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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

About this granth

The Madhava Nidana (माधव निदान), also called the Rugvinishchaya, is Madhavakara's treatise on the diagnosis of disease in Ayurveda. He gathered the diagnostic material scattered through the works of Charaka, Sushruta and Vagbhata into one ordered text, which became the standard Ayurvedic work on identifying illness. Each disease is examined through the five aspects of diagnosis: cause, early signs, symptoms, response to trial treatment and pathogenesis.

This scan is the July 2007 (Samvat 2064) edition of Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, giving the Sanskrit verses with the Hindi commentary of Dattaram, son of Shrikrishnalal. The preface discusses the place of diagnosis, the patient, the physician and medicine in Ayurveda.

The detailed contents show the range of the work: fevers and their forms in the tissues, sannipata, diarrhoea, grahani, the varieties of breathing disorders, the effects of alcohol, epilepsy, defects of semen and impotence, among many others, with passages cited from Sushruta and others.

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भाषाटीकासमेत । ( २०३ )
अब प्लीहोदरके लक्षण कहता हूँ तू सुन। विदाही ( वंशकरीरादि अर्थात् दाह
करनेवाली ) और अभिष्यन्दी ( दध्यादि ) अर्थात् स्रोत ( छिद्र ) रोकनेवाली ऐसे
अन्न निरन्तर सेवन करनेवाले पुरुषके अत्यन्त दुष्ट भये जो रुधिर और कफ बढकर
प्लीहा ( तापतिल्ली ) को बढावें इस उदरको प्लीहोत्थ उदर कहते हैं, यह बाईं-
तरफ बढता है। इस अवस्था में रोगी बहुत दुःख पाता है, देहमें मन्दज्वर होय,
मन्दाग्नि होय तथा कफ पित्तोदरके लक्षण इसमें मिलते हैं, बल क्षीण हो अत्यन्त
पीला वर्ण होय ॥
यकृदाल्युदरके लक्षण ।
सव्यान्यपार्श्वे यकृति प्रदुष्टे ज्ञेयं यकृद्धाल्युदरं तदेव ॥ १८ ॥
दहने तरफ जो यकृत् कहिये कलेजा है वह दुष्ट कहिये रोगके होनेसे प्लीहोदरके
समान उदर होय उसको यकृद्दाल्युदर कहते हैं। दोषोंकरके यकृतका भेद होय है
इसीसे यकृद्दालि उदर कहते हैं ॥
इसमें दोषोंका सम्बन्ध कहते हैं-
उदावर्त्तरुजानाहैर्मोह तृड्दहनज्वरैः ।
गौरवारुचिकाठिन्यैर्विद्यात्तत्र मलान्क्रमात् ॥ १९ ॥
उदावर्त्त, शूल, अफरा इनसे वायु, मोह, प्यास, ज्वर इनसे पित्त और भारीपना,
अरुचि, कठिनता इनसे कफ ऐसे क्रमपूर्वक दोषोंका सम्बन्ध जानना ॥
बद्धगुदोदरके लक्षण ।
यस्यांत्रमन्नैरुपलेपिभिर्वा बालाश्मभिर्वा पिहितं यथावत् ।
संचीयते तस्य मलः सदोषः शनैः शनैः संकरवच्च नाड्याम् ॥२०॥
निरुध्यते तस्य गुदे पुरीषं निरेति कृच्छ्रादतिचाल्पमल्पम् ।
हृन्नाभिमध्ये परिवृद्धिमेति तस्योदरं बद्धगुदं वदन्ति ॥ २१ ॥
जिस पुरुषकी आंत उपलेप कहिये गाढे अन्न करके (शाकादिक अथवा बाल
तथा बारीक पत्थरके टुकडे करके ) बद्ध हो जाय, उस पुरुषका दोषयुक्त मल धीरे
धीरे आंतडीकी नलीमें होकर जैसे बुहारीसे झारा तृण धूर आदि क्रमसे बढे है
इसी प्रकार बढे और वह मल बडे कष्टसे गुदद्वारा थोडा थोडा निकलै, जब मलका
निकलना बन्द हो जाय तब मल दोषोंकरके गुदासे ऊपर आवै इसीसे उदर बढे
है अर्थात् हृदय और नाभिके मध्य अन्नपाकस्थानकी वृद्धि हो इसीसे इस उदरको
१ यकृद्धालयति दोषैर्भेदयतीति यकृद्धाल्युदरम् ।
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( २०४ ) माधवनिदान ।

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( २०४ ) माधवनिदान ।
बद्धगुदोदर कहते हैं । अथवा गुदाके ऊपर आंतोंको बद्ध होनेसे बद्धगुद कहते हैं ।
यह चरकका मत है ॥
क्षतोदरके लक्षण ।
शल्यं तथान्नोपहितं यदन्त्रं भुक्तं भिनत्त्यागतमन्यथा वा ।
तस्मात्स्रुतोऽन्त्रात्सलिलप्रकाशः स्रावः स्रवेद्वै गुदतस्तु भूयः॥२२॥
नाभेरधश्चोदरमेति वृद्धिं निस्तुद्यते दाल्यति चातिमात्रम् ।
एतत्परिस्राव्युदरं प्रदिष्टं-
कांटा धूल आदिके साथ मिलकर पेटमें चला जाय अथवा पक्वाशयसे शल्या-
दियुक्त अन्न विलोम (टेढ़ा तिरछा ) चलाजाय तब आंतोंको काटे और सीधा जाय
तो नहीं काटे, अथवा जम्भाई अति अशन करनेसे आंत फटजाय सो चरकमें
लिखा भी है उन फटे आंतोंके गलित पानीके समान स्राव पुनः गुदाके मार्ग होकर
झरै, नाभिके नीचेका भाग बढ़ै, नोचनेकीसी तथा भेद ( चीरने ) कीसी पीडासे
अत्यन्त व्यथित होय, इस क्षतोदरको ग्रन्थान्तरमें परिस्रावि उदर कहते हैं और
इसीको छिद्रोदर कहते हैं यह गयदासका मत है ॥
जलोदरकी उत्पत्ति और लक्षण ।
-दकोदरं कीर्तयतो निबोध ॥ २३ ॥
यः स्नेहपीतोऽप्यनुवासितो वा वान्तो विरक्तोऽप्यथवा निरूढः ।
पिबेज्जलं शीतलमाशु तस्य स्रोतांसि दूष्यन्ति हि तद्वहानि ॥ २४॥
स्नेहोपलिप्तेष्वथ वापि तेषु दकोदरं पूर्ववदभ्युपैति ।
स्निग्धं महत्तत्परिवृद्धनाभि समाततं पूर्णमिवाम्बुना च ॥
यथा दृतिः क्षुभ्यति कम्पते च शब्दायते चापि दकोदरं तत् ॥२५॥
अब जलोदर कैसे होय है? उसको कहते हैं सुनो, जिसने स्नेह ( घृततैलादि ) पान
करा होय अथवा अनुवासनबस्ति करी हो, वमन करा हो अथवा दस्त करे हों अथवा
निरूहबस्ति करी होय, ऐसा पुरुष शीतलजल पीवे तब उसकी जल बहनेवाली
नसोंके मार्ग तत्काल दुष्ट होय हैं, वे उदक बहनेवाले स्रोत ( मार्ग ) स्नेहसे उपलिप्त
( चिकने ) होनेसे पूर्ववत् ( अर्थात् अन्नरस उपस्नेह न्यायकरके अर्थात् इनको बाहर
लायकर उदरको उत्पन्न करे ) जलोदर होय है उसमें चिकनापन दीखे, ऊंचा होय,
१ " शर्करातृणलोष्टास्थिकंटकैरन्नसंयुतैः । भिद्येतान्त्रं यदा भुक्तैर्जृम्भयात्यशनेन वा ॥"इति॥

