महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
(वैवाहिकपर्व)
(वैवाहिकपर्व)
सप्ततितमोऽध्यायः
अर्जुनका राजा विराटको महाराज युधिष्ठिरका परिचय देना
वैशम्पायन उवाच
ततस्तृतीये दिवसे भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः ।
स्नाताः शुक्लाम्वरधराः समये चरितव्रताः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरं पुरस्कृत्य सर्वाभरणभूषिताः ।
द्वारि मत्ता यथा नागा भ्राजमाना महारथाः ॥ २ ॥
विराटस्य सभां गत्वा भूमिपालासानेष्वथ ।
निषेदुः पावकप्रख्याः सर्वे धिष्ण्येष्विवाग्नयः ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर नियत समयतक अपनी प्रतिज्ञाका पालन करके अग्निके समान तेजस्वी पाँचों भाई महारथी पाण्डव तीसरे दिन स्नान करके श्वेत वस्त्र धारणकर समस्त राजोचित आभूषणोंसे विभूषित हो राजसभामें द्वारपर स्थित मदोन्मत्त गजराजोंकी भाँति सुशोभित होने लगे। वे राजा युधिष्ठिरको आगे करके विराटकी सभामें गये और राजाओंके लिये रखे हुए सिंहासनोंपर बैठे। उस समय वे भिन्न-भिन्न यज्ञवेदियोंपर प्रज्वलित अग्नियोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ १—३ ॥
तेषु तत्रोपविष्टेषु विराटः पृथिवीपतिः ।
आजगाम सभां कर्तुं राजकार्याणि सर्वशः ॥ ४ ॥
पाण्डवोंके वहाँ बैठ जानेपर राजा विराट अपने समस्त राजकाज करनेके लिये सभामें आये ॥ ४ ॥
श्रीमतः पाण्डवान् दृष्ट्वा ज्वलतः पावकानिव ।
मुहूर्तमिव च ध्यात्वा सरोषः पृथिवीपतिः ॥ ५ ॥
अथ मत्स्योऽब्रवीत् कङ्कं देवरूपमिव स्थितम् ।
मरुद्गणैरुपासीनं त्रिदशानामिवेश्वरम् ॥ ६ ॥
वहाँ प्रज्वलित अग्नियोंके समान तेजस्वी श्रीसम्पन्न पाण्डवोंको देखकर पृथिवीपति विराटने दो घड़ीतक मन-ही-मन कुछ विचार किया। फिर वे कुपित होकर देवताके समान स्थित मरुद्गणोंसे घिरे हुए देवराज इन्द्रके तुल्य सुशोभित कंकसे बोले— ॥ ५-६ ॥
स किलाक्षातिवापस्त्वं सभास्तारो मया वृतः ।
अथ राजासने कस्मादुपविष्टस्त्वलंकृतः ॥ ७ ॥
'कंक! तुम्हें तो मैंने पासा फेंकनेवाला सभासद् बनाया था। आज बन-ठनकर राजसिंहासनपर कैसे बैठ गये?' ॥ ७ ॥
वैशम्पायन उवाच
परिहासेप्सया वाक्यं विराटस्य निशम्य तत् ।
स्मयमानोऽर्जुनो राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! मानो परिहास करनेके लिये कहा गया हो, ऐसा विराटका वह वचन सुनकर अर्जुन मुसकराते हुए इस प्रकार बोले ॥ ८ ॥
अर्जुन उवाच
इन्द्रस्यार्धासनं राजन्नयमारोढुमर्हति ।
ब्रह्मण्यः श्रुतवांस्त्यागी यज्ञशीलो दृढव्रतः ॥ ९ ॥
अर्जुनने कहा— राजन्! आपके राजासनकी तो बात ही क्या है, ये तो इन्द्रके भी आधे सिंहासनपर बैठनेके अधिकारी हैं। ये ब्राह्मणभक्त, शास्त्रोंके विद्वान्, त्यागी, यज्ञशील तथा दृढ़ताके साथ अपने व्रतका पालन करनेवाले हैं ॥ ९ ॥
एष विग्रहवान् धर्म एष वीर्यवतां वरः ।
एष बुद्ध्याधिको लोके तपसां च परायणम् ॥ १० ॥
