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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2323)

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एकोनत्रिंशोऽध्यायः

कृपाचार्यकी सम्मति और दुर्योधनका निश्चय

वैशम्पायन उवाच

ततः शारद्वतो वाक्यमित्युवाच कृपस्तदा ।
युक्तं प्राप्तं च वृद्धेन पाण्डवान् प्रति भाषितम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इसके पश्चात् महर्षि शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्यने उस समय यह बात कही—‘राजन्! वयोवृद्ध भीष्मजीने पाण्डवोंके विषयमें जो कुछ कहा है, वह युक्तियुक्त तो है ही, अवसरके अनुकूल भी है ॥ १ ॥
धर्मार्थसहितं श्लक्ष्णं तत्त्वतश्च सहेतुकम् ।
तत्रानुरूपं भीष्मेण ममाप्यत्र गिरं शृणु ॥ २ ॥
‘उसमें धर्म और अर्थ दोनों ही संनिहित हैं। वह सुन्दर, तात्त्विक और सकारण है। इस विषयमें मेरा भी जो कथन है, वह भीष्मजीके ही अनुरूप है, उसे सुनो ॥
तेषां चैव गतिस्तीर्थैर्वासश्चैषां प्रचिन्त्यताम् ।
नीतिर्विधीयतां चापि साम्प्रतं या हिता भवेत् ॥ ३ ॥
‘तुमलोग गुप्तचरोंसे पाण्डवोंकी गति और स्थितिका पता लगवाओ और उसी नीतिका आश्रय लो, जो इस समय हितकारिणी हो ॥ ३ ॥
नावज्ञेयो रिपुस्तात प्राकृतोऽपि बुभूषता ।
किं पुनः पाण्डवास्तात सर्वास्त्रकुशला रणे ॥ ४ ॥
‘तात! जिसे सम्राट् बननेकी इच्छा हो, उसे साधारण शत्रुकी भी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। फिर जो युद्धमें सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके संचालनमें कुशल हैं, उन पाण्डवोंकी तो बात ही क्या है? ॥ ४ ॥
तस्मात् सत्रं प्रविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।
गूढभावेषु छन्नेषु काले चोदयमागते ॥ ५ ॥
स्वराष्ट्रे परराष्ट्रे च ज्ञातव्यं बलमात्मनः ।
उदयः पाण्डवानां च प्राप्ते काले न संशयः ॥ ६ ॥
‘अतः इस समय जब कि महात्मा पाण्डव छद्मवेष धारण करके (अर्थात् वेष बदलकर) गुप्तरूपसे छिपे हुए हैं और अज्ञातवासकी जो नियत अवधि थी, वह प्रायः समाप्त हो चली है, स्वराष्ट्र और परराष्ट्रमें अपनी कितनी शक्ति है—इसे समझ लेना चाहिये। इसमें संदेह नहीं कि उपयुक्त समय आते ही पाण्डव प्रकट हो जायेंगे ॥ ५-६ ॥
निवृत्तसमयाः पार्था महात्मानो महाबलाः ।
महोत्साहा भविष्यन्ति पाण्डवा ह्यमितौजसः ॥ ७ ॥

