महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
(नलोपाख्यानपर्व)
(नलोपाख्यानपर्व)
द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
भीमसेन-युधिष्ठिर-संवाद, बृहदश्वका आगमन तथा युधिष्ठिरके पूछनेपर बृहदश्वके द्वारा नलोपाख्यानकी प्रस्तावना
जनमेजय उवाच
अस्त्रहेतोर्गते पार्थे शक्रलोकं महात्मनि ।
युधिष्ठिरप्रभृतयः किमकुर्वत पाण्डवाः ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! अस्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये महात्मा अर्जुनके इन्द्रलोक चले जानेपर युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंने क्या किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
अस्त्रहेतोर्गते पार्थे शक्रलोकं महात्मनि ।
आवसन् कृष्णया सार्धं काम्यके भरतर्षभाः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! अस्त्रविद्याके लिये महात्मा अर्जुनके इन्द्रलोक जानेपर भरतकुलभूषण पाण्डव द्रौपदीके साथ काम्यकवनमें निवास करने लगे ॥ २ ॥
ततः कदाचिदेकान्ते विविक्त इव शाद्वले ।
दुःखार्ता भरतश्रेष्ठा निषेदुः सह कृष्णया ॥ ३ ॥
धनंजयं शोचमानाः साश्रुकण्ठाः सुदुःखिताः ।
तद्वियोगाार्दितान् सर्वाञ्छोकः समभिपुप्लुवे ॥ ४ ॥
तदनन्तर एक दिन एकान्त एवं पवित्र स्थानमें, जहाँ छोटी-छोटी हरी दूर्वा आदि घास उगी हुई थी, वे भरतवंशके श्रेष्ठ पुरुष दुःखसे पीड़ित हो द्रौपदीके साथ बैठे और धनंजय अर्जुनके लिये चिन्ता करते हुए अत्यन्त दुःखमें भरे अश्रुगद्गद कण्ठसे उन्हींकी बातें करने लगे। अर्जुनके वियोगसे पीड़ित उन समस्त पाण्डवोंको शोकसागरने अपनी लहरोंमें डुबो दिया ॥ ३-४ ॥
धनंजयवियोगाच्च राज्यभ्रंशाच्च दुःखिताः ।
अथ भीमो महाबाहुर्युधिष्ठिरमभाषत ॥ ५ ॥
पाण्डव राज्य छिन जानेसे तो दुःखी थे ही। अर्जुनके विरहसे वे और भी क्लेशमें पड़ गये थे। उस समय महाबाहु भीमने युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ५ ॥
निदेशात् ते महाराज गतोऽसौ भरतर्षभः ।
अर्जुनः पाण्डुपुत्राणां यस्मिन् प्राणाः प्रतिष्ठिताः ॥ ६ ॥
‘महाराज! आपकी आज्ञासे भरतवंशका रत्न अर्जुन तपस्याके लिये चला गया। हम सब पाण्डवोंके प्राण उसीमें बसते हैं ॥ ६ ॥
यस्मिन् विनष्टे पाञ्चालाः सह पुत्रैस्तथा वयम् ।
सात्यकिर्वासुदेवश्च विनश्येयुर्न संशयः ॥ ७ ॥
‘यदि कहीं अर्जुनका नाश हुआ तो पुत्रोंसहित पांचाल, हम पाण्डव, सात्यकि और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण—ये सब-के-सब नष्ट हो जायँगे ॥ ७ ॥
योऽसौ गच्छति धर्मात्मा बहून् क्लेशान् विचिन्तयन् ।
