महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 686)
पञ्चनवतितमोऽध्यायः
पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना
वैशम्पायन उवाच
ते तथा सहिता वीरा वसन्तस्तत्र तत्र ह ।
क्रमेण पृथिवीपाल नैमिषारण्यमागताः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार वे वीर पाण्डव विभिन्न स्थानोंमें निवास करते हुए क्रमशः नैमिषारण्यतीर्थमें आये ॥ १ ॥
ततस्तीर्थेषु पुण्येषु गोमत्याः पाण्डवा नृप ।
कृताभिषेकाः प्रददुर्गाश्च वित्तं च भारत ॥ २ ॥
भरतनन्दन! नरेश्वर! तदनन्तर गोमतीके पुण्य तीर्थोंमें स्नान करके पाण्डवोंने वहाँ गोदान और धनदान किया* ॥ २ ॥
तत्र देवान् पितॄन् विप्रांस्तर्पयित्वा पुनः पुनः ।
कन्यातीर्थेऽश्वतीर्थे च गवां तीर्थे च भारत ।
कालकोट्यां वृषप्रस्थे गिरावुष्य च पाण्डवाः ॥ ३ ॥
बाहुदायां महीपाल चक्रुः सर्वेऽभिषेचनम् ।
प्रयागे देवयजने देवानां पृथिवीपते ॥ ४ ॥
ऊषुराप्लुत्य गात्राणि तपश्चातस्थुरुत्तमम् ।
गङ्गायमुनयोश्चैव संगमे सत्यसंगराः ॥ ५ ॥
भारत! भूपाल! वहाँ देवताओं, पितरों तथा ब्राह्मणोंको बार-बार तृप्त करके कन्यातीर्थ, अश्वतीर्थ, गोतीर्थ, कालकोटि तथा वृषप्रस्थगिरिमें निवास करते हुए उन सब पाण्डवोंने बाहुदा नदीमें स्नान किया। पृथ्वीपते! तदनन्तर उन्होंने देवताओंकी यज्ञभूमि प्रयागमें पहुँचकर वहाँ गंगा-यमुनाके संगममें स्नान किया। सत्यप्रतिज्ञ पाण्डव वहाँ स्नान करके कुछ दिनोंतक उत्तम तपस्यामें लगे रहे ॥ ३—५ ॥
विपाप्मानो महात्मानो विप्रेभ्यः प्रददुर्वसु ।
तपस्विजनजुष्टां च ततो वेदीं प्रजापतेः ॥ ६ ॥
जग्मुः पाण्डुसुता राजन् ब्राह्मणैः सह भारत ।
तत्र ते न्यवसन् वीरास्तपश्चातस्थुरुत्तमम् ॥ ७ ॥
संतर्पयन्तः सततं वन्येन हविषा द्विजान् ।
उन पापरहित महात्माओंने (त्रिवेणीतटपर) ब्राह्मणोंको धन दान किया। भरतनन्दन! तत्पश्चात् पाण्डव ब्राह्मणोंके साथ ब्रह्माजीकी वेदीपर गये, जो तपस्वीजनोंसे सेवित है। वहाँ उन वीरोंने उत्तम तपस्या करते हुए निवास किया। वे सदा कन्द-मूल-फल आदि वन्य हविष्यद्वारा ब्राह्मणोंको तृप्त करते रहते थे ।। ६-७१/२ ।।
ततो महीधरं जग्मुर्धर्मज्ञेनाभिसंस्कृतम् ।। ८ ।।
राजर्षिणा पुण्यकृता गयेनानुपमद्युते ।
अनुपम तेजस्वी जनमेजय! प्रयागसे चलकर पाण्डव पुण्यात्मा एवं धर्मज्ञ राजर्षि गयके द्वारा यज्ञ करके शुद्ध किये हुए उत्तम पर्वतसे उपलक्षित गयातीर्थमें गये ।। ८१/२ ।।
नगो गयशिरो यत्र पुण्या चैव महानदी ।। ९ ।।
वानीरमालिनी रम्या नदी पुलिनशोभिता ।
जहाँ गयशिर नामक पर्वत और बेंतकी पंक्तियोंसे घिरी हुई रमणीय महानदी है, जो अपने दोनों तटोंसे विशेष शोभा पाती है ।। ९१/२ ।।
दिव्यं पवित्रकूटं च पवित्रं धरणीधरम् ।। १० ।।
ऋषिजुष्टं सुपुण्यं तत् तीर्थं ब्रह्मसरोत्तमम् ।
अगस्त्यो भगवान् यत्र गतो वैवस्वतं प्रति ।। ११ ।।
वहाँ महर्षियोंसे सेवित, पावन शिखरोंवाला, दिव्य एवं पवित्र दूसरा पर्वत भी है जो अत्यन्त पुण्यदायक तीर्थ है। वहीं उत्तम ब्रह्मसरोवर है जहाँ भगवान् अगस्त्यमुनि वैवस्वत यमसे मिलनेके लिये पधारे थे ।। १०-११ ।।
उवास च स्वयं तत्र धर्मराजः सनातनः ।