'अज्ञातवासका समय पूर्ण कर लेनेपर कुन्तीके वे महाबली, अमितपराक्रमी और महात्मा पुत्र पाण्डव महान् उत्साहसे सम्पन्न हो जायँगे ॥ ७ ॥
तस्माद् बलं च कोषश्च नीतिश्चापि विधीयताम् ।
यथा कालोदये प्राप्ते सम्यक् तैः संदधामहे ॥ ८ ॥
'अतः इस समय तुम्हें अपनी सेना, कोष और नीति ऐसी बनायी रखनी चाहिये, जिससे समय आनेपर हम उनके साथ यथावत् सन्धि (मेल अथवा बाण-संधान) कर सकें ॥ ८ ॥
तात बुद्ध्यापि तत् सर्वं बुध्यस्व बलमात्मनः ।
नियतं सर्वमित्रेषु बलवत्स्वबलेषु च ॥ ९ ॥
'तात! तुम स्वयं बुद्धिसे भी विचारकर अपनी सम्पूर्ण शक्ति कितनी है, इसकी जानकारी प्राप्त कर लो। तुम्हारे बलवान् और निर्बल सब प्रकारके मित्रोंमें निश्चित बल कितना है, यह भी जान लेना चाहिये ॥ ९ ॥
उच्चावचं बलं ज्ञात्वा मध्यस्थं चापि भारत ।
प्रहृष्टमप्रहृष्टं च संदधाम तथा परैः ॥ १० ॥
'भारत! उत्तम, मध्यम और अधम तीनों प्रकारकी सेनाओंकी स्थिति समझो। उत्तम और मध्यम सेनाएँ प्रसन्न हैं या अप्रसन्न—इसे जान लो; तब हम शत्रुओंसे सन्धि (मेल या बाण-संधान) कर सकते हैं ॥ १० ॥
साम्ना दानेन भेदेन दण्डेन बलिकर्मणा ।
न्यायेनाक्रम्य च परान् बलाच्चानम्य दुर्बलान् ॥ ११ ॥
सान्त्वयित्वा तु मित्राणि बलं चाभाष्यतां सुखम् ।
सुकोषबलसंवृद्धः सम्यक् सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १२ ॥
'साम (समझाना), दान (धन आदि देना), भेद (शत्रुओंमें फूट डालना), दण्ड देना और कर लेना—इन नीतियोंके द्वारा* शत्रुपर आक्रमण करके, दुर्बलोंको बलसे दबाकर, मित्रोंको मेल-जोलसे अपनाकर और सेनाको मिष्टभाषण एवं वेतन आदि देकर अपने अनुकूल कर लेना चाहिये। इस प्रकार उत्तम कोष और सेनाको बढ़ा लेनेपर तुम अच्छी सफलता प्राप्त कर सकोगे ॥ ११-१२ ॥
योत्स्यसे चापि बलिभिररिभिः प्रत्युपस्थितैः ।
अन्यैस्त्वं पाण्डवैर्वापि हीनैः स्वबलवाहनैः ॥ १३ ॥
'उस दशामें बलवान्-से-बलवान् शत्रु क्यों न आ जायँ और वे पाण्डव हों या दूसरे कोई, यदि सेना और वाहन आदिकी दृष्टिसे उनमें अपनी अपेक्षा न्यूनता है तो तुम उन सबके साथ युद्ध कर सकोगे ॥ १३ ॥
एवं सर्वं विनिश्चित्य व्यवसायं स्वधर्मतः ।
यथाकालं मनुष्येन्द्र चिरं सुखमवाप्स्यसि ॥ १४ ॥

‘नरेन्द्र! इस प्रकार अपने धर्मके अनुकूल सम्पूर्ण कर्तव्यका निश्चय करके यथासमय उसका पालन करोगे, तो दीर्घकालतक सुख भोगोगे’ ॥ १४ ॥

(वैशम्पायन उवाच

ततो दुर्योधनो वाक्यं श्रुत्वा तेषां महात्मनाम् ।
मुहूर्तंमिव संचिन्त्य सचिवानिदमब्रवीत् ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर दुर्योधन उन महात्माओंका वचन सुनकर दो घड़ीतक कुछ विचार करता रहा। फिर मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोला।