भवन्नियोगाद् बीभत्सुस्ततो दुःखतरं नु किम् ॥ ८ ॥
‘जो धर्मात्मा अर्जुन अनेक प्रकारके क्लेशोंका चिन्तन करते हुए आपकी आज्ञासे तपस्याके लिये गया, उससे बढ़कर दुःख और क्या होगा? ॥ ८ ॥
यस्य बाहू समाश्रित्य वयं सर्वे महात्मनः ।
मन्यामहे जितानाजौ परान् प्राप्तां च मेदिनीम् ॥ ९ ॥
‘जिस महापराक्रमी अर्जुनके बाहुबलका आश्रय लेकर हम संग्राममें शत्रुओंको पराजित और इस पृथ्वीको अपने अधिकारमें आयी हुई समझते हैं ॥ ९ ॥
यस्य प्रभावान्न मया सभामध्ये धनुष्मतः ।
नीता लोकममुं सर्वे धार्तराष्ट्राः ससौबलाः ॥ १० ॥
‘जिस धनुर्धर वीरके प्रभावसे प्रभावित होकर मैंने सभामें शकुनिसहित समस्त धृतराष्ट्रपुत्रोंको तुरंत ही यमलोक नहीं भेज दिया ॥ १० ॥
ते वयं बाहुबलिनः क्रोधमुत्थितमात्मनः ।
सहामहे भवन्मूलं वासुदेवेन पालिताः ॥ ११ ॥
‘हम सब लोग बाहुबलसे सम्पन्न हैं और भगवान् वासुदेव हमारे रक्षक हैं तो भी हम आपके कारण अपने उठे हुए क्रोधको चुपचाप सह लेते हैं ॥ ११ ॥
वयं हि सह कृष्णेन हत्वा कर्णमुखान् परान् ।
स्वबाहुविजितां कृत्स्नां प्रशासैम वसुन्धराम् ॥ १२ ॥
‘भगवान् श्रीकृष्णके साथ हमलोग कर्ण आदि शत्रुओंको मारकर अपने बाहुबलसे जीती हुई सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन कर सकते हैं ॥ १२ ॥
भवतो द्यूतदोषेण सर्वे वयमुपप्लुताः ।
अहीनपौरुषा बाला बलिभिर्बलवत्तराः ॥ १३ ॥
‘आपके जूएके दोषसे हमलोग पुरुषार्थयुक्त होकर भी दीन बन गये हैं और वे मूर्ख दुर्योधन आदि भेंटमें मिले हुए हमारे धनसे सम्पन्न हो इस समय अधिक बलशाली बन गये हैं।। १३ ।।
क्षात्रं धर्मं महाराज त्वमवेक्षितुमर्हसि ।
न हि धर्मो महाराज क्षत्रियस्य वनाश्रयः ॥ १४ ॥
‘महाराज! आप क्षत्रियधर्मकी ओर तो देखिये। इस प्रकार वनमें रहना कदापि क्षत्रियोंका धर्म नहीं है ।। १४ ।।
राज्यमेव परं धर्मं क्षत्रियस्य विदुर्बुधाः ।
स क्षत्रधर्मविद् राजा मा धर्म्यान्नीनशः पथः ॥ १५ ॥
‘विद्वानोंने राज्यको ही क्षत्रियका सर्वोत्तम धर्म माना है। आप क्षत्रियधर्मके ज्ञाता नरेश हैं। धर्मके मार्गसे विचलित न होइये ।। १५ ।।
प्राग् द्वादशसमा राजन् धार्तराष्ट्रान् निहन्महि ।
निवर्त्य च वनात् पार्थमानाय्य च जनार्दनम् ॥ १६ ॥
‘राजन्! हमलोग बारह वर्ष बीतनेके पहले ही अर्जुनको वनसे लौटाकर और भगवान् श्रीकृष्णको बुलाकर धृतराष्ट्रके पुत्रोंका संहार कर सकते हैं ।। १६ ।।
व्यूढानीकान् महाराज जवेनैव महामते ।
धार्तराष्ट्रानमुं लोकं गमयामि विशाम्पते ॥ १७ ॥
सर्वानहं हनिष्यामि धार्तराष्ट्रान् ससौबलान् ।
दुर्योधनं च कर्णं च यो वान्यः प्रतियोत्स्यते ॥ १८ ॥
