेऽस्माकमन्यस्तस्मात् सुरेश्वरात् ॥ १५ ॥
‘तात! हम भूमण्डलमें केवल एक व्यक्तिकी ही आज्ञाका पालन करते हैं। भारत! जिनके शासनको शिरोधार्य करके हम निश्चिन्त हो सर्वत्र विचरते हैं। हमारे उन्हीं एकमात्र

स्वामीने जैसी आज्ञा दी है वैसा बर्ताव हम कर रहे हैं। अतः इन देवेश्वरके सिवा दूसरा कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो हमलोगोंपर शासन कर सके' ।। १४-१५ ।।
एवमुक्तः स गन्धर्वैः कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
गन्धर्वान् पुनरेवेदं वचनं प्रत्यभाषत ।। १६ ।।
गन्धर्वोंके ऐसा कहनेपर कुन्तीनन्दन अर्जुनने पुनः उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया— ।। १६ ।।
न तद् गन्धर्वराजस्य युक्तं कर्म जुगुप्सितम् ।
परदाराभिमर्शश्च मानुषैश्च समागमः ।। १७ ।।
‘गन्धर्वो! परायी स्त्रियोंका अपहरण और मनुष्योंके साथ युद्ध—ये घृणित कर्म गन्धर्वराज चित्रसेनको शोभा नहीं देते हैं ।। १७ ।।
उत्सृज्यध्वं महावीर्यान् धृतराष्ट्रसुतानिमान् ।
दारांश्चैषां विमुञ्चध्वं धर्मराजस्य शासनात् ।। १८ ।।
‘अतः तुमलोग धर्मराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे इन महापराक्रमी धृतराष्ट्रके पुत्रों तथा इनकी स्त्रियोंको छोड़ दो ।।
यदा साम्ना न मुञ्चध्वं गन्धर्वा धृतराष्ट्रजान् ।
मोक्षयिष्यामि विक्रम्य स्वयमेव सुयोधनम् ।। १९ ।।
‘गन्धर्वो! यदि इस प्रकार समझाने-बुझानेसे तुमलोग धृतराष्ट्रके पुत्रोंको नहीं छोड़ोगे, तो मैं स्वयं ही पराक्रम करके दुर्योधनको छुड़ा लूँगा’ ।। १९ ।।
एवमुक्त्वा ततः पार्थः सव्यसाची धनंजयः ।
ससर्ज निशितान् बाणान् खचरान् खचरान् प्रति ।। २० ।।
ऐसा कहकर सव्यसाची अर्जुनने गन्धर्वोंके एक-एक दलपर अपने तीखे आकाशगामी बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।। २० ।।
तथैव शरवर्षेण गन्धर्वास्ते बलोत्कटाः ।
पाण्डवानभ्यवर्तन्त पाण्डवाश्च दिवौकसः ।। २१ ।।
इसी प्रकार बलोन्मत्त गन्धर्व भी बाणोंकी बौछार करते हुए पाण्डवोंसे भिड़ गये। इधरसे पाण्डव भी गन्धर्वोंका डटकर सामना करने लगे ।। २१ ।।
ततः सुतुमुलं युद्धं गन्धर्वाणां तरस्विनाम् ।
बभूव भीमवेगानां पाण्डवानां च भारत ।। २२ ।।
भारत! तदनन्तर बलशाली गन्धर्वों तथा भयानक वेगवाले पाण्डवोंमें अत्यन्त भयंकर युद्ध प्रारम्भ हो गया ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि पाण्डवगन्धर्वयुद्धे
चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २४४ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें पाण्डव-गन्धर्वयुद्धविषयक दो सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २४४ ।।