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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

१२२-

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द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

महर्षि च्यवनको सुकन्याकी प्राप्ति

लोमश उवाच

भृगोर्महर्षेः पुत्रोऽभूच्च्यवनो नाम भारत ।
समीपे सरसस्तस्य तपस्तेपे महाद्युतिः ॥ १ ॥
स्थाणुभूतो महातेजा वीरस्थानेन पाण्डव ।
अतिष्ठत चिरं कालमेकदेशे विशाम्पते ॥ २ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! महर्षि भृगुके पुत्र च्यवन मुनि हुए, जो महान् तेजस्वी थे। उन्होंने उस सरोवरके समीप तपस्या आरम्भ की। पाण्डुनन्दन! परम तेजस्वी महात्मा च्यवन वीरासनसे बैठकर ठूंठे काठके समान जान पड़ते थे। राजन्! वे एक ही स्थानपर दीर्घकालतक अविचलभावसे बैठे रहे ॥ १-२ ॥

स वल्मीकोऽभवदृषिर्लताभिरिव संवृतः ।
कालेन महता राजन् समाकीर्णः पिपीलिकैः ॥ ३ ॥
धीरे-धीरे अधिक समय बीतनेपर उनका शरीर चींटियोंसे व्याप्त हो गया। वे महर्षि लताओंसे आच्छादित हो गये और बाँबीके समान प्रतीत होने लगे ॥ ३ ॥

तथा स संवृतो धीमान् मृत्पिण्ड इव सर्वशः ।
तप्यते स्म तपो घोरं वल्मीकेन समावृतः ॥ ४ ॥
इस प्रकार लता-वेलोंसे आच्छादित हो बुद्धिमान् च्यवन मुनि सब ओरसे केवल मिट्टीके लोंदेके समान जान पड़ने लगे। दीमकोंद्वारा जमा की हुई मिट्टीके ढेरसे ढके हुए वे बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे ॥ ४ ॥

अथ दीर्घस्य कालस्य शर्यातिर्नाम पार्थिवः ।
आजगाम सरो रम्यं विहर्तुमिदमुत्तमम् ॥ ५ ॥
इस प्रकार दीर्घकाल व्यतीत होनेपर राजा शर्याति इस उत्तम एवं रमणीय सरोवरके तटपर विहारके लिये आये ॥ ५ ॥

तस्य स्त्रीणां सहस्राणि चत्वार्यासन् परिग्रहे ।
एकैव च सुता सुभ्रूः सुकन्या नाम भारत ॥ ६ ॥
युधिष्ठिर! उनके अन्तःपुरमें चार हजार स्त्रियाँ थीं, परंतु संतानके नामपर केवल एक ही सुन्दरी पुत्री थी, जिसका नाम सुकन्या था ॥ ६ ॥

सा सखीभिः परिवृता दिव्याभरणभूषिता ।
चंक्रम्यमाणा वल्मीकं भार्गवस्य समासदत् ॥ ७ ॥

वह कन्या दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सखियोंसे घिरी हुई वनमें इधर-उधर घूमने लगी। घूमती-घामती वह भृगुनन्दन च्यवनकी बाँबीके पास जा पहुँची ॥ ७ ॥

सा वै वसुमतीं तत्र पश्यन्ती सुमनोरमाम् ।
वनस्पतीन् विचिन्वन्ती विजहार सखीवृता ॥ ८ ॥
वहाँकी भूमि उसे बड़ी मनोहर दिखायी दी। वह सखियोंके साथ वृक्षोंके फल-फूल तोड़ती हुई चारों ओर घूमने लगी ॥ ८ ॥

रूपेण वयसा चैव मदनेन मदेन च ।
बभञ्ज वनवृक्षाणां शाखाः परमपुष्पिताः ॥ ९ ॥
तां सखीरहितामेकामेकवस्त्रामलंकृताम् ।
ददर्श भार्गवो धीमांश्चरन्तीमिव विद्युतम् ॥ १० ॥
सुन्दर रूप, नयी अवस्था, कामभावके उदय और यौवनके मदसे प्रेरित हो सुकन्याने उत्तम फूलोंसे भरी हुई वन-वृक्षोंकी बहुत-सी शाखाएँ तोड़ लीं। वह सखियोंका साथ छोड़कर अकेली टहलने लगी। उस समय उसके शरीरपर एक ही वस्त्र था और वह भाँति-भाँतिके अलंकारोंसे अलंकृत थी। बुद्धिमान् च्यवन मुनिने उसे देखा। वह चमकती हुई विद्युत्‌के समान चारों ओर विचर रही थी ॥ ९-१० ॥