‘महाराज! महामते! धृतराष्ट्रके पुत्र कितनी ही सेनाओंकी मोर्चाबन्दी क्यों न कर लें, हम उन्हें शीघ्र यमलोकका पथिक बनाकर ही छोड़ेंगे। मैं स्वयं ही शकुनिसहित समस्त धृतराष्ट्रपुत्रोंको मार डालूँगा। दुर्योधन, कर्ण अथवा दूसरा जो कोई योद्धा मेरा सामना करेगा, उसे भी अवश्य मारूँगा ।। १७-१८ ।।
मया प्रशमिते पश्चात् त्वमेष्यसि वनात् पुनः ।
एवं कृते न ते दोषा भविष्यन्ति विशाम्पते ॥ १९ ॥
‘मेरे द्वारा शत्रुओंका संहार हो जानेपर आप फिर तेरह वर्षके बाद वनसे चले आइयेगा। प्रजानाथ! ऐसा करनेपर आपको दोष नहीं लगेगा ।। १९ ।।
यज्ञैश्च विविधैस्तात कृतं पापमरिंदम ।
अवधूय महाराज गच्छेम स्वर्गमुत्तमम् ॥ २० ॥
‘तात! शत्रुदमन! महाराज! हम नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करके अपने किये हुए पापको धो-बहाकर उत्तम स्वर्गलोकमें चलेंगे ।। २० ।।
एवमेतद् भवेद् राजन् यदि राजा न बालिशः ।
अस्माकं दीर्घसूत्रः स्याद् भवान् धर्मपरायणः ॥ २१ ॥
'राजन्! यदि ऐसा हो तो आप हमारे धर्मपरायण राजा अविवेकी और दीर्घसूत्री नहीं समझे जायेंगे ॥ २१ ॥
निकृत्या निकृतिप्रज्ञा हन्तव्या इति निश्चयः ।
न हि नैकृतिकं हत्वा निकृत्या पापमुच्यते ॥ २२ ॥
'शठता करने या जाननेवाले शत्रुओंको शठताके द्वारा ही मारना चाहिये, यह एक सिद्धान्त है। जो स्वयं दूसरोंपर छल-कपटका प्रयोग करता है, उसे छलसे भी मार डालनेमें पाप नहीं बताया गया है ॥ २२ ॥
तथा भारत धर्मेषु धर्मज्ञैरिह दृश्यते ।
अहोरात्रं महाराज तुल्यं संवत्सरेण ह ॥ २३ ॥
'भरतवंशी महाराज! धर्मशास्त्रमें इसी प्रकार धर्मपरायण धर्मज्ञ पुरुषोंद्वारा यहाँ एक दिन-रात एक संवत्सरके समान देखा जाता है ॥ २३ ॥
तथैव वेदवचनं श्रूयते नित्यदा विभो ।
संवत्सरो महाराज पूर्णो भवति कृच्छ्रतः ॥ २४ ॥
'प्रभो! महाराज! इसी प्रकार सदा यह वैदिक वचन सुना जाता है कि कृच्छ्रव्रतके अनुष्ठानसे एक वर्षकी पूर्ति हो जाती है ॥ २४ ॥
यदि वेदाः प्रमाणान्ते दिवसादूध्वर्मच्युत ।
त्रयोदश समाः कालो ज्ञायतां परिनिष्ठितः ॥ २५ ॥
'अच्युत! यदि आप वेदको प्रमाण मानते हैं तो तेरहवें दिनके बाद ही तेरह वर्षोंका समय बीत गया, ऐसा समझ लीजिये ॥ २५ ॥
कालो दुर्योधनं हन्तुं सानुबन्धमरिंदम ।
एकाग्रां पृथिवीं सर्वां पुरा राजन् करोति सः ॥ २६ ॥
'शत्रुदमन! यह दुर्योधनको उसके सगे-सम्बन्धियों-सहित मार डालनेका अवसर आया है। राजन्! वह सारी पृथ्वीको जबतक एक सूत्रमें बाँध ले, उसके पहले ही यह कार्य कर लेना चाहिये ॥ २६ ॥
द्यूतप्रियेण राजेन्द्र तथा तद् भवता कृतम् ।
