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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

(इन्द्रलोकाभिगमनपर्व)

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(इन्द्रलोकाभिगमनपर्व)

द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

अर्जुनका हिमालयसे विदा होकर मातलिके साथ स्वर्गलोकको प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच

गतेषु लोकपालेषु पार्थः शत्रुनिबर्हणः ।
चिन्तयामास राजेन्द्र देवराजरथं प्रति ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! लोकपालोंके चले जानेपर शत्रुसंहारक अर्जुनने देवराज इन्द्रके रथका चिन्तन किया ॥ १ ॥

ततश्चिन्तयमानस्य गुडाकेशस्य धीमतः ।
रथो मातलिसंयुक्त आजगाम महाप्रभः ॥ २ ॥
निद्राविजयी बुद्धिमान् पार्थके चिन्तन करते ही मातलीसहित महातेजस्वी रथ वहाँ आ गया ॥ २ ॥

नभो वितिमिरं कुर्वञ्जलदान् पाटयन्निव ।
दिशः सम्पूरयन् नादैर्महामेघरवोपमैः ॥ ३ ॥
वह रथ आकाशको अन्धकारशून्य मेघोंकी घटाको विदीर्ण और महान् मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर शब्दसे दिशाओंको परिपूर्ण-सा कर रहा था ॥ ३ ॥

असयः शक्तयो भीमा गदाश्चोग्रप्रदर्शनाः ।
दिव्यप्रभावाः प्रासाश्च विद्युतश्च महाप्रभाः ॥ ४ ॥
तथैवाशनयश्चैव चक्रयुक्तास्तुलागुडाः ।
वायुस्फोटाः सनिर्घाता महामेघस्वनास्तथा ॥ ५ ॥
उस रथमें तलवार, भयंकर शक्ति, उग्र गदा, दिव्य प्रभावशाली प्रास, अत्यन्त कान्तिमती विद्युत्, अशनि एवं चक्रयुक्त भारी वजनवाले प्रस्तरके गोले रखे हुए थे, जो चलाते समय हवामें सनसनाहट पैदा करते थे। तथा जिनसे वज्रगर्जन और महामेघोंकी गम्भीर ध्वनिके समान शब्द होते थे ॥ ४-५ ॥

तत्र नागा महाकाया ज्वलितास्याः सुदारुणाः ।
सिताभ्रकूटप्रतिमाः संहताश्च तथोपलाः ॥ ६ ॥

उस स्थानमें अत्यन्त भयंकर तथा प्रज्वलित मुखवाले विशालकाय सर्प मौजूद थे। श्वेत बादलोंके समूहकी भाँति ढेर-के-ढेर युद्धमें फेंकनेयोग्य पत्थर भी रखे हुए थे ॥ ६ ॥
दशवाजिसहस्राणि हरीणां वातरंहसाम् ।
वहन्ति यं नेत्रमुषं दिव्यं मायामयं रथम् ॥ ७ ॥
वायुके समान वेगशाली दस हजार श्वेत-पीत रंगवाले घोड़े नेत्रोंमें चकाचौंध पैदा करनेवाले उस दिव्य मायामय रथको वहन करते थे ॥ ७ ॥
तत्रापश्यन्महानीलं वैजयन्तं महाप्रभम् ।
ध्वजमिन्दीवरश्यामं वंशं कनकभूषणम् ॥ ८ ॥
अर्जुनने उस रथपर अत्यन्त नीलवर्णवाले महातेजस्वी 'वैजयन्त' नामक इन्द्रध्वजको फहराता देखा। उसकी श्याम सुषमा नील कमलकी शोभाको तिरस्कृत कर रही थी। उस ध्वजके दण्डमें सुवर्ण मढ़ा हुआ था ॥ ८ ॥
तस्मिन् रथे स्थितं सूतं तप्तहेमविभूषितम् ।
दृष्ट्वा पार्थो महाबाहुर्देवमेवान्वतर्कयत् ॥ ९ ॥
महाबाहु कुन्तीकुमारने उस रथपर बैठे हुए सारथिकी ओर देखा, जो तपाये हुए सुवर्णके आभूषणोंसे विभूषित था। उसे देखकर उन्होंने कोई देवता ही समझा ॥ ९ ॥
तथा तर्कयतस्तस्य फाल्गुनस्याथ मातलिः ।
संनतः प्रस्थितो भूत्वा वाक्यमर्जुनमब्रवीत् ॥ १० ॥
इस प्रकार विचार करते हुए अर्जुनके सम्मुख उपस्थित हो मातलिने विनीतभावसे कहा ॥ १० ॥

