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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

१०३-

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त्र्यधिकशततमोऽध्यायः

भगवान् विष्णुके आदेशसे देवताओंका महर्षि अगस्त्यके आश्रमपर जाकर उनकी स्तुति करना

देवा ऊचुः
तव प्रसादाद् वर्धन्ते प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः ।
ता भाविता भावयन्ति हव्यकव्यैर्दिवौकसः ॥ १ ॥
**देवता कहते हैं—**प्रभो! जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—इन चार भेदोंवाली सम्पूर्ण प्रजा आपकी कृपासे ही वृद्धिको प्राप्त होती है। अभ्युदयशील होनेपर वे (मानव) प्रजाएँ ही हव्य और कव्योंद्वारा देवताओंका भरण-पोषण करती हैं ॥ १ ॥
लोका ह्येवं विवर्धन्ते ह्यन्योन्यं समुपाश्रिताः ।
त्वत्प्रसादान्निरुद्विग्नास्त्वयैव परिरक्षिताः ॥ २ ॥
इदं च समनुप्राप्तं लोकानां भयमुत्तमम् ।
न च जानीम केनेमे रात्रौ वध्यन्ति ब्राह्मणाः ॥ ३ ॥
इसी प्रकार सब लोग एक-दूसरेके सहारे उन्नति करते हैं। आपकी ही कृपासे सब प्राणी उद्वेगरहित जीवन बिताते और आपके द्वारा ही सर्वथा सुरक्षित रहते हैं। भगवन्! मनुष्योंके समक्ष यह बड़ा भारी भय उपस्थित हुआ है। न जाने कौन रातमें आकर इन ब्राह्मणोंका वध कर रहा है ॥ २-३ ॥
क्षीणेषु च ब्राह्मणेषु पृथिवी क्षयमेष्यति ।
ततः पृथिव्यां क्षीणायां त्रिदिवं क्षयमेष्यति ॥ ४ ॥
ब्राह्मणोंके नष्ट होनेपर सारी पृथ्वी नष्ट हो जायगी और पृथ्वीका नाश होनेपर स्वर्ग भी नष्ट हो जायगा ॥ ४ ॥
त्वत्प्रसादान्महाबाहो लोकाः सर्वे जगत्पते ।
विनाशं नाधिगच्छेयुस्त्वया वै परिरक्षिताः ॥ ५ ॥
महाबाहो! जगत्पते! आप ऐसी कृपा करें, जिससे आपके द्वारा सुरक्षित होकर सब लोग विनाशको न प्राप्त हों ॥ ५ ॥

विष्णुरुवाच
विदितं मे सुराः सर्वं प्रजानां क्षयकारणम् ।
भवतां चापि वक्ष्यामि शृणुध्वं विगतज्वराः ॥ ६ ॥
**भगवान् विष्णु बोले—**देवताओ! प्रजाके विनाशका जो कारण उपस्थित हुआ है वह सब मुझे ज्ञात है। मैं तुमलोगोंको भी बता रहा हूँ; निश्चिन्त होकर सुनो ॥ ६ ॥

कालेय इति विख्यातो गणः परमदारुणः ।
तैश्च वृत्रं समाश्रित्य जगत् सर्वं प्रमाथितम् ॥ ७ ॥
दैत्योंका एक अत्यन्त भयंकर दल है जो कालेय नामसे विख्यात है। उन दैत्योंने वृत्रासुरका सहारा लेकर सारे संसारमें तहलका मचा दिया था ॥ ७ ॥
ते वृत्रं निहतं दृष्ट्वा सहस्राक्षेण धीमता ।
जीवितं परिरक्षन्तः प्रविष्टा वरुणालयम् ॥ ८ ॥

परम बुद्धिमान् इन्द्रके द्वारा वृत्रासुरको मारा गया देख वे अपने प्राण बचानेके लिये समुद्रमें जाकर छिप गये हैं ॥ ८ ॥
ते प्रविश्योदधिं घोरं नक्रग्राहसमाकुलम् ।
उत्सादनार्थं लोकानां रात्रौ घ्नन्ति ऋषीनिह ॥ ९ ॥
नाक और ग्राहोंसे भरे हुए भयंकर समुद्रमें घुसकर वे सम्पूर्ण जगत्का संहार करनेके लिये रातमें निकलते तथा यहाँ ऋषियोंकी हत्या करते हैं ॥ ९ ॥
न तु शक्याः क्षयं नेतुं समुद्राश्रयगा हि ते ।
समुद्रस्य क्षये बुद्धिर्भवद्भिः सम्प्रधार्यताम् ॥ १० ॥
उन दानवोंका संहार नहीं किया जा सकता; क्योंकि वे दुर्गम समुद्रके आश्रयमें रहते हैं। अतः तुम-लोगोंको समुद्रको सुखानेका विचार करना चाहिये ॥ १० ॥
अगस्त्येन विना को हि शक्तोऽन्योऽर्णवशोषणे ।

