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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

१५४-

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चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

भीमसेनके द्वारा क्रोधवश नामक राक्षसोंकी पराजय और द्रौपदीके लिये सौगन्धिक कमलोंका संग्रह करना

भीम उवाच

पाण्डवो भीमसेनोऽहं धर्मराजादनन्तरः ।
विशालां बदरीं प्राप्तो भ्रातृभिः सह राक्षसाः ॥ १ ॥
अपश्यत् तत्र पाञ्चाली सौगन्धिकमनुत्तमम् ।
अनिलोढमितो नूनं सा बहूनि परीप्सति ॥ २ ॥
**भीमसेन बोले—**राक्षसो! मैं धर्मराज युधिष्ठिरका छोटा भाई पाण्डुपुत्र भीमसेन हूँ और भाइयोंके विशाला बदरी नामक तीर्थमें आकर ठहरा हूँ। वहाँ पाञ्चालराजकुमारी द्रौपदीने सौगन्धिक नामक एक परम उत्तम कमल देखा। उसे देखकर वह उसी तरहके और भी बहुत-से पुष्प प्राप्त करना चाहती है, जो निश्चय ही यहींसे हवामें उड़कर वहाँ पहुँचा होगा ।। १-२ ।।

तस्या मामनवद्याङ्ग्या धर्मपत्नयाः प्रिये स्थितम् ।
पुष्पाहारमिह प्राप्तं निबोधत निशाचराः ॥ ३ ॥
निशाचरो! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि मैं उसी अनिन्द्य सुन्दरी धर्मपत्नीका प्रिय मनोरथ पूर्ण करनेके लिये उद्यत हो बहुत-से सौगन्धिक पुष्पोंका अपहरण करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ ।। ३ ।।

राक्षसा ऊचुः

आक्रीडोऽयं कुबेरस्य दयितः पुरुषर्षभ ।
नेह शक्यं मनुष्येण विहर्तुं मर्त्यधर्मणा ॥ ४ ॥
**राक्षसोंने कहा—**नरश्रेष्ठ! यह सरोवर कुबेरकी परम प्रिय क्रीड़ास्थली है। इसमें मरणधर्मा मनुष्य विहार नहीं कर सकता ।। ४ ।।

देवर्षयस्तथा यक्षा देवाश्चात्र वृकोदर ।
आमन्त्र्य यक्षप्रवरं पिबन्ति रमयन्ति च ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव विहरन्त्यत्र पाण्डव ॥ ५ ॥
वृकोदर! देवर्षि, यक्ष तथा देवता भी यक्षराज कुबेरकी अनुमति लेकर ही यहाँका जल पीते और इसमें विहार करते हैं। पाण्डुनन्दन! गन्धर्व और अप्सराएँ भी इसी नियमके अनुसार यहाँ विहार करती हैं ।। ५ ।।

अन्यायेनेह यः कश्चिदवमान्य धनेश्वरम् ।

विहर्तुमिच्छेद दुर्वृत्तः स विनश्येन्न संशयः ॥ ६ ॥
जो कोई दुराचारी पुरुष धनाध्यक्ष कुबेरकी अवहेलना करके अन्यायपूर्वक यहाँ विहार करना चाहेगा, वह नष्ट हो जायगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥
तमनादृत्य पद्मानि जिहीर्षसि बलादितः ।
धर्मराजस्य चात्मानं ब्रवीषि भ्रातरं कथम् ॥ ७ ॥
भीमसेन! तुम अपने बलके घमंडमें आकर कुबेरकी अवहेलना करके यहाँसे कमलपुष्पोंका अपहरण करना चाहते हो। ऐसी दशामें अपने-आपको धर्मराजका भाई कैसे बता रहे हो? ॥ ७ ॥
आमन्त्र्य यक्षराजं वै ततः पिब हरस्व च ।
नातोऽन्यथा त्वया शक्यं किंचित् पुष्करमीक्षितुम् ॥ ८ ॥
पहले यक्षराजकी आज्ञा ले लो, उसके बाद इस सरोवरका जल पीओ और यहाँसे कमलके फूल ले जाओ। ऐसा किये बिना तुम यहाँके किसी कमलकी ओर देख भी नहीं सकते ॥ ८ ॥