प्रायेणाज्ञातचर्यायां वयं सर्वे निपातिताः ॥ २७ ॥
'राजेन्द्र! जूएके खेलमें आसक्त होकर आपने ऐसा अनर्थ कर डाला कि प्रायः हम सब लोगोंको अज्ञातवासके संकटमें लाकर पटक दिया ॥ २७ ॥
न तं देशं प्रपश्यामि यत्र सोऽस्मान् सुदुर्जनः ।
न विज्ञास्यति दुष्टात्मा चारैरिति सुयोधनः ॥ २८ ॥
अधिगम्य च सर्वान् नो वनवासमिमं ततः ।
प्रव्राजयिष्यति पुनर्निंकृत्याधमपूरुषः ॥ २९ ॥
‘मैं ऐसा कोई देश या स्थान नहीं देखता, जहाँ अत्यन्त दुष्टचित्त, दुरात्मा दुर्योधन अपने गुप्तचरोंद्वारा हमलोगोंका पता न लगा ले। वह नीच नराधम हम सब लोगोंका गुप्त निवास जान लेनेपर पुनः अपनी कपटपूर्ण नीतिद्वारा हमें इस वनवासमें ही डाल देगा ।। २८-२९ ।।
यद्यस्मानभिगच्छेत पापः स हि कथंचन ।
अज्ञातचर्यामुत्तीर्णान् दृष्ट्वा च पुनराह्वयेत् ।। ३० ।।
‘यदि वह पापी किसी प्रकार यह समझ ले कि हम अज्ञातवासकी अवधि पार कर गये हैं, तो वह उस दशामें हमें देखकर पुनः आपको ही जूआ खेलनेके लिये बुलायेगा ।। ३० ।।
द्यूतेन ते महाराज पुनर्धूर्तमवर्तत ।
भवांश्च पुनराहूतो द्यूते नैवापनेष्यति ।। ३१ ।।
‘महाराज! आप एक बार जूएके संकटसे बचकर दुबारा द्यूतक्रीडामें प्रवृत्त हो गये थे, अतः मैं समझता हूँ, यदि पुनः आपका द्यूतके लिये आवाहन हो तो आप उससे पीछे न हटेंगे ।। ३१ ।।
स तथाक्षेषु कुशलो निश्चितो गतचेतनः ।
चरिष्यसि महाराज वनेषु वसतीः पुनः ।। ३२ ।।
‘नरेश्वर! वह विवेकशून्य शकुनि जूआ फेंकनेकी कलामें कितना कुशल है, यह आप अच्छी तरह जानते हैं, फिर तो उसमें हारकर आप पुनः वनवास ही भोगेंगे ।।
यद्यस्मान् सुमहाराज कृपणान् कर्तुमर्हसि ।
यावज्जीवमवेक्षस्व वेदधर्मांश्च कृत्स्नशः ।। ३३ ।।
‘महाराज! यदि आप हमें दीन, हीन, कृपण ही बनाना चाहते हैं तो जबतक जीवन है, तबतक सम्पूर्ण वेदोक्त धर्मोंके पालनपर ही दृष्टि रखिये ।। ३३ ।।
निकृत्या निकृतिप्रज्ञो हन्तव्य इति निश्चयः ।
अनुज्ञातस्त्वया गत्वा यावच्छक्ति सुयोधनम् ।। ३४ ।।
यथैव कक्षमुत्सृष्टो दहेदनिलसारथिः ।
हनिष्यामि तथा मन्दमनुजानातु मे भवान् ।। ३५ ।।
‘अपना निश्चय तो यही है कि कपटीको कपटसे ही मारना चाहिये। यदि आपकी आज्ञा हो तो जैसे तृणकी राशिमें डाली हुई आग हवाका सहारा पाकर उसे भस्म कर डालती है, वैसे ही मैं जाकर अपनी शक्तिके अनुसार उस मूढ़ दुर्योधनका वध कर डालूँ, अतः आप मुझे आज्ञा दीजिये ।। ३४-३५ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवाणं भीमं तु धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
