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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

चित्रसेन, अर्जुन तथा युधिष्ठिरका संवाद और दुर्योधनका छुटकारा

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षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

चित्रसेन, अर्जुन तथा युधिष्ठिरका संवाद और दुर्योधनका छुटकारा

वैशम्पायन उवाच

ततोऽर्जुनश्चित्रसेनं प्रहसन्निदमब्रवीत् ।
मध्ये गन्धर्वसैन्यानां महेष्वासो महाद्युतिः ॥ १ ॥
किं ते व्यवसितं वीर कौरवाणां विनिग्रहे ।
किमर्थं च सदारोऽयं निगृहीतः सुयोधनः ॥ २ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर परम कान्तिमान् महाधनुर्धर अर्जुनने गन्धर्वोंकी सेनाके बीच चित्रसेनसे हँसते हुए पूछा—'वीर! कौरवोंको बंदी बनानेमें तुम्हारा क्या उद्देश्य था? स्त्रियोंसहित दुर्योधनको तुमने किसलिये कैद किया?' ॥ १-२ ॥

चित्रसेन उवाच

विदितोऽयमभिप्रायस्तत्रस्थेन दुरात्मनः ।
दुर्योधनस्य पापस्य कर्णस्य च धनंजय ॥ ३ ॥
वनस्थान् भवतो ज्ञात्वा क्लिश्यमानाननाथवत् ।
समस्थो विषमस्थांस्तान् द्रक्ष्यामीत्यनवस्थितान् ॥ ४ ॥
इमेऽवहसितुं प्राप्ता द्रौपदीं च यशस्विनीम् ।
ज्ञात्वा चिकीर्षितं चैषां मामुवाच सुरेश्वरः ॥ ५ ॥

**चित्रसेनने कहा—**धनंजय! देवराज इन्द्रको स्वर्गमें बैठे-ही-बैठे दुरात्मा दुर्योधन और पापी कर्णका यह अभिप्राय मालूम हो गया था कि ये आपलोगोंको वनमें रहकर अनाथकी भाँति क्लेश उठाते और विषम परिस्थितिमें पड़कर अस्थिरभावसे रहते हुए जानकर भी उस अवस्थामें आपको देखने और दुःखी करनेका निश्चय कर चुके हैं। ये स्वयं सम (सुखपूर्ण)-अवस्थामें स्थित हैं, फिर भी आप पाण्डवों तथा यशस्विनी द्रौपदीकी हँसी उड़ानेके लिये वनमें आये हैं। इस प्रकार इनकी (आपलोगोंका अनिष्ट करनेकी) इच्छा जानकर देवेश्वर इन्द्रने मुझसे इस प्रकार कहा— ॥ ३—५ ॥

गच्छ दुर्योधनं बद्ध्वा सहामात्यमिहानय ।
धनंजयश्च ते रक्ष्यः सह भ्रातृभिराहवे ॥ ६ ॥
स च प्रियः सखा तुभ्यं शिष्यश्च तव पाण्डवः ।

'चित्रसेन! तुम जाओ और दुर्योधनको उसके मन्त्रियोंसहित बाँधकर यहाँ ले आओ। युद्धमें तुम्हें भाइयोंसहित अर्जुनकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि पाण्डुनन्दन अर्जुन तुम्हारे

प्रिय सखा तथा शिष्य हैं' ।।
वचनाद् देवराजस्य ततोऽस्मीहागतो द्रुतम् ।। ७ ।।
अयं दुरात्मा बद्धश्च गमिष्यामि सुरालयम् ।
नेष्याम्येनं दुरात्मानं पाकशासनशासनात् ।। ८ ।।
वहाँसे देवराजकी यह आज्ञा मानकर मैं तुरन्त यहाँ चला आया। यह दुरात्मा दुर्योधन मेरी कैदमें आ गया है; अतः अब मैं देवलोकको जाऊँगा और पाकशासन इन्द्रकी आज्ञासे इस दुरात्माको भी वहीं ले जाऊँगा ।। ८ ।।