सर्वासां सरितां चैव समुद्भेदो विशाम्पते ।। १२ ।।
क्योंकि सनातन धर्मराज वहाँ स्वयं निवास करते हैं। राजन्! वहाँ सम्पूर्ण नदियोंका प्राकट्य हुआ है ।।
यत्र संनिहितो नित्यं महादेवः पिनाकधृक् ।
तत्र ते पाण्डवा वीराश्चातुर्मास्यैस्तदेजिरे ।। १३ ।।
ऋषियज्ञेन महता यत्राक्षयवटो महान् ।
पिनाकपाणि भगवान् महादेव उस तीर्थमें नित्य निवास करते हैं। वहाँ वीर पाण्डवोंने उन दिनों चातुर्मास्यव्रत ग्रहण करके महान् ऋषियज्ञ अर्थात् वेदादि सत्शास्त्रोंके स्वाध्यायद्वारा भगवान्की आराधना की। वहीं महान् अक्षयवट है ।। १३१/२ ।।
अक्षये देवयजने अक्षयं यत्र वै फलम् ।। १४ ।।
देवताओंकी वह यज्ञभूमि अक्षय है और वहाँ किये हुए प्रत्येक सत्कर्मका फल अक्षय होता है ।। १४ ।।
ते तु तत्रोपवासांस्तु चक्रुर्नि Schweit...
ते तु तत्रोपवासांस्तु चक्रुर्नेश्चितमानसाः ।
ब्राह्मणास्तत्र शतशः समाजग्मुस्तपोधनाः ।। १५ ।।
अविचल चित्तवाले पाण्डवोंने उस तीर्थमें कई उपवास किये। उस समय वहाँ सैकड़ों तपस्वी ब्राह्मण पधारे ।। १५ ।।
चातुर्मास्येनायजन्त आर्षेण विधिना तदा ।
तत्र विद्यातपोवृद्धा ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
कथां प्रचक्रिरे पुण्यां सदसिस्था महात्मनाम् ।। १६ ।।
उन्होंने शास्त्रोक्त विधिपूर्वक चातुर्मास्य यज्ञ किया। वहाँ आये हुए ब्राह्मण विद्या और तपस्यामें बढ़े-चढ़े तथा वेदोंके पारंगत विद्वान् थे। उन्होंने परस्पर मिलकर सभामें बैठकर महात्मा पुरुषोंकी पवित्र कथाएँ कहीं ।। १६ ।।
तत्र विद्याव्रतस्नातः कौमारं व्रतमास्थितः ।
शमठोऽकथयद् राजन्नामूर्तरयसं गयम् ।। १७ ।।
उनमें शमठ नामक एक विद्वान् ब्राह्मण थे जो विद्याध्ययनका व्रत समाप्त करके स्नातक हो चुके थे। उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्यपालनका व्रत ले रखा था। राजन्! शमठने वहाँ अमूर्तरयाके पुत्र महाराज गयकी कथा इस प्रकार कही ।। १७ ।।
शमठ उवाच
अमूर्तरयसः पुत्रो गयो राजर्षिसत्तमः ।
पुण्यानि यस्य कर्माणि तानि मे शृणु भारत ।। १८ ।।
**शमठ बोले—**भरतनन्दन युधिष्ठिर! अमूर्तरयाके पुत्र गय राजर्षियोंमें श्रेष्ठ थे। उनके कर्म बड़े ही पवित्र एवं पावन थे। मैं उनका वर्णन करता हूँ, सुनो— ।।
यस्य यज्ञो बभूवेह बह्वन्नो बहुदक्षिणः ।
यत्रान्नपर्वता राजन् शतशोऽथ सहस्रशः ।। १९ ।।
घृतकुल्याश्च दध्नश्च नद्यो बहुशतास्तथा ।
व्यञ्जनानां प्रवाहाश्च महार्हाणां सहस्रशः ।। २० ।।
राजन्! यहाँ राजा गयने बड़ा भारी यज्ञ किया था। उसमें बहुत अन्न खर्च हुआ था और असंख्य दक्षिणा बाँटी गयी थी। उस यज्ञमें अन्नके सैकड़ों और हजारों पर्वत लग गये थे। घीके कई सौ कुण्ड और दहीकी नदियाँ बहती थीं। सहस्रों प्रकारके उत्तमोत्तम व्यञ्जनोंकी बाढ़-सी आ गयी थी ।। १९-२० ।।
अहन्यहनि चाप्येवं याचतां सम्प्रदीयते ।
अन्ये च ब्राह्मणा राजन् भुञ्जतेऽन्नं सुसंस्कृतम् ।। २१ ।।
याचकोंको प्रतिदिन इसी प्रकार भोजन और दान दिया जाता था। राजन्! अन्यान्य ब्राह्मण भी वहाँ उत्तम रीतिसे तैयारकी हुई रसोई जीमते थे ।। २१ ।।
तत्र वै दक्षिणाकाले ब्रह्मघोषो दिवं गतः ।
