सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

१८३-

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन

वैशम्पायन उवाच

काम्यकं प्राप्य कौरव्य युधिष्ठिरपुरोगमाः ।
कृतातिथ्या मुनिगणैर्निषेदुः सह कृष्णया ।। १ ।।
ततस्तान् परिविश्वस्तान् वसतः पाण्डुनन्दनान् ।
ब्राह्मणा बहवस्तत्र समन्तात् पर्यवारयन् ।। २ ।।
अथाब्रवीद् द्विजः कश्चिदर्जुनस्य प्रियः सखा ।
स एष्यति महाबाहुर्वशी शौरिरुदारधीः ।। ३ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**कुरुनन्दन जनमेजय! काम्यकवनमें पहुँचनेपर वहाँके मुनियोंने युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंका यथोचित आदर-सत्कार किया। फिर वे द्रौपदीके साथ वहाँ रहने लगे। जब वे विश्वासपात्र पाण्डव वहाँ निवास करने लगे, तब बहुत-से ब्राह्मणोंने आकर सब ओरसे उन्हें घेर लिया (और उन्हींके साथ रहने लगे)। तदनन्तर एक दिन एक ब्राह्मण आया। उसने यह सूचना दी कि सबको वशमें रखनेवाले उदारबुद्धि महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण, जो अर्जुनके प्रिय सखा हैं, अभी यहाँ पधारेंगे ।। १—३ ।।

विदिता हि हरेर्यूयमिहायाताः कुरुद्वहाः ।
सदा हि दर्शनाकाङ्क्षी श्रेयोऽन्वेषी च वो हरिः ।। ४ ।।
कुरुश्रेष्ठ पाण्डवो! आपलोगोंका यहाँ आना भगवान् श्रीकृष्णको ज्ञात हो चुका है। वे सदा आपलोगोंको देखनेके लिये उत्सुक रहते हैं और आपके कल्याणकी बात सोचते रहते हैं ।। ४ ।।

बहुवत्सरजीवी च मार्कण्डेयो महातपाः ।
स्वाध्यायतपसा युक्तः क्षिप्रं युष्मान् समेष्यति ।। ५ ।।
एक शुभ समाचार और है, चिरंजीवी महातपस्वी मार्कण्डेय मुनि, जो स्वाध्याय और तपस्यामें संलग्न रहा करते हैं, शीघ्र ही आपलोगोंसे मिलेंगे ।। ५ ।।

तथैव ब्रुवतस्तस्य प्रत्यदृश्यत केशवः ।
शैब्यसुग्रीवयुक्तेन रथेन रथिनां वरः ।। ६ ।।
मघवानिव पौलोम्या सहितः सत्यभामया ।
उपायाद् देवकीपुत्रो दिदृक्षुः कुरुसत्तमान् ।। ७ ।।

ब्राह्मण इस प्रकारकी बातें कह ही रहा था कि शैब्य और सुग्रीव नामक अश्वोंसे जुते हुए रथद्वारा रथियोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण आते हुए दिखायी दिये। जैसे शचीके साथ इन्द्र आये हों, उसी प्रकार सत्यभामाके साथ देवकीनन्दन श्रीहरि उन कुरुकुलशिरोमणि पाण्डवोंसे मिलने वहाँ आये ।। ६-७ ।।
अवतीर्य रथात् कृष्णो धर्मराजं यथाविधि ।
ववन्दे मुदितो धीमान् भीमं च बलिनां वरम् ।। ८ ।।
परम बुद्धिमान् श्रीकृष्णने रथसे उतरकर बड़ी प्रसन्नताके साथ धर्मराज युधिष्ठिर तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमको विधिपूर्वक प्रणाम किया ।। ८ ।।
पूजयामास धौम्यं च यमाभ्यामभिवादितः ।
परिष्वज्य गुडाकेशं द्रौपदीं पर्यसान्त्वयत् ।। ९ ।।
स दृष्ट्वा फाल्गुनं वीरं चिरस्य प्रियमागतम् ।
पर्यष्वजत दाशार्हः पुनः पुनररिंदमः ।। १० ।।
फिर धौम्य मुनिका पूजन किया। तत्पश्चात् नकुल-सहदेवने आकर उनके चरणोंमें मस्तक झुकाये। इसके बाद निद्राविजयी अर्जुनको हृदयसे लगाकर श्रीकृष्णने द्रौपदीको भलीभाँति सान्त्वना दी। परमप्रिय वीरवर अर्जुनको दीर्घकालके बाद आया देख शत्रुदमन श्रीकृष्णने उन्हें बार-बार हृदयसे लगाया ।। ९-१० ।।
तथैव सत्यभामापि द्रौपदीं परिषस्वजे ।
पाण्डवानां प्रियां भार्यां कृष्णस्य महिषी प्रिया ।। ११ ।।
इसी प्रकार श्रीकृष्णकी प्यारी रानी सत्यभामाने भी पाण्डवोंकी प्रिय पत्नी पांचालीका आलिंगन किया ।। ११ ।।