मातलिरुवाच

भो भोः शक्रात्मज श्रीमाञ्छक्रस्त्वां द्रष्टुमिच्छति ।
आरोहतु भवाञ्छीघ्रं रथमिन्द्रस्य सम्मतम् ॥ ११ ॥
मातलि बोला— इन्द्रकुमार! श्रीमान् देवराज इन्द्र आपको देखना चाहते हैं। यह उनका प्रिय रथ है। आप इसपर शीघ्र आरूढ़ होइये ॥ ११ ॥
आह माममरश्रेष्ठः पिता तव शतक्रतुः ।
कुन्तीसुतमिह प्राप्तं पश्यन्तु त्रिदशालयाः ॥ १२ ॥
एष शक्रः परिवृतो देवैर्ऋषिगणैस्तथा ।
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च त्वां दिदृक्षुः प्रतीक्षते ॥ १३ ॥
आपके पिता देवेश्वर शतक्रतुने मुझसे कहा है कि 'तुम कुन्तीनन्दन अर्जुनको यहाँ ले आओ, जिससे सब देवता उन्हें देखें।' देवताओं, महर्षियों, गन्धर्वों तथा अप्सराओंसे घिरे हुए इन्द्र आपको देखनेके लिये प्रतीक्षा कर रहे हैं ॥ १२-१३ ॥
अस्माल्लोकाद् देवलोकं पाकशासनशासनात् ।

आरोह त्वं मया सार्धं लब्धास्त्रः पुनरेष्यसि ॥ १४ ॥
आप देवराजकी आज्ञासे इस लोकसे मेरे साथ देवलोकको चलिये। वहाँसे दिव्यास्त्र प्राप्त करके लौट आइयेगा ॥ १४ ॥

अर्जुन उवाच

मातले गच्छ शीघ्रं त्वमारोहस्व रथोत्तमम् ।
राजसूयाश्वमेधानां शतैरपि सुदुर्लभम् ॥ १५ ॥
अर्जुनने कहा— मातले! आप जल्दी चलिये। अपने इस उत्तम रथपर पहले आप चढ़िये। यह सैकड़ों राजसूय और अश्वमेधयज्ञोंद्वारा भी अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १५ ॥
पार्थिवैः सुमहाभाग्यैर्यज्वभिर्भूरिदक्षिणैः ।
दैवतैर्वा समारोढुं दानवैर्वा रथोत्तमम् ॥ १६ ॥
प्रचुर दक्षिणा देनेवाले, महान् सौभाग्यशाली, यज्ञपरायण भूमिपालों, देवताओं अथवा दानवोंके लिये भी इस उत्तम रथपर आरूढ़ होना कठिन है ॥ १६ ॥
नातप्ततपसा शक्य एष दिव्यो महारथः ।
द्रष्टुं वाप्यथवा स्प्रष्टुमारोढुं कुत एव च ॥ १७ ॥
जिन्होंने तपस्या नहीं की है, वे इस महान् दिव्य रथका दर्शन या स्पर्श भी नहीं कर सकते, फिर इसपर आरूढ़ होनेकी तो बात ही क्या है? ॥ १७ ॥
त्वयि प्रतिष्ठिते साधो रथस्थे स्थिरवाजिनि ।
पश्चादहमथारोक्ष्ये सुकृती सत्पथं यथा ॥ १८ ॥
साधु सारथे! आप इस रथपर स्थिरतापूर्वक बैठकर जब घोड़ोंको काबूमें कर लें, तब जैसे पुण्यात्मा सन्मार्गपर आरूढ़ होता है, उसी प्रकार पीछे मैं भी इस रथपर आरूढ़ होऊँगा ॥ १८ ॥

वैशम्पायन उवाच

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा मातलिः शक्रसारथिः ।
आरुरोह रथं शीघ्रं हयान् येमे च रश्मिभिः ॥ १९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! अर्जुनका यह वचन सुनकर इन्द्रसारथि मातलि शीघ्र ही रथपर जा बैठा और बागडोर खींचकर घोड़ोंको काबूमें किया ॥ १९ ॥
ततोऽर्जुनो हृष्टमना गङ्गायामाप्लुतः शुचिः ।
जजाप जप्यं कौन्तेयो विधिवत् कुरुनन्दनः ॥ २० ॥
तदनन्तर कुरुनन्दन कुन्तीकुमार अर्जुनने प्रसन्नमनसे गंगामें स्नान किया और पवित्र हो विधिपूर्वक जपने-योग्य मन्त्रका जप किया ॥ २० ॥
ततः पितॄन् यथान्यायं तर्पयित्वा यथाविधि ।
मन्दरं शैलराजं तमाप्रष्टुमुपचक्रमे ॥ २१ ॥

फिर विधिपूर्वक न्यायोचित रीतिसे पितरोंका तर्पण करके विस्तृत शैलराज हिमालयसे विदा लेनेका उपक्रम किया ॥ २१ ॥

