महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2359)
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
कौरवोंद्वारा उत्तर दिशाकी ओरसे आकर विराटकी गौओंका अपहरण और गोपाध्यक्षका उत्तरकुमारको युद्धके लिये उत्साह दिलाना
वैशम्पायन उवाच
याते त्रिगर्तान् मत्स्ये तु पशूंस्तान् वै परीप्सति ।
दुर्योधनः सहामात्यो विराटमुपयादथ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जिस समय अपने पशुओंको छुड़ा लानेकी इच्छासे राजा विराट त्रिगर्तोंसे युद्ध करनेके लिये गये, उसी समय दुर्योधनने अपने मन्त्रियोंके साथ विराटदेशपर चढ़ाई की ॥ १ ॥
भीष्मो द्रोणश्च कर्णश्च कृपश्च परमास्त्रवित् ।
द्रौणिश्च सौबलश्चैव तथा दुःशासनः प्रभो ॥ २ ॥
विविंशतिर्विकर्णश्च चित्रसेनश्च वीर्यवान् ।
दुर्मुखो दुःशलश्चैव ये चैवान्ये महारथाः ॥ ३ ॥
राजन्! भीष्म, द्रोण, कर्ण, अस्त्रविद्याके श्रेष्ठ विद्वान् कृपाचार्य, अश्वत्थामा, शकुनि, दुःशासन, विविंशति, विकर्ण, पराक्रमी चित्रसेन, दुर्मुख, दुःशल तथा अन्य महारथी भी दुर्योधनके साथ थे ॥ २-३ ॥
एते मत्स्यानुपागम्य विराटस्य महीपतेः ।
घोषान् विद्राव्य तरसा गोधनं जहुरोजसा ॥ ४ ॥
इन सबने राजा विराटके मत्स्यदेशमें आकर उनके घोषोंमें भगदड़ मचा दी और बड़े वेगसे बलपूर्वक गोधनका अपहरण करना आरम्भ किया ॥ ४ ॥
षष्टिं गवां सहस्राणि कुरवः कालयन्ति च ।
महता रथवंशेन परिवार्य समन्ततः ॥ ५ ॥
वे कौरव वीर राजा विराटकी साठ हजार गौओंको विशाल रथसमूहोंद्वारा चारों ओरसे घेरकर हाँक ले चले ॥ ५ ॥
गोपालानां तु घोषस्य हन्यतां तैर्महारथैः ।
आरावः सुमहानासीत् सम्प्रहारे भयंकरे ॥ ६ ॥
उस समय वहाँ भयंकर मारपीट हुई। उन महारथियोंद्वारा मारे जाते हुए घोषके ग्वालोंका जोर-जोरसे होनेवाला आर्तनाद बहुत दूरतक सुनायी देता था ॥ ६ ॥
गोपाध्यक्षो भयत्रस्तो रथमास्थाय सत्वरः ।
जगाम नगरायैव परिक्रोशंस्तदाऽऽर्तवत् ॥ ७ ॥
तब उन गौओंका रक्षक भयभीत हो तुरंत ही रथपर बैठकर आर्तकी भाँति विलाप करता हुआ राजधानीकी ओर चल दिया ।। ७ ।।
स प्रविश्य पुरं राज्ञो नृपवेश्माभ्ययात् ततः।
अवतीर्य रथात् तूर्णमाख्यातुं प्रविवेश ह ॥ ८ ॥
राजा विराटके नगरमें पहुँचकर वह राजभवनके समीप गया और रथसे उतरकर तुरंत यह समाचार सूचित करनेके लिये महलके भीतर चला गया ।। ८ ।।
दृष्ट्वा भूमिंजयं नाम पुत्रं मत्स्यस्य मानिनम्।
तस्मै तत् सर्वमाचष्ट राष्ट्रस्य पशुकर्षणम् ॥ ९ ॥
षष्टिं गवां सहस्राणि कुरवः कालयन्ति ते।
तद् विजेतुं समुत्तिष्ठ गोधनं राष्ट्रमवर्धन ॥ १० ॥
वहाँ मत्स्यराजके मानी पुत्र भूमिंजय (उत्तर) से मिलकर उस गोपने उनसे राज्यके पशुओंके अपहरणका सब समाचार बताते हुए कहा—'राजकुमार! आप इस राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले हैं। आज कौरव आपकी साठ हजार गौओंको हाँक ले जा रहे हैं। उनके हाथसे उस गोधनको जीत लानेके लिये उठ खड़े होइये ॥ ९-१० ॥
राजपुत्र हितप्रेप्सुः क्षिप्रं निर्याहि च स्वयम्।
त्वां हि मत्स्यो महीपालः शून्यपालमिहाकरोत् ॥ ११ ॥
'राजपुत्र! आप इस राज्यके हितैषी हैं, अतः स्वयं ही युद्धके लिये तैयार होकर निकलिये। मत्स्यनरेशने अपनी अनुपस्थितिमें आपको ही यहाँका रक्षक नियुक्त किया है ॥ ११ ॥
त्वया परिषदो मध्ये श्लाघते स नराधिपः ।
पुत्रो ममानुरूपश्च शूरश्चेति कुलोद्वहः ॥ १२ ॥
‘वे सभामें आपसे प्रभावित होकर आपकी प्रशंसामें बड़ी-बड़ी बातें किया करते हैं। उनका कहना है—‘मेरा यह पुत्र उत्तर मेरे अनुरूप शूरवीर और इस वंशका भार वहन करनेमें समर्थ है ।। १२ ।।