ततस्ते पाण्डवाः सर्वे सभार्याः सपुरोहिताः ।
आनर्चुः पुण्डरीकाक्षं परिवव्रुश्च सर्वशः ॥ १२ ॥
तदनन्तर पत्नी और पुरोहितसहित समस्त पाण्डवोंने कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णका पूजन किया और सब-के-सब उन्हें घेरकर बैठ गये ॥ १२ ॥
कृष्णस्तु पार्थेन समेत्य विद्वान्
धनंजयेनासुरतर्जनेन ।
बभौ यथा भूतपतिर्महात्मा
समेत्य साक्षाद् भगवान् गुहेन ॥ १३ ॥
सर्वज्ञ भगवान् श्रीकृष्ण असुरोंको भयभीत करनेवाले कुन्तीनन्दन अर्जुनसे मिलकर उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे परम महात्मा साक्षात् भगवान् भूतनाथ शंकर कार्तिकेयसे मिलकर शोभा पाते हैं ॥ १३ ॥
ततः समस्तानि किरीटमाली
वनेषु वृत्तानि गदाग्रजाय ।
उक्त्वा यथावत् पुनरन्वपृच्छत्
कथं सुभद्रा च स चाभिमन्युः ॥ १४ ॥
तदनन्तर किरीटधारी अर्जुनने गदके बड़े भाई भगवान् श्रीकृष्णको वनवासके सारे वृत्तान्त यथार्थरूपसे बताकर पुनः उनसे पूछा—'सुभद्रा और अभिमन्यु कैसे हैं?' ॥ १४ ॥

स पूजयित्वा मधुहा यथावत्
पार्थं च कृष्णां च पुरोहितं च ।
उवाच राजानमभिप्रशंसन्
युधिष्ठिरं तत्र सहोपविश्य ॥ १५ ॥
भगवान् मधुसूदनने अर्जुन, द्रौपदी तथा पुरोहित धौम्यका सम्मान करके सबके साथ बैठकर राजा युधिष्ठिरकी प्रशंसा करते हुए कहा— ॥ १५ ॥

धर्मः परः पाण्डव राज्यलाभात्
तस्यार्थमाहुस्तप एव राजन् ।
सत्यार्जवाभ्यां चरता स्वधर्मं
जितस्त्वयायं च परश्च लोकः ॥ १६ ॥
‘राजन्! पाण्डुनन्दन! राज्यलाभकी अपेक्षा धर्म महान् है। धर्मकी वृद्धिके लिये तपको ही प्रधान साधन बताया गया है। आप सत्य और सरलता आदि सद्गुणोंके साथ-साथ स्वधर्मका पालन करते हैं, अतः आपने इस लोक और परलोक दोनोंको जीत लिया है ॥ १६ ॥

अधीतमग्रे चरता व्रतानि
सम्यग् धनुर्वेदमवाप्यकृत्स्नम् ।
क्षात्रेण धर्मेण वसूनि लब्ध्वा
सर्वे ह्यवाप्ताः क्रतवः पुराणाः ॥ १७ ॥
न ग्राम्यधर्मेषु रतिस्तवास्ति
कामान्न किंचित् कुरुषे नरेन्द्र ।
न चार्थलोभात् प्रजहासि धर्मं
तस्मात् प्रभावादसि धर्मराजः ॥ १८ ॥
‘आपने सबसे पहले ब्रह्मचर्य आदि व्रतोंका पालन करते हुए सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया है। तत्पश्चात् सम्पूर्ण धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की है। इसके बाद क्षत्रिय-धर्मके अनुसार धनका उपार्जन करके समस्त प्राचीन यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। नरेश्वर! जिसमें गँवारोंकी आसक्ति हुआ करती है, उस स्त्री-सम्बन्धी भोगमें आपका अनुराग नहीं है। आप कामनासे प्रेरित होकर कुछ नहीं करते हैं और धनके लोभसे धर्मका त्याग नहीं करते हैं। इसी प्रभावसे धर्मराज कहलाते हैं ॥ १७-१८ ॥

दानं च सत्यं च तपश्च राजन्
श्रद्धा च बुद्धिश्च क्षमा धृतिश्च ।
अवाप्य राष्ट्राणि वसूनि भोगा-
नेषा परा पार्थ सदा रतिस्ते ॥ १९ ॥

‘राजन्! आपने राज्य, धन और भोगोंको पाकर भी सदा दान, सत्य, तप, श्रद्धा, बुद्धि, क्षमा तथा धृति—इन सद्गुणोंसे ही प्रेम किया है ।। १९ ।।