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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

१०७-

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सप्ताधिकशततमोऽध्यायः

सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान्‌के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान्‌से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति

लोमश उवाच

एतच्छ्रुत्वान्तरिक्षाच्च स राजा राजसत्तमः ।
यथोक्तं तच्चकाराथ श्रद्दधद् भरतर्षभ ।। १ ।।
लोमशजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! यह आकाशवाणी सुनकर भूपालशिरोमणि राजा सगरने उसपर विश्वास करके उसके कथनानुसार सब कार्य किया ।। १ ।।

एकैकशस्ततः कृत्वा बीजं बीजं नराधिपः ।
घृतपूर्णेषु कुम्भेषु तान् भागान् विदधे ततः ।। २ ।।
नरेशने एक-एक बीजको अलग करके उन सबको घीसे भरे हुए घड़ोंमें रखा ।। २ ।।

धात्रीश्चैकैकशः प्रादात् पुत्ररक्षणतत्परः ।
ततः कालेन महता समुत्तस्थुर्महाबलाः ।। ३ ।।
षष्टिः पुत्रसहस्राणि तस्याप्रतिमतेजसः ।
रुद्रप्रसादाद् राजर्षेः समजायन्त पार्थिव ।। ४ ।।
फिर पुत्रोंकी रक्षाके लिये तत्पर हो सबके लिये पृथक्-पृथक् धायें नियुक्त कर दीं। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उस अनुपम तेजस्वी नरेशके साठ हजार महाबली पुत्र उन घड़ोंमेंसे निकल आये। युधिष्ठिर! राजर्षि सगरके वे सभी पुत्र भगवान् शिवकी कृपासे ही उत्पन्न हुए थे ।। ३-४ ।।

ते घोराः क्रूरकर्माण आकाशपरिसर्पिणः ।
बहुत्वाच्चावजानन्तःसर्वाँल्लोकान् सहामरान् ।। ५ ।।
वे सब-के-सब भयंकर स्वभाववाले और क्रूरकर्मा थे। आकाशमें भी सब ओर घूम-फिर सकते थे। उनकी संख्या अधिक होनेके कारण वे देवताओंसहित सम्पूर्ण लोकोंकी अवहेलना करते थे ।। ५ ।।

त्रिदशांश्चाप्यबाधन्त तथा गन्धर्वराक्षसान् ।
सर्वाणि चैव भूतानि शूराः समरशालिनः ।। ६ ।।
समरभूमिमें शोभा पानेवाले वे शूरवीर राजकुमार देवताओं, गन्धर्वों, राक्षसों तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको कष्ट दिया करते थे ।। ६ ।।

वध्यमानास्ततो लोकाः सागरैर्मन्दबुद्धिभिः ।
ब्रह्माणं शरणं जग्मुः सहिताः सर्वदैवतैः ॥ ७ ॥
मन्दबुद्धि सगरपुत्रोंद्वारा सताये हुए सब लोग सम्पूर्ण देवताओंके साथ ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ ७ ॥

तानुवाच महाभागः सर्वलोकपितामहः ।
गच्छध्वं त्रिदशाः सर्वे लोकैः सार्धं यथागतम् ॥ ८ ॥
उस समय सर्वलोकपितामह महाभाग ब्रह्माने उनसे कहा—'देवताओ! तुम सभी इन सब लोगोंके साथ जैसे आये हो, वैसे लौट जाओ ॥ ८ ॥

नातिदीर्घेण कालेन सागराणां क्षयो महान् ।
भविष्यति महाघोरः स्वकृतैः कर्मभिः सुराः ॥ ९ ॥
'अब थोड़े ही दिनोंमें अपने ही किये हुए अपराधोंद्वारा इन सगरपुत्रोंका अत्यन्त घोर और महान् संहार होगा' ॥ ९ ॥

एवमुक्तास्तु ते देवा लोकाश्च मनुजेश्वर ।
पितामहमनुज्ञाप्य विप्रजग्मुर्यथागतम् ॥ १० ॥
नरेश्वर! उनके ऐसा कहनेपर सब देवता तथा अन्य लोग ब्रह्माजीकी आज्ञा ले जैसे आये थे वैसे लौट गये ॥ १० ॥