उवाच सान्त्वयन् राजा मूर्ध्न्युपाघ्राय पाण्डवम् ।। ३६ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! धर्मराज राजा युधिष्ठिरने उपर्युक्त बातें कहनेवाले पाण्डुनन्दन भीमसेनका मस्तक सूँघकर उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा— ।। ३६ ।।
असंशयं महाबाहो हनिष्यसि सुयोधनम् ।
वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्वं सह गाण्डीवधन्वना ।। ३७ ।।
'महाबाहो! इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि तुम तेरहवें वर्षके बाद गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ जाकर युद्धमें सुयोधनको मार डालोगे ।। ३७ ।।
यत् त्वामाभाषसे पार्थ प्राप्तः काल इति प्रभो ।
अनृतं नोत्सहे वक्तुं न ह्येतन्मम विद्यते ।। ३८ ।।
'किंतु शक्तिशाली वीर कुन्तीकुमार! तुम जो यह कहते हो कि सुयोधनके वधका अवसर आ गया है, वह ठीक नहीं है। मैं झूठ नहीं बोल सकता, मुझमें यह आदत नहीं है ।। ३८ ।।
अन्तरेणापि कौन्तेय निकृतिं पापनिश्चयम् ।
हन्ता त्वमसि दुर्धर्ष सानुबन्धं सुयोधनम् ।। ३९ ।।
'कुन्तीनन्दन! तुम दुर्धर्ष वीर हो, छल-कपटका आश्रय लिये बिना भी पापपूर्ण विचार रखनेवाले सुयोधनको सगे-सम्बन्धियोंसहित नष्ट कर सकते हो' ।। ३९ ।।
एवं ब्रुवति भीमं तु धर्मराजे युधिष्ठिरे ।
आजगाम महाभागो बृहदश्वो महर्षिः ।। ४० ।।
धर्मराज युधिष्ठिर जब भीमसेनसे ऐसी बातें कह रहे थे, उसी समय महाभाग महर्षि बृहदश्व वहाँ आ पहुँचे ।। ४० ।।
तमभिप्रेक्ष्य धर्मात्मा सम्प्राप्तं धर्मचारिणम् ।
शास्त्रवन्मधुपर्केण पूजयामास धर्मराट् ।। ४१ ।।
धर्मात्मा धर्मराज युधिष्ठिरने धर्मानुष्ठान करनेवाले उन महात्माको आया देख शास्त्रीय विधिके अनुसार मधुपर्कद्वारा उनका पूजन किया ।। ४१ ।।
आश्वस्तं चैनमासीनमुपासीनो युधिष्ठिरः ।
अभिप्रेक्ष्य महाबाहुः कृपणं बह्वभाषत ।। ४२ ।।
जब वे आसनपर बैठकर थकावटसे निवृत्त हो चुके अर्थात् विश्राम कर चुके, तब महाबाहु युधिष्ठिर उनके पास ही बैठकर उन्हींकी ओर देखते हुए अत्यन्त दीनतापूर्ण वचन बोले— ।। ४२ ।।
अक्षद्यूते च भगवन् धनं राज्यं च मे हृतम् ।
आहूय निकृतिप्रज्ञैः कितवैरक्षकोविदैः ।। ४३ ।।
'भगवन्! पासे फेंककर खेले जानेवाले जूएके लिये मुझे बुलाकर छल-कपटमें कुशल तथा पासा डालनेकी कलामें निपुण धूर्त जुआरियोंने मेरे सारे धन तथा राज्यका अपहरण
कर लिया है ।। ४३ ।।
अनक्षज्ञस्य हि सतो निकृत्या पापनिश्चयैः ।
भार्या च मे सभां नीता प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ।। ४४ ।।
‘मैं जूएका मर्मज्ञ नहीं हूँ। फिर भी पापपूर्ण विचार रखनेवाले उन दुष्टोंके द्वारा मेरी प्राणोंसे भी अधिक गौरवशालिनी पत्नी द्रौपदी केश पकड़कर भरी सभामें लायी गयी ।। ४४ ।।