एषोऽस्त्रं विविधं वेत्ति त्रैलोक्ये सचराचरे ।
न चैवान्यः पुमान् वेत्ति न वेत्स्यति कदाचन ॥ ११ ॥
ये मूर्तिमान् धर्म हैं तथा पराक्रमी पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं। इस जगत्में ये सबसे बढ़कर बुद्धिमान् और तपस्याके परम आश्रय हैं। ये नाना प्रकारके ऐसे अस्त्रोंको जानते हैं, जिन्हें इस चराचर त्रिलोकीमें दूसरा मनुष्य न तो जानता है और न कभी जान सकेगा ॥ १०-११ ॥
न देवा नासुराः केचिन्न मनुष्या न राक्षसाः ।
गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिन्नरमहोरगाः ॥ १२ ॥
जिन अस्त्रोंको देवता, असुर, मनुष्य, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर और बड़े-बड़े नाग भी नहीं जानते, उन सबका इन्हें ज्ञान है ॥ १२ ॥
दीर्घदर्शी महातेजाः पौरजानपदप्रियः ।
पाण्डवानामतिरथो यज्ञधर्मपरो वशी ॥ १३ ॥
ये दीर्घदर्शी, महातेजस्वी तथा नगर और देशके लोगोंको अत्यन्त प्रिय हैं। ये पाण्डवोंमें अतिरथी वीर हैं एवं सदा यज्ञ और धर्मके अनुष्ठानमें संलग्न तथा मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले हैं ॥ १३ ॥
महर्षिकल्पो राजर्षिः सर्वलोकेषु विश्रुतः ।
बलवान् धृतिमान् दक्षः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
धनैश्च सञ्चयैश्चैव शक्रवैश्रवणोपमः ॥ १४ ॥
ये महर्षियोंके समान हैं, राजर्षि हैं और समस्त लोकोंमें विख्यात हैं। बलवान्, धैर्यवान्, चतुर, सत्यवादी और जितेन्द्रिय हैं। धन और संग्रहकी दृष्टिसे ये इन्द्र और कुबेरके समान हैं ॥ १४ ॥
यथा मनुर्महातेजा लोकानां परिरक्षिता ।
एवमेष महातेजाः प्रजानुग्रहकारकः ॥ १५ ॥
जैसे महातेजस्वी मनु समस्त लोकोंके रक्षक हैं उसी प्रकार ये महातेजस्वी नरेश भी प्रजाजनोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं ॥ १५ ॥
अयं कुरूणामृषभो धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
अस्य कीर्तिः स्थिता लोके सूर्यस्येवोद्यतः प्रभा ॥ १६ ॥
ये ही कुरुवंशमें सर्वश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर हैं। उदयकालके सूर्यकी शान्त प्रभाके समान इनकी सुख-दायिनी कीर्ति समस्त संसारमें फैली हुई है ॥ १६ ॥
संसरन्ति दिशः सर्वा यशसोऽस्य इवांशवः ।
उदितस्येव सूर्यस्य तेजसोऽनु गभस्तयः ॥ १७ ॥
जैसे सूर्योदय होनेपर सूर्यके तेजके पश्चात् उनकी किरणें समस्त दिशाओंमें फैल जाती हैं, उसी प्रकार इनके सुयशके साथ-साथ उसकी सुधाधवल किरणें समस्त दिशाओंमें छा रही हैं ॥ १७ ॥
एनं दशसहस्राणि कुञ्जराणां तरस्विनाम् ।
अन्वयुः पृष्ठतो राजन् यावदध्यावसत् कुरून् ॥ १८ ॥
राजन्! ये महाराज जब कुरुदेशमें रहते थे, उस समय इनके पीछे दस हजार वेगवान् हाथी चला करते थे ॥ १८ ॥
त्रिंशदेनं सहस्राणि रथाः काञ्चनमालिनः ।
सदश्वैरुपसम्पन्नाः पृष्ठतोऽनुययुस्तदा ॥ १९ ॥