तां पश्यमानो विजने स रेमे परमद्युतिः ।
क्षामकण्ठश्च विप्रर्षिस्तपोबलसमन्वितः ॥ ११ ॥
उसे एकान्तमें देखकर परम कान्तिमान्, तपोबल-सम्पन्न एवं दुर्बल कण्ठवाले ब्रह्मर्षि च्यवनको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ११ ॥

तामाबभाषे कल्याणीं सा चास्य न शृणोति वै ।
ततः सुकन्या वल्मीके दृष्ट्वा भार्गवचक्षुषी ॥ १२ ॥
कौतूहलात् कण्टकेन बुद्धिमोहबलात्कृता ।
किं नु खल्विदमित्युक्त्वा निर्बिभेदास्य लोचने ॥ १३ ॥
अक्रुध्यत् स तया विद्धे नेत्रे परममन्युमान् ।
ततः शर्यातिसैन्यस्य शकृन्मूत्रे समावृणोत् ॥ १४ ॥
ततो रुद्धे शकृन्मूत्रे सैन्यमानाहदुःखितम् ।
तथागतमभिप्रेक्ष्य पर्यपृच्छत् स पार्थिवः ॥ १५ ॥
तपोनित्यस्य वृद्धस्य रोषणस्य विशेषतः ।
केनापकृतमद्येह भार्गवस्य महात्मनः ॥ १६ ॥
ज्ञातं वा यदि वाऽज्ञातं तद् द्रुतं ब्रूत मा चिरम् ।
तमूचुः सैनिकाः सर्वे न विद्मोऽपकृतं वयम् ॥ १७ ॥
उन्होंने उस कल्याणमयी राजकन्याको पुकारा; परंतु वह (ब्रह्मर्षिका कण्ठ दुर्बल होनेके कारण) उनकी आवाज नहीं सुनती थी। उस बाँबीमें मुनिवर च्यवनकी चमकती हुई

आँखोंको देखकर उसे बहुत कौतूहल हुआ। उसकी बुद्धिपर मोह छा गया और उसने विवश होकर यह कहती हुई कि 'देखूँ यह क्या है?' एक काँटेसे उन्हें छेद दिया। उसके द्वारा आँखें बिंध जानेके कारण परम क्रोधी ब्रह्मर्षि च्यवन अत्यन्त कुपित हो उठे। फिर तो उन्होंने शर्यातिकी सेनाके मल-मूत्र बंद कर दिये। मल-मूत्रका द्वार बंद हो जानेसे मलावरोधके कारण सारी सेनाको बहुत दुःख होने लगा। सैनिकोंकी ऐसी अवस्था देखकर राजाने सबसे पूछा—'यहाँ नित्य-निरन्तर तपस्यामें संलग्न रहनेवाले वयोवृद्ध महामना च्यवन रहते हैं। वे स्वभावतः बड़े क्रोधी हैं। उनका जानकर या बिना जाने आज किसने अपकार किया है? जिन लोगोंने भी ब्रह्मर्षिका अपराध किया हो, वे तुरंत सब कुछ बता दें, विलम्ब न करें।'

तब सम्पूर्ण सैनिकोंने उनसे कहा—'महाराज! हम नहीं जानते कि किसके द्वारा उनका अपराध हुआ है? ।। १२—१७ ।।

सर्वोपायैर्यथाकामं भवांस्तदधिगच्छतु ।
ततः स पृथिवीपालः साम्ना चोग्रेण च स्वयम् ।। १८ ।।
पर्यपृच्छत् सुहृद्वर्गं पर्यजानन्न चैव ते ।
आनाहर्तं ततो दृष्ट्वा तत्सैन्यमसुखार्दितम् ।। १९ ।।
पितरं दुःखितं दृष्ट्वा सुकन्येदमथाब्रवीत् ।
मयाटन्त्येह वल्मीके दृष्टं सत्त्वमभिज्वलत् ।। २० ।।

