महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
इल्वल और वातापिका वर्णन, महर्षि अगस्त्यका पितरोंके उद्धारके लिये विवाह करनेका विचार तथा विदर्भराजका महर्षि अगस्त्यसे एक कन्या पाना
षण्णवतितमोऽध्यायः
इल्वल और वातापिका वर्णन, महर्षि अगस्त्यका पितरोंके उद्धारके लिये विवाह करनेका विचार तथा विदर्भराजका महर्षि अगस्त्यसे एक कन्या पाना
वैशम्पायन उवाच
ततः सम्प्रस्थितो राजा कौन्तेयो भूरिदक्षिणः ।
अगस्त्याश्रममासाद्य दुर्जयायामुवास ह ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर प्रचुर दक्षिणा देनेवाले कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरने गयासे प्रस्थान किया और अगस्त्याश्रममें जाकर दुर्जय मणिमती नगरीमें निवास किया ॥ १ ॥
तत्रैव लोमशं राजा पप्रच्छ वदतां वरः ।
अगस्त्येनेह वातापिः किमर्थमुपशामितः ॥ २ ॥
वहीं वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने महर्षि लोमशसे पूछा—‘ब्रह्मन्! अगस्त्यजीने यहाँ वातापिको किसलिये नष्ट किया? ॥ २ ॥
आसीद्वा किं प्रभावश्च स दैत्यो मानवान्तकः ।
किमर्थं चोदितो मन्युरगस्त्यस्य महात्मनः ॥ ३ ॥
‘मनुष्योंका विनाश करनेवाले उस दैत्यका प्रभाव कैसा था? और महात्मा अगस्त्यजीके मनमें क्रोधका उदय कैसे हुआ’? ॥ ३ ॥
लोमश उवाच
इल्वलो नाम दैतेय आसीत् कौरवनन्दन ।
मणिमत्यां पुरि पुरा वातापिस्तस्य चानुजः ॥ ४ ॥
लोमशजीने कहा—कौरवनन्दन! पूर्वकालकी बात है, इस मणिमती नगरीमें इल्वल नामक दैत्य रहता था। वातापि उसीका छोटा भाई था ॥ ४ ॥
स ब्राह्मणं तपोयुक्तमुवाच दितिनन्दनः ।
पुत्रं मे भगवानेकमिन्द्रतुल्यं प्रयच्छतु ॥ ५ ॥
तस्मै स ब्राह्मणो नादात् पुत्रं वासवसम्मितम् ।
चुक्रोध सोऽसुरस्तस्य ब्राह्मणस्य ततो भृशम् ॥ ६ ॥
तदाप्रभृति राजेन्द्र इल्वलो ब्रह्महासुरः ।
मन्युमान् भ्रातरं छागं मायावी ह्यकरोत् ततः ॥ ७ ॥
मेषरूपी च वातापिः कामरूप्यभवत् क्षणात् ।
संस्कृत्य च भोजयति ततो विप्रं जिघांसति ॥ ८ ॥
एक दिन दितिनन्दन इल्वलने एक तपस्वी ब्राह्मणसे कहा—'भगवन्! आप मुझे ऐसा पुत्र दें, जो इन्द्रके समान पराक्रमी हो।' उन ब्राह्मणदेवताने इल्वलको इन्द्रके समान पुत्र नहीं दिया। इससे वह असुर उन ब्राह्मणदेवतापर बहुत कुपित हो उठा। राजन्! तभीसे इल्वल दैत्य क्रोधमें भरकर ब्राह्मणोंकी हत्या करने लगा। वह मायावी अपने भाई वातापिको मायासे बकरा बना देता था। वातापि भी इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ था! अतः वह क्षणभरमें भेड़ा और बकरा बन जाता था। फिर इल्वल उस भेड़ या बकरेको पकाकर उसका मांस राँधता और किसी ब्राह्मणको खिला देता था। इसके बाद वह ब्राह्मणको मारनेकी इच्छा करता था ॥ ५—८ ॥
स चाह्वयति यं वाचा गतं वैवस्वतक्षयम् ।
स पुनर्देहमास्थाय जीवन् स्म प्रत्यदृश्यत ॥ ९ ॥
इल्वलमें यह शक्ति थी कि वह जिस किसी भी यमलोकमें गये हुए प्राणीको उसका नाम लेकर बुलाता वह पुनः शरीर धारण करके जीवित दिखायी देने लगता था ॥ ९ ॥
ततो वातापिमसुरं छागं कृत्वा सुसंस्कृतम् ।
