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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे पुनः यह अनुरोध किया—'भगवन्! फिर मुझे क्षत्रियोंका माहात्म्य सुनाइये' ॥ १ ॥

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षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः

सेदुक और वृषदर्भका चरित्र

वैशम्पायन उवाच

भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत् पाण्डवः ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे पुनः यह अनुरोध किया—'भगवन्! फिर मुझे क्षत्रियोंका माहात्म्य सुनाइये' ॥ १ ॥

अथाचष्ट मार्कण्डेयो महाराज वृषदर्भसेदुकनामानौ राजानौ नीतिमार्गरतावस्त्रोपास्त्रकृतिनौ ॥ २ ॥

तब मार्कण्डेयजीने कहा—'महाराज! पूर्वकालमें वृषदर्भ और सेदुक ये दो राजा थे। दोनोंही नीतिके मार्गपर चलनेवाले और अस्त्र तथा उपास्त्रोंकी विद्यामें निपुण थे ॥ २ ॥

सेदुको वृषदर्भस्य बालस्यैव उपांशुव्रतमभ्यजानात् कुप्यमदेयं ब्राह्मणस्य ॥ ३ ॥

'वृषदर्भने बचपनसे ही एक गुप्त व्रत ले रखा था कि 'ब्राह्मणको सोना-चाँदीके सिवा और कुछ नहीं देना चाहिये (तात्पर्य यह कि उसे सुवर्ण तथा रजत ही प्रदान करना चाहिये)'। उनके इस व्रतको सेदुक जानते थे ॥ ३ ॥

अथ तं सेदिकं ब्राह्मणः कश्चिद् वेदाध्ययनसम्पन्न आशिषं दत्त्वा गुर्वर्थी भिक्षितवान् ॥ ४ ॥
अश्वसहस्रं मे भवान् ददात्विति तं सेदुको ब्राह्मणमब्रवीत् ॥ ५ ॥
नास्ति सम्भवो गुर्वर्थं दातुमिति ॥ ६ ॥

'एक दिन कोई वेदाध्ययनसम्पन्न ब्राह्मण राजा सेदुकके पास आया और उन्हें आशीर्वाद देकर गुरु-दक्षिणाके लिये भिक्षा माँगता हुआ बोला—'राजन्! आप मुझे एक हजार घोड़े दीजिये।' तब सेदुकने उस ब्राह्मण-से कहा—'ब्रह्मन्! आपकी अभीष्ट गुरु-दक्षिणा देना मेरे लिये सम्भव नहीं है ॥ ४-६ ॥

स त्वं गच्छ वृषदर्भसकाशम् । राजा परम-धर्मज्ञो ब्राह्मण तं भिक्षस्व । स ते दास्यति तस्यैतदुपांशुव्रतमिति ॥ ७ ॥

'अतः आप वृषदर्भके पास चले जाइये। ब्राह्मण! राजा वृषदर्भ बड़े धर्मज्ञ हैं। आप उन्हींसे याचना कीजिये। वे आपकी अभीष्ट वस्तु अवश्य दे देंगे। यह उनका गुप्त नियम है' ॥ ७ ॥

अथ ब्राह्मणो वृषदर्भसकाशं गत्वा अश्वसहस्रमयाचत् । स राजा तं कशेनाताडयत् ॥ ८ ॥

'तब ब्राह्मण देवताने वृषदर्भके पास जाकर एक हजार घोड़े माँगे। यह सुनकर राजा उन्हें कोड़ेसे पीटने लगे' ॥ ८ ॥
तं ब्राह्मणोऽब्रवीत् । किं हिंस्यनागसं मामिति ॥ ९ ॥
'यह देख ब्राह्मणने उनसे पूछा—'राजन्! मुझ निरपराधको आप क्यों मार रहे हैं' ॥ ९ ॥
एवमुक्त्वा तं शपन्तं राजाऽऽह । विप्र किं यो न ददाति तुभ्यमुताहोस्विद् ब्राह्मण्यमेतत् ॥ १० ॥
'ऐसा कहकर ब्राह्मण देवता शाप देनेको उद्यत हो गये। तब राजाने उनसे कहा—'विप्रवर! क्या जो आपको अपना धन न दे, उसको शाप देना ही उचित है? अथवा यही ब्राह्मणोचित कर्म है?' ॥ १० ॥

ब्राह्मण उवाच
राजाधिराज तव समीपं सेदुकेन प्रेषितो भिक्षितु-मागतः । तेनानुशिष्टेन मया त्वं भिक्षितोऽसि ॥ ११ ॥
ब्राह्मणने कहा—'राजाधिराज! आपके पास राजा सेदुकने मुझे भेजा है, तभी आपसे गुरु-दक्षिणा माँगने आया हूँ। उनके उपदेशके अनुसार ही मैंने आपसे याचना की है' ॥ ११ ॥

राजोवाच
पूर्वाह्ने ते दास्यामि यो मेऽद्य बलिरागमिष्यति । यो हन्यते कशया कथं मोघं क्षेपणं तस्य स्यात् ॥ १२ ॥
**राजा बोले—*ब्रह्मन्! आज जो भी राजकीय कर मेरे पास आयेगा, उसे कल पूर्वाह्नमें ही आपको दे दूँगा। जिसे कोड़ेसे पीटा जाय, उसे खाली हाथ कैसे लौटाया जा सकता है? ॥ १२ ॥
इत्युक्त्वा ब्राह्मणाय दैवसिकामुत्पत्तिं प्रादात् ।
अधिकस्याश्वसहस्रस्य मूल्यमेवादादिति ॥ १३ ॥
ऐसा कहकर राजाने ब्राह्मणको एक दिनकी आय दे दी। इस प्रकार उन्होंने एक हजारसे अधिक घोड़ोंका मूल्य ही दिया
॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि सेदुकवृषदर्भचरिते षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें सेदुकवृषदर्भचरितविषयक एक सौ छियानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९६ ॥