अर्जुन उवाच

उत्सृज्यतां चित्रसेन भ्रातास्माकं सुयोधनः ।
धर्मराजस्य संदेशान्मम चेदिच्छसि प्रियम् ।। ९ ।।
**अर्जुन बोले—**चित्रसेन! दुर्योधन हमलोगोंका भाई है। यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो धर्मराजके आदेशसे इसे छोड़ दो ।। ९ ।।

चित्रसेन उवाच

पापोऽयं नित्यसंतुष्टो न विमोक्षणमर्हति ।
प्रलब्धा धर्मराजस्य कृष्णायाश्च धनंजय ।। १० ।।
**चित्रसेनने कहा—**धनंजय! यह पापी सदा राज्यसुख भोगनेके कारण हर्षसे मतवाला हो उठा है; अतः इसे छोड़ना उचित नहीं है। इसने धर्मराज युधिष्ठिर तथा द्रौपदीको धोखा दिया है ।। १० ।।
नेदं चिकीर्षितं तस्य कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
जानाति धर्मराजो हि श्रुत्वा कुरु यथेच्छसि ।। ११ ।।
कुन्तीनन्दन धर्मराज युधिष्ठिर इसके इस कुटिल अभिप्रायको नहीं जानते हैं; अतः यह सब सुनकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो ।। ११ ।।

वैशम्पायन उवाच

ते सर्व एव राजानमभिजग्मुर्युधिष्ठिरम् ।
अभिगम्य च तत् सर्वं शशंसुस्तस्य चेष्टितम् ।। १२ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर वे सब लोग राजा युधिष्ठिरके पास गये। वहाँ जाकर गन्धर्वोने दुर्योधनकी सारी कुचेष्टा कह सुनायी ।। १२ ।।
अजातशत्रुस्तच्छ्रुत्वा गन्धर्वस्य वचस्तदा ।
मोक्षयामास तान् सर्वान् गन्धर्वान् प्रशशंस च ।। १३ ।।
गन्धर्वोंका यह कथन सुनकर अजातशत्रु युधिष्ठिरने उस समय समस्त कौरवोंको बन्धनसे छुड़ा दिया और गन्धर्वोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा की— ।। १३ ।।

दिष्ट्या भवद्भिर्बलिभिः शक्तैः सर्वैर्न हिंसितः ।
दुर्वृत्तो धार्तराष्ट्रोऽयं सामात्यज्ञातिबान्धवः ॥ १४ ॥
'आप सब लोग बलवान् और सामर्थ्यशाली हैं। आपने मन्त्रियों तथा जाति-भाइयोंसहित इस दुराचारी दुर्योधनका वध नहीं किया, यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ १४ ॥

उपकारो महांस्तात कृतोऽयं मम खेचरैः ।
कुलं न परिभूतं मे मोक्षणेऽस्य दुरात्मनः ॥ १५ ॥
'तात! आकाशचारी गन्धर्वोंने यह मेरा बहुत बड़ा उपकार किया कि इस दुरात्माको छोड़ दिया, इसलिये मेरे कुलका अपमान नहीं हुआ ॥ १५ ॥

आज्ञापयध्वमिष्टानि प्रीयामो दर्शनेन वः ।
प्राप्य सर्वानभिप्रायांस्ततो व्रजत मा चिरम् ॥ १६ ॥
'गन्धर्वो! अपनी अभीष्ट सेवाके लिये हमें आज्ञा दीजिये। हम सब लोग आपके दर्शनसे बहुत प्रसन्न हैं। अपनी समस्त मनोवांछित वस्तुओंको प्राप्त करनेके पश्चात् यहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कीजियेगा ॥ १६ ॥

अनुज्ञातास्तु गन्धर्वाः पाण्डुपुत्रेण धीमता ।
सहाप्सरोभिः संहृष्टाश्चित्रसेनमुखा ययुः ॥ १७ ॥
बुद्धिमान् पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे आज्ञा लेकर चित्रसेन आदि सब गन्धर्व अप्सराओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे विदा हुए ॥ १७ ॥