ततः काले बहुतिथे व्यतीते भरतर्षभ ।
दीक्षितः सगरो राजा हयमेधेन वीर्यवान् ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर पराक्रमी राजा सगरने अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा ली ॥ ११ ॥

तस्याश्वो व्यचरद् भूमिं पुत्रैः स परिरक्षितः ।
(सर्वैरेव महोत्साहैः स्वच्छन्दप्रचरो नृप ।)
समुद्रं स समासाद्य निस्तोयं भीमदर्शनम् ॥ १२ ॥
रक्ष्यमाणः प्रयत्नेन तत्रैवान्तरधीयत ।
ततस्ते सागरास्तात हृतं मत्वा हयोत्तमम् ॥ १३ ॥
आगम्य पितुराचख्युरदृश्यं तुरगं हृतम् ।
तेनोक्ता दिक्षु सर्वासु सर्वे मार्गंत वाजिनम् ॥ १४ ॥
(ससमुद्रवनद्वीपां विचरन्तो वसुन्धराम् ।)
राजन्! उनका यज्ञिय अश्व उनके अत्यन्त उत्साही सभी पुत्रोंद्वारा सुरक्षित हो स्वच्छन्दगतिसे पृथ्वीपर विचरने लगा। जब वह अश्व भयंकर दिखायी देनेवाले जलशून्य समुद्रके तटपर आया, तब प्रयत्नपूर्वक रक्षित होनेपर भी वहाँ सहसा अदृश्य हो गया। तात! तब उस उत्तम अश्वको अपहृत जानकर सगरपुत्रोंने पिताके पास आकर कहा—'हमारे यज्ञिय अश्वको किसीने चुरा लिया, अब वह दिखायी नहीं देता।' यह सुनकर राजा सगरने

कहा—'तुम सब लोग समुद्र, वन और द्वीपोंसहित सारी पृथ्वीपर विचरते हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें जाकर उस अश्वका पता लगाओ'।। १२—१४।।
ततस्ते पितुराज्ञाय दिक्षु सर्वासु तं हयम्।
अमार्गन्त महाराज सर्वं च पृथिवीतलम्॥ १५॥
ततस्ते सागराः सर्वे समुपेत्य परस्परम्।
नाध्यगच्छन्त तुरगमश्वहर्तारमेव च॥ १६॥
महाराज! तदनन्तर वे पिताकी आज्ञा ले इस सम्पूर्ण भूतलमें सभी दिशाओंमें अश्वकी खोज करने लगे। खोजते-खोजते सभी सगरपुत्र एक-दूसरेसे मिले, परंतु वे अश्व तथा अश्वहर्ताका पता न लगा सके।। १५-१६।।
आगम्य पितरं चोचुस्ततः प्राञ्जलयोऽग्रतः।
ससमुद्रवनद्वीपा सनदीनदकन्दरा॥ १७॥
सपर्वतवनोद्देशा निखिलेन मही नृप।
अस्माभिर्विचिता राजञ्छासनात् तव पार्थिव॥ १८॥
न चाश्वमधिगच्छामो नाश्वहर्तारमेव च।
श्रुत्वा तु वचनं तेषां स राजा क्रोधमूर्च्छितः॥ १९॥
उवाच वचनं सर्वांस्तदा दैववशान्नृप।
अनागमाय गच्छध्वं भूयो मार्गत वाजिनम्॥ २०॥
यज्ञियं तं विना ह्यश्वं नागन्तव्यं हि पुत्रकाः।
प्रतिगृह्य तु संदेशं पितुस्ते सगरात्मजाः॥ २१॥
भूय एव महीं कृत्स्नां विचेतुमुपचक्रमुः।
अथापश्यन्त ते वीराः पृथिवीमवदारिताम्॥ २२॥
तब वे पिताके पास आकर उनके आगे हाथ जोड़कर बोले—'महाराज! हमने आपकी आज्ञासे समुद्र, वन, द्वीप, नदी, नद, कन्दरा, पर्वत और वन्य प्रदेशोंसहित सारी पृथ्वी खोज डाली, परंतु हमें न तो अश्व मिला न उसका चुरानेवाला ही।' युधिष्ठिर! उनकी यह बात सुनकर राजा सगर क्रोधसे मूर्च्छित हो उठे और उस समय दैववश उन सबसे इस प्रकार बोले—'जाओ, लौटकर न आना। पुनः घोड़ेका पता लगाओ। पुत्रो! उस यज्ञके अश्वको लिये बिना वापस न आना।' पिताका वह संदेश शिरोधार्य करके सगरपुत्रोंने फिर सारी पृथ्वीपर अश्वको ढूँढ़ना आरम्भ किया। तदनन्तर उन वीरोंने एक स्थानपर पृथ्वीमें दरार पड़ी हुई देखी।। १७—२२।।
समासाद्य बिलं तच्चाप्यखनन् सगरात्मजाः।
कुद्दालैर्हेषुकैश्चैव समुद्रं यत्नमास्थिताः॥ २३॥
उस बिलके पास पहुँचकर सगरपुत्रोंने कुदालों और फावड़ोंसे समुद्रको प्रयत्नपूर्वक खोदना आरम्भ किया।।