इष्वस्त्रे निपुणो योधः सदा वीरश्च मे सुतः ।
तस्य तत् सत्यमेवास्तु मनुष्येन्द्रस्य भाषितम् ॥ १३ ॥
‘मेरा वह लाड़ला बेटा बाण चलाने तथा अन्यान्य अस्त्रोंके प्रयोगकी कलामें भी निपुण, सदा युद्धके लिये उद्यत रहनेवाला और वीर है।' उन महाराजका यह कथन आज सत्य सिद्ध होना चाहिये ।। १३ ।।
आवर्तय कुरून् जित्वा पशून् पशुमतां वर ।
निर्दहैषामनीकानि भीमेन शरतेजसा ॥ १४ ॥
‘पशुसम्पत्तिवाले समस्त राजाओंमें आप श्रेष्ठ हैं; अतः कौरवोंको परास्त करके अपने पशुओंको लौटा लाइये और बाणोंकी भयंकर अग्निसे इन कौरवोंकी सारी सेनाओंको भस्म कर डालिये ।। १४ ।।
धनुश्च्युतै रुक्मपुङ्खैः शरैः संनतपर्वभिः ।
द्विषतां भिन्ध्यनीकानि गजानामिव यूथपः ॥ १५ ॥
‘जैसे हाथियोंके झुंडका स्वामी गजराज अपने विरोधियोंको रौंद डालता है, उसी प्रकार आप अपने धनुषसे छूटे हुए सुवर्णमय पंखसे सुशोभित और झुकी हुई गाँठवाले तीखे बाणोंद्वारा विपक्षियोंकी विपुल वाहिनीको छिन्न-भिन्न कर डालिये ।। १५ ।।
पाशोपधानां ज्यातन्त्रीं चापदण्डां महास्वनाम् ।
शरवर्णां धनुर्वीणां शत्रुमध्ये प्रवादय ।। १६ ।।
‘आज शत्रुओंके बीचमें जोर-जोरसे गूँजनेवाली धनुषरूपी वीणा बजाइये। पाश (प्रत्यंचा बाँधनेके दोनों सिरे) उसके उपधान (खूँटियाँ) हैं, प्रत्यंचा तार हैं, धनुष उसका दण्ड है और बाण ही उससे झंकृत होनेवाले वर्ण (स्वर) हैं ।। १६ ।।
श्वेता रजतसंकाशा रथे युज्यन्तु ते हयाः ।
ध्वजं च सिंहं सौवर्णमुच्छ्रयन्तु तव प्रभो ।। १७ ।।
‘प्रभो अब चाँदीके समान चमकनेवाले वे श्वेत रंगके घोड़े आपके रथमें जोते जायें और सिंहके चिह्नसे सुशोभित सुवर्णमय ऊँचा ध्वज फहरा दिया जाय ।। १७ ।।
रुक्मपुङ्खाः प्रसन्नाग्रा मुक्ता हस्तवता त्वया ।
छादयन्तु शराः सूर्यं राज्ञां मार्गनिरोधकाः ।। १८ ।।
‘वीरवर! आपके हाथ बहुत मजबूत हैं। उनके द्वारा आपके चलाये हुए सोनेकी पाँख और स्वच्छ नोकवाले बाण शत्रुपक्षके राजाओंकी राह रोककर सूर्यदेवको भी ढक दें ।। १८ ।।
रणे जित्वा कुरून् सर्वान् वज्रपाणिरिवासुरान् ।
यशो महदवाप्य त्वं प्रविशेदं पुरं पुनः ।। १९ ।।
‘जैसे वज्रपाणि इन्द्र समस्त असुरोंको परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार आप युद्धमें सम्पूर्ण कौरवोंको जीतकर महान् यश प्राप्त करके पुनः इस नगरमें प्रवेश करें ।।
त्वं हि राष्ट्रस्य परमा गतिर्मत्स्यपतेः सुतः ।
यथा हि पाण्डुपुत्राणामर्जुनो जयतां वरः ।। २० ।।
एवमेव गतिर्नूनं भवान् विषयवासिनाम् ।
गतिमन्तो वयं त्वद्य सर्वे विषयवासिनः ।। २१ ।।
‘मत्स्यराजके सुयोग्य पुत्र होनेके कारण आप ही इस राष्ट्रके महान् आश्रय हैं। जैसे विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुन पाण्डवोंके उत्तम आश्रय हैं, उसी प्रकार आप भी निश्चय ही इस राज्यके निवासियोंकी परम गति हैं। हम सभी मत्स्यदेशवासी आज आपको पाकर ही गतिमान् (सनाथ) हैं’ ।। २०-२१ ।।
वैशम्पायन उवाच
स्त्रीमध्य उक्तस्तेनासौ तद् वाक्यमभयंकरम् ।
अन्तःपुरे श्लाघमान इदं वचनमब्रवीत् ।। २२ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! उस समय राजकुमार उत्तर अन्तःपुरमें स्त्रियोंके बीचमें बैठा था। वहीं उस गोपाध्यक्षने उससे ये निर्भय बनानेवाली उत्साहजनक बातें कहीं। अतः वह अपनी प्रशंसा करता हुआ इस प्रकार कहने लगा ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे गोपवाक्ये पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तर दिशाकी गौओंके अपहरणके प्रसंगमें गोपवचनविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