पुनर्द्यूतेन मां जित्वा वनवासं सुदारुणम् ।
प्राव्राजयन् महारण्यमजिनैः परिवारितम् ।। ४५ ।।
‘एक बार जूएके संकटसे बच जानेपर पुनः द्यूतका आयोजन करके उन्होंने मुझे जीत लिया और मृगचर्म पहनाकर वनवासका अत्यन्त दारुण कष्ट भोगनेके लिये इस महान् वनमें निर्वासित कर दिया ।। ४५ ।।
अहं वने दुर्वसतीर्वसन् परमदुःखितः ।
अक्षद्यूताधिकारे च गिरः शृण्वन् सुदारुणाः ।। ४६ ।।
आर्तानां सुहृदां वाचो द्यूतप्रभृति शंसताम् ।
अहं हृदि श्रिताः स्मृत्वा सर्वरात्रीर्विचिन्तयन् ।। ४७ ।।
‘मैं अत्यन्त दुःखी हो बड़ी कठिनाईसे वनमें निवास करता हूँ। जिस सभामें जूआ खेलनेका आयोजन किया गया था, वहाँ प्रतिपक्षी पुरुषोंके मुखसे मुझे अत्यन्त कठोर बातें सुननी पड़ी हैं। इसके सिवा द्यूत आदि कार्योंका उल्लेख करते हुए मेरे दुःखातुर सुहृदोंने जो संतापसूचक बातें कही हैं, वे सब मेरे हृदयमें स्थित हैं। मैं उन सब बातोंको याद करके सारी रात चिन्तामें निमग्न रहता हूँ ।। ४६-४७ ।।
यस्मिंश्चैव समस्तानां प्राणा गाण्डीवधन्वनि ।
विना महात्मना तेन गतसत्त्व इवाभवम् ।। ४८ ।।
‘इधर जिस गाण्डीव धनुषधारी अर्जुनमें हम सबके प्राण बसते हैं, वह भी हमसे अलग है। महात्मा अर्जुनके बिना मैं निष्प्राण-सा हो गया हूँ ।। ४८ ।।
कदा द्रक्ष्यामि बीभत्सुं कृतास्त्रं पुनरागतम् ।
प्रियवादिनमक्षुद्रं दयायुक्तमतन्द्रितः ।। ४९ ।।
‘मैं सदा निरालस्यभावसे यही सोचा करता हूँ कि श्रेष्ठ, दयालु और प्रियवादी अर्जुन कब अस्त्रविद्या सीखकर फिर यहाँ आयेगा और मैं उसे भर आँख देखूँगा ।। ४९ ।।
अस्ति राजा मया कश्चिदल्पभाग्यतरो भुवि ।
भवता दृष्टपूर्वो वा श्रुतपूर्वोऽपि वा क्वचित् ।
न मत्तो दुःखिततरः पुमानस्तीति मे मतिः ।। ५० ।।
‘क्या मेरे-जैसा अत्यन्त भाग्यहीन राजा इस पृथ्वीपर कोई दूसरा भी है? अथवा आपने कहीं मेरे-जैसे किसी राजाको पहले कभी देखा या सुना है। मेरा तो यह विश्वास है कि
मुझसे बढ़कर अत्यन्त दुःखी मनुष्य दूसरा कोई नहीं है' ।। ५० ।।
बृहदश्व उवाच
यद् ब्रवीषि महाराज न मत्तो विद्यते क्वचित् ।
अल्पभाग्यतरः कश्चित् पुमानस्तीति पाण्डव ।। ५१ ।।
अत्र ते वर्णयिष्यामि यदि शुश्रूषसेऽनघ ।
यस्त्वत्तो दुःखिततरो राजाऽऽसीत् पृथिवीपते ।। ५२ ।।
**बृहदश्व बोले—**महाराज पाण्डुनन्दन! तुम जो यह कह रहे हो कि मुझसे बढ़कर अत्यन्त भाग्यहीन कोई पुरुष कहीं भी नहीं है, उसके विषयमें मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा। अनघ! पृथिवीपते! यदि तुम सुनना चाहो तो मैं उस व्यक्तिका परिचय दूँगा, जो इस पृथिवीपर तुमसे भी अधिक दुःखी राजा था ।। ५१-५२ ।।
वैशम्पायन उवाच
