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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

२०३-

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त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

ब्रह्माजीकी उत्पत्ति और भगवान् विष्णुके द्वारा मधुकैटभका वध

मार्कण्डेय उवाच

स एवमुक्तो राजर्षिरुत्तङ्केनापराजितः ।
उत्तङ्कं कौरवश्रेष्ठ कृताञ्जलिरथाब्रवीत् ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**कौरवश्रेष्ठ! उत्तङ्कके इस प्रकार आग्रह करनेपर अपराजित वीर राजर्षि बृहदश्वने उनसे हाथ जोड़कर कहा— ॥ १ ॥

न तेऽभिगमनं ब्रह्मन् मोघमेतद् भविष्यति ।
पुत्रो ममायं भगवन् कुवलाश्व इति स्मृतः ॥ २ ॥
धृतिमान् क्षिप्रकारी च वीर्येणाप्रतिमो भुवि ।
‘ब्रह्मन्! आपका यह आगमन निष्फल नहीं होगा। भगवन्! मेरा यह पुत्र कुवलाश्व भूमण्डलमें अनुपम वीर है। यह धैर्यवान् और फुर्तीला है ॥ २ १/२ ॥

प्रियं च ते सर्वमेतत् करिष्यति न संशयः ॥ ३ ॥
पुत्रैः परिवृतः सर्वैः शूरैः परिघबाहुभिः ।
विसर्जयस्व मां ब्रह्मन् न्यस्तशस्त्रोऽस्मि साम्प्रतम् ॥ ४ ॥
परिघ-जैसी मोटी भुजाओंवाले अपने समस्त शूरवीर पुत्रोंके साथ जाकर यह आपका सारा अभीष्ट कार्य सिद्ध करेगा, इसमें संशय नहीं है। ब्रह्मन्! आप मुझे छोड़ दीजिये। मैंने अब अस्त्र-शस्त्रोंको त्याग दिया है’ ॥

तथास्त्विति च तेनोक्तो मुनिनामिततेजसा ।
स तमादिश्य तनयमुत्तङ्काय महात्मने ॥ ५ ॥
क्रियतामिति राजर्षिर्जगाम वनमुत्तमम् ।
तब अमित तेजस्वी उत्तङ्क मुनिने ‘तथास्तु’ कहकर राजाको वनमें जानेकी आज्ञा दे दी। तत्पश्चात् राजर्षि बृहदश्वने महात्मा उत्तङ्कको अपना वह पुत्र सौंप दिया और धुन्धुका वध करनेकी आज्ञा दे उत्तम तपोवनकी ओर प्रस्थान किया ॥ ५ १/२ ॥

युधिष्ठिर उवाच

क एष भगवन् दैत्यो महावीर्यस्तपोधन ॥ ६ ॥
कस्य पुत्रोऽथ नप्ता वा एतदिच्छामि वेदितुम् ।
**युधिष्ठिरने पूछा—**तपोधन! भगवन्! यह पराक्रमी दैत्य कौन था? किसका पुत्र और नाती था? मैं यह सब जानना चाहता हूँ ॥ ६ १/२ ॥

एवं महाबलो दैत्यो न श्रुतो मे तपोधन ।। ७ ।।
एतदिच्छामि भगवन् याथातथ्येन वेदितुम् ।
सर्वमेव महाप्राज्ञ विस्तरेण तपोधन ।। ८ ।।
तपस्याके धनी मुनीश्वर! ऐसा महाबली दैत्य तो मैंने कभी नहीं सुना था, अतः भगवन्! मैं इसके विषयमें यथार्थ बातें जानना चाहता हूँ। महामते! आप यह सारी कथा विस्तारपूर्वक बताइये ।। ७-८ ।।

मार्कण्डेय उवाच

शृणु राजन्निदं सर्वं यथावृत्तं नराधिप ।
कथ्यमानं महाप्राज्ञ विस्तरेण यथातथम् ।। ९ ।।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! तुम बड़े बुद्धिमान् हो। यह सारा वृत्तान्त मैं यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो ।। ९ ।।

एकार्णवे तदा लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
प्रणष्टेषु च भूतेषु सर्वेषु भरतर्षभ ।। १० ।।
भरतश्रेष्ठ! बात उस समयकी है जब सम्पूर्ण चराचर जगत् एकार्णवके जलमें डूबकर नष्ट हो चुका था। समस्त प्राणी कालके गालमें चले गये थे ।। १० ।।

प्रभवं लोककर्तारं विष्णुं शाश्वतमव्ययम् ।
यमाहुर्मुनयः सिद्धाः सर्वलोकमहेश्वरम् ।। ११ ।।
सुष्वाप भगवान् विष्णुरप्सु योगत एव सः ।
नागस्य भोगे महति शेषस्यामिततेजसः ।। १२ ।।
उस समय वे भगवान् विष्णु एकार्णवके जलमें अमित तेजस्वी शेषनागके विशाल शरीरकी शय्यापर योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करते थे। उन्हीं भगवान्‌को सिद्ध, मुनिगण सबकी उत्पत्तिका कारण, लोकस्रष्टा, सर्वव्यापी, सनातन, अविनाशी तथा सर्वलोकमहेश्वर कहते हैं ।। ११-१२ ।।

