सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2389)

⬅ विषय-सूची (TOC)

चत्वारिंशोऽध्यायः

अर्जुनका उत्तरको शमीवृक्षसे अस्त्र उतारनेके लिये आदेश

वैशम्पायन उवाच

तां शमीमुपसंगम्य पार्थो वैराटिमब्रवीत् ।
सुकुमारं समाज्ञाय संग्रामे नातिकोविदम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस शमीवृक्षके समीप पहुँचकर अर्जुनने विराटकुमार उत्तरको सुकुमार तथा युद्धकी कलामें पूर्णतया कुशल न जानकर उससे कहा— ॥ १ ॥

समादिष्टो मया क्षिप्रं धनूंष्यवहरोत्तर ।
नेमानि हि त्वदीयानि सोढुं शक्ष्यन्ति मे बलम् ।
भारं चापि गुरुं वोढुं कुञ्जरं वा प्रमर्दितुम् ॥ २ ॥
मम वा बाहुविक्षेपं शत्रूनिह विजेष्यतः ।

‘उत्तर! मेरी आज्ञासे तुम शीघ्र इस वृक्षपर चढ़कर वहाँ रखे हुए धनुष उतारो, क्योंकि तुम्हारे ये धनुष मेरे बाहुबलको नहीं सह सकेंगे, कोई भारी कार्य-भार नहीं उठा सकेंगे अथवा बड़े-बड़े गजराजोंका नाश करनेमें भी ये काम न दे सकेंगे। इतना ही नहीं, यहाँ शत्रुओंपर विजय पानेके लिये युद्ध करते समय ये मेरे बाहुविक्षेपको भी नहीं सँभाल सकेंगे ॥ २ १/२ ॥

(नैभिः काममलं कर्तुं कर्म वैजयिकं त्विह ।
अतिसूक्ष्माणि ह्रस्वानि सर्वाणि च मृदूनि च ।
आयुधानि महाबाहो तवैतानि परंतप ॥)
तस्माद् भूमिंजयारोह शमीमेतां पलाशिनीम् ॥ ३ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले महाबाहु उत्तर! तुम्हारे ये सभी अस्त्र-शस्त्र अत्यन्त सूक्ष्म, छोटे और कोमल हैं। इनके द्वारा यहाँ विजय दिलानेवाला पराक्रम नहीं किया जा सकता। इसलिये भूमिंजय! पत्तोंसे सुशोभित इस शमीवृक्षपर शीघ्र चढ़ जाओ ॥ ३ ॥

अस्यां हि पाण्डुपुत्राणां धनूंषि निहितान्युत ।
युधिष्ठिरस्य भीमस्य बीभत्सोर्यमयोस्तथा ॥ ४ ॥

‘इसपर युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन और नकुल-सहदेव—इन सब पाण्डवोंके धनुष रखे हुए हैं ॥ ४ ॥

ध्वजाः शराश्च शूराणां दिव्यानि कवचानि च ।
अत्र चैतन्महावीर्यं धनुः पार्थस्य गाण्डिवम् ॥ ५ ॥
एकं शतसहस्रेण संमितं राष्ट्रवर्धनम् ।

व्यायामसहमत्यर्थं तृणराजसमं महत् ॥ ६ ॥
‘उन शूरवीरोंके ध्वज, बाण और दिव्य कवच भी यहीं हैं। यहीं अर्जुनका वह महान् शक्तिशाली गाण्डीव धनुष भी है, जो अकेला ही एक लाख धनुषोंके समान है। यह राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाला, परिश्रमको सहनेमें समर्थ और ताड़के समान अत्यन्त विशाल है ।। ५-६ ।।

सर्वायुधमहामात्रं शत्रुसम्बाधकारकम् ।
सुवर्णविकृतं दिव्यं श्लक्ष्णमायतमव्रणम् ॥ ७ ॥
अलं भारं गुरुं वोढुं दारुणं चारुदर्शनम् ।
तादृशान्येव सर्वाणि बलवन्ति दृढानि च ।
युधिष्ठिरस्य भीमस्य बीभत्सोर्यमयोस्तथा ॥ ८ ॥
‘सम्पूर्ण आयुधोंमें यह सबसे बड़ा है और शत्रुओंको विशेष पीड़ा देनेवाला है। यह सोनेको गलाकर बनाया हुआ, दिव्य, सुन्दर, विस्तृत तथा व्रणरहित (नित्य नूतन) है। यह भारीसे भारी भार वहन करनेमें समर्थ, भयंकर और देखनेमें मनोहर है। ऐसे ही युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन तथा नकुल-सहदेवके भी सब धनुष प्रबल और सुदृढ़ हैं ।। ७-८ ।।

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे अर्जुनास्त्रकथने
चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तरगोग्रहके प्रसंगमें अर्जुनके द्वारा अस्त्रवर्णनविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४० ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ९ १/३ श्लोक हैं।)