साधूनां पुण्यशीलानां मुनीनां पुण्यकर्मणाम् ।
त्वं सदा संश्रयः शैल स्वर्गमार्गाभिकाङ्क्षिणाम् ॥ २२ ॥
'गिरिराज! तुम साधु-महात्माओं, पुण्यात्मा मुनियों तथा स्वर्गमार्गकी अभिलाषा रखनेवाले पुण्यकर्मा मनुष्योंके सदा शुभ आश्रय हो ॥ २२ ॥

त्वत्प्रसादात् सदा शैल ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः ।
स्वर्गं प्राप्ताश्चरन्ति स्म देवैः सह गतव्यथाः ॥ २३ ॥
'गिरिराज! तुम्हारे कृपाप्रसादसे सदा कितने ही ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य स्वर्गमें जाकर व्यथारहित हो देवताओंके साथ विचरते हैं ॥ २३ ॥

अद्रिराज महाशैल मुनिसंश्रय तीर्थवन् ।
गच्छाम्यामन्त्रयामि त्वां सुखमस्म्युषितस्त्वयि ॥ २४ ॥
'अद्रिराज! महाशैल! मुनियोंके निवासस्थान! तीर्थोंसे विभूषित हिमालय! मैं तुम्हारे शिखरपर सुखपूर्वक रहा हूँ, अतः तुमसे आज्ञा माँगकर यहाँसे जा रहा हूँ ॥ २४ ॥

तव सानूनि कुञ्जांश्च नद्यः प्रस्रवणानि च ।
तीर्थानि च सुपुण्यानि मया दृष्टान्यनेकशः ॥ २५ ॥
'तुम्हारे शिखर, कुंजवन, नदियाँ, झरने और परम पुण्यमय तीर्थस्थान मैंने अनेक बार देखे हैं ॥ २५ ॥

फलानि च सुगन्धीनि भक्षितानि ततस्ततः ।
सुसुगन्धाश्च वार्योघास्त्वच्छरीरविनिःसृताः ॥ २६ ॥
अमृतास्वादनीया मे पीताः प्रस्रवणोदकाः ।
'यहाँके विभिन्न स्थानोंसे सुगन्धित फल लेकर भोजन किये हैं। तुम्हारे शरीरसे प्रकट हुए परम सुगन्धित प्रचुर जलका सेवन किया है। तुम्हारे झरनेका अमृतके समान स्वादिष्ट जल मैंने प्रतिदिन पान किया है ॥ २६ १/२ ॥

शिशुर्यथा पितुरङ्के सुसुखं वर्तते नग ॥ २७ ॥
तथा तवाङ्के ललितं शैलराज मया प्रभो ।
'प्रभो नगराज! जैसे शिशु अपने पिताके अंकमें बड़े सुखसे रहता है, उसी प्रकार मैंने भी तुम्हारी गोदमें आमोदपूर्वक क्रीड़ाएँ की हैं ॥ २७ १/२ ॥

अप्सरोगणसंकीर्णे ब्रह्मघोषानुनादिते ॥ २८ ॥
सुखमस्म्युषितः शैल तव सानुषु नित्यदा ।
'शैलराज! अप्सराओंसे व्याप्त और वैदिक मन्त्रोंके उच्चघोषसे प्रतिध्वनित तुम्हारे शिखरोंपर मैंने प्रतिदिन बड़े सुखसे निवास किया है' ॥ २८ १/२ ॥

एवमुक्त्वाऽर्जुनः शैलमामन्त्र्य परवीरहा ॥ २९ ॥

आरुरोह रथं दिव्यं द्योतयन्निव भास्करः ।
ऐसा कहकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुन शैलराजसे आज्ञा माँगकर उस दिव्य रथको देदीप्यमान करते हुए-से उसपर आरूढ़ हो गये, मानो सूर्य सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहे हों ॥ २९ १/२ ॥

स तेनादित्यरूपेण दिव्येनाद्भुतकर्मणा ॥ ३० ॥
ऊर्ध्वमाचक्रमे धीमान् प्रहृष्टः कुरुनन्दनः ।
सोऽदर्शनपथं यातो मर्त्यानां धर्मचारिणाम् ॥ ३१ ॥
परम बुद्धिमान् कुरुनन्दन अर्जुन बड़े प्रसन्न होकर उस अद्भुत चालसे चलनेवाले सूर्यस्वरूप दिव्य रथके द्वारा ऊपरकी ओर जाने लगे। धीरे-धीरे धर्मात्मा मनुष्योंके दृष्टिपथसे दूर हो गये ॥ ३०-३१ ॥

ददर्शाद्भुतरूपाणि विमानानि सहस्रशः ।
न तत्र सूर्यः सोमो वा द्योतते न च पावकः ॥ ३२ ॥
ऊपर जाकर उन्होंने सहस्रों अद्भुत विमान देखे। वहाँ न सूर्य प्रकाशित होते हैं, न चन्द्रमा। अग्निकी प्रभा भी वहाँ काम नहीं देती है ॥ ३२ ॥