भीमसेन उवाच

राक्षसास्तं न पश्यामि धनेश्वरमिहान्तिके ।
दृष्ट्वापि च महाराजं नाहं याचितुमुत्सहे ॥ ९ ॥
न हि याचन्ति राजान एष धर्मः सनातनः ।
न चाहं हातुमिच्छामि क्षात्रधर्मं कथंचन ॥ १० ॥
**भीमसेन बोले—**राक्षसो! प्रथम तो मैं यहाँ आस-पास कहीं भी धनाध्यक्ष कुबेरको देख नहीं रहा हूँ, दूसरे यदि मैं उन महाराजको देख भी लूँ तो भी उनसे याचना नहीं कर सकता, क्योंकि क्षत्रिय किसीसे कुछ माँगते नहीं हैं, यही उनका सनातन धर्म है। मैं किसी तरह क्षात्र-धर्मको छोड़ना नहीं चाहता ॥ ९-१० ॥
इयं च नलिनी रम्या जाता पर्वतनिर्झरैः ।
नेयं भवनमासाद्य कुबेरस्य महात्मनः ॥ ११ ॥
यह रमणीय सरोवर पर्वतीय झरनोंसे प्रकट हुआ है, यह महामना कुबेरके घरमें नहीं है ॥ ११ ॥
तुल्या हि सर्वभूतानामियं वैश्रवणस्य च ।
एवं गतेषु द्रव्येषु कः कं याचितुमर्हति ॥ १२ ॥
अतः इसपर अन्य सब प्राणियोंका और कुबेरका भी समान अधिकार है। ऐसी सार्वजनिक वस्तुओंके लिये कौन किससे याचना करेगा? ॥ १२ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा राक्षसान् सर्वान् भीमसेनो ह्यमर्षणः ।

व्यगाहत महाबाहुर्नलिनीं तां महाबलः ॥ १३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! सभी राक्षसोंसे ऐसा कहकर अमर्षमें भरे हुए महाबली महाबाहु भीमसेन उस सरोवरमें प्रवेश करने लगे ॥ १३ ॥

ततः स राक्षसैर्वाचा प्रतिषिद्धः प्रतापवान् ।
मा मैवमिति सक्रोधैर्भर्त्सयद्भिः समन्ततः ॥ १४ ॥
उस समय क्रोधमें भरे राक्षस चारों ओरसे प्रतापी भीमको फटकारते हुए वाणीद्वारा रोकने लगे—‘नहीं-नहीं, ऐसा न करो’ ॥ १४ ॥

कदर्थीकृत्य तु स तान् राक्षसान् भीमविक्रमः ।
व्यगाहत महातेजास्ते तं सर्वे न्यवारयन् ॥ १५ ॥
परंतु भयंकर पराक्रमी महातेजस्वी भीम उन सब राक्षसोंकी अवहेलना करके उस जलाशयमें उतर ही गये। यह देख सब राक्षस उन्हें रोकनेकी चेष्टा करते हुए चिल्ला उठे— ॥ १५ ॥

गृह्णीत बध्नीत विकर्ततेमं
पचाम खादाम च भीमसेनम् ।
क्रुद्धा ब्रुवन्तोऽभिययुर्द्रुतं ते
शस्त्राणि चोद्यम्य विवृत्तनेत्राः ॥ १६ ॥
‘अरे! इसे पकड़ो, बाँध लो, काट डालो, हम सब लोग इस भीमको पकायेंगे और खा जायँगे।’ क्रोधपूर्वक उपर्युक्त बातें कहते और आँखें फाड़-फाड़कर देखते हुए वे सभी राक्षस शस्त्र उठाकर तुरंत उनकी ओर दौड़े ॥ १६ ॥

ततः स गुर्वी यमदण्डकल्पां
महागदां काञ्चनपट्टनद्धाम् ।
प्रगृह्य तानभ्यपतत् तरस्वी
ततोऽब्रवीत् तिष्ठत तिष्ठतेति ॥ १७ ॥
तब भीमसेनने यमदण्डके समान विशाल और भारी गदा उठा ली, जिसपर सोनेका पत्र मढ़ा हुआ था। उसे लेकर वे बड़े वेगसे उन राक्षसोंपर टूट पड़े और ललकारते हुए बोले—‘खड़े रहो, खड़े रहो’ ॥ १७ ॥

ते तं तदा तोमरपट्टिशाद्यै-
र्व्याविद्धशस्त्रैः सहसा निपेतुः ।
जिघांसवः क्रोधवशाः सुभीमा
भीमं समन्तात् परिवव्रुरुग्राः ॥ १८ ॥
वातेन कुन्त्यां बलवान् सुजातः
शूरस्तरस्वी द्विषतां निहन्ता ।
सत्ये च धर्मे च रतः सदैव
पराक्रमे शत्रुभिरप्रधृष्यः ॥ १९ ॥
यह देख वे भयंकर क्रोधवश नामक राक्षस भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे शत्रुओंके शस्त्रोंको नष्ट कर देनेवाले तोमर, पट्टिश आदि आयुधोंको लेकर सहसा उनकी ओर दौड़े और उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। वे सब-के-सब बड़े उग्र स्वभावके थे। इधर भीमसेन कुन्तीदेवीके गर्भसे वायु देवताके द्वारा उत्पन्न होनेके कारण बड़े बलवान्, शूरवीर, वेगशाली एवं शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ थे। वे सदा ही सत्य एवं धर्ममें रत थे। पराक्रमी तो वे ऐसे थे कि अनेक शत्रु मिलकर भी उन्हें परास्त नहीं कर सकते थे ॥ १८-१९ ॥
तेषां स मार्गान् विविधान् महात्मा
विहत्य शस्त्राणि च शात्रवाणाम् ।