न च प्रज्ञायते किंचिद् ब्रह्मशब्देन भारत ।। २२ ।।
भरतनन्दन! उस यज्ञमें दक्षिणा देते समय जो वेदमन्त्रोंकी ध्वनि होती थी वह स्वर्गलोकतक गूँज उठती थी। उस वेदध्वनिके सामने दूसरा कोई शब्द नहीं सुनायी पड़ता था ॥ २२ ॥
पुण्येन चरता राजन् भूर्दिशः खं नभस्तथा ।
आपूर्णामासीच्छब्देन तदप्यासीन्महाद्भुतम् ॥ २३ ॥
यत्र स्म गाथा गायन्ति मनुष्या भरतर्षभ ।
अन्नपानैः शुभैस्तृप्ता देशे देशे सुवर्चसः ॥ २४ ॥
राजन्! वहाँ सब ओर फैले हुए पुण्यमय शब्दसे पृथ्वी, दिशाएँ, स्वर्ग और आकाश परिपूर्ण हो गये। यह बड़ी ही अद्भुत बात थी। भरतश्रेष्ठ! उस यज्ञमें सब मनुष्य यह गाथा गाते रहते थे कि ‘इस यज्ञमें देश-देशके अत्यन्त तेजस्वी पुरुष उत्तम अन्नपानसे तृप्त हो रहे हैं’ ॥ २३-२४ ॥
गयस्य यज्ञे के त्वद्य प्राणिनो भोक्तुमीप्सवः ।
तत्र भोजनशिष्टस्य पर्वताः पञ्चविंशतिः ॥ २५ ॥
‘गयके यज्ञमें लोग यही पूछते फिरते थे कि ‘कौन-कौन ऐसे प्राणी रह गये हैं जो अभी भोजन करना चाहते हैं?’ वहाँ खानेसे बचे हुए अन्नके पचीस पर्वत शेष रह गये थे ॥ २५ ॥
न तत् पूर्वे जनाश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे ।
गयो यदकरोद् यज्ञे राजर्षिरमितद्युतिः ॥ २६ ॥
‘अमिततेजस्वी राजर्षि गयने अपने यज्ञमें जो व्यय किया था, वह पहलेके राजाओंने भी नहीं किया था और भविष्यमें भी कोई दूसरे कर सकेंगे, ऐसा सम्भव नहीं है ॥
कथं तु देवा हविषा गयेन परितर्पिताः ।
पुनः शक्ष्यन्त्युपादातुमन्यैर्दत्तानि कानिचित् ॥ २७ ॥
‘गयने सम्पूर्ण देवताओंको हविष्यसे भलीभाँति तृप्त कर दिया है, अब वे दूसरोंके दिये हुए हविष्यको कैसे ग्रहण कर सकेंगे? ॥ २७ ॥
सिकता वा यथा लोके यथा वा दिवि तारकाः ।
यथा वा वर्षतो धारा असंख्येयाः स्म केनचित् ।
तथा गणयितुं शक्या गययज्ञे न दक्षिणाः ॥ २८ ॥
‘जैसे लोकमें बालूके कण, आकाशके तारे और बरसते हुए बादलोंकी जलधाराएँ किसीके द्वारा भी गिनी नहीं जा सकतीं, उसी प्रकार गयके यज्ञमें दी हुई दक्षिणाओंकी भी कोई गणना नहीं कर सकता था ॥ २८ ॥
एवंविधाः सुबहवस्तस्य यज्ञा महीपतेः ।
बभूवुरस्य सरसः समीपे कुरुनन्दन ॥ २९ ॥
कुरुनन्दन! महाराज गयके ऐसे ही बहुत-से यज्ञ इस ब्रह्मसरोवरके समीप सम्पन्न हुए हैं ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गययज्ञकथने
पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमश-तीर्थयात्राके प्रसंगमें
‘गयके यज्ञका वर्णन’-विषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९५ ।।
* यहाँ पाण्डवोंके द्वारा गोदान और धनदान करनेके विषयमें यह शंका होती है कि इनके पास ये सब कहाँसे आये पर ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वनपर्वके बारहवें अध्यायमें आता है कि काम्यकवनमें पाण्डवोंसे मिलनेके लिये भगवान् श्रीकृष्ण एवं भोजवंशी, वृष्णिवंशी और अन्धककुलके राजागण तथा द्रुपद, धृष्टद्युम्न, धृष्टकेतु एवं केकय राजकुमार आये थे। उनका पाण्डवोंसे मिलकर अपने-अपने राज्यमें लौट जानेका भी वर्णन वनपर्वके बाईसवें अध्यायमें आया है। इससे अनुमान होता है कि इन राजाओंने पाण्डवोंको भेंटमें प्रचुर धन दिया होगा।