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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

१०२-

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द्व्यधिकशततमोऽध्यायः

कालेयोंद्वारा तपस्वियों, मुनियों और ब्रह्मचारियों आदिका संहार तथा देवताओंद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति

लोमश उवाच

समुद्रं ते समाश्रित्य वारुणं निधिमम्भसः ।
कालेयाः सम्प्रवर्तन्त त्रैलोक्यस्य विनाशने ॥ १ ॥
लोमशजी कहते हैं— राजन्! वरुणके निवासस्थान जलनिधि समुद्रका आश्रय लेकर कालेय नामक दैत्य तीनों लोकोंके विनाश-कार्यमें लग गये ॥ १ ॥

ते रात्रौ समभिक्रुद्धा भक्षयन्ति सदा मुनीन् ।
आश्रमेषु च ये सन्ति पुण्येष्वायतनेषु च ॥ २ ॥
वे सदा रातमें कुपित होकर आते और आश्रमों तथा पुण्य-स्थानोंमें जो निवास करते थे उन मुनियोंको खा जाते थे ॥ २ ॥

वसिष्ठस्याश्रमे विप्रा भक्षितास्तैर्दुरात्मभिः ।
अशीतिः शतमष्टौ च नव चान्ये तपस्विनः ॥ ३ ॥
उन दुरात्माओंने वसिष्ठके आश्रममें निवास करनेवाले एक सौ अठ्ठासी ब्राह्मणों तथा नौ दूसरे तपस्वियोंको अपना आहार बना लिया ॥ ३ ॥

च्यवनस्याश्रमं गत्वा पुण्यं द्विजिनषेवितम् ।
फलमूलाशननां हि मुनीनां भक्षितं शतम् ॥ ४ ॥
च्यवन मुनिके पवित्र आश्रममें, जहाँ बहुत-से द्विज निवास करते थे, जाकर उन दैत्योंने फल-मूलका आहार करनेवाले सौ मुनियोंका भक्षण कर लिया ॥ ४ ॥

एवं रात्रौ स्म कुर्वन्ति विविशुश्चार्णवं दिवा ।
भरद्वाजाश्रमे चैव नियता ब्रह्मचारिणः ॥ ५ ॥
वाय्वाहाराम्बुभक्षाश्च विंशतिः संनिषूदिताः ।
एवं क्रमेण सर्वांस्तानाश्रमान् दानवास्तदा ॥ ६ ॥
निशायां परिबाधन्ते मत्ता भुजबलाश्रयात् ।
कालोपसृष्टाः कालेया घ्नन्तो द्विजगणान् बहून् ॥ ७ ॥
न चैनानन्वबुध्यन्त मनुजा मनुजोत्तम ।
एवं प्रवृत्तान् दैत्यांस्तांस्तापसेषु तपस्विषु ॥ ८ ॥
इस प्रकार वे रातमें तपस्वी मुनियोंका संहार करते और दिनमें समुद्रके जलमें प्रवेश कर जाते थे। भरद्वाज मुनिके आश्रममें वायु और जल पीकर संयम-नियमके साथ रहनेवाले

बीस ब्रह्मचारियोंको कालेयोंने कालके गालमें डाल दिया। इस तरह क्रमशः सभी आश्रमोंमें जाकर अपने बाहुबलके भरोसे उन्मत्त रहनेवाले दानव रातमें वहाँके निवासियोंको सर्वथा कष्ट पहुँचाया करते थे। नरश्रेष्ठ! कालेय दानव कालके अधीन हो रहे थे; इसीलिये वे असंख्य ब्राह्मणोंकी हत्या करते चले जा रहे थे। मनुष्योंको उनके इस षड्यन्त्रका पता नहीं लगता था। इस प्रकार वे तपस्याके धनी तापसोंके संहारमें प्रवृत्त हो रहे थे॥ ५–८॥