तं ब्राह्मणं भोजयित्वा पुनरेव समाह्वयत् ॥ १० ॥
उस दिन वातापि दैत्यको बकरा बनाकर इल्वल उसके मांसका संस्कार किया और उन ब्राह्मणदेवको वह मांस खिलाकर पुनः अपने भाईको पुकारा ॥ १० ॥
तामिल्वलेन महता स्वरेण वाचमीरिताम् ।
श्रुत्वातिमायो बलवान् क्षिप्रं ब्राह्मणकण्टकः ॥ ११ ॥
तस्य पार्श्वं विनिर्भिद्य ब्राह्मणस्य महासुरः ।
वातापिः प्रहसन् राजन् निश्चक्राम विशाम्पते ॥ १२ ॥
राजन्! इल्वलके द्वारा उच्चस्वरसे बोली हुई वाणी सुनकर वह अत्यन्त मायावी ब्राह्मणशत्रु बलवान् महादैत्य वातापि उस ब्राह्मणकी पसलीको फाड़कर हँसता हुआ निकल आया ॥ ११-१२ ॥
एवं स ब्राह्मणान् राजन् भोजयित्वा पुनः पुनः ।
हिंसयामास दैतेय इल्वलो दुष्टचेतनः ॥ १३ ॥
राजन्! इस प्रकार दुष्टहृदय इल्वल दैत्य बार-बार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर अपने भाईद्वारा उनकी हिंसा करा देता था (इसीलिये अगस्त्यमुनिने वातापिको नष्ट किया था) ॥ १३ ॥
अगस्त्यश्चापि भगवानेतस्मिन् काल एव तु ।
पितॄन् ददर्श गर्ते वै लम्बमानानधोमुखान् ॥ १४ ॥
इन्हीं दिनों भगवान् अगस्त्यमुनि कहीं चले जा रहे थे। उन्होंने एक जगह अपने पितरोंको देखा जो एक गड्ढेमें नीचे मुँह किये लटक रहे थे ॥ १४ ॥
सोऽपृच्छल्लम्बमानांस्तान् भवन्त इव कम्पिताः ।
(किमर्थं वेह लम्बध्वं गर्ते यूयमधोमुखाः ।)
संतानहेतोरिति ते प्रत्यूचुर्ब्रह्मवादिनः ।। १५ ।।
तब उन लटकते हुए पितरोंसे अगस्त्यजीने पूछा—'आपलोग यहाँ किसलिये नीचे मुँह किये काँपते हुए-से लटक रहे हैं?' यह सुनकर उन वेदवादी पितरोंने उत्तर दिया—'संतानपरम्पराके लोपकी सम्भावनाके कारण हमारी यह दुर्दशा हो रही है' ।। १५ ।।
ते तस्मै कथयामासुर्वयं ते पितरः स्वकाः ।
गर्तमेतमनुप्राप्ता लम्बामः प्रसवार्थिनः ।। १६ ।।
उन्होंने अगस्त्यके पूछनेपर बताया कि 'हम तुम्हारे ही पितर हैं। संतानके इच्छुक होकर इस गड्ढेमें लटक रहे हैं' ।। १६ ।।
यदि नो जनयेथास्त्वमगस्त्यापत्यमुत्तमम् ।
स्यान्नोऽस्मान्निरयान्मोक्षस्त्वं च पुत्राप्नुया गतिम् ।। १७ ।।
'अगस्त्य! यदि तुम हमारे लिये उत्तम संतान उत्पन्न कर सको तो हम इस नरकसे छुटकारा पा सकते हैं और बेटा! तुम्हें भी सद्गति प्राप्त होगी' ।। १७ ।।
स तानुवाच तेजस्वी सत्यधर्मपरायणः ।
करिष्ये पितरः कामं व्येतु वो मानसो ज्वरः ॥ १८ ॥
तब सत्यधर्मपरायण तेजस्वी अगस्त्यने उनसे कहा—'पितरो! मैं आपकी इच्छा पूर्ण करूँगा। आपकी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये' ॥ १८ ॥
ततः प्रसवसंतानं चिन्तयन् भगवानृषिः ।
आत्मनः प्रसवस्यार्थे नापश्यत् सदृशीं स्त्रियम् ॥ १९ ॥
तब भगवान् महर्षि अगस्त्यने संतानोत्पादनकी चिन्ता करते हुए अपने अनुरूप संतानको गर्भमें धारण करनेके लिये योग्य पत्नीका अनुसंधान किया, परंतु उन्हें कोई योग्य स्त्री दिखायी नहीं दी ॥ १९ ॥
स तस्य तस्य सत्त्वस्य तत् तदङ्गमनुत्तमम् ।
संगृह्य तत्समैरङ्गैर्निर्ममे स्त्रियमुत्तमाम् ॥ २० ॥
तब उन्होंने एक-एक जन्तुके उत्तमोत्तम अंगोंका भावनाद्वारा संग्रह करके उन सबके द्वारा एक परम सुन्दर स्त्रीका निर्माण किया ॥ २० ॥