(देवलोकं ततो गत्वा गन्धर्वैः सहितस्तदा ।
न्यवेदयच्च तत् सर्वं चित्रसेनः शतक्रतोः ॥)
देवराडपि गन्धर्वान् मृतांस्तान् समजीवयत् ।
दिव्येनामृतवर्षेण ये हताः कौरवैर्युधि ॥ १८ ॥
तदनन्तर गन्धर्वोंसहित चित्रसेनने देवलोकमें पहुँचकर देवराज इन्द्रके समक्ष सब समाचार निवेदन किया। युद्धमें कौरवोंद्वारा जो गन्धर्व मारे गये थे, उन सबको देवराज इन्द्रने दिव्य अमृतकी वर्षा करके जिला दिया ॥ १८ ॥

ज्ञातींस्तानवमुच्याथ राजदारांश्च सर्वशः ।
कृत्वा च दुष्करं कर्म प्रीतियुक्ताश्च पाण्डवाः ॥ १९ ॥
सस्त्रीकुमारैः कुरुभिः पूज्यमाना महारथाः ।
बभ्राजिरे महात्मानः क्रतुमध्ये यथाग्नयः ॥ २० ॥
इस प्रकार उन सब भाई-बंधुओं एवं राजकुलकी महिलाओंको गन्धर्वोंसे छुड़ाकर एवं दुष्कर पराक्रम करके प्रसन्न हुए महारथी महामना पाण्डव स्त्री-बालकोंसहित कौरवोंद्वारा पूजित एवं प्रशंसित हो यज्ञ-मण्डपमें प्रज्वलित अग्नियोंके समान देदीप्यमान हो रहे थे ॥ १९-२० ॥

ततो दुर्योधनं मुक्तं भ्रातृभिः सहितस्तदा ।
युधिष्ठिरस्तु प्रणयादिदं वचनमब्रवीत् ॥ २१ ॥
तदनन्तर बन्धनमुक्त हुए दुर्योधनसे भाइयोंसहित युधिष्ठिरने प्रेमपूर्वक यह बात कही — ॥ २१ ॥

मा स्म तात पुनः कार्षीरीदृशं साहसं क्वचित् ।
न हि साहसकर्तारः सुखमेधन्ति भारत ॥ २२ ॥
‘तात! फिर कभी ऐसा दुःसाहस न करना। भारत! दुःसाहस करनेवाले मनुष्य कभी सुखी नहीं होते ॥ २२ ॥

स्वस्तिमान् सहितः सर्वैर्भ्रातृभिः कुरुनन्दन ।
गृहान् व्रज यथाकामं वैमनस्यं च मा कृथाः ॥ २३ ॥
‘कुरुनन्दन! अब तुम अपने सब भाइयोंके साथ कुशलपूर्वक इच्छानुसार घर जाओ। हमलोगोंके प्रति मनमें वैमनस्य न रखना? ॥ २३ ॥

वैशम्पायन उवाच

पाण्डवेनाभ्यनुज्ञातो राजा दुर्योधनस्तदा ।
प्रणम्य धर्मपुत्रं तु गतेन्द्रिय इवातुरः ॥ २४ ॥

विदीर्यमाणो व्रीडावान् जगाम नगरं प्रति ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी आज्ञा पाकर राजा दुर्योधनने उन धर्मपुत्र अजातशत्रुको प्रणाम करके अपने नगरकी ओर प्रस्थान किया। उस समय जिसकी इन्द्रियाँ काम न देती हों उस रोगीकी भाँति उसका हृदय व्यथासे विदीर्ण हो रहा था। उसे अपने कुकृत्यपर बड़ी लज्जा हो रही थी ॥ २४ १/२ ॥
तस्मिन् गते कौरवेये कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ २५ ॥
भ्रातृभिः सहितो वीरः पूज्यमानो द्विजातिभिः ।
तपोधनैश्च तैः सर्वैर्वृतः शक्र इवामरैः ॥ २६ ॥
तथा द्वैतवने तस्मिन् विजहार मुदा युतः ॥ २७ ॥
दुर्योधनके चले जानेपर द्विजातियोंसे प्रशंसित होते हुए भाइयोंसहित वीर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर वहाँके समस्त तपस्वी मुनियोंसे घिरे रहकर देवताओंके बीचमें बैठे हुए इन्द्रकी भाँति शोभा पाने और प्रसन्नतापूर्वक द्वैतवनमें विहार करने लगे ॥ २५—२७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनमोक्षणे
षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनको छुड़ानेसे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २८ श्लोक हैं)