खद्योतवदभिज्ञातं तन्मया विद्धमन्तिकात् ।
एतच्छ्रुत्वा तु वल्मीकं शर्यातिस्तूर्णमभ्ययात् ॥ २१ ॥
तत्रापश्यत् तपोवृद्धं वयोवृद्धं च भार्गवम् ।
अयाचदथ सैन्यार्थं प्राञ्जलिः पृथिवीपतिः ॥ २२ ॥
'आप अपनी रुचिके अनुसार सभी उपायोंद्वारा इसका पता लगावें।' तब राजा शर्यातिने साम और उग्रनीतिके द्वारा सभी सुहृदोंसे पूछा; परंतु वे भी इसका पता न लगा सके। तदनन्तर सुकन्याने सारी सेनाको मलावरोधके कारण दुःखसे पीड़ित और पिताको भी चिन्तित देख इस प्रकार कहा—'तात! मैंने इस वनमें घूमते समय एक बाँबीके भीतर कोई चमकीली वस्तु देखी, जो जुगनूके समान जान पड़ती थी। उसके निकट जाकर मैंने उसे काँटेसे बींध दिया।' यह सुनकर शर्याति तुरंत ही बाँबीके पास गये। वहाँ उन्होंने तपस्यामें बढ़े-चढ़े वयोवृद्ध महात्मा च्यवनको देखा और हाथ जोड़कर अपने सैनिकोंका कष्ट निवारण करनेके लिये याचना की— ॥ १८—२२ ॥
अज्ञानाद् बालया यत् ते कृतं तत् क्षन्तुमर्हसि ।
ततोऽब्रवीन्महीपालं च्यवनो भार्गवस्तदा ॥ २३ ॥
अपमानादहं विद्धो ह्यनया दर्पपूर्णया ।
रूपौदार्यसमायुक्तां लोभमोहबलात्कृताम् ॥ २४ ॥
तामेव प्रतिगृह्याहं राजन् दुहितरं तव ।
क्षंस्यामीति महीपाल सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २५ ॥
'भगवन्! मेरी बालिकाने अज्ञानवश जो आपका अपराध किया है, उसे आप कृपापूर्वक क्षमा करें।' उनके ऐसा कहनेपर भृगुनन्दन च्यवनने राजासे कहा—'राजन्! तुम्हारी इस पुत्रीने अहंकारवश अपमानपूर्वक मेरी आँखें फोड़ी हैं, अतः रूप और उदारता आदि गुणोंसे युक्त तथा लोभ और मोहके वशीभूत हुई तुम्हारी इस कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त करके ही मैं इसका अपराध क्षमा कर सकता हूँ। भूपाल! यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ' ॥ २३—२५ ॥

लोमश उवाच

ऋषेर्वचनमाज्ञाय शर्यातिरविचारयन् ।
ददौ दुहितरं तस्मै च्यवनाय महात्मने ॥ २६ ॥
लोमशजी कहते हैं—च्यवन ऋषिका यह वचन सुनकर राजा शर्यातिने बिना कुछ विचार किये ही महात्मा च्यवनको अपनी पुत्री दे दी ॥ २६ ॥
प्रतिगृह्य च तां कन्यां भगवान् प्रससाद ह ।
प्राप्तप्रसादो राजा वै ससैन्यः पुरमाव्रजत् ॥ २७ ॥

उस राजकन्याको पाकर भगवान् च्यवन मुनि प्रसन्न हो गये। तत्पश्चात् उनका कृपाप्रसाद प्राप्त करके राजा शर्याति सेनासहित सकुशल अपनी राजधानीको लौट आये ।। २७ ।।

सुकन्यापि पतिं लब्ध्वा तपस्विनमनिन्दिता ।
नित्यं पर्यचरत् प्रीत्या तपसा नियमेन च ।। २८ ।।

सुकन्या भी तपस्वी च्यवनको पतिरूपमें पाकर प्रतिदिन प्रेमपूर्वक तप और नियमका पालन करती हुई उनकी परिचर्या करने लगी ।। २८ ।।

अग्नीनामतिथीनां च शुश्रूषुरनसूयिका ।
समाराधयत क्षिप्रं च्यवनं सा शुभानना ।। २९ ।।

सुमुखी सुकन्या किसीके गुणोंमें दोष नहीं देखती थी। वह त्रिविध अग्नियों और अतिथियोंकी सेवामें तत्पर हो शीघ्र ही महर्षि च्यवनकी आराधनामें लग गयी ।। २९ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौकन्ये
द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२२ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें
सुकन्योपाख्यानविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२२ ।।