यथा प्रवीरान् निजघान भीमः
परं शतं पुष्करिणीसमीपे ॥ २० ॥
महामना भीमने शत्रुओंके भाँति-भाँतिके पैंतरों तथा अस्त्र-शस्त्रोंको विफल करके उनके सौसे भी अधिक प्रमुख वीरोंको उस सरोवरके समीप मार गिराया ॥ २० ॥
ते तस्य वीर्यं च बलं च दृष्ट्वा
विद्याबलं बाहुबलं तथैव ।
अशक्नुवन्तः सहितं समन्ताद्
द्रुतं प्रवीराः सहसा निवृत्ताः ॥ २१ ॥
भीमसेनका पराक्रम, शारीरिक बल, विद्याबल और बाहुबल देखकर वे वीर राक्षस एक साथ संगठित होकर भी उनका वेग सहनेमें असमर्थ हो गये और सहसा सब ओरसे युद्ध छोड़कर निवृत्त हो गये ॥ २१ ॥
विदीर्यमाणास्तत एव तूर्ण-
माकाशमास्थाय विमूढसंज्ञाः ।
कैलासशृङ्गाण्यभिदुद्रुवुस्ते
भीमार्दिताः क्रोधवशाः प्रभग्नाः ॥ २२ ॥
भीमसेनकी मारसे क्षत-विक्षत एवं पीड़ित हो वे क्रोधवश नामक राक्षस अपनी सुध-बुध खो बैठे थे। अतः उनके पाँव उखड़ गये और वे तुरंत वहाँसे आकाशमें उड़कर कैलासके शिखरोंपर भाग गये ॥ २२ ॥
स शक्रवद् दानवदैत्यसङ्घान्
विक्रम्य जित्वा च रणेऽरिसङ्घान् ।
विगाह्य तां पुष्करिणीं जितारिः
कामाय जग्राह ततोऽम्बुजानि ॥ २३ ॥
शत्रुविजयी भीम इन्द्रकी भाँति पराक्रम करके दानव और दैत्योंके दलको युद्धमें हराकर उस सरोवरमें प्रविष्ट हो इच्छानुसार कमलोंका संग्रह करने लगे ॥ २३ ॥
ततः स पीत्वामृतकल्पमम्भो
भूयो बभूवोत्तमवीर्यतेजाः ।
उत्पाट्य जग्राह च सोऽम्बुजानि
सौगन्धिकान्युत्तमगन्धवन्ति ॥ २४ ॥
तदनन्तर उस सरोवरका अमृतके समान मधुर जल पीकर वे पुनः उत्तम बल और तेजसे सम्पन्न हो गये और श्रेष्ठ सुगन्धसे युक्त सौगन्धिक कमलोंको उखाड़-उखाड़कर संगृहीत करने लगे ॥ २४ ॥
ततस्तु ते क्रोधवशाः समेत्य
धनेश्वरं भीमबलप्रणुन्नाः ।

भीमस्य वीर्यं च बलं च संख्ये
यथावदाचख्युरतीव भीताः ॥ २५ ॥
तब भीमसेनके बलसे पीड़ित और अत्यन्त भयभीत हुए क्रोधवशोंने धनाध्यक्ष कुबेरके पास जाकर युद्धमें भीमके बल और पराक्रमका यथावत् वृत्तान्त कह सुनाया ॥ २५ ॥

तेषां वचस्तत् तु निशम्य देवः
प्रहस्य रक्षांसि ततोऽभ्युवाच ।
गृह्णातु भीमो जलजानि कामात्
कृष्णानिमित्तं विदितं ममैतत् ॥ २६ ॥
उनकी बातें सुनकर देवप्रवर कुबेरने हँसकर उन राक्षसोंसे कहा—‘मुझे यह मालूम है। भीमसेनको द्रौपदीके लिये इच्छानुसार कमल ले लेने दो’ ॥ २६ ॥

ततोऽभ्यनुज्ञाप्य धनेश्वरं ते
जग्मुः कुरूणां प्रवरं विरोषाः ।
भीमं च तस्यां ददृशुर्नलिन्यां
यथोपजोषं विहरन्तमेकम् ॥ २७ ॥
तब धनाध्यक्षकी आज्ञा पाकर वे राक्षस रोषरहित हो कुरुप्रवर भीमके पास गये और उन्हें अकेले ही उस सरोवरमें इच्छानुसार विहार करते देखा ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौगन्धिकाहरणे चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सौगन्धिकाहरणविषयक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५४ ॥