प्रभाते समदृश्यन्त नियताहारकर्षिताः ।
महीतलस्था मुनयः शरीरैर्गतजीवितैः ॥ ९ ॥
प्रातःकाल आनेपर नियमित आहारसे दुर्बल मुनिगण अपने अस्थिमात्रावशिष्ट निष्प्राण शरीरोंसे पृथ्वीपर पड़े दिखायी देते थे॥ ९॥

क्षीणमांसैर्विरुधिरैर्विमज्जान्त्रैर्विसंधिभिः ।
आकीर्णैरबभौ भूमिः शङ्खानामिव राशिभिः ॥ १० ॥
राक्षसोंके द्वारा भक्षण करनेके कारण उनके शरीरोंका मांस तथा रक्त क्षीण हो चुका था। वे मज्जा, आँतें और संधिस्थानों (घुटने आदि)-से रहित हो गये थे। इस तरह सब ओर फैली हुई सफेद हड्डियोंके कारण वहाँकी भूमि शंखराशिसे आच्छादित-सी प्रतीत होती थी॥ १०॥

कलशैर्विप्रविद्धैश्च सुवैर्भग्नैस्तथैव च ।
विकीर्णैरग्निहोत्रैश्च भूर्बभूव समावृता ॥ ११ ॥
उलटे-पुलटे पड़े हुए कलशों, टूटे-फूटे सुवों तथा बिखरी पड़ी हुई अग्निहोत्रकी सामग्रियोंसे उन आश्रमोंकी भूमि आच्छादित हो रही थी॥ ११॥

निःस्वाध्यायवषट्कारं नष्टयज्ञोत्सवक्रियम् ।
जगदासीन्निरुत्साहं कालेयभयपीडितम् ॥ १२ ॥
स्वाध्याय और वषट्कार बंद हो गये। यज्ञोत्सव आदि कार्य नष्ट हो गये। कालेयोंके भयसे पीड़ित हुए सम्पूर्ण जगत्में कहीं कोई उत्साह नहीं रह गया था॥

एवं संक्षीयमाणाश्च मानवा मनुजेश्वर ।
आत्मत्राणपराभीताः प्राद्रवन्त दिशो भयात् ॥ १३ ॥
नरेश्वर! इस प्रकार दिन-दिन नष्ट होनेवाले मनुष्य भयभीत हो अपनी रक्षाके लिये चारों दिशाओंमें भाग गये॥ १३॥

केचिद् गुहाः प्रविविशुर्निर्झरांश्चापरे तथा ।
अपरे मरणोद्विग्ना भयात् प्राणान् समुत्सृजन् ॥ १४ ॥
कुछ लोग गुफाओंमें जा छिपे। कितने ही मानव झरनोंके आस-पास रहने लगे और कितने ही मनुष्य मृत्युसे इतने घबरा गये कि भयसे ही उनके प्राण निकल गये॥ १४॥

केचिदत्र महेष्वासाः शूराः परमहर्षिताः ।
मार्गमाणाः परं यत्नं दानवानां प्रचक्रिरे ॥ १५ ॥

