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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 233 of 404

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Page 233

भाषाटीकासमेत । ( २१५ )
वातकी गलगण्ड काली नसोंसे व्याप्त होय और उसमें सुईके चुभानेकीसी पीडा
होय, उसका रंग काला और लाल होय, तथा कठोर हो, बहुतकालमें बढे तथा
पके नहीं और जो पके तो कदाचित् यदृच्छापूर्वक पके, उस रोगीके मुखमें विरसता
होय तथा तालु व गलेमें शोष होय ॥
कफज गलगंडके लक्षण ।
स्थिरः सवर्णो गुरुरुग्रकण्डूः शीतो महांश्चापि कफात्मकस्तु ॥ ४ ॥
चिराभिवृद्धिं भजते चिराद्वा प्रपच्यते मन्दरुजः कदाचित् ।
माधुर्यमास्यस्य च तस्य जन्तोर्भवेत्तथा तालुगलप्रलेपः ॥ ५ ॥
कफकी गलगण्ड स्थिर, त्वचाके रंगके समान वर्ण होय, भारी हो, खुजली बहुत
चले, शीतल और बडी होय है, वह बहुत दिनमें बढे और बहुत कालमें पके, पीडा
थोडी होय, मुखमें मिठास होय तथा गलेमें और तालुएमें कफ लिहसासा होय ॥
मेदज गलगण्डके लक्षण ।
स्निग्धो गुरुः पाण्डुरनिष्टगन्धो मेदोभवः स्वल्परुजोऽतिकण्डूः ।
प्रलम्बतेऽलाबुवदल्पमूलो देहानुरूपक्षयवृद्धियुक्तः ॥
स्निग्धास्यता तस्य भवेच्च जन्तोर्गलेऽनुशब्दं कुरुते च नित्यम् ॥६॥
मेदसे प्रगट गलगण्ड चिकना होय, भारी, पीला वर्ण, दुर्गन्धयुक्त, मन्द पीडा
करनेवाला और अत्यन्त खुजली चले, वह तुम्बीफलके समान लम्बा होय, उसकी
जड छोटी होय और देहानुरूप क्षय और वृद्धि इनसे युक्त होय अर्थात् देहके क्षीण
होनेसे क्षीण होजाय, देहके बढनेसे बढजाय, उसका मुख तेल लगा होय ऐसा
चिकना होय और बोलते समय गलेसे दो शब्द निकलें ॥
असाध्य लक्षण ।
कृच्छ्राच्छ्वसन्तं मृदुसर्वगात्रं संवत्सरातीतमरोचकार्तम् ।
क्षीणं च वैद्यो गलगण्डजुष्टं भिन्नस्वरं चापि विवर्जयेत्तु ॥ ७ ॥
बडे कष्टसे श्वासलेनेवाला, नरम शरीरवाला, जिसके गलगण्ड होकर वर्षदिन
व्यतीत होगया हो, अरुचिसे पीडित, क्षीण होगया हो और स्वरभेदयुक्त ऐसे
गलगण्डपीडित मनुष्यको वैद्य त्यागदे ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मित्तमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
गलगण्डनिदानं समाप्तम् ॥