स खन्यमानः सहितैः सागरैर्वरुणालयः ।
अगच्छत् परमामार्तिं दीर्यमाणः समन्ततः ॥ २४ ॥
असुरोरगरक्षांसि सत्त्वानि विविधानि च ।
आर्तनादमकुर्वन्त वध्यमानानि सागरैः ॥ २५ ॥
एक साथ लगे हुए सगरकुमारोंके खोदनेपर सब ओरसे विदीर्ण होनेवाले समुद्रको बड़ी पीड़ाका अनुभव होता था। सगरपुत्रोंके हाथों मारे जाते हुए असुर, नाग, राक्षस और नाना प्रकारके जन्तु बड़े जोरसे आर्तनाद करते थे ॥ २४-२५ ॥
छिन्नशीर्षा विदेहाश्च भिन्नत्वगस्थिसंधयः ।
प्राणिनः समदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २६ ॥
सैकड़ों और हजारों ऐसे प्राणी दिखायी देने लगे जिनके मस्तक कट गये थे, शरीर छिन्न-भिन्न हो गये थे, चमड़े छिल गये थे तथा हड्डियोंके जोड़ टूट गये थे ॥ २६ ॥
एवं हि खनतां तेषां समुद्रं वरुणालयम् ।
व्यतीतः सुमहान् कालो न चाश्वः समदृश्यत ॥ २७ ॥
इस प्रकार वरुणके निवासभूत समुद्रकी खुदाई करते-करते उनका बहुत समय बीत गया, परंतु वह अश्व कहीं दिखायी नहीं दिया ॥ २७ ॥
ततः पूर्वोत्तरे देशे समुद्रस्य महीपते ।
विदार्य पातालमथ संक्रुद्धाः सगरात्मजाः ॥ २८ ॥
अपश्यन्त हयं तत्र विचरन्तं महीतले ।
कपिलं च महात्मानं तेजोराशिमनुत्तमम् ।
तेजसा दीप्यमानं तु ज्वालाभिरिव पावकम् ॥ २९ ॥
राजन्! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए सगरपुत्रोंने समुद्रके पूर्वोत्तर प्रदेशमें पाताल फोड़कर प्रवेश किया और वहाँ उस यज्ञिय अश्वको पृथ्वीपर विचरते देखा। वहीं तेजकी परम उत्तम राशि महात्मा कपिल बैठे थे, जो अपने दिव्य तेजसे उसी प्रकार उद्भासित हो रहे थे, जैसे लपटोंसे अग्नि ॥ २८-२९ ॥
ते तं दृष्ट्वा हयं राजन् सम्प्रहृष्टतनूरुहाः ।
अनादृत्य महात्मानं कपिलं कालचोदिताः ॥ ३० ॥
संक्रुद्धाः सम्प्रधावन्त अश्वग्रहणकाङ्क्षिणः ।
ततः क्रुद्धो महाराज कपिलो मुनिसत्तमः ॥ ३१ ॥
राजन्! उस अश्वको देखकर उनके शरीरमें हर्षजनित रोमाञ्च हो आया। वे कालसे प्रेरित हो क्रोधमें भरकर महात्मा कपिलका अनादर करके उस अश्वको पकड़नेके, लिये दौड़े। महाराज! तब मुनिश्रेष्ठ कपिल कुपित हो उठे ॥ ३०-३१ ॥