इस भूतलपर कुछ महान् धनुर्धर शूरवीर भी थे, जो अत्यन्त हर्ष और उत्साहसे युक्त हो दानवोंके स्थानका पता लगाते हुए उनके दमनके लिये भारी प्रयत्न करने लगे ॥ १५ ॥
न चैतानधिजग्मुस्ते समुद्रं समुपाश्रितान् ।
श्रमं जग्मुश्च परममाजग्मुः क्षयमेव च ॥ १६ ॥
परंतु समुद्रमें छिपे हुए दानवोंको वे पकड़ नहीं पाते। उन्होंने बहुत परिश्रम किया और अन्तमें थककर वे पुनः अपने घरको ही लौट आये ॥ १६ ॥
जगत्युपशमं याते नष्टयज्ञोत्सवक्रिये ।
आजग्मुः परमामार्तिं त्रिदशा मनुजेश्वर ॥ १७ ॥
मनुजेश्वर! यज्ञोत्सव आदि कार्योंके नष्ट हो जानेपर जब जगत्का विनाश होने लगा, तब देवताओंको बड़ी पीड़ा हुई ॥ १७ ॥
समेत्य समहेन्द्राश्च भयान्मन्त्रं प्रचक्रिरे ।
शरण्यं शरणं देवं नारायणमजं विभुम् ॥ १८ ॥
तेऽभिगम्य नमस्कृत्य वैकुण्ठमपराजितम् ।
ततो देवाः समस्तास्ते तदोचुर्मधुसूदनम् ॥ १९ ॥
इन्द्र आदि सब देवताओंने मिलकर भयसे मुक्त होनेके लिये मन्त्रणा की। फिर वे समस्त देवता सबको शरण देनेवाले, शरणागतवत्सल, अजन्मा एवं सर्वव्यापी, अपराजित वैकुण्ठनाथ भगवान् नारायणदेवकी शरणमें गये और नमस्कार करके उन मधुसूदनसे बोले — ॥
त्वं नः स्रष्टा च भर्ता च हर्ता च जगतः प्रभो ।
त्वया सृष्टमिदं विश्वं यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति ॥ २० ॥
'प्रभो! आप ही हमारे स्रष्टा और पालक हैं। आप ही सम्पूर्ण जगत्का संहार करनेवाले हैं। इस स्थावर और जंगम सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि आपने ही की है ॥
त्वया भूमिः पुरा नष्टा समुद्रात् पुष्करेक्षण ।
वाराहं वपुराश्रित्य जगदर्थे समुद्धृता ॥ २१ ॥
'कमलनयन! पूर्वकालमें आपने वाराहरूप धारण करके सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये समुद्रके जलसे इस खोयी हुई पृथ्वीका उद्धार किया था ॥ २१ ॥
आदिदैत्यो महावीर्यो हिरण्यकशिपुः पुरा ।
नारसिंहं वपुः कृत्वा सूदतः पुरुषोत्तम ॥ २२ ॥
'पुरुषोत्तम! प्राचीनकालमें आपने ही नृसिंह-शरीर धारण करके महापराक्रमी आदिदैत्य हिरण्यकशिपुका वध किया था ॥ २२ ॥
अवध्यः सर्वभूतानां बलिश्चापि महासुरः ।
वामनं वपुराश्रित्य त्रैलोक्याद् भ्रंशितस्त्वया ॥ २३ ॥

'सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अवध्य महादैत्य बलिको भी आपने ही वामनरूप धारण करके त्रिलोकीके राज्यसे वंचित किया ।। २३ ।।
असुरश्च महेष्वासो जम्भ इत्यभिविश्रुतः ।
यज्ञक्षोभकरः क्रूरस्त्वयैव विनिपातितः ।। २४ ।।
'यज्ञोंका नाश करनेवाले क्रूरकर्मा महाधनुर्धर जम्भ नामसे विख्यात असुरको भी आपने ही मार गिराया था ।। २४ ।।
एवमादीनि कर्माणि येषां संख्या न विद्यते ।
अस्माकं भयभीतानां त्वं गतिर्मधुसूदन ।। २५ ।।
'ऐसे-ऐसे आपके अनेक कर्म हैं, जिनकी कोई संख्या नहीं है। मधुसूदन! हम भयभीत देवताओंके एकमात्र आश्रय आप ही हैं ।। २५ ।।
तस्मात् त्वां देवदेवेश लोकार्थं ज्ञापयामहे ।
रक्ष लोकांश्च देवांश्च शक्रं च महतो भयात् ।। २६ ।।
'देवदेवेश्वर! इसीलिये लोकहितके उद्देश्यसे हम यह निवेदन कर रहे हैं कि आप सम्पूर्ण जगत्के प्राणियों, देवताओं और इन्द्रकी भी महान् भयसे रक्षा कीजिये' ।। २६ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां विष्णुस्तवे
द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १०२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें विष्णुस्तुतिविषयक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०२ ।।