लोककर्ता महाभाग भगवानच्युतो हरिः ।
नागभोगेन महता परिरभ्य महीमिमाम् ।। १३ ।।
स्वपतस्तस्य देवस्य पद्मं सूर्यसमप्रभम् ।
नाभ्यां विनिःसृतं दिव्यं तत्रोत्पन्नः पितामहः ।। १४ ।।
साक्षाल्लोकगुरुर्ब्रह्मा पद्मे सूर्यसमप्रभः ।

महाभाग! अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले लोककर्ता भगवान् श्रीहरि नागके विशाल फणके द्वारा धारण की हुई इस पृथ्वीका सहारा लेकर (शेषनागपर) सो रहे थे, उस समय उन दिव्यस्वरूप नारायणकी नाभिसे एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, जो सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था। उसीमें सम्पूर्ण लोकोंके गुरु साक्षात् पितामह ब्रह्माजी प्रकट हुए, जो सूर्यके समान तेजस्वी थे ॥ १३-१४ १/२ ॥
चतुर्वेदश्चतुर्मूर्तिस्तथैव च चतुर्मुखः ॥ १५ ॥
स्वप्रभावाद् दुर्धर्षो महाबलपराक्रमः ।
वे चारों वेदोंके विद्वान् हैं। जरायुज आदि चतुर्विध जीव उन्हींके स्वरूप हैं। उनके चार मुख हैं। उनके बल और पराक्रम महान् हैं। वे अपने प्रभावसे दुर्धर्ष हैं ॥ १५ १/२ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य दानवौ वीर्यवत्तमौ ॥ १६ ॥
मधुश्च कैटभश्चैव दृष्टवन्तौ हरिं प्रभुम् ।
ब्रह्माजीके प्रकट होनेके कुछ काल बाद मधु और कैटभ नामक दो पराक्रमी दानवोंने सर्वसामर्थ्यवान् भगवान् श्रीहरिको देखा ॥ १६ १/२ ॥
शयानं शयने दिव्ये नागभोगे महाद्युतिम् ॥ १७ ॥
बहुयोजनविस्तीर्णे बहुयोजनायते ।
किरीटकौस्तुभधरं पीतकौशेयवाससम् ॥ १८ ॥
वे शेषनागके शरीरकी दिव्य शय्यापर शयन किये हुए थे। उनका तेज महान् है। वे जिस शय्यापर शयन करते हैं, उसकी लंबाई-चौड़ाई कई योजनोंकी है। भगवान्के मस्तकपर किरीट और कण्ठमें कौस्तुभमणिकी शोभा हो रही थी। उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था ॥ १७-१८ ॥
दीप्यमानं श्रिया राजंस्तेजसा वपुषा तथा ।
सहस्रसूर्यप्रतिममद्भुतोपमदर्शनम् ॥ १९ ॥
राजन्! वे अपनी कान्ति और तेजसे उद्दीप्त हो रहे थे। शरीरसे वे सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशित होते थे। उनकी झाँकी अद्भुत और अनुपम थी ॥ १९ ॥
विस्मयः सुमहानासीन्मधुकैटभयोस्तथा ।
दृष्ट्वा पितामहं चापि पद्मे पद्मनिभेक्षणम् ॥ २० ॥
वित्रासयेतामथ तौ ब्रह्माणममितौजसम् ।
वित्रस्यमानो बहुशो ब्रह्मा ताभ्यां महायशाः ॥ २१ ॥
अकम्पयत् पद्मनालं ततोऽबुध्यत केशवः ।
अथापश्यत गोविन्दो दानवौ वीर्यवत्तरौ ॥ २२ ॥
भगवान्को देखकर मधु और कैटभ दोनोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। तत्पश्चात् उनकी दृष्टि कमलमें बैठे हुए कमलनयन पितामह ब्रह्माजीपर पड़ी। उन्हें देखकर वे दोनों दैत्य उन अमित तेजस्वी ब्रह्माजीको डराने लगे। उन दोनोंके द्वारा बार-बार डराये जानेपर

महायशस्वी ब्रह्माजीने उस कमलकी नालको हिलाया। इससे भगवान् गोविन्द जाग उठे। जागनेपर उन्होंने उन दोनों महापराक्रमी दानवोंको देखा ।। २०—२२ ।।
दृष्ट्वा तावब्रवीद् देवः स्वागतं वां महाबलौ ।
ददामि वां वरं श्रेष्ठं प्रीतिर्हि मम जायते ।। २३ ।।
उन महाबली दानवोंको देखकर भगवान् विष्णुने कहा—‘तुम दोनों बड़े बलवान् हो। तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम दोनोंको उत्तम वर दे रहा हूँ; क्योंकि तुम्हें देखकर मुझे प्रसन्नता होती है’ ।। २३ ।।
तौ प्रहस्य हृषीकेशं महादर्पौ महाबलौ ।
प्रत्यब्रूतां महाराज सहितौ मधुसूदनम् ।। २४ ।।
महाराज! वे दोनों महाबली दानव बड़े अभिमानी थे। उन्होंने हँसकर इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् मधुसूदनसे एक साथ कहा— ।। २४ ।।