दुर्योधन उवाच

श्रुतं ह्येतन्मया पूर्वं कथासु जनसंसदि ।
वीराणां शास्त्रविदुषां प्राज्ञानां मतिनिश्चये ॥
कृतिनां सारफल्गुत्वं जानामि नयचक्षुषा ।
**दुर्योधनने कहा—**मन्त्रियो! मैंने पूर्वकालमें जनसाधारणकी बैठकमें आपसकी बातचीतके समय शास्त्रोंके विद्वान्, ज्ञानी, वीर एवं पुण्यात्मा पुरुषोंके निश्चित सिद्धान्तके विषयमें कुछ ऐसी बातें सुनी हैं, जिनसे नीतिकी दृष्टिके अनुसार मैं मनुष्योंके बलाबलकी जानकारी रखता हूँ।
सत्त्वे बाहुबले धैर्ये प्राणे शारीरसम्भवे ।
साम्प्रतं मानुषे लोके सदैत्यनरराक्षसे ॥
चत्वारस्तु नरव्याघ्रा बले शक्रोपमा भुवि ।
उत्तमाः प्राणिनां तेषां नास्ति कश्चिद् बले समः ॥
समप्राणबला नित्यं सम्पूर्णबलपौरुषाः ।
बलदेवश्च भीमश्च मद्रराजश्च वीर्यवान् ॥
चतुर्थः कीचकस्तेषां पञ्चमं नानुशुश्रुमः ।
अन्योन्यान्तरबलाः परस्परजयैषिणः ॥
बाहुयुद्धमभीप्सन्तो नित्यं संरब्धमानसाः ।
तेनाहमवगच्छामि प्रत्ययेन वृकोदरम् ॥
मनस्यभिनिविष्टं मे व्यक्तं जीवन्ति पाण्डवाः ।
इस समय मनुष्यलोकमें दैत्य, मानव तथा राक्षसोंमें चार ही ऐसे पुरुषसिंह सुने जाते हैं, जो इस भूतलपर आत्मबल, बाहुबल, धैर्य तथा शारीरिक शक्तिमें इन्द्रके समान हैं। वे ही समस्त प्राणधारियोंमें उत्तम हैं। बलमें उनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। उन सबमें सदा एक समान प्राणशक्ति मानी गयी है। वे सम्पूर्ण बल और पराक्रमसे सम्पन्न हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—बलदेव, भीमसेन, पराक्रमी मद्रराज शल्य तथा कीचक। इनमें कीचकका चौथा स्थान है। इनके समान कोई पाँचवाँ वीर मेरे सुननेमें नहीं आया। ये सभी

परस्पर समान बलशाली तथा (मौका पड़नेपर) एक-दूसरेको जीतनेके लिये उत्सुक रहे हैं। इनके मनमें एक-दूसरेके प्रति सदा रोष भरा रहा और ये परस्पर बाहुयुद्ध करना चाहते रहे हैं। इस आधारपर मैं भीमसेनका पता पा लेता हूँ और मेरे मनमें स्पष्टरूपसे यह बात आ जाती है कि पाण्डव अवश्य जीवित हैं।

तत्राहं कीचकं मन्ये भीमसेनेन मारितम् ॥
सैरन्ध्रीं द्रौपदीं मन्ये नात्र कार्या विचारणा ।
अब मुझे ऐसा लगता है कि विराटनगरमें कीचकको भीमसेनेने ही मारा है। सैरन्ध्रीको मैं द्रौपदी समझता हूँ। इस विषयमें कोई अधिक विचार नहीं करना चाहिये।

शङ्के कृष्णानिमित्तं तु भीमसेनेन कीचकः ॥
गन्धर्वव्यपदेशेन हतो निशि महाबलः ।
को हि शक्तः परो भीमात् कीचकं हन्तुमोजसा ॥
शस्त्रं विना बाहुवीर्यात् तथा सर्वाङ्गचूर्णने ।
मर्दितुं वा तथा शीघ्रं चर्ममांसास्थिचूर्णितम् ॥
मुझे संदेह है कि द्रौपदीके निमित्तसे भीमसेनेने ही गन्धर्वका नाम धारण करके रात्रिके समय महाबली कीचकको मारा होगा। भीमसेनके सिवा दूसरा कौन ऐसा वीर है, जो बिना अस्त्र-शस्त्रके केवल शारीरिक शक्ति और बाहुबलसे कीचकको मार सके तथा उसके सम्पूर्ण अंगोंको चूर-चूर करने और शीघ्रतापूर्वक अस्थि, चर्म एवं मांसके उस चूर्णसमुदायको मसलकर मांसपिण्ड बना देनेमें समर्थ हो?।

रूपमन्यत् समास्थाय भीमस्यैतद् विचेष्टितम् ।
ध्रुवं कृष्णानिमित्तं तु भीमसेनेन सूतजाः ॥
गन्धर्वव्यपदेशेन हता युधि न संशयः ।
अतः यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है कि दूसरा रूप धारण करके भीमसेनेने ही यह पराक्रम किया है। गन्धर्वनामधारी भीमने ही कृष्णाके लिये रातके समय सूतपुत्रोंका वध किया है, इसमें संशय नहीं है।