स तां विदर्भराजस्य पुत्रार्थं तप्यतस्तपः ।
निर्मितामात्मनोऽर्थाय मुनिः प्रादान्महातपाः ॥ २१ ॥
उन दिनों विदर्भराज पुत्रके लिये तपस्या कर रहे थे। महातपस्वी अगस्त्यमुनिने अपने लिये निर्मित की हुई वह स्त्री राजाको दे दी ॥ २१ ॥
सा तत्र जज्ञे सुभगा विद्युत् सौदामनी यथा ।
विभ्राजमाना वपुषा व्यवर्धत शुभानना ॥ २२ ॥
उस सुन्दरी कन्याका उस राजभवनमें बिजलीके समान प्रादुर्भाव हुआ। वह शरीरसे प्रकाशमान हो रही थी। उसका मुख बहुत सुन्दर था, वह राजकन्या वहाँ दिनोदिन बढ़ने लगी ॥ २२ ॥
जातमात्रां च तां दृष्ट्वा वैदर्भः पृथिवीपतिः ।
प्रहर्षेण द्विजातिभ्यो न्यवेदयत भारत ॥ २३ ॥
भरतनन्दन! राजा विदर्भने उस कन्याके उत्पन्न होते ही हर्षमें भरकर ब्राह्मणोंको यह शुभ संवाद सुनाया ॥
अभ्यनन्दन्त तां सर्वे ब्राह्मणा वसुधाधिप ।
लोपामुद्रेति तस्याश्च चक्रिरे नाम ते द्विजाः ॥ २४ ॥
राजन्! उस समय सब ब्राह्मणोंने राजाका अभिनन्दन किया और उस कन्याका नाम 'लोपामुद्रा' रख दिया ॥ २४ ॥
ववृधे सा महाराज बिभ्रती रूपमुत्तमम् ।
अप्सुवोत्पलिनी शीघ्रमग्नेरिव शिखा शुभा ॥ २५ ॥
महाराज! उत्तम रूप धारण करनेवाली वह राजकुमारी जलमें कमलिनी तथा यज्ञवेदीपर प्रज्वलित शुभ्र अग्निशिखाकी भाँति शीघ्रतापूर्वक बढ़ने लगी ॥ २५ ॥
तां यौवनस्थां राजेन्द्र शतं कन्याः स्वलंकृताः ।
दास्यः शतं च कल्याणीमुपातस्थुर्वशानुगाः ॥ २६ ॥
राजेन्द्र! जब उसने युवावस्थामें पदार्पण किया, उस समय उस कल्याणी कन्याको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सौ सुन्दरी कन्याएँ और सौ दासियाँ उसकी आज्ञाके अधीन होकर घेरे रहतीं और उसकी सेवा किया करती थीं ॥ २६ ॥
सा स्म दासीशतवृता मध्ये कन्याशतस्य च ।
आस्ते तेजस्विनी कन्या रोहिणीव दिवि प्रभा ॥ २७ ॥
सौ दासियों और सौ कन्याओंके बीचमें वह तेजस्विनी कन्या आकाशमें सूर्यकी प्रभा तथा नक्षत्रोंमें रोहिणीके समान सुशोभित होती थी ॥ २७ ॥
यौवनस्थामपि च तां शीलाचारसमन्विताम् ।
न वव्रे पुरुषः कश्चिद् भयात् तस्य महात्मनः ॥ २८ ॥
यद्यपि वह युवती और शील एवं सदाचारसे सम्पन्न थी तो भी महात्मा अगस्त्यके भयसे किसी राजकुमारने उसका वरण नहीं किया ॥ २८ ॥
सा तु सत्यवती कन्या रूपेणाप्सरसोऽप्यति ।
तोषयामास पितरं शीलेन स्वजनं तथा ॥ २९ ॥
वह सत्यवती राजकुमारी रूपमें अप्सराओंसे भी बढ़कर थी। उसने अपने शील-स्वभावसे पिता तथा स्वजनोंको संतुष्ट कर दिया था ॥ २९ ॥
वैदर्भीं तु तथायुक्तां युवतीं प्रेक्ष्य वै पिता ।
मनसा चिन्तयामास कस्मै दद्यामिमां सुताम् ॥ ३० ॥
पिता विदर्भराजकुमारीको युवावस्थामें प्रविष्ट हुई देख मन-ही-मन यह विचार करने लगे कि ‘इस कन्याका किसके साथ विवाह करूँ’ ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां अगस्त्योपाख्याने षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्योपाख्यानविषयक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९६ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३० १/३ श्लोक हैं]