अन्यथा हि न शक्यास्ते विना सागरशोषणम् ।। ११ ।।
महर्षि अगस्त्यके सिवा दूसरा कौन है जो समुद्रका शोषण करनेमें समर्थ हो। समुद्रको सुखाये बिना वे दानव काबूमें नहीं आ सकते ।। ११ ।।

एतच्छ्रुत्वा तदा देवा विष्णुना समुदाहृतम् ।
परमेष्ठिनमाज्ञाप्य अगस्त्यस्याश्रमं ययुः ।। १२ ।।
भगवान् विष्णुकी कही हुई यह बात सुनकर देवता ब्रह्माजीकी आज्ञा ले अगस्त्यके आश्रमपर गये ।।

तत्रापश्यन् महात्मानं वारुणिं दीप्ततेजसम् ।
उपास्यमानमृषिभिर्देवैरिव पितामहम् ।। १३ ।।
वहाँ उन्होंने मित्रावरुणके पुत्र महात्मा अगस्त्यजीको देखा। उनका तेज उद्भासित हो रहा था। जैसे देवतालोग ब्रह्माजीके पास बैठते हैं, उसी प्रकार बहुत-से ऋषि-मुनि उनके निकट बैठे थे ।। १३ ।।

तेऽभिगम्य महात्मानं मैत्रावरुणिमच्युतम् ।
आश्रमस्थं तपोराशिं कर्मभिः स्वैरभिष्टुवन् ।। १४ ।।
अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले मित्रावरुण नन्दन तपोराशि महात्मा अगस्त्य आश्रममें ही विराजमान थे। देवताओंने समीप जाकर उनके अद्भुत कर्मोंका वर्णन करते हुए स्तुति प्रारम्भ की ।। १४ ।।

देवा ऊचुः

नहुषेणाभितप्तानां त्वं लोकानां गतिः पुरा ।
भ्रंशितश्च सुरैश्वर्यात् स्वर्लोकाल्लोककण्टकः ।। १५ ।।
**देवता बोले—**भगवन्! पूर्वकालमें राजा नहुषके अन्यायसे संतप्त हुए लोकोंकी आपने ही रक्षा की थी। आपने ही उस लोककण्टक नरेशको देवेन्द्रपद तथा स्वर्गसे नीचे गिरा दिया था ।। १५ ।।

क्रोधात् प्रवृद्धः सहसा भास्करस्य नगोत्तमः ।
वचस्तवानतिक्रामन् विन्ध्यः शैलो न वर्धते ।। १६ ।।
पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्य सूर्यदेवपर क्रोध करके जब सहसा बढ़ने लगा तब आपने ही उसे रोका था। आपकी आज्ञाका उल्लंघन न करते हुए विन्ध्यगिरि आज भी बढ़ नहीं रहा है ।। १६ ।।

तमसा चावृते लोके मृत्युनाभ्यर्दिताः प्रजाः ।
त्वामेव नाथमासाद्य निर्वृतिं परमां गताः ।। १७ ।।
विन्ध्यगिरिके बढ़नेसे जब सारे जगत्में अन्धकार छा गया और सारी प्रजा मृत्युसे पीड़ित होने लगी। उस समय आपको ही अपना रक्षक पाकर सबने अत्यन्त हर्षका अनुभव

किया था ॥ १७ ॥
अस्माकं भयभीतानां नित्यशो भगवान् गतिः ।
ततस्त्वार्ताः प्रयाचामो वरं त्वां वरदो ह्यसि ॥ १८ ॥
सदा आप ही हम भयभीत देवताओंके लिये आश्रय होते आये हैं। अतः इस समय भी संकटमें पड़कर हम आपसे वर माँग रहे हैं; क्योंकि आप ही वर देनेके योग्य हैं ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि
लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्यमाहात्म्यकथने त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्यमाहात्म्य-वर्णनविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०३ ॥