पितामहेन ये चोक्ता देशस्य च जनस्य च ॥
गुणास्ते मत्स्यराष्ट्रस्य बहुशोऽपि मया श्रुताः ।
विराटनगरे मन्ये पाण्डवाश्छन्नचारिणः ॥
निवसन्ति पुरे रम्ये तत्र यात्रा विधीयताम् ।
पितामह भीष्मने युधिष्ठिरके निवासके प्रभावसे देश और जनसमुदायके जो गुण बताये हैं, उनमें भी बहुत-से गुण मत्स्यराष्ट्रमें (दूतोंद्वारा) मेरे सुननेमें आये हैं। इससे मैं मानता हूँ कि पाण्डव राजा विराटके रमणीय नगरमें निवास करते और छद्मवेष धारण करके गुप्तरूपसे विचरते हैं, अतः वहाँकी यात्रा करनी चाहिये।

मत्स्यराष्ट्रं हनिष्यामो ग्रहीष्यामश्च गोधनम् ॥

गृहीते गोधने नूनं तेऽपि योत्स्यन्ति पाण्डवाः ।
अपूर्णे समये चापि यदि पश्येम पाण्डवान् ।
द्वादशान्यानि वर्षाणि प्रवेक्ष्यन्ति पुनर्वनम् ॥
हमलोग वहाँ चलकर मत्स्यराष्ट्रको तहस-नहस करेंगे और राजा विराटके गोधनपर अपना अधिकार कर लेंगे। उनके गोधनका अपहरण कर लेनेपर निश्चय ही पाण्डव भी हम लोगोंके साथ युद्ध करेंगे। ऐसी दशामें यदि अज्ञातवासका समय पूर्ण होनेसे पूर्व ही हम पाण्डवोंको देख लेंगे, तो उन्हें पुनः दूसरी बार बारह वर्षोंके लिये वनमें प्रवेश करना पड़ेगा।
तस्मादन्यतरेणापि लाभोऽस्माकं भविष्यति ।
कोषवृद्धिर्हिहास्माकं शत्रूणां निधनं भवेत् ॥
कथं सुयोधनं गच्छेद युधिष्ठिरभृतः पुरा ।
एतच्चापि वदत्येष मात्स्यः परिभवान्मयि ॥
अतः दोमेंसे एक भी हो जाय, तो भी हमें लाभ ही होगा। इस रणयात्रासे हमारे कोषकी वृद्धि होगी और शत्रुओंका नाश हो जायगा। मत्स्यदेशका राजा विराट मेरे प्रति तिरस्कारका भाव रखकर यह भी कहा करता है कि पूर्वकालमें धर्मराज युधिष्ठिरने जिसका पालन-पोषण किया हो, वह दुर्योधनके अधिकारमें कैसे जा सकता है?।
तस्मात् कर्तव्यमेतद् वै तत्र यात्रा विधीयताम् ।
एतत् सुनीतं मन्येऽहं सर्वेषां यदि रोचते ॥)
अतः निश्चय ही मत्स्यदेशपर आक्रमण करना चाहिये। वहाँकी यात्रा अवश्य की जाय। यदि आप सब लोगोंको अच्छा लगे, तो मैं इस कार्यको नीतिके अनुकूल मानता हूँ।

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि चारप्रत्याचारे कृपवाक्ये एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें गुप्तचर भेजनेके विषयमें कृपाचार्यवचनसम्बन्धी उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २० श्लोक मिलाकर कुल ३४ श्लोक हैं।)


* जब शत्रुको शक्ति अपने बराबर हो, तब उसके प्रति साम और भेदनीतिका प्रयोग करना चाहिये अर्थात् उससे समझौता करना या उसकी सेनामें फूट डालनी चाहिये। यदि शत्रु अपनेसे अधिक शक्तिशाली हो, तो वहाँ दाननीतिका प्रयोग उचित है अर्थात् उसे धन, रत्न आदि भेंट देकर शान्त करना चाहिये। यदि अपनी ही शक्ति अधिक हो, तो उसे दण्ड देना या युद्धमें मार गिराना चाहिये। अतः अपने और विपक्षीके बलाबलका ज्ञान प्राप्त करना अत्यन्त आवश्यक है।