इस प्रकार अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए सुवर्णमालामण्डित तीस हजार रथ भी उस समय इनका अनुसरण करते थे ॥
एनमष्टशताः सूताः सुमृष्टमणिकुण्डलाः ।
अब्रुवन् मागधैः सार्धं पुरा शक्रमिवर्षयः ॥ २० ॥
जैसे महर्षिगण इन्द्रकी स्तुति करते हैं, उसी प्रकार पहले विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण किये आठ सौ सूत और मागध इनके गुण गाते थे ॥ २० ॥
एनं नित्यमुपासन्त कुरवः किंकरा यथा ।
सर्वे च राजन् राजानो धनेश्वरमिवामराः ॥ २१ ॥
राजन्! जैसे देवगण धनाध्यक्ष कुबेरका दरबार किया करते हैं, वैसे ही सब राजा और कौरव किंकरोंकी भाँति इनकी नित्य उपासना करते थे ॥ २१ ॥
एष सर्वान् महीपालान् करदान् समकारयत् ।
वैश्यानिव महाभागो विवशान् स्ववशामपि ॥ २२ ॥
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातकानां महात्मनाम् ।
उपजीवन्ति राजानमेनं सुचरितव्रतम् ॥ २३ ॥
इन महाभाग नरेशने इस देशके सब राजाओंको वैश्योंकी भाँति स्ववश (अपने अधीन) और विवश करके कर देनेवाला बना दिया था। (अर्थात् सब राजा इन्हें कर दिया करते थे।) अत्यन्त उत्तम व्रतका पालन करनेवाले इन महाराजके यहाँ प्रतिदिन अठासी हजार महाबुद्धिमान् स्नातकोंकी जीविका चलती थी ॥ २२-२३ ॥
एष वृद्धाननाथांश्च पङ्गून्धांश्च मानवान् ।
पुत्रवत् पालयामास प्रजा धर्मेण वै विभुः ॥ २४ ॥
ये बूढ़े, अनाथ, पंगू और अंधे मनुष्योंका भी स्नेहपूर्वक पालन करते थे। ये नरेश अपनी प्रजाकी धर्मपूर्वक पुत्रकी भाँति रक्षा करते थे ॥ २४ ॥
एष धर्मे दमे चैव क्रोधे चापि जितव्रतः ।
महाप्रसादो ब्रह्मण्यः सत्यवादी च पार्थिवः ॥ २५ ॥
ये भूपाल धर्म और इन्द्रियसंयममें तत्पर तथा क्रोधको काबूमें रखनेके लिये दृढ़प्रतिज्ञ हैं। ये बड़े कृपालु, ब्राह्मणभक्त और सत्यवक्ता हैं ॥ २५ ॥
शीघ्रं तापेन चैतस्य तप्स्यते स सुयोधनः ।
सगणः सह कर्णेन सौबलेनापि वा विभुः ॥ २६ ॥
इनके प्रतापसे दुर्योधन शक्तिशाली होकर भी कर्ण, शकुनि तथा अपने गणोंके साथ शीघ्र ही संतप्त होनेवाला है ॥ २६ ॥
न शक्यन्ते ह्यस्य गुणाः प्रसंख्यातुं नरेश्वर ।
एष धर्मपरो नित्यमानृशंसश्च पाण्डवः ॥ २७ ॥
एवं युक्तो महाराजः पाण्डवः पार्थिवर्षभः ।
कथं नार्हति राजार्हमासनं पृथिवीपते ॥ २८ ॥
नरेश्वर! इनके सद्गुणोंकी गणना नहीं की जा सकती। ये पाण्डुनन्दन नित्य धर्मपरायण तथा दयालु स्वभावके हैं। राजन्! समस्त राजाओंके शिरोमणि पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिर इस प्रकार सर्वोत्तम गुणोंसे युक्त होकर भी राजोचित आसनके अधिकारी क्यों नहीं हैं? ॥ २७-२८ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि वैवाहिकपर्वणि पाण्डवप्रकाशे सप्ततितमोऽध्यायः
॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें पाण्डवप्राकट्यविषयक
सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