अथैनमब्रवीद् राजा ब्रवीतु भगवानिति ।
इमामवस्थां सम्प्राप्तं श्रोतुमिच्छामि पार्थिवम् ।। ५३ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब राजा युधिष्ठिरने मुनिसे कहा—'भगवन्! अवश्य कहिये। जो मेरी-जैसी संकटपूर्ण स्थितिमें पहुँचा हुआ हो, उस राजाका चरित्र मैं सुनना चाहता हूँ' ।। ५३ ।।
बृहदश्व उवाच
शृणु राजन्नवहितः सह भ्रातृभिरच्युत ।
यस्त्वत्तो दुःखिततरो राजाऽऽसीत् पृथिवीपते ।। ५४ ।।
**बृहदश्वने कहा—**राजन्! अपने धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले भूपाल! तुम भाइयोंसहित सावधान होकर सुनो। इस पृथिवीपर जो तुमसे भी अधिक दुःखी राजा था, उसका परिचय देता हूँ ।। ५४ ।।
निषधेषु महीपालो वीरसेन इति श्रुतः ।
तस्य पुत्रोऽभवन्नाम्ना नलो धर्मार्थकोविदः ।। ५५ ।।
निषधदेशमें वीरसेन नामसे प्रसिद्ध एक भूपाल हो गये हैं। उन्हींके पुत्रका नाम नल था। जो धर्म और अर्थके तत्त्वज्ञ थे ।। ५५ ।।
स निकृत्या जितो राजा पुष्करेणेति नः श्रुतम् ।
वनवासं सुदुःखार्तो भार्यया न्यवसत् सह ।। ५६ ।।
हमने सुना है कि राजा नलको उनके भाई पुष्करने छलसे ही जूएके द्वारा जीत लिया था और वे अत्यन्त दुःखसे आतुर हो अपनी पत्नीके साथ वनवासका दुःख भोगने लगे थे ।। ५६ ।।
न तस्य दासा न रथो न भ्राता न च बान्धवाः ।
वने निवसतौ राजञ्छिष्यन्ते स्म कदाचन ॥ ५७ ॥
राजन्! उनके साथ न सेवक थे न रथ, न भाई थे न बान्धव। वनमें रहते समय उनके पास ये वस्तुएँ कदापि शेष नहीं थीं ॥ ५७ ॥
भवान् हि संवृतो वीरैर्भ्रातृभिर्देवसम्मितैः ।
ब्रह्मकल्पैर्द्विजाग्र्यैश्च तस्मान्नार्हसि शोचितुम् ॥ ५८ ॥
तुम तो देवतुल्य पराक्रमी वीर भाइयोंसे घिरे हुए हो। ब्रह्माजीके समान तेजस्वी श्रेष्ठ ब्राह्मण तुम्हारे चारों ओर बैठे हुए हैं। अतः तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ॥
युधिष्ठिर उवाच
विस्तरेणाहमिच्छामि नलस्य सुमहात्मनः ।
चरितं वदतां श्रेष्ठ तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥ ५९ ॥
युधिष्ठिर बोले—वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुने! मैं उत्तम महामना राजा नलका चरित्र विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। आप मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ ५९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें
बृहदश्वयुधिष्ठिरसंवादविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