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भाषाटीकासमेत । (२०५)
नाभिके पास बहुत ऊंचा होय, चारों ओर तनासा मालूम होय, पानीकी पोट
भरीसी होय जैसे पानीसे भरी पखालमें जल हलै है उसी प्रकार हले, गडगड शब्द-
करे, कांपे इनको जलोदर अर्थात् जलन्धर कहते हैं ॥
साध्यासाध्यविचार ।
जन्मनैवोदरं सर्वं प्रायः कृच्छ्रतमं विदुः ॥ २६ ॥
बलिनस्तदजाताम्बु यत्नसाध्यं नवोत्थितम् ।
सर्व प्रकारके उदर जन्मसे ही प्रायः अत्यन्त कष्टसाध्य होते हैं । बलवान् पुरु-
षके नवीन प्रकट भया हो और उसमें पानी नहीं प्रगट भया हो ऐसा बडे यत्नसे
साध्य होय ॥
पानी नहीं प्रगट भया हो ऐसे उदरके लक्षण चरकमें कहे हैं-
अशोथमरुणाभासं सशब्दं नातिभारिकम् ॥ २७ ॥
सदा गुडगुडायन्तं शिराजालगवाक्षितम् ।
नाभिं विष्टभ्य पायौ तु वेगं कृत्वा प्रणश्यति ॥ २८ ॥
हृद्वंक्षणकटीनाभिगुदं प्रत्येकशूलिनः ।
कर्कशं सृजतो वातं नातिमन्दे च पावके ॥ २९ ॥
लालया विरसे चास्ये मूत्रेऽल्पे संहते विशि ।
अजातोदकमित्येतैर्युक्तं विज्ञाय लक्षणैः ॥ ३० ॥
जातोदकके लक्षण भी चरकमें इस प्रकार कहे हैं सो लिखते हैं-
पयःपूर्णा दृतिरिव क्षोभे शब्दकरं मृदु ।
अप्रव्यक्तशिरं शूनं नितान्तमुदरं महत् ॥ ३१ ॥
आलस्यमास्यवैरस्यं मूत्रं बहुशकृत्स्रुतम् ।
जातोदकस्य लिङ्गं स्यान्मंदोऽग्निः पाण्डुतापि च ॥३२॥ इति।
पक्षाद्वद्धगुदं तूर्ध्वं सर्वं जातोदकं तथा ।
प्रायो भवत्यभावाय च्छिद्रान्त्रं चोदरं नृणाम् ॥ ३३ ॥
बद्धगुदोदर १५ दिवसके पिछाडी असाध्य होता है, उसी प्रकार सब प्रकारके
उदक (पानी) उत्पन्न होनेसे नाशकारक होता है, और छिद्रान्त्रोदर यह प्रायः
नाशक होता है । कदाचित् शल्य अथवा शस्त्रचिकित्सा जैसी होनी चाहिये ऐसी
होय तो उदक (पानी) प्रगट भया उदररोग छिद्रान्त्र अथवा बद्धगुद साध्य होता है.
यह प्रायः इस पदसे सूचना करी ॥

( २०६ ) माधवनिदान ।

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( २०६ ) माधवनिदान ।
असाध्य लक्षण ।
शूनाक्षं कुटिलोपस्थमुपक्लिन्नतनुत्वचम् ।
बलशोणितमांसाग्निपरिक्षीणं च वर्जयेत् ॥ ३४ ॥
जिस उदररोगीके नेत्रोंपर सूजन होय लिंग टेढा हो गया हो, पेटकी त्वचा गीली
तथा पतली होगई हो, बल, रुधिर, मांस और अग्नि ये जिसके क्षीण हो गये हों
ऐसा रोगी त्याज्य है ॥
दूसरे असाध्य लक्षण ।
पार्श्वभङ्गान्नविद्वेषशोथातीसारपीडितम् ।
विरिक्तं चाप्युदरिणं पूर्यमाणं विवर्जयेत् ॥ ३५ ॥
पार्श्वभंग (पसलियोंमें पीडा), अन्नमें अरुचि, शोथ, अतिसार इनसे पीडित और
दस्त करानेसे जिसका पेट फिर पानीसे भरजाय, ऐसे उदररोगीको वैद्य त्यागदेय ॥
इति श्रीपंडितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायाम्
उदररोगनिदानं समाप्तम् ॥
अथ शोथरोगनिदानम् ।
————܀————
शोथकी सम्प्राप्ति ।
रक्तपित्तकफान्वायुर्दुष्टो दुष्टान्बहिः शिराः ।
नीत्वा रुद्धगतिस्तैर्हि कुर्यात्त्वङ्मांससंश्रयम् ॥
सोत्सेधं संहतं शोथं तमाहुर्निचयादतः ॥ १ ॥
कुपित भई वायु स्वकारणसे दुष्टभये रक्तपित्तकफको बाह्यशिरा (बाहरकी
नाडियों) में प्राप्त करके पुनः उन्हीं रक्तपित्त कफसे रुकगया है मार्ग जिसका ऐसा
यह पवन त्वचा और मांस इनके आश्रयसे सूजन उत्पन्न करे, वह सूजन ऊंची और
कठिन होय, इसको रक्तसहित त्रिदोषोंका सम्बन्ध है, इससे इस शोथको सन्निपा-
तात्मक कहते हैं “त्वङ्मांससंश्रयम्” इस पदसे व्रणशोथसे शोथका भेद दिखाया
क्योंकि व्रणशोथकी उत्पत्ति आठ व्रणवस्तुओंमें होती है, सो कहा भी है—“त्वङ्-
मांसशिरास्नाय्वस्थिसन्धिसन्धिकोष्ठमर्माणि इति अष्टौ व्रणवस्तूनि भवंति ” इति ॥
सर्वहेतुविशेषैस्तु रूपभेदान्नवात्मकम् ।
दोषैः पृथग्द्वयैः सर्वैरभिघाताद्विषादपि ॥ २ ॥
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शोथका निदान ।

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भाषाटीकासमेत । ( २०७ )
वह सूजन कारणभेदसे कार्यभेद होकर ९ नौ प्रकारका होय है । यथा-अलग
अलग दोषोंसे ३, द्वन्द्वज ३, सन्निपातज १, अभिघातज १ और विषसे १ ऐसे
सब मिलकर नौ प्रकारका शोथ रोग भया ॥
शोथका निदान ।
शुद्धामया भक्तकृशा बलानां क्षाराम्लतीक्ष्णोष्णगुरूपसेवा ।
दध्याममृच्छाकविरोधिपिष्टगरोपसृष्टान्ननिषेवणं च ॥ ३ ॥
अर्शांस्यचेष्टा वपुषो ह्यशुद्धिर्मर्माभिघातो विषमा प्रसूतिः ।
मिथ्योपचारः प्रतिकर्मणां च निजस्य हेतुः श्वयथोः प्रदिष्टः॥४॥
वमन आदि, ज्वरादिक, अभोजन ( विगुणभोजन ) इनसे जो कृश और बल-
हीन मनुष्योंके क्षारादिकका सेवन सूजनका कारण होय है । तहां नोन, खटाई,
तीखी, उष्ण, भारी वस्तुओंका सेवन, दही अपक्क, मिट्टी, निषिद्ध साग, विरुद्ध
( क्षीरमत्स्यादिक ), पिष्ठी या मैदा वगैरहकी वस्तु, संयोगजविषसे दूषित भये अन्नके
सेवन करनेसे, बवासीर, दण्डकसरतके न करनेसे, शोधनके योग्य दोषोंके न शोध-
नेसे, हृदयादि दोषज कर्मोंके उपघातसे, कच्चा गर्भपात होना, वमनादि पञ्चकर्मोंका
मिथ्यायोग ये सर्वदोषज सूजनके कारण कहे हैं ॥
शोथका पूर्वरूप ।
तत्पूर्वरूपं दवथुः शिरायामोऽङ्गगौरवम् ॥ ५ ॥
सन्ताप, नसोंकी तननेके समान पीडा, देह भारी ये लक्षण सूजन होनेवाले
पुरुषके होते हैं ॥
शोथका सामान्य लक्षण ।
सगौरवं स्यादनवस्थितत्वं सोत्सेधमूष्मा च शिरातनुत्वम् ।
सलोमहर्षश्च विवर्णता च सामान्यलिङ्गं श्वयथोः प्रदिष्टम् ॥ ६ ॥
अंग भारी हो, चित्तमें स्वस्थता न होना, ऊंची सूजन और दाह, नस पतली
होंजायँ, रोमांच और देहका रंग बदल जाय ये सूजनके सामान्य लक्षण हैं ॥
वातजशोथके लक्षण ।
चलस्तनुत्वक्परुषोऽरुणोऽसितः ससुप्तिहर्षार्तियुतोऽनिमित्ततः ।
प्रशाम्यति प्रोन्नमतिप्रपीडितो दिवाबलीस्याच्छ्वयथुः समीरणत्॥७॥
१ बाह्य हेतुसे उत्पन्न हुआ जो मर्मोंका उपघात वह तो आगन्तुज शोथकाही हेतु है ।

( २०८ ) माधवनिदान ।

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( २०८ ) माधवनिदान ।
बादीकी सूजन चञ्चल, त्वचा पतली हो जाय, कठोर हो, लाल, काली तथा
त्वचा शून्य पडजाय, भिन्न भिन्न वेदना हों अथवा रोमांच और पीडा हो, कदा-
चित् निमित्तके बिना शांति हो जाय, उस सूजनके दाबनेसे तत्क्षण ऊपरको उठ
आवे, दिनमें जोर बहुत करे ॥
पित्तशोथके लक्षण ।
मृदुः सगन्धोऽसितपीतरागवान् भ्रमज्वरस्वेदतृषामदान्वितः ।
य उष्यते स्पर्शरुगक्षिरागकृत्स पित्तशोथो भृशदाहपाकवान् ॥ ८ ॥
पित्तकी सूजन नरम, कुछ दुर्गन्धयुक्त, काली, पीली और लाल होय, उसके
होनेसे भ्रम, ज्वर, पसीना, प्यास और मस्तपना ये लक्षण होयँ, दाह होय, हाथ
लगानेसे दूखे, इसीसे नेत्र लाल हों, उसमें अत्यन्त दाह तथा पाक होय ॥
कफजशोथके लक्षण ।
गुरुः स्थिरः पाण्डुररोचकान्वितः प्रसेकनिद्रावमिवाह्निमान्द्यकृत् ।
सकृच्छ्रजन्मप्रशमो निपीडितो नचोन्नमेद्रात्रिबली कफात्मकः ॥९॥
कफकी सूजन भारी, स्थिर, पीली होय है, इसके योगसे अन्नद्वेष, लारौंका
गिरना, निद्रा, वमन, मन्दाग्नि ये लक्षण होयँ तथा इस सूजनकी उत्पत्ति और नाश
बहुतकालमें होय, इसको दबानेसे ऊपरको नहीं उठे, रात्रिमें इसकी प्रबलता हो ॥
द्वन्द्वज और सन्निपातज शोथके लक्षण ।
निदानाकृतिसंसर्गाच्छ्वयथुः स्याद् द्विदोषजः ।
सर्वाकृतिः संनिपाताच्छोथो व्यामिश्रलक्षणः ॥ १० ॥
दो दोषोंका लक्षण और कारण एकत्र मिलनेसे द्वन्द्वज शोथ जानना और सन्नि-
पातसे सूजन होय उसमें वातादिक तीनों दोषोंके लक्षण होते हैं ॥
अभिघातजशोथके लक्षण ।
अभिघातेन शस्त्रादिच्छेदभेदक्षतादिभिः ।
हिमानिलोदध्यनिलैर्भल्लातकपिकच्छुजैः ॥ ११ ॥
रसैः शुकैश्च संस्पर्शाच्छ्वयथुः स्याद्विसर्पवान् ।
भृशोष्मा लोहिताभासः प्रायशः पित्तलक्षणः ॥ १२ ॥
काष्ठादिककी चोट लगनेसे, शस्त्रादिकसे छेदन होनेसे, पत्थर आदिसे फूटनेसे
अथवा घावके होनेसे, आदि शब्दसे लकडी आदिके प्रहार, शीतल पवन लगनेसे
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भाषाटीकासमेत । ( २०९ )
समुद्रकी पवन लगनेसे, भिलावेके तेल लग जानेसे और कौंचकी फलीके स्पर्श
होनेसे जो सूजन होय सो चारों तरफ फैल जाय, अत्यन्त दाह होय, उसका रंग
लाल होय और विशेषकरके इससे पित्तके लक्षण होते हैं ॥
विषजशोथके लक्षण।
विषजः सविषप्राणिपरिसर्पणमूत्रणात् ।
दंष्ट्रादन्तनखाघातादविषप्राणिनामपि ॥ १३ ॥
विण्मूत्रशुक्रोपहतमलवद्वस्त्रसंकरात् ।
विषवृक्षानिलस्पर्शाद्विषयोगावचूर्णनात् ॥ १४ ॥
मृदुश्चलोऽवलम्बी च शीघ्रो दाहरुजाकरः ।
विषवाले प्राणियोंके अंगपर चलनेसे अथवा मूतनेके अथवा निर्विष (विष-
रहित मनुष्यादिक) प्राणियोंके दाढ दांत नख लगनेसे अथवा सविष प्राणियोंकी
विष्ठा मूत्र शुक्र इनसे भरा अथवा मलिन वस्त्र अंगमें लगनेसे अथवा विषवृक्षकी
हवाके लगनेसे अथवा संयोगज विषके अंगमें लगनेसे जो सूजन उत्पन्न होय सो
विषज कहलाती है। वह सूजन नरम, चंचल, भीतर प्रवेश करनेवाली, जल्दी प्रगट
होनेवाली, दाह और पीडा करनेवाली होती है ॥
जिस जिस ठिकाने दोष सूजन उत्पन्न करें उनको कहते हैं-
दोषाः श्वयथुमूर्ध्वं हि कुर्वन्त्यामाशयस्थिताः ॥ १५ ॥
पक्वाशयस्था मध्ये तु वर्चःस्थानगतास्त्वधः ।
कृत्स्नदेहमनुप्राप्ताः कुर्युः सर्वरसं तथा ॥ १६ ॥
आमाशयस्थित दोष ऊपर (उरःस्थानादिकोंमें) सूजनको करें, पक्वाशयमें
स्थित दोष मध्य कहिये उर और पक्वाशय इन दोनोंके बीचमें सूजन करें, मूलस्थान-
गत दोष नीचेके स्थान (पैर आदि) में सूजन करें और सर्व देहमें दोष स्थित
होनेसे सब देहमें सूजनको करते हैं ॥
सूजनके कृच्छादिभेद ।
यो मध्यदेशे श्वयथुः स कष्टः सर्वगश्च यः ।
अधोऽङ्गेऽरिष्टभूतः स्याद्यश्चोर्ध्वं परिसर्पति ॥ १७ ॥
जो सूजन मध्यदेशमें तथा सब शरीरमें होय अथवा सान्निपातिक होय वह कष्ट-
साध्य है और पुरुषके नीचेके अंगमें प्रगट हो, ऊपरको चढे वह असाध्य है और
चकारसे स्त्रीकी सूजन ऊपरसे नीचेको उतरे वह भी असाध्य है ॥
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(२१०) माधवनिदान ।

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(२१०) माधवनिदान ।
असाध्यलक्षण ।
श्वासः पिपासा छर्दिश्च दौर्बल्यं ज्वर एव च ।
यस्य चान्ने रुचिर्नास्ति शोथिनं परिवर्जयेत् ॥ १८ ॥
श्वास, प्यास, वमन, दुर्बलता, ज्वर ये लक्षण होयें और जिसकी अन्नमें अरुचि
होय ऐसे सूजनवाले रोगीको वैद्य त्याग दे ॥
अनन्योपद्रवकृतः शोथः पादसमुत्थितः ।
पुरुषं हन्ति नारीं तु मुखजो गुह्यजो द्वयम् ॥
नवोऽनुपद्रवः शोथः साध्योऽसाध्यः पुरेरितः ॥ १९ ॥
अन्यरोगोंके उपद्रवसे प्रगट न भई हो अर्थात् शोथकेही उपद्रवसे पैदा हुई ऐसी
सूजन पहिले पैरोंमें उत्पन्न हो फिर मुखआदि ऊपरके स्थानोंमें प्राप्त होय (उसको
उलटी सूजन कहते हैं) वह पुरुषका नाश करे और जो प्रथम मुखपर होकर पीछे
पैरोंपे उतरे वह सूजन स्त्रियोंको घातक है और जो प्रथम बस्तिमें होकर सब देहमें
व्याप्त हो वह स्त्रीपुरुष दोनोंकी नाशक है। नवीन और उपद्रवरहित जो सूजन होय
वह साध्य और “अधोऽङ्गेऽरिष्टभूतः” इत्यादि श्लोकमें कही हुई सूजन असाध्य है ॥
शोथके उपद्रव ।
छर्दिस्तृष्णाऽरुचिः श्वासो ज्वरोऽतीसार एव च ।
सप्तकोऽयं सदौर्बल्यः शोथोपद्रवसंग्रहः ॥ २० ॥
छर्दी, प्यास, अरुचि, श्वास, ज्वर, अतिसार, दुर्बलता ये सात सूजनके उपद्रव हैं
यह चरकमें लिखा है ॥
विवर्जयेत्कुक्ष्युदराश्रितं च तथा गले मर्मणि संश्रितं च ।
स्थूलः खरश्चापि भवेद्विवर्ज्यो यश्चापि बालस्थविराबलानाम् ॥२१॥
जो सूजन कोख और उदरमें हो तथा कण्ठ और मर्मस्थानमें हो, मोटी और
खरखरी हो तो असाध्य जाननी चाहिये, बालक तथा वृद्ध स्त्रीके भी स्थूल और
खरखरी हुई सूजन असाध्य जानकर छोड देनी चाहिये ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
शोथरोगनिदानं समाप्तम् ॥
१ अनन्यस्य उपद्रवास्तद्विपरीता अनन्योपद्रवाः। एतेनायमर्थः-शोथस्यैव ये उपद्रवास्तैः कृतः
अथवा अन्यमुपद्रवं करोतीत्यन्योपद्रवकृत् नान्योपद्रवकृदित्यनन्योपद्रवकृत्ततोऽनन्योपद्रवकृत
स्वनिदानाजात इति शेषः। २ “यस्तु पादाभिनिर्वृत्तः शोथः सर्वाङ्गजो भवेत् । पुरुषं हन्ति
नारीं च मुखजो गुह्यजो द्वयम् ॥”
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अथान्डवृद्धिनिदानम् ।

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भाषाटीकासमेत । ( २११ )
अथान्डवृद्धिनिदानम् ।
━◇❖◇━
अण्डवृद्धिकी सम्प्राप्ति ।
क्रुद्धोऽनूर्ध्वगतिर्वायुः शोथशूलकरश्चरन् ।
मुष्कौ वंक्षणतः प्राप्य फलकोशाभिवाहिनीः ॥
प्रपीड्य धमनीर्वृद्धिं करोति फलकोशयोः ॥ १ ॥
कुपित भई अधोगमनशील ( नीचे विचरनेवाली ) तथा सूजन और शूल उत्पन्न
करनेवाली वायु संचार करती हुई वंक्षण ( लिंग और जंघोंकी सन्धि ) से अण्ड-
कोशोंमें आय कर अण्ड और कोश अथवा अण्डोंके कोशोंके बहनेवाली धमनियोंको
दुष्ट कर अण्डकोशकी ( दोनों अंडोंकी अथवा एक ओरके अण्डकी ) वृद्धि करै है॥
दोषास्रमेदोमूत्रान्त्रैः स वृद्धिः सप्तधा गदः ।
मूत्रान्त्रजावप्यनिलाद्धेतुभेदस्तुं केवलम् ॥ २ ॥
वह वृद्धिरोग तीनों दोषोंसे ३, रुधिरसे १, मेदसे १, मूत्रसे १ और आंतोंसे १
ऐसे सात प्रकारका है। मूत्रज और अन्त्रजवृद्धि ये दोनों वायुसे होती हैं, परन्तु इन
दोनोंका निदान चिकित्सा में भेद होनेसे पृथक् ग्रहण करा है। सो लिखा भी है—
“ मूत्रान्त्रजावप्यनिलाद्धेतुभेदस्तु केवलम् ” इति ॥
वातकी अण्डवृद्धिके लक्षण ।
वातपूर्णादृतिस्पर्शो रूक्षो वातादहेतुरुक् ॥ ३ ॥
वातसे भरी मसक जैसी हाथके लगनेसे मालूम होय ऐसा मालूम होय, रूक्ष और
विना कारण दुखने लगे, वह वातकी अंडवृद्धि जाननी ॥
पित्तकी अंडवृद्धिके लक्षण ।
पक्कोदुम्बरसंकाशः पित्ताद्दाहोष्मपाकवान् ।
पित्तकी अंडवृद्धि पके गूलरके समान होय है तथा दाह और गरमी तथा पक-
नेवाली होय है ॥
कफकी अंडवृद्धिके लक्षण ।
कफाच्छीतो गुरुः स्निग्धः कण्डूमान्कठिनोऽल्परुक् ॥ ४ ॥
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
१ क्योंकि कहा भी है—दोषदूष्यसंसर्गादायतनविशेषात् निमित्ततश्चैषां व्याधीनां भेदः ॥
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( २१२ ) माधवनिदान ।

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( २१२ ) माधवनिदान ।
कफसे अंडवृद्धि शीतल, भारी, चिकनी तथा खुजलीयुक्त कठिन और थोडी
पीडायुक्त होय है ॥
रक्तजवृद्धिके लक्षण ।
कृष्णस्फोटावृतः पित्तवृद्धिर्लिङ्गैश्च पित्तजः ।
काले फोडाओंसे व्याप्त तथा जिसमें पित्तवृद्धिके लक्षण मिलते होयँ, उस अण्ड-
वृद्धिको पित्तकी तथा रक्तकी कहते हैं ॥
मेदोजअंडवृद्धिके लक्षण ।
कफवन्मेदसो वृद्धिर्मृदुस्तालफलोपमः ॥ ५ ॥
मेदसे जो अंडवृद्धि होय है वह कफकी वृद्धिके समान मृदु ( नरम ) तथा ताल-
फलके समान हो अर्थात् पीले रंगकी और गोल होय ॥
मूत्रवृद्धिके लक्षण ।
मूत्रधारणशीलस्य मूत्रजः स च गच्छति ।
अम्भोभिः पूर्णदृतिवत्क्षोभं याति सरुङ्मृदुः ॥
मूत्रकृच्छ्रमधः स्याच्च चालयन्फलकोशयोः ॥ ६ ॥
मूत्रको रोकनेका जिसका स्वभाव होय उसको यह रोग होय है, वह पुरुष जब
चले तब पानीसे भरी पखालके समान डबक डबक हले तथा बजे, उसमें और
पीडा थोडी होय, हाथके छूनेसे नरम मालूम होय, उसमें मूत्रकृच्छकीसी पीडा होय,
फल और कोश दोनों इधर उधर चलायमान होयँ ॥
अन्त्रवृद्धिके लक्षण ।
वातकोपिभिराहारैः शीततोयावगाहनैः ।
धारणेरणभाराध्वविषममार्गप्रवर्तनैः ॥ ७ ॥
क्षोभणैः क्षुभितोऽन्यैश्च क्षुद्रान्त्रावयवं यदा ।
पवनो विगुणीकृत्य स्वनिवेशादधो नयेत् ॥
कुर्याद्वंक्षणसन्धिस्थो ग्रन्थाभं श्वयथुं तदा ॥ ८ ॥
वातकोपककारक आहारके सेवन करनेसे, शीतल जलमें प्रवेश करके स्नान करनेसे,
उपस्थित मूत्रादिवेगोंके धारण करनेसे, अप्राप्त वेग अर्थात् करनेकी इच्छा न होय
उसको बलपूर्वक प्रेरणा करनेसे, भारी बोझके उठानेसे, अति मार्गके चलनेसे
अंगोंकी विषम चेष्टा ( अर्थात् टेढा तिरछा अंगोंकरके गमनादिक करना ), बल
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स्थानमें गांठके समान सूजनको प्रगट करे ॥

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भाषाटीकासमेत । (२१३)
वान्‌से वैर करना, कठिन धनुषका ईंचना इत्यादिक ऐसे और कारणोंसे कुपित भई
जो वायु सो छोटी आंतोंके अवयवोंके एकदेशको विगाडकर अर्थात् उसका संकोच
कर अपने रहनेके स्थानसे उसको नीचे ले जाय तब वंक्षणसंधिमें स्थित होकर उस
स्थानमें गांठके समान सूजनको प्रगट करे ॥
इसकी औषधि न करनेका परिणाम ।
उपेक्षमाणस्य च मुष्कवृद्धिमाध्मानरुक्स्तंभवर्तीं स वायुः ।
प्रपीडितोऽन्तः स्वनवान्प्रयाति प्रध्मापयेन्नेति पुनश्च मुक्तः॥ ९॥
जिस अण्डवृद्धिसे अफरा होय, पीडा होय, जडता होय उसकी उपेक्षा करनेसे
अर्थात् औषध न करनेसे तथा अण्डकोशोंके दबानेसे जो वायु कोंकों शब्द करै
तथा हाथके दाबनेसे वायु ऊपरको चढ जाय और छोडनेसे फिर नीचे उतरकर
अण्डोंको फुलाय दे ये होते हैं ॥
असाध्य लक्षण ।
क्षुद्रान्त्रावयवाच्छ्लेष्मा मुष्कयोर्वातसञ्चयात् ।
अण्डवृद्धिरसाध्योऽयं वातवृद्धिसमाकृतिः ॥ १० ॥
छोटी आंतोंके अवयव ( अंगवाला ) कफ वातके सञ्चयसे मुष्कके विषे प्राप्त होय
तथा जिसमें वातके लक्षण कहे वे सब मिलते होयँ वह अण्डवृद्धि असाध्य है ॥
वध्म्र अर्थात् बदरोगका निदान ग्रन्थान्तरमें लिखा है यथा-
वध्म्ररोगनिदान ।
अत्याभिष्यन्दिगुर्वामसेवनान्निचयं गतः ॥ ११ ॥
करोति ग्रन्थिवच्छोफं दोषो वंक्षणसन्धिषु ।
ज्वरशूनाङ्गदाहाढ्यं तं वध्म्रमिति निर्दिशेत् ॥ १२ ॥
यस्य पूर्वं फिरंगाख्यो रोगो भूत्वा प्रशाम्यति ।
तस्य जन्तोर्वध्म्ररोग इत्युक्तं सुश्रुतादिभिः ॥ १३ ॥
तथोष्णवातजुष्टस्य मेढ्रव्रणयुतस्य च ।
तस्य पुंसो वध्म्ररोगं प्रवदन्ति भिषग्वराः ॥ १४ ॥
अभिष्यंदि वस्तुके खानेसे, भारी अन्नके खानेसे, कच्चे अन्नके खानेसे वृद्धिके प्राप्त
हुए दोष अथवा “अत्यभिष्यंदिगुर्वाम” इस जगह “अत्यभिष्यंदिगुर्वन्नशुष्कपूज्या-
मिषाशनात् ” ऐसा भी पाठ है अर्थात् अभिष्यंदि भारी अन्नके खानेसे तथा सूखा

( २१४ ) माधवनिदान ।

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( २१४ ) माधवनिदान ।
और पूज्य कहिये गौ आदिके मांस खानेसे दोष ( वात पित्त कफ ) कुपित होकर
वंक्षणकी संधिमें अर्थात् वस्ति स्थानके समीप जिनको नल कहते हैं उनमें सूजनको
प्रगट करे, उस सूजनके होनेसे ज्वर होय तथा सूजनमें पीडा होय, अंगोंमें अत्यन्त
दाह होय, जिस मनुष्यके पहले फिरंग ( गरमी ) का रोग होकर शान्त होगया
होय उसके यह बदका रोग होता है अथवा गरमीवाले पुरुषके लिंगमें व्रण घाव
होय उसके यह बदरोग होता है ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायाम्
अण्डवृद्धिनिदानं समाप्तम् ॥
अथ गलगण्डनिदानम् ।
निबद्धः श्वयथुर्यस्य मुष्कवल्लम्बते गले ।
महान्वा यदि वा ह्रस्वो गलगण्डं तमादिशेत् ॥ १ ॥
जिसके गलेमें अनुबंधयुक्त बडी अथवा छोटी अंडकोशके समान सूजन होकर
लटके उसको गलगंड कहते हैं ॥
गलगंडकी सम्प्राप्ति ।
वातः कफश्चापि गले प्रदुष्टौ मन्ये समाश्रित्य तथैव मेदः ।
कुर्वन्ति गण्डं क्रमशः स्त्रिलिङ्गैः समन्वितं तं गलगण्डमाहुः ॥ २ ॥
गलेमें दुष्ट भये वात कफ और उसी प्रकार मेद गलेकी दोनों मन्यानाडियोंका
आश्रय लेकर क्रमसे आप अपने लक्षणसंयुक्त गंड ( गोला ) उत्पन्न करै हैं उसको
गलगंडरोग कहते हैं । यह रोग वात कफ और मेद् इन कारणोंसे तीन
प्रकारका है। यह रोग अपने ही स्वभावसे पैत्तिक नहीं होय है, जैसे चातुर्थिक-
ज्वर अपने प्रभावसे जंघोंमें कफका और मस्तकमें वातका प्रथम आता है इसमें भी
पित्तका नहीं होय है, उसी प्रकार इस रोगमें भी जानो ॥
वातिक-गलगंडके लक्षण ।
तोदान्वितः कृष्णशिरावनद्धः श्यावोऽरुणो वा पवनात्मकस्तु ।
पारुष्ययुक्तश्चिरवृद्धिपाको यहच्छया पाकमियात्कदाचित् ॥
वैरस्यमास्यस्य च तस्य जन्तोर्भवेत्तथा तालुगलप्रशोषः ॥ ३ ॥
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भाषाटीकासमेत । ( २१५ )
वातकी गलगण्ड काली नसोंसे व्याप्त होय और उसमें सुईके चुभानेकीसी पीडा
होय, उसका रंग काला और लाल होय, तथा कठोर हो, बहुतकालमें बढे तथा
पके नहीं और जो पके तो कदाचित् यदृच्छापूर्वक पके, उस रोगीके मुखमें विरसता
होय तथा तालु व गलेमें शोष होय ॥
कफज गलगंडके लक्षण ।
स्थिरः सवर्णो गुरुरुग्रकण्डूः शीतो महांश्चापि कफात्मकस्तु ॥ ४ ॥
चिराभिवृद्धिं भजते चिराद्वा प्रपच्यते मन्दरुजः कदाचित् ।
माधुर्यमास्यस्य च तस्य जन्तोर्भवेत्तथा तालुगलप्रलेपः ॥ ५ ॥
कफकी गलगण्ड स्थिर, त्वचाके रंगके समान वर्ण होय, भारी हो, खुजली बहुत
चले, शीतल और बडी होय है, वह बहुत दिनमें बढे और बहुत कालमें पके, पीडा
थोडी होय, मुखमें मिठास होय तथा गलेमें और तालुएमें कफ लिहसासा होय ॥
मेदज गलगण्डके लक्षण ।
स्निग्धो गुरुः पाण्डुरनिष्टगन्धो मेदोभवः स्वल्परुजोऽतिकण्डूः ।
प्रलम्बतेऽलाबुवदल्पमूलो देहानुरूपक्षयवृद्धियुक्तः ॥
स्निग्धास्यता तस्य भवेच्च जन्तोर्गलेऽनुशब्दं कुरुते च नित्यम् ॥६॥
मेदसे प्रगट गलगण्ड चिकना होय, भारी, पीला वर्ण, दुर्गन्धयुक्त, मन्द पीडा
करनेवाला और अत्यन्त खुजली चले, वह तुम्बीफलके समान लम्बा होय, उसकी
जड छोटी होय और देहानुरूप क्षय और वृद्धि इनसे युक्त होय अर्थात् देहके क्षीण
होनेसे क्षीण होजाय, देहके बढनेसे बढजाय, उसका मुख तेल लगा होय ऐसा
चिकना होय और बोलते समय गलेसे दो शब्द निकलें ॥
असाध्य लक्षण ।
कृच्छ्राच्छ्वसन्तं मृदुसर्वगात्रं संवत्सरातीतमरोचकार्तम् ।
क्षीणं च वैद्यो गलगण्डजुष्टं भिन्नस्वरं चापि विवर्जयेत्तु ॥ ७ ॥
बडे कष्टसे श्वासलेनेवाला, नरम शरीरवाला, जिसके गलगण्ड होकर वर्षदिन
व्यतीत होगया हो, अरुचिसे पीडित, क्षीण होगया हो और स्वरभेदयुक्त ऐसे
गलगण्डपीडित मनुष्यको वैद्य त्यागदे ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मित्तमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
गलगण्डनिदानं समाप्तम् ॥

( २१६ ) माधवनिदान ।

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( २१६ ) माधवनिदान ।
अथ गण्डमालानिदानम् ।
————
कर्कन्धुकोलामलकप्रमाणैः कक्षांसमन्यागलवंक्षणेषु ।
मेदःकफाभ्यां चिरमन्दपाकैः स्याद्गण्डमाला बहुभिश्च गण्डैः ॥ १ ॥
मेद और कफ इनसे प्रगट भया कांख, कन्धा, नाड़के पिछाडी मन्या नाडीमें,
गलेमें और वंक्षण ( जानुमेद्रूसन्धि ) इन ठिकाने छोटे बेरके बराबर, बड़े बेरके
समान, आमलेके समान, ऐसी अनेक प्रकारकी गण्ड होती हैं, वे बहुत दिनमें हौले
हौले पकें उनको गण्डमाला कहते हैं ॥
अपचीके लक्षण ।
ते ग्रन्थयः केचिदवाप्तपाकाः स्रवन्ति नश्यन्ति भवन्ति चान्ये ।
कालानुबन्धं चिरमादधाति सैवापचीति प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥ २ ॥
अब गण्डमालाका भेद अपची है उसको कहते हैं—पूर्वोक्त गण्डमालाकी गांठ
पके नहीं अथवा पाक होनेसे स्रवे, कोई नष्ट होजाय, दूसरी नवीन उठे ऐसी पीडा
बहुत दिन रहे उसको कोई अपची कहते हैं ॥
असाध्य और साध्यके लक्षण ।
साध्या स्मृता पीनसपार्श्वशूलकासज्वरच्छर्दियुता न साध्या ।
पूर्वोक्त अपची रोग साध्य है और उसमें पीनस होय, पसवाडोंमें शूल, खांसी,
ज्वर, वमन ये होंय तो अपची असाध्य है ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
गण्डमाला ( अपची ) निदानं समाप्तम् ॥
अथ ग्रन्थिनिदानम् ।
————
वातादयो मांसमसृक्प्रदुष्टाः सन्दूष्य मेदश्च तथा शिराश्च ।
वृत्तोन्नतं विग्रथितं तु शोथं कुर्वन्त्यतो ग्रन्थिरिति प्रदिष्टः ॥ १ ॥
अत्यन्त दुष्ट हुए वातादि दोष मांस, रुधिर और मेद, उसी प्रकार शिरा ( नस )
इनको दुष्ट कर ( इस जगह दुष्टका अर्थ वृद्धि करना चाहिये, क्षयरूप न करना
चाहिये कारण इसका यह है कि, क्षीण विकारोंकी सामर्थ्य रोग करनेकी नहीं
होती है ) गोल ऊंची गांठके समान अथवा कठिन सूजनको उत्पन्न करे उसको
ग्रन्थि ( गांठ ) कहते हैं ॥
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भाषाटीकासमेत। (२१७)
वातजग्रन्थिके लक्षण।
आयम्यते वृश्च्यति तुद्यते च प्रत्यस्यते मथ्यति भिद्यते च ।
कृष्णो मृदुर्बस्तिरिवाततश्च भिन्नः स्रवेच्चानिलजोऽस्रमच्छम् ॥ २ ॥
वादीकी गांठ तनेके समान करडी मालूम हो, छीलनेके समान मालूम हो, सुई
चुभनेकीसी पीडा होय, मानो गिरा चाहती है, मथनेकीसी पीडा होय, फोडनेकीसी
पीडा होय, काला वर्ण हो, नरम हो, बस्तिके समान चौडी और भारी होय और
उसके टूटनेसे स्वच्छ रुधिर निकले ॥
पित्तकी ग्रन्थिके लक्षण।
दन्दह्यते धूप्यति चूष्यते च पापच्यते प्रज्वलतीव चापि ।
रक्तः सपीतोऽप्यथवापि पित्ताद्भिन्नः स्रवेद्दुष्टमतीव चास्रम् ॥ ३ ॥
पित्तकी गांठ आगसे भरेके समान अत्यन्त दाह करे, आंतोंसे धूआं निकलतासा
मालूम हो, चूष्यते कहिये मानो सिंगी लगायके कोई चूसे है, खार लगानेके सदृश
पका मालूम होय, अग्निके समान जलीसी मालूम होय, उस गांठका रंग लाल अथवा
किंचित् पीला होय और टूटनेसे उसमेंसे दुष्ट रुधिर बहुत निकले ॥
कफकी ग्रन्थिके लक्षण।
शीतो विवर्णोऽल्परुजोऽतिकण्डूः पाषाणवत्संहननोपपन्नः ।
चिराभिवृद्धिश्च कफप्रकोपाद्भिन्नः स्रवेच्छुक्लघनं च पूयम् ॥ ४ ॥
कफकी ग्रन्थि (गांठ) शीतल, प्रकृति समान वर्ण, (कोई किंचित् विवर्ण हों
ऐसे कहते हैं) थोडी पीडा हो अत्यन्त खुजली चले, पत्थरके समान कठिन बडी
होय और चिरकालमें बढनेवाली होय, फूटनेसे उसमेंसे सफेद गाढी राध निकले ॥
मेदजग्रन्थिके लक्षण।
शरीरवृद्धिक्षयवृद्धिहानिः स्निग्धो महान्कण्डुयुतो गुरुश्च ।
मेदःकृतो गच्छति चात्र भिन्ने पिण्याकसर्पिःप्रतिमं तु मेदः ॥ ५ ॥
मेदकी ग्रंथि शरीरके बढनेसे बढे और शरीरके क्षीण होनेसे क्षीण होजाय, चिकनी
बडी खुजलीयुक्त पीडारहित होय है और जब वह फूट जाय तब उसमेंसे तिल-
कल्कके समान अथवा घृतके समान मेदा निकले ॥
शिराजग्रन्थिके लक्षण।
व्यायामजातैरबलस्य तैस्तैराक्षिप्य वायुस्तु शिराप्रतानम् ।
संकुच्य संपीड्य विशोष्य चापि ग्रन्थि करोत्युन्नतमाशु वृत्तम् ॥ ६ ॥
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( २१८ ) माधवनिदान ।

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( २१८ ) माधवनिदान ।
निर्बलपुरुष शरीरको परिश्रमकारक कर्म करे तब वायु कुपित होकर शिराके
जालको संकुचित कर एकत्रकर और सुखायकर ऊंची गांठको शीघ्र प्रगट करै है ॥
साध्यासाध्यके लक्षण ।
ग्रन्थिः शिराजः स च कृच्छ्रसाध्यो भवेद्यदि स्यात्सरुजश्चलश्च ।
अरुक्स एवाप्यचलो महांश्च मर्मोत्थितश्चापि विवर्जनीयः ॥ ७ ॥
वह शिरा (कहिये नस) की गांठ कृच्छ्रसाध्य है, यदि वह पीडायुक्त तथा चञ्चल
होय तो वह गांठ साध्य है, और पीडारहित तथा निश्चल बडी और मर्मस्थानमें
प्रगट भई होय तो वह असाध्य है, उसको वैद्य त्याग दे ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाधुरीभाषाटीकायां
ग्रन्थिनिदानं समाप्तम् ॥
अथार्बुदनिदानम् ।
अर्बुदकी सम्प्राप्ति ।
गात्रप्रदेशे काचिदेव दोषाः समुच्छ्रिता मांसमसृक्प्रदूष्य ।
वृत्तं स्थिरं मन्दरुजं महान्तमनल्पमूलं चिरवृद्ध्यपाकम् ॥
कुर्वन्ति मांसोच्छ्रयमत्यगाधं तदर्बुदं शास्त्रविदो वदन्ति ॥ १ ॥
शरीरके किसी भागमें दुष्ट भये जो दोष सो मांस रुधिरको दुष्ट कर गोल, स्थिर,
मन्दपीडायुक्त, यह ग्रन्थिरोगसे बडी होय है, बडी जिसकी जड होय, बहुत
कालमें बढनेवाली तथा पकनेवाली न होय ऐसी मांसकी गांठ उठे उसको वैद्य
अर्बुद कहते हैं ॥
वातेन पित्तेन कफेन चापि रक्तेन मांसेन च मेदसा च ।
उज्जायते तस्य च लक्षणानि ग्रन्थेः समानानि सदा भवन्ति ॥ २ ॥
वह अर्बुदरोग बादीसे, पित्तसे, कफसे, रुधिरसे, मांससे और मेदसे ऐसे छः
प्रकारका है । उसके लक्षण सर्वदा ग्रंथिके सदृश होते हैं ॥
रक्तार्बुदके लक्षण ।
दोषः प्रदुष्टो रुधिरं शिराश्च संकुच्य संपीड्य ततस्त्वपाकम् ।
सास्रावमुन्नह्यति मांसपिण्डं मांसांकुरैराचितमाशु वृद्धम् ॥ ३ ॥
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भाषाटीकासमेत । ( २१३ )
करोत्यजस्रं रुधिरप्रवृत्तिमसाध्यमेतद्रुधिरात्मकं तु ।
रक्तक्षयोपद्रवपीडितत्वात्पाण्डुर्भवेत्सोऽर्बुदपीडितस्तु ॥ ४ ॥
दुष्ट भये दोष रुधिरको तथा नसोंको संकोच कर तथा पीडित कर मांसके गोलेको
प्रगट करे वह यत्किंचित् पकनेवाला तथा कुछ स्रावयुक्त हो, मांसपिंडको ऊंचा
करता हो और मांसांकुरसे व्याप्त और शीघ्र बढनेवाला होता है. उसमें रुधिर निर-
न्तर बहा करें, यह रक्तार्बुद असाध्य है। वह रक्तार्बुदपीडितरोगी रक्तक्षयके उप-
द्रवोंकरके पीडित होनेसे उसका वर्ण पीला हो जाय । ये रक्तार्बुदके लक्षण हैं ॥
मांसार्बुदकी संप्राप्ति ।
मुष्टिप्रहारादिभिरर्दितेऽङ्गे मांसं प्रदुष्टं जनयेद्धि शोथम् ॥ ५ ॥
अवेदनं स्निग्धमनन्यवर्णमपाकमश्मोपममप्रचाल्यम् ।
प्रदुष्टमांसस्य नरस्य गाढमेतद्भवेन्मांसपरायणस्य ॥ ६ ॥
मांसार्बुदं त्वेतदसाध्यमुक्तं-
मुक्काआदिका लगनेसे अंगमें पीडा होय, उस पीडासे दुष्ट भया मांस सो सूजन
उत्पन्न करे, उस सूजनमें पीडा नहीं होय और वह चिकनी देहके वर्ण होय पके
नहीं, पत्थरके समान कठिन, हले नहीं ऐसा होय है । जिस मनुष्यका मांस बिगड
जाय और नित्य मांसको खाया करे उसको यह अर्बुदरोग होता है । यह मांसार्बुद
असाध्य कहा है । कोई मांसार्बुदका भेद रसोली कहते हैं ॥
साध्यमें असाध्य प्रकार ।
-साध्येष्वपीमानि तु वर्जयेच्च ।
संप्रस्रुतं मर्मणि यच्च जातं स्रोतःसु या यच्च भवेदचाल्यम् ॥ ७ ॥
साध्यमें भी यह इन लक्षणोंवाला अर्बुदरोग वर्जित है, स्राव ( झरे ) और
मर्मस्थानमें प्रगट भया हो, अथवा नासा आदि स्रोत ( मार्ग ) में प्रगट हो और
जो स्थित हो, वह असाध्य है ॥
अध्यर्बुदके लक्षण ।
यज्जायतेऽन्यत्खलु पूर्वजाते ज्ञेयं तदध्यर्बुदमर्बुदज्ञैः ।
पहले जिस ठिकानेपर अर्बुद भया होय उसी ठिकानेपर दूसरा अर्बुद प्रगट
होय उसको अध्यर्बुद कहते हैं ॥
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(२२०) माधवनिदान ।

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(२२०) माधवनिदान ।
द्विरर्बुदके लक्षण ।
यद्वन्द्वजातं युगपत्क्रमाद्वा द्विरर्बुदं तच्च भवेदसाध्यम् ॥ ८ ॥
एक कालमें दो अर्बुद, अथवा एकके पिछाडी दूसरा अर्बुद क्रमसे प्रगट होय
उसको द्विरर्बुद कहते हैं, यह असाध्य हैं ॥
अर्बुद न पकनेका कारण ।
न पाकमायान्ति कफाधिकत्वान्मेदोबहुत्वाच्च विशेषतस्तु ।
दोषस्थिरत्वाद् ग्रथनाच्च तेषां सर्वार्बुदान्येव निसर्गतस्तु ॥ ९ ॥
कफ अधिक होनेसे अथवा विशेषकरके मेद अधिक होनेसे, तथा दोषोंके
स्थिर होनेसे अथवा दोषोंके ग्रन्थिरूप होनेसे सर्व प्रकारकी अर्बुद स्वभावसे ही
पके नहीं हैं ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकाया-
मर्बुदनिदानं समाप्तम् ॥
अथ श्लीपदनिदानम् ।
श्लीपदकी सम्प्राप्ति ।
यः सज्ज्वरो वंक्षणजो भृशार्तिः शोथो नृणां पाद्गतः क्रमेण ।
तच्छ्लीपदं स्यात्करकर्णनेत्रशिश्रौष्ठनासास्वपि केचिदाहुः ॥ १ ॥
जो सूजन अत्यन्त पीडायुक्त प्रथम वंक्षणमें उत्पन्न होकर धीरे धीरे पैरोंमें आवै
उसके साथ ज्वर भी हो सो इस रोगको श्लीपद कहते हैं। यह श्लीपद हाथ, कान,
नेत्र, शिश्न, ओठ, नाक इनमें भी होती है, ऐसे कोई कहते हैं ॥
वातजश्लीपद ।
वातजं कृष्णरूक्षं च स्फुटितं तीव्रवेदनम् ।
अनिमित्तरुजं तस्य बहुशो ज्वर एव च ॥ २ ॥
वातकी श्लीपद काली, रूखी, फटी और जिसमें तीव्र पीडा होय, बिना कारणके
दूखे और उसमें ज्वर बहुत होय ॥

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भाषाटीकासमेत । (२२१)
पित्तजश्लीपद ।
पित्तजं पीतसंकाशं दाहज्वरयुतं मृदु ।
पित्तकी श्लीपद पीले रंगकी, दाह और ज्वरयुक्त होय तथा नरम होय है ॥
श्लैष्मिकश्लीपद ।
श्लैष्मिकं स्निग्धवर्णं च श्वेतं पाण्डु गुरु स्थिरम् ॥ ३ ॥
कफकी श्लीपदका वर्ण चिकना, सफेद, पीला, भारी और कठिन होय है ॥
असाध्य लक्षण ।
वल्मीकमिव सञ्जातं कण्टकैरुपचीयते ।
अब्दात्मकं महत्तच्च वर्जनीयं विशेषतः ॥ ४ ॥
सर्पकी बांबीके समान बढी हुई और जिसके ऊपर कांटे होयँ, ऐसी एक वर्षकी
होगई हो और बडी होय उसको वैद्य त्याग दे ॥
श्लीपदमें कफको प्राधान्य अव्यभिचारकरके है उसको कहते हैं-
त्रीण्यप्येतानि जानीयाच्छ्लीपदानि कफोच्छ्रयात् ।
गुरुत्वं च महत्त्वं च यस्मान्नास्ति विना कफात् ॥ ५ ॥
इन पूर्वोक्त तीनों श्लीपदोंमें कफकी अधिकता है कारण इसका यह है कि, भारी
और महत्त्व ये दोनों कफके बिना नहीं होते ॥
श्लीपद कौनसे देशमें उत्पन्न होता है उसको कहते हैं-
पुराणोदकभूयिष्ठाः सर्वर्तुषु च शीतलाः ।
ये देशास्तेषु जायन्ते श्लीपदानि विशेषतः ॥ ६ ॥
वर्षार्ऋतुमें पानी अधिक वर्षे परन्तु पृथ्वीके नीचे होनेसे सूखे नहीं इसीसे पुराने
पानीका संचय ( इकट्ठा ) होय और सर्व ऋतुमें सरदी रहाकरे ऐसे जो अनूपदेश
( पूर्व आदि देश ) उनमें यह श्लीपदरोग विशेषकरके होय है । जांगल देशोंमें
अग्निका अधिक अंश होय है इससे उन देशोंमें जलको पुरातनत्व नहीं होय है और
अनूपदेशमें गरमी मन्द पडनेसे उष्ण ऋतुमें भी शीतलता होय है, हाथ कान
आदिमें श्लीपदरोगकी शंका होनेसे दोषोंके कोपद्वारा ज्वर करके श्लीपदको जान ले ॥
असाध्य लक्षण ।
यच्छ्लेष्मलाहारविहारजातं पुंसः प्रकृत्या च कफात्मकस्य ।
सास्रावमत्युन्नतसर्वलिङ्गं सकण्डुरं श्लेष्मयुतं विवर्ज्यम् ॥ ७ ॥

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( २२२ ) माधवनिदान ।

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( २२२ ) माधवनिदान ।
जो श्लीपद कफकारक आहार विहारसे प्रगट भया तथा कफप्रकृतिवाले पुरुषके
कफसे प्रगट भया होय, तथा स्रावयुक्त तथा जिस दोषसे प्रगट भया होय उस
दोषके लक्षण उसमें बढ़ गये होयँ, जिसमें खुजली बहुत होय और कफयुक्त होय
सो श्लीपदरोगी वैद्यकरके त्याज्य है ॥
इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरानिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
श्लीपदनिदानं समाप्तम् ॥
अथ विद्रधिनिदानम् ।
त्वग्रक्तमांसमेदांसि प्रदुष्यास्थिसमाश्रिताः ।
दोषाः शोथं शनैर्घोरं जनयन्त्युच्छ्रिता भृशम् ॥ १ ॥
महाशूलं रुजावन्तं वृत्तं वाप्यथवायतम् ।
स विद्रधिरिति ख्यातो विज्ञेयः षड्विधश्च सः ॥ २ ॥
पृथग्दोषैः समस्तैश्च क्षतेनाप्यसृजा तथा ।
षण्णामपि हि तेषां तु लक्षणं संप्रचक्षते ॥ ३ ॥
अत्यन्त बढ़े तथा अस्थि ( हड्डी ) का आश्रय करके रहनेवाले वातादिदोष त्वचा,
रुधिर, मांस और मेद इनको दुष्ट कर धीरे धीरे भयंकर शोथ उत्पन्न करे, उसकी जड
हड्डीपर्यन्त पहुँच जाय, उत्पत्तिकालमें अत्यंत पीडाकारक तथा गोल अथवा लंबा
जो शोथ ( सूजन ) होय उसको विद्रधि कहते हैं पृथक् दोषोंसे ३, सन्निपातसे १,
क्षत ( घाव ) से १ और रुधिरसे १ मिलकर छः प्रकारकी विद्रधि होय हैं, उन
छःहों विद्रधिके लक्षण कहते हैं ॥
वातजविद्रधिके लक्षण ।
कृष्णोऽरुणो वा विषमो भृशमत्यर्थवेदनः ।
चित्रोत्थानप्रपाकश्च विद्रधिर्वातसंभवः ॥ ४ ॥
जो विद्रधि काली लाल विषम कहिये कदाचित् छोटी कदाचित् मोटी हो
अत्यन्त वेदनायुक्त और उसका प्रगट होना तथा पाक ये नाना प्रकारके होयँ
उसको वातविद्रधि कहते हैं ॥
पित्तकी विद्रधिके लक्षण ।
पक्वोदुम्बरसंकाशः श्यावो वा ज्वरदाहवान् ।
क्षिप्रोत्थानप्रपाकश्च विद्रधिः पित्तसंभवः ॥ ५ ॥
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