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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 221 of 404

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Page 221

भाषाटीकासमेत । ( २०३ )
अब प्लीहोदरके लक्षण कहता हूँ तू सुन। विदाही ( वंशकरीरादि अर्थात् दाह
करनेवाली ) और अभिष्यन्दी ( दध्यादि ) अर्थात् स्रोत ( छिद्र ) रोकनेवाली ऐसे
अन्न निरन्तर सेवन करनेवाले पुरुषके अत्यन्त दुष्ट भये जो रुधिर और कफ बढकर
प्लीहा ( तापतिल्ली ) को बढावें इस उदरको प्लीहोत्थ उदर कहते हैं, यह बाईं-
तरफ बढता है। इस अवस्था में रोगी बहुत दुःख पाता है, देहमें मन्दज्वर होय,
मन्दाग्नि होय तथा कफ पित्तोदरके लक्षण इसमें मिलते हैं, बल क्षीण हो अत्यन्त
पीला वर्ण होय ॥
यकृदाल्युदरके लक्षण ।
सव्यान्यपार्श्वे यकृति प्रदुष्टे ज्ञेयं यकृद्धाल्युदरं तदेव ॥ १८ ॥
दहने तरफ जो यकृत् कहिये कलेजा है वह दुष्ट कहिये रोगके होनेसे प्लीहोदरके
समान उदर होय उसको यकृद्दाल्युदर कहते हैं। दोषोंकरके यकृतका भेद होय है
इसीसे यकृद्दालि उदर कहते हैं ॥
इसमें दोषोंका सम्बन्ध कहते हैं-
उदावर्त्तरुजानाहैर्मोह तृड्दहनज्वरैः ।
गौरवारुचिकाठिन्यैर्विद्यात्तत्र मलान्क्रमात् ॥ १९ ॥
उदावर्त्त, शूल, अफरा इनसे वायु, मोह, प्यास, ज्वर इनसे पित्त और भारीपना,
अरुचि, कठिनता इनसे कफ ऐसे क्रमपूर्वक दोषोंका सम्बन्ध जानना ॥
बद्धगुदोदरके लक्षण ।
यस्यांत्रमन्नैरुपलेपिभिर्वा बालाश्मभिर्वा पिहितं यथावत् ।
संचीयते तस्य मलः सदोषः शनैः शनैः संकरवच्च नाड्याम् ॥२०॥
निरुध्यते तस्य गुदे पुरीषं निरेति कृच्छ्रादतिचाल्पमल्पम् ।
हृन्नाभिमध्ये परिवृद्धिमेति तस्योदरं बद्धगुदं वदन्ति ॥ २१ ॥
जिस पुरुषकी आंत उपलेप कहिये गाढे अन्न करके (शाकादिक अथवा बाल
तथा बारीक पत्थरके टुकडे करके ) बद्ध हो जाय, उस पुरुषका दोषयुक्त मल धीरे
धीरे आंतडीकी नलीमें होकर जैसे बुहारीसे झारा तृण धूर आदि क्रमसे बढे है
इसी प्रकार बढे और वह मल बडे कष्टसे गुदद्वारा थोडा थोडा निकलै, जब मलका
निकलना बन्द हो जाय तब मल दोषोंकरके गुदासे ऊपर आवै इसीसे उदर बढे
है अर्थात् हृदय और नाभिके मध्य अन्नपाकस्थानकी वृद्धि हो इसीसे इस उदरको
१ यकृद्धालयति दोषैर्भेदयतीति यकृद्धाल्युदरम् ।
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