स्वयैव प्रभया तत्र द्योतन्ते पुण्यलब्धया ।
तारारूपाणि यानीह दृश्यन्ते द्युतिमन्ति वै ॥ ३३ ॥
दीपवद् विप्रकृष्टत्वात् तनूनि सुमहान्त्यपि ।

तानि तत्र प्रभास्वन्ति रूपवन्ति च पाण्डवः ॥ ३४ ॥
ददर्श स्वेषु धिष्ण्येषु दीप्तिमन्तः स्वयार्चिषा ।
तत्र राजर्षयः सिद्धा वीराश्च निहता युधि ॥ ३५ ॥
वहाँ स्वर्गके निवासी अपने पुण्यकर्मोंसे प्राप्त हुई अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होते हैं। यहाँ प्रकाशमान तारोंके रूपमें जो दूर होनेके कारण दीपककी भाँति छोटे और बड़े प्रकाशपुंज दिखायी देते हैं, उन सभी प्रकाशमान स्वरूपोंको पाण्डुनन्दन अर्जुनने देखा। जो अपने-अपने अधिष्ठानोंमें अपनी ही ज्योतिसे देदीप्यमान हो रहे थे। उन लोकोंमें वे सिद्ध राजर्षि वीर निवास करते थे, जो युद्धमें प्राण देकर वहाँ पहुँचे थे ॥ ३३—३५ ॥
तपसा च जितं स्वर्गं सम्पेतुः शतसङ्घशः ।
गन्धर्वाणां सहस्राणि सूर्यज्वलिततेजसाम् ॥ ३६ ॥
गुह्यकानामृषीणां च तथैवाप्सरसां गणान् ।
लोकानात्मप्रभान् पश्यन् फाल्गुनो विस्मयान्वितः ॥ ३७ ॥
सैकड़ों झुंड-के-झुंड तपस्वी पुरुष स्वर्गमें जा रहे थे, जिन्होंने तपस्याद्वारा उसपर विजय पायी थी। सूर्यके समान प्रकाशमान सहस्रों गन्धर्वों, गुह्यकों, ऋषियों तथा अप्सराओंके समूहोंको और उनके स्वतः प्रकाशित होनेवाले लोकोंको देखकर अर्जुनको बड़ा आश्चर्य होता था ॥ ३६-३७ ॥
पप्रच्छ मातलिं प्रीत्या स चाप्येनमुवाच ह ।
एते सुकृतिनः पार्थ स्वेषु धिष्ण्येष्ववस्थिताः ॥ ३८ ॥
तान् दृष्टवानसि विभो तारारूपाणि भूतले ।
अर्जुनने प्रसन्नतापूर्वक मातलिसे उनके विषयमें पूछा, तब मातलिने उनसे कहा—'कुन्तीकुमार! ये वे ही पुण्यात्मा पुरुष हैं, जो अपने-अपने लोकोंमें निवास करते हैं। विभो! उन्हींको भूतलपर आपने तारोंके रूपमें चमकते देखा है' ॥ ३८ १/२ ॥
ततोऽपश्यत् स्थितं द्वारि शुभं वैजयिनं गजम् ॥ ३९ ॥
ऐरावतं चतुर्दन्तं कैलासमिव शृङ्खिणम् ।
स सिद्धमार्गमाक्रम्य कुरुपाण्डवसत्तमः ॥ ४० ॥
व्यरोचत यथापूर्वं मान्धाता पार्थिवोत्तमः ।
अभिचक्राम लोकान् स राज्ञां राजीवलोचनः ॥ ४१ ॥
तदनन्तर अर्जुनने स्वर्गद्वारपर खड़े हुए सुन्दर विजयी गजराज ऐरावतको देखा, जिसके चार दाँत बाहर निकले हुए थे। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो अनेक शिखरोंसे सुशोभित कैलास पर्वत हो। कुरु-पाण्डव-शिरोमणि अर्जुन सिद्धोंके मार्गपर आकर वैसे ही शोभा पाने लगे, जैसे पूर्वकालमें भूपालशिरोमणि मान्धाता सुशोभित होते थे। कमलनयन अर्जुनने उन पुण्यात्मा राजाओंके लोकोंमें भ्रमण किया ॥ ३९—४१ ॥
एवं स संक्रामंस्तत्र स्वर्गलोके महायशाः ।

ततो ददर्श शक्रस्य पुरीं ताममरावतीम् ॥ ४२ ॥
इस प्रकार महायशस्वी पार्थने स्वर्गलोकमें विचरते हुए आगे जाकर इन्द्रपुरी अमरावतीका दर्